ना नदिया, ना बहे धारा... सत्ता बहाए सिर्फ किनारा

पर्यावरणविदों की चिंता इस बात को लेकर है कि डैम के सुरक्षा तंत्र को सिर्फ उसके निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि उसके परिचालन में जो खामियां है उस पर ध्यान दिया जाना बेहद ज़रूरी है. 2018 में केरला में आई बाढ़ के बाद जो रिपोर्ट पेश की गई उसमें यही बात निकल कर आई की राज्य भर के 79 डैम में से कोई भी बाढ़ को निंयत्रित करने के लिए तैयार नहीं है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 2, 2020, 11:43 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
ना नदिया, ना बहे धारा... सत्ता बहाए सिर्फ किनारा
डैम के सुरक्षा तंत्र को सिर्फ उसके निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि उसके परिचालन में जो खामियां है उस पर ध्यान दिया जाना बेहद ज़रूरी है. (प्रतीकात्मक)
एतराज़ फिल्म में वकील बने अन्नू कपूर, कोर्ट में अपनी दलील की शुरुआत करते हुए कहते हॆं कि औरत एक नदी की तरह होती है. वो जब अपनी सीमाओं में बहती है तो लाती है खुशहाली, हरियाली और जब वो सीमाओं को लांघती है तो लाती है बरबादी विनाश. और नदी की सीमा क्या है, ये सरकारें तय करती हैं. वर्तमान सरकार तो पूरी तरह से नदियों को अपनी छड़ी से हांकने का मन बना चुकी है. वो इन पर हर कीमत पर नियंत्रण चाहती है. इसके लिए नदियां तो छोड़ो, राज्य सरकारों तक के अधिकार छीनने का मन बनाया जा चुका है. ऐसा लगता है कि अब नदियों के निजीकरण का वक्त आ चुका है.

केंद्र सरकार ने 2019 में तीन बिल पेश किए थे. पहला रिवर बेसिन मेनेजमेंट बिल 2019 जिसके तहत भारत की 13 नदी के बेसिन के लिए प्राधिकरण का प्रस्ताव है. दूसरा है नदी जल विवाद विधेयक 2019 इसमें एक विवाद समीति बनाए जाने का प्रस्ताव है. तीसरा है सबसे अहम बांध सुरक्षा प्राधिकरण विधेयक.ये विधेयक उन सभी बांधो पर लागू होगा जिनकी ऊंचाई 15 मीटर या 10 से 15 मीटर के बीच की ऊँचाई वाले केवल वही बांध जिनके डिज़ाइन और स्ट्रक्चर विधेयक में निर्दिष्ट विशेषताओं वाले हों. विधेयक में देश भर के निर्दिष्ट बांधों की निगरानी, निरीक्षण, परिचालन और रखरखाव संबंधी प्रावधान रखे गए है. विधेयक में इन बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये भी संस्थागत प्रणाली का प्रावधान किया गया है.

देश में फिलहाल 5344 बड़े डैम हैं जो काम कर रहे हैं इसके अलावा 447 डैम निर्माणाधीन हैं. वहीं हज़ारों मंझोले और छोटे डैम मौजूद है. इनमें करीब 25 फीसद बांध 50 से 100 साल से ऊपर के हैं. करीब 80 फीसद बांद 25 साल से ज्यादा पुराने हैं. इनकी सुरक्षा की बात होना बेहद ज़रूरी है. इनमें हुई एक ज़रा सी चूक से हज़ारो की जान चली जाती है.


भारत में 1980 से इस विधेयक में एकरूपता लाने की कोशिश की जा रही थी. यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि देश में कुल 5,344 बांधों में से 92 फीसदी बांधों का निर्माण एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवाहित होने वाली नदियों पर किया गया है जिनमें से 293 बांध 100 साल से अधिक भी पुराने हैं. और इस विधेयक को लेकर कई राज्यों का कहना है कि इस विधेयक के ज़रिए केंद्र सरकार सुरक्षा के बहाने राज्यों से उनके अधिकार छीनने की तैयारी कर रही है, जबकि पानी राज्य का मामला होता है. मसलन तमिलनाडु को विधेयक की धारा 24 (1) को लेकर परेशानी है जो कहती है कि अगर डैम किसी एक राज्य की संपत्ति है लेकिन उसका निर्माण दूसरे राज्य की सीमा में हुआ है तो ऐसे में विवाद को रोकने के लिए केंद्र का उस पर नियंत्रण रहेगा .
वहीं पर्यावरणविदों की चिंता इस बात को लेकर है कि डैम के सुरक्षा तंत्र को सिर्फ उसके निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि उसके परिचालन में जो खामियां है उस पर ध्यान दिया जाना बेहद ज़रूरी है. 2018 में केरला में आई बाढ़ के बाद जो रिपोर्ट पेश की गई उसमें यही बात निकल कर आई की राज्य भर के 79 डैम में से कोई भी बाढ़ को निंयत्रित करने के लिए तैयार नहीं है.


इन दिनों मौसम में बदलाव की वजह से जिस तरह से बारिश का रुख देखने को मिल रहा है, उसकी वजह से पूरे मौसम की बजाए बस कुछ ही दिन बारिश होती है, ये बारिश काफी तेज और लगातार होती है. जिसकी वजह से डैम में पानी भर जाता है औऱ उन्हें खोल दिया जाता है जिसकी वजह से आस पास का क्षेत्र हर साल डूब में आ जाता है औऱ कई गांव और शहर हर साल अपना बोरिया बिस्तर समेटते रहते हैं. गुजरात को हरा भरा रखने के लिए नर्मदा पर बनाए गए सरदार सरोवर डैम से हर साल ये नौबत आती है कि मध्यप्रदेश की तरफ के कई गांव डूब में आ जाते हैं.

ये तो हुआ डैम की सुरक्षा की बात, अब बात नदियों की सुरक्षा की कर लेते हैं. क्या इस विधेयक के पास होने से नदियों को भी सुरक्षा मिल जाएगी. शायद नहीं. गंगा पर बन रहे बांध औऱ जल विद्युत परियोजनाओं को इस विधेयक के बाद अतिरिक्त सुरक्षा ज़रूर मिल जाएगी. नमामि गंगा जैसी योजना के साथ आगाज़ करने वाली सरकार भले ही लाख बातें कर ले लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य नदियों को बचाना नहीं, उन पर डैम बनाना औऱ उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना है. अगर सरकार की नियत पर्यावरण और नदियों को लेकर साफ होती तो प्रोफेसर जी.डी.अग्रवाल (स्वामी सानंद) आज जीवित होते.सरकार डैम को सुरक्षा तो प्रदान करवा रही है लेकिन उसकी वजह से जो नदियां सूख रही हैं, जिन नदियों का जल गंदे नाले में तब्दील हो चुका है, उन्हे फिर से अविरल औऱ निर्मल बनाने का इन विधेयकों में कोई भी प्रावधान है ? खुद को पर्यावरण प्रेमी बताने वाली और गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने वाली सरकार में क्या कोई एक बांध का निर्माण भी सिर्फ पर्यावरणीय वजह से खारिज किया गया? बल्कि यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन पर्यावरण मंत्रालय देखने वाले जयराम रमेश ने भागीरथी के मुहाने पर बने जिस लाहौरी नागपाल डैम के कार्य को रुकवा दिया था. वर्तमान सरकार ने उसकी टनल को भरने के बजाए उस पर दरवाजा लगा दिया है. शायद वो ताक में है उन्हें उस दरवाजे को खोलने का मौका मिल जाए.

यही नहीं ऋषिकेश में मौजूद रंभा नाम की नदी है जो गंगा में मिलती है, इसके अलावा ऋषि कुंड और सरस्वती कुंड से निकलने वाली धाराएं भी हैं ये दोनों ही जलधाराएं त्रिवेणी घाट पर कभी गंगा में मिलती रही हैं. इन्हें त्रिवेणी संगम कहा जाता है . अब इनकी हालत ऐसी है कि ऋषि कुंड तो है पर जल स्रोत दम तोड़ रहा है. हालत ये है कि इससे निकलने वाला पानी गंगा तक पहुंचते पहुंचते हांफ जाता है. भू-माफियाओं का कब्जा तो पहाड़ों पर मौजूद पूरी गंगा पर हो चुका है. और आश्रमों से लेकर होटलों तक का गंदा अब इनकी मूल धारा बन चुका है. विंडबना देखिए रंभा और सरस्वती जैसी छोटी नदियों को सरकार की नमामि गंगे परियोजना में नाला कहा गया है. सरकार जिन धाराओं को खुद नदी मानने को राजी नहीं है तो आप किसी से क्या उम्मीद करते हैं. प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ही निकलने वाली वरुणा और असी नदी जिसकी वजह से इस शहर का नाम वाराणसी पड़ा वो आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेगी.

इस देश में बहने वाली नदियों के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि उनके लिए इस देश के नीति निर्माताओं की सोच उस जानवर की तरह है जो शौच करके उस पर मिट्टी डाल कर उसे ढंक देता है. जानवर तो ये काम फिर भी शायद प्रकृति से जुड़ा होने की वजह से सफाई के लिए करता होगा लेकिन शायद यहां पर सोच सिर्फ उसे ढांकने पर है जिससे किसी की नज़र उस पर ना पड़े. ये वहीं मानसिकता है जो लगातार नदियों का शोषण करते हुए समाज और सरकारों में हमें दिखाई देता है. जो नदी को औरत की तरह मानकर उसका सौंदर्यीकरण ही उसकी आजादी, उसकी विकास और उसके जीवन का अंतिम सत्य मान कर चलते हैं. जो ये मानते हैं कि नदी वो औरत है जिसका काम सिर्फ बहना है वो भी उस दिशा में जहां समाज चाहता है. बाकि सत्ताओं की ना नदिया बहती है औऱ ना धारा... बहता है तो बस किनारा.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 2, 2020, 11:43 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर