पर्यटन उद्योग पर पड़ने वाला असर एक चेतावनी

वर्ल्ड वाइड फंड यानि डब्ल्यू डब्ल्यू एफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीते 50 सालों में वन्यजीवन में दो तिहाई गिरावट देखने को मिली है. रिपोर्ट बताती है कि इस विनाशकारी गिरावट में किसी तरह की कमी के आसार भी नज़र नहीं आ रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 15, 2020, 5:49 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
पर्यटन उद्योग पर पड़ने वाला असर एक चेतावनी
भारत में लगभग 8 फीसदी वैश्विक प्रजातियां जंगल में पाई जाती है
षड़यंत्र सिद्धांत पर आधारित वेबसीरिज यूटोपिया की कहानी दवा उद्योग और महामारी के इर्द गिर्द बुनी गई है. कुछ जवानों का समूह यूटोपिया नाम की कॉमिक्स के चित्रों के ज़रिए समाज में फैलाए जा रहे विनाश के षड़यंत्र का पता लगाते हैं. कहानी एक रूपक के तौर पर चलती है जिसमें खलनायक को मिस्टर रैबिट नाम दिया गया है. पूरी श्रंखला में आप एक नाम बार बार सुनते हैं, संस्थान. दरअसल संस्थान ऐसी जगह है जहां पर दुनिया भर के उन बच्चों को रखा जाता है जो या तो अनाथ थे या उनके माता-पिता ने उन्हें किसी मजबूरी में वहां छोड़ दिय है. इन बच्चों का इस्तमाल ठीक वैसे ही किया जाता है जैसे इंसान अपनी बीमारी का इलाज खोजने के लिए खरगोश या दूसरे जानवरों का करता है. बच्चों को पिंजरेनुमा घऱ में रखना, उनकी बाहरी जिंदगी से कोई वास्ता ना होना. उनके कुछ अच्छा करने पर उन्हें किशमिश देना. जैसे बहुत सारे रूपक जानवरों के साथ होने वाले अत्याचार पर से पर्दा उठाते हैं. श्रंखला के अंत में जब मिस्टर रैबिट का राज फाश होता है तो पता चलता है कि एक वैक्सीन बनाई जा रही है जिसका उद्देश्य किसी को मारना नहीं बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से को नपुंसक करना है. जिससे तीन पीढियों तक जनसंख्या पर नियंत्रण रहे और दूसरी प्रजातियों को पनपने का मौका मिले, जिनके हिस्से को इंसानो ने उनसे छीन लिया है.

वर्ल्ड वाइड फंड यानि डब्ल्यू डब्ल्यू एफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीते 50 सालों में वन्यजीवन में दो तिहाई गिरावट देखने को मिली है. रिपोर्ट बताती है कि इस विनाशकारी गिरावट में किसी तरह की कमी के आसार भी नज़र नहीं आ रहे हैं. जंगलों के जलने से लेकर समुद्र और नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण के जरिए वन्यजीव के पतन के लिए हम सारे तरीके अपना रहे हैं.

ये आंकड़े बेहद डरावने हैं
संवर्धन वैज्ञानिकों ने दुनिया भर की हजारो विभिन्न तरह की वन्य प्रजातियों पर नज़र रखते हुए रिपोर्ट तैयार की है, जो बताती है कि 1970 से अभी तक तमाम तरह के स्तनपाई, पक्षी, समुद्री जीवों की करीब 20,000 प्रजातियों में 68 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है. ज़ूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों की ये रिपोर्ट बताती है कि हम इंसानो ने अपने पैर जमाने के लिए कितनो के पैर जड़ों से उखाड़ दिये हैं.
कोरोना महामारी के दौर में तो हमें लगातार ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं जो बताते हैं कि हमारा हस्तक्षेप किस कदर बढ़ गया है. जंगली जानवरों के अलावा हाल ही में एक शहर में समुद्री सील सड़कों पर घूमती हुई पाई गई थी. वन्यजीवों के घरों में आए बदलाव और उनके इस तरह सड़कों पर घूमते पाए जाने के पीछे रिपोर्ट में जो अहम वजह पाई गई है. उनके मुताबिक 2000 से अब तक 1 करोड़ 90 लाख वर्गकिलोमीटर क्षेत्र अलग-अलग आपदाओं, नदियों के विनाश या दूसरी गतिविधियों की वजह से हमने खो दिया है. ये क्षेत्र इतना बड़ा है कि इसमें 8 यूके समा जाएं. इसके अलावा करीब 10 लाख वन्य प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं. वहीं 130 करोड़ टन खाना हर साल बरबाद होता है. चूंकि हमे हर बात को पैसों के साथ तोलने की आदत पड़ गई है तो इसको भी अगर अर्थ के लिहाज से देखें तो इसका मतलब है करीब 1 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान दुनिया भर को झेलना पड़ रहा है.

हालांकि कुछ मॉडल बताते हैं कि हम इस विनाश को रोक सकते हैं और कुछ हद तक वापस पुरानी स्थिति में भी ला सकते हैं बस कुछ बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत हैं, जैसे जंगलों के संवर्धन और संरक्षण पर गंभीरता से काम करना होगा, वहीं खाद्य उत्पादन और उनके उपभोग के तरीकों में तुरंत बदलाव लाना पड़ेगा. लेकिन इससे भी ज्यादा ज़रूरी है कि हमारी प्रकृति को लेकर जो पर्यटन वाली प्रवृत्ति है उससे निजात पानी होगी. हम प्रकृति को जितना उसके हाल पर छोड़ेंगे उतना ही वो विकास करेगी.

जो दिख रहा है नुकसान उतना ही नहींधरती पर मौजूद जीवन को होने वाले नुकसान या उसके विनाश को पूरी तरह आंकड़ों में समेट पाना बेहद जटिल और काफी हद तक असंभव है. इसलिए वैज्ञानिक अलग अलग तरीकों को अपनाकर अनुमान की गणऩा करते हैं. मसलन जिस रिपोर्ट का हम ज़िक्र कर रहे हैं उसके ज़रिये भी ये तो पता चल सकता है कि कितना वन्यजीव विनाश की कगार पर है लेकिन इससे कितनी प्रजातियां खत्म हो गई या विनाश की कगार पर हैं ये बता पाना मुश्किल होता है. जैसे रिपोर्ट से पता चलता है कि सबसे ज्यादा नुकसान लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्रों में हुआ है जहां सरीसृप, उभयचरों और पक्षियों की करीब 94 फीसद प्रजातियों को नुकसान पहुंचा है.

इसके अलावा इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्ज़र्वेशन ऑफ नेचर के विलुप्त हो रही प्रजातियों पर दिए गए आंकड़े बताते हैं कि पौधों और जीवों की करीब 1 लाख प्रजातियों में से 32 हज़ार लुप्त होने की कगार पर हैं. वहीं 2019 में वैज्ञानिकों के एक दल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पिछले दशक में ही करीब 10 लाख पौधों और जीवों की प्रजातियों विनाश की कगार पर पहुंच गई हैं.

एक नज़र भारत पर
भारत में लगभग 8 फीसदी वैश्विक प्रजातियां जंगल में पाई जाती है. वन्यजीवों को विलुप्त होने से रोकने के लिये सबसे पहले 1872 में वाइल्ड एलीफेंट प्रिजर्वेशन एक्ट पारित किया गया था. इसके बाद 1927 में भारतीय वन अधिनियम अस्तित्व में आया, इस रानून के मुताबिक वन्य जीवों के शिकार एवं वनों की अवैध कटाई को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया. आज़ादी के बाद, भारत सरकार ने इंडियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थापना की, 1956 में फिर से भारतीय वन अधिनियम पारित किया गया . इसके बाद 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पारित हुआ . यह एक व्यापक केन्द्रीय कानून है, जिसमें विलुप्त होते वन्य जीवों तथा अन्य लुप्त प्राय: प्राणियों के संरक्षण का प्रावधान है। वन्य जीवों की चिंतनीय स्थिति में सुधार एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिये राष्ट्रीय वन्यजीव योजना , 1983 में प्रारंभ की गई . इसके बाद बीते दस सालों में वन्य संरक्षण अधिनियम, नदियों और पर्यावरण से जुड़े तमाम अधिनियमों में जो संशोधन किए गए वो कुल मिलाकर प्रकृति और इससे जुड़े जीवों को एक रेवेन्यू मॉडल की तरह देखता है. यही नहीं मार्च 2019 में भारतीय वन अधिनियम में एक संशोधन प्रस्तावित किया गया, इसमें वन अधिकार अधिनियम के तहत दिए गये अधिकारों को समाप्त करने के प्रावधानों के बारे में कहा गया है. यही नहीं हाल के वर्षों में भारत की संरक्षण नीतियां कोई संदेह नहीं छोड़ती हैं क्योंकि देश संरक्षण के मॉडल को आगे बढ़ाने पर आमादा है। जबकि अन्य देश समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल के मूल्य को पहचान रहे हैं. भारत तेजी से उल्टी दिशा में आगे बढ़ रहा है.

इसके अलावा हमें हर चीज़ में अर्थ नज़र आ रहा है. जंगल सफारी से लेकर घड़ियाल और अब गंगा डॉल्फिन (सूंस) सफारी की पहल बताती है कि हम किस तरह हर जगह बाज़ार तलाश रहे हैं. जीप मे बैठ कर वाओ वाओ करते हम प्रकृति प्रेमी या बोट पर सवार होकर घड़ियाल से लेकर सूंस को निहारते हम गंगा पुत्रों के घरों के अंदर तो छोड़िए अगर कहीं गली में भी एक बंदर आ जाता है तो हम दिन भर घर से बाहर नहीं निकलते हैं. और हम बगैर किसी वन्य जीव की इजाजत लिए उसकी निजता की परवाह किए उसके घरों में घुस जाते हैं. ऐसे में कोराना काल में पर्यटन उद्योग पर जो असर पड़ा है हमें उसे एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: October 15, 2020, 5:49 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर