वो पक्षी हैं उनमें बस जान है, हम इंसान हैं

Bird Flu: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में पोंग डैम के इलाक़े को बर्ड फ्लू का एपी सेंटर माना जा रहा है, यहां बीते हफ्ते एक दिन में क़रीब 2400 प्रवासी पक्षियों की मौत हुई है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 8, 2021, 9:30 PM IST
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वो पक्षी हैं उनमें बस जान है, हम इंसान हैं
देश के 6 राज्‍य बर्ड फ्लू से प्रभावित हैं. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)
पक्षियों का एक वैज्ञानिक है. जो बचपन से उन्ही के बीच पला बढ़ा है. उस वैज्ञानिक को पक्षियों से इतना प्यार है कि उन्हें चोट ना लग जाए इस डर से वो अपने घर के पंखे भी चालू नहीं करता है. उस वैज्ञानिक को पता चलता है कि मोबाइल के टॉवर से निकलने वाली रेडियोधर्मी तरंगे पक्षियों को नुकसान पहुंचा रही हैं. इसकी वजह से पक्षियों की असमय मौत हो रही है. वो इस बात को समझाने के लिए सरकार से लेकर मोबाइल चलाने वाली कंपनियों के उच्च अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने की कोशिश करता है. लेकिन हर जगह उसकी बात को नकार दिया जाता है. वो सड़क पर उतर कर आंदोलन भी करता है लेकिन कोई फायदा नहीं होता है. आखिरकार वो आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है. और आगे चलकर वो पक्षीराजा नाम से एक दैत्य (इंसानों की नज़र में) में बदल जाता है. इस तरह वो इंसानो से पक्षियों की मौत का बदला लेता है. रोबोट 2.0 फिल्म की इस कहानी में जब इंसानों की रक्षा करने वाला रोबोट चिट्टी पक्षीराजा से मुकाबला करता है तो वो उसे हराने के लिए पक्षियों को सामने ले आता है. चूंकि पक्षीराजा चिड़ियों को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है इसलिए वो हार जाता है. इस तरह मानव सभ्यता कहानी के अंत में अपनी बेचारगी औऱ निर्दोषता को मासूमियत के साथ दिखाने की एक नाकाम कोशिश करती है. हालांकि फिल्म के अंत में पक्षीराजा के साथ सहानुभूति जुड़ती है. लेकिन, ये सहानुभूति तब तक के लिए ही है जब तक पक्षीराजा का खुद का नुकसान हो रहा है.

दरअसल, रोबोट 2.0 की कहानी का अंत हमारी वो हकीकत बयान करता है जो हम अंदर से हैं. राजस्थान, हिमाचल, मध्य प्रदेश, केरल में जैसे ही पक्षियों के मरने की खबर आई. अफरा तफरी में मरे हुए कौओं की जांच के लिए उन्हें भोपाल के हाई-सिक्योरिटी लैब में भेज दिया गया. जैसे ही यहां से बर्ड फ्लू के परिणाम की पुष्टि हुई. तुरंत पोल्ट्री फार्म को बंद करने के निर्देश दे दिये गए. खबर आ रही है कि पक्षियों के मरने की संख्या 70 हज़ार से ऊपर पहुंच गई है.

हर खबर में इससे मानव जीवन को होने वाले नुकसान, उस पर खतरे, औऱ उसके बचाव की बात की जा रही है. लेकिन तमाम खबरों में पक्षियो की मौत से जुड़ी संवेदना नदारद नज़र आती है. हम इंसान ये मान कर चलते हैं कि मौत से होने वाला नुकसान तभी गणना के योग्य होता है जब किसी इंसान की जान जाती है. यहां तक कि संवेदनाएं भी तभी उग्र होती हैं, जब इंसान मरता है. जानवर शब्द से तो जिंदगी के जाने का अहसास ही नहीं मिलता है. ये बात और है कि जानवर शब्द में जान ही अहम है, लेकिन हमारे लिए तो जानवर या तो सामाजिक बर्ताव के तौर पर प्रयोग किया गया नकारात्मक शब्द है या फिर एक नगण्य स्थूल चीज जो है तो लेकिन जिसके अस्तित्व को लेकर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जाता है.

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में पोंग डैम के इलाक़े को बर्ड फ्लू का एपी सेंटर माना जा रहा है, यहां बीते हफ्ते एक दिन में क़रीब 2400 प्रवासी पक्षियों की मौत हुई है. वहीं मध्य प्रदेश के इंदौर में पिछले हफ्ते से कौवों की मौत हो रही है और उनमें बर्ड फ्लू की पुष्टि हुई है. इसके बाद प्रशासन ने बर्ड फ्लू का अलर्ट जारी कर दिया.
दरअसल इंदौर के डेली कॉलेज कैंपस में रात में कौवे रुकने आते हैं. वहां पर पिछले एक हफ्ते से रोज़ाना 20-30 कौवे सुबह मरे मिल रहे थे. इन कौवों का भोपाल की राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान में परीक्षण कराया गया. इनमें बर्ड फ्लू पाया गया था. इंदौर में अब तक 150 से ज्यादा कौओ की मौत हो चुकी है. मध्य प्रदेश में पक्षियों के बैठने वाली जगह को डिसइन्फेक्ट करवाया गया, पेड़ों के नीचे लोगों को जाने या बैठने पर रोक लगा दी गई है, पक्षियों को पॉलिथीन में बंद करके ज़मीन में दबाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं. जिससे ये पक्षी किसी भी तरह से सीधे मानव के संपर्क में आकर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा पाएं. इसके अलावा हरियाणा के बरवाला में बीते कुछ दिनों के अंदर ही क़रीब एक लाख मुर्ग़ियों की मौत हो चुकी है, वहीं, राजस्थान में कौवों के मरने का सिलसिला जारी है. झालावाड़ ज़िले में कई कौवों की मौत हुई है और माना जा रहा है कि ऐसा एवियन इंफ्लूएंजा या बर्ड फ्लू फैलने की वजह से हो रहा है. केरल में कुछ बत्तख़ों के टेस्ट करने पर उनमें भी बर्ड फ्लू निकला है. यही नहीं केरल में 12,000 बतखों की मौत हो चुकी है, जिसके बाद कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य भी सतर्क हो गए हैं.

इन तमाम मौतों से एक तबका है जो सबसे ज्यादा चिंता में हैं, वो है व्यापारी तबका. मुर्गा, बतख का हर दिन का करोड़ों का कारोबार है, अब बर्ड फ्लू के फैलने के बाद इस नुकसान की चिंता ज़रूर सभी को सताने लगी है. इसलिए वो तमाम अलग-अलग माध्यमों से ये बताने में लगे हुए हैं कि पोल्ट्री फार्म पर बर्ड फ्लू का असर नहीं पड़ा है. खास बात ये है कि मुर्गा खाने का शौक रखने वाला तबका जो बगैर चिकन के रह नहीं पाता है, जैसे ही उसे मौत का खतरा नज़र आता है वो तुरंत चिकन से सामाजिक दूरी बनाना शुरू कर देता है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआलेकिन ये सब कुछ तभी तक है जब तक खुद पर मौत का खतरा मंडरा रहा हो. पक्षियों की मौत से किसी को कुछ लेना देना नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो 2019 में जब राजस्थान की सबसे बड़ी खारे पानी की सांभर झील के पास 10 हज़ार से अधिक पक्षी की मौत हुई तो सरकार और तमाम तरह के संगठन उसकी तह में जाने की कोशिश करते. लेकिन इसके बजाए ये हुआ कि जेसीबी से गड्ढा करके तमाम मरे हुए पक्षियों को उसमें दफ्ना दिया गया. इस मामले पर उच्च न्यायालय ने ज़रूर स्वत: संज्ञान लेकर राजस्थान सरकार से जवाब मांगा था. सरकार ने अपने जवाब में कहा था कि प्रवासी पक्षियों की मौत वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन सहित दूसरी वजह से हो रही है, जिसमें उनका इतनी दूर से उड़ कर आना, पर्याप्त भोजन ना मिल पाने और प्रदूषण की वजह से बीमार पड़ना बताया गया. पक्षियों की मौत के तीन बड़े कारणों का भी अनुमान लगाया गया.

जिसमें -पहला, जो पक्षी मरे, वो दलदल में दब गए थे और उनमें कीड़े लगने लगे थे, दूसरे पक्षी इन्हें खाकर मरने लगे. कुल मिलाकर सरकार का ज़ोर ये साबित करने पर था कि पक्षियों की मौत का कारण बर्ड फ्लू नहीं था.

दूसरा, यह घटना 'हाइपर नकट्रेमिया' यानी पानी में सोडियम की अत्यधिक मात्रा होने के कारण नशा होने से हुई थी. ये बात औऱ है कि वन विभाग के पास एक्सपर्ट, लैब और संसाधन ही नहीं थे. मौत के पीछे तीसरा कारण जो सामने आया वो यह था कि जहां घटना हुई है, झील के उस क्षेत्र में पानी काफी लंबे समय से नहीं था, इस वजह से नमक काफी गाढ़ा हो गया था, बारिश में जब उसमें पानी आया तो इससे नमक जहरीला बन गया. हालांकि ये बात महज़ खानापूर्ति के तौर पर ही की गई थी. जैसे ही मरने का सिलसिला थमा, जांच का सिलसिला भी थम गया.

ऐसा ही हुआ था मवेशियों के साथ
1990 में यू.के में जब इस बात का पता चला था कि वो वहां फार्म में मीट के लिए पाली जाने वाली गायों को एक बीमारी ने घेर लिया है, जिसका नाम बोविन स्पोन्जिफोर्म एन्सिफेलोपेथी (बीएसई) या मेड काउ डिजीज दिया गया था. तो उस दौरान इंसानों में इसका खतरा ना फैले इसके लिए हज़ारों गायों को जिंदा जला दिया गया था. बाद में वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की थी कि मीट के सेवन से ये तभी फैल सकता है जब गायों के तंत्रिका ऊतक या किसी बीमारी से जुड़े अऩ्य अंग का सेवन ठीक से पकाए बगैर किया गया हो. प्रियान नाम के वायरस से फैलने वाली इस बीमारी के फैलने की वजह की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि जिस जानवर में प्रियान वायरस मौजूद है, अगर उसके मांस का सेवन दूसरे जानवर कर लेते हैं तो उन्हें ये रोग हो जाता है. अब यहां सवाल ये खड़ा होता है कि गाय, भेड़, बकरी, जिनमें ये बीमारी पाई जाती है, वो सभी तो शाकाहारी होते हैं फिर उनमें ये बीमारी कहां से आ गई. कुछ शोध से ऐसा पता चला था कि शाकाहारी जानवरों को ज्यादा मांसल बनाने के लिए उनके भोजन में दूसरे जानवरों के उन अंगों को मिलाया गया था जो इंसानों के खाने के काम नहीं आते थे. इस तरह इस बीमारी ने जन्‍म लिया. हालांकि इस बात की वैज्ञानिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है लेकिन ये बात एक सवाल ज़रूर खड़ा करती है.

ये सारी बातें इसलिए कि इतनी संख्या में या इसकी आधी संख्या में भी इंसानों की मौत हो जाती तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होती? इसका जवाब बीते दिनों सड़क मार्ग से दिल्ली लौटने के दौरान मिला. जब हमारी गाड़ी को किसान आंदोलन की वजह से मार्ग बदल कर दिल्ली में जाना पड़ा. हुआ यूं कि रास्ते भर हमारे साथ मौजूद एक शख्स किसान आंदोलन, बेचारे किसान, किसानों की व्यथा की कथा सुनाते रहे और अपने क्रांतिकारी आंदोलन से हमें व्यथित करते रहे. इस तरह बात करते हुए जब हम दिल्ली सीमा पर पहुंचे और किसान आंदोलन की वजह से हमारा मार्ग परिवर्तित हुआ तो हमारे घर पहुंचने में एक घंटे की देरी होने लगी. क्रांतिकारी शख्स अपनी पत्नी से बात करते हुए कह रहे थे, इन कंबख्त किसानों ने जीना हराम कर रखा है. तो वो तो किसान थे, जो मर रहे हैं वो बस पक्षी हैं, और बाकि हमें कुछ नहीं होना चाहिए क्योंकि हम इंसान हैं. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: January 8, 2021, 9:14 PM IST
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