प्रकृति का ‘बजट’ हमेशा घाटे का क्यों?

हाल ही में बजट 2021-22 पेश किया गया. बजट का एक साधारण सा सिद्धांत होता है. अकाउंट में जब जमा करोगे तब ही निकाल पाओगे. लेकिन आमतौर पर प्रकृति के अकाउंट को लेकर हमारा हिसाब उस टूथपेस्ट की तरह हैं, जिससे अपने दांत चमकाने के लिए हम पेस्ट तो निकाल रहे हैं लेकिन उसे भरने की कोई तरकीब हमने सोची ही नहीं है. प्रकृति का बजट हमेशा घाटे का ही होता है. आइए माजरा समझते हैं-

Source: News18Hindi Last updated on: February 5, 2021, 2:34 PM IST
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प्रकृति का ‘बजट’ हमेशा घाटे का क्यों?
(PTI Photo)

हाल ही में बजट 2021-22 पेश किया गया. बजट का एक साधारण सा सिद्धांत होता है. अकाउंट में जब जमा करोगे तब ही निकाल पाओगे. लेकिन आमतौर पर प्रकृति के अकाउंट को लेकर हमारा हिसाब उस टूथपेस्ट की तरह हैं, जिससे अपने दांत चमकाने के लिए हम पेस्ट तो निकाल रहे हैं लेकिन उसे भरने की कोई तरकीब हमने सोची ही नहीं है. प्रकृति का बजट हमेशा घाटे का ही होता है. आइए माजरा समझते हैं-


बनारस से गाज़ीपुर की तरफ आगे बढ़ो तो बीच में एक गांव पड़ता है, कैथी. कैथी बनारस का आखरी और गाज़ीपुर की सीमा से लगा हुआ गांव है. इस गांव में बनारस की संस्कृति औऱ गाज़ीपुर की छाप मिलती है. गाज़ीपुर जिसे बनारस की छोटी बहन कहा जाता है. यहां एक छोटी नदी बहन है जो अपनी बड़ी बहन से मिलती है. इस संगम को गंगा-गोमती संगम कहा जाता है.


इस संगम के किनारे एक मंदिर है,जिसे लेकर आस्था है कि यहां शिव की अराधना करने पर मार्केण्डेय जैसा पुत्र प्राप्त होता है. ना जाने कितनी महिलाएं- पुरुष औऱ तमाम परिवार सामाजिक दबाव में यहां पुत्र आस्था के लिए आते हैं. यहां मंदिर पर जितनी हलचल देखने को मिलती है उतना ही ये घाट शांत रहता है. जितना प्रयाग में संगम का महत्व है, उसका 1 फीसद असर भी यहां देखने को नहीं मिलता है. पिछले दस सालों से ये घाट इसी तरह से शांत नज़र आ रहा है. हालांकि इस बार जब घाट को देखा तो वहां कुछ निर्माण काम होता नज़र आया.


यानी बनारस की तर्ज पर यहां भी घाटों का उद्धार किया जा रहा है. घाट निर्माण के बाद इस जगह को भी पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किए जाने की योजना नज़र आ रही थी. घाट और किनारों के सौंदर्यीकरण में लगी सत्ता जिन्होंने ‘अर्थ’ गंगा की परिभाषा गढ़ी है. क्या वो घाट और तट से आगे बढ़कर सोच सकती है. क्यों नदियों के सूखने की खबर भी आ रही है. इसका एक उदाहरण गोमती नदी और उसकी सहायक नदियों में देखने को मिल रहा है. गोमती की 26 सहायक नदियों में से 22 लगभग सूख चुकी है. और इससे भी ज्यादा खतरनाक बात ये है कि जो बाकी बची 4 नदियां है उनमें भी आंशिक रूप से ही बहाव बचा है. ऐसे में गोमती के प्रवाह के बने रहने को लेकर ही खतरा मंडरा रहा है. ये खुलासा इंडियन जर्नल ऑफ इकोलॉजी में छपे एक शोध से हुआ है.


नदियों से जो अंधाधुंध जल दोहन हो रहा है औऱ नदी तट विकास के नाम पर जो गोमती पर डायफ्राम वॉल बनाई गई है उसने पूरी गोमती का नदी तंत्र ही बिगाड़ दिया है. इसकी वजह से नदी के भूगर्भ का जल जो उसे पोषित करता है, उसमें कमी आ गई है, जिससे नदी में बहाव कम हो गया है. अध्ययन बताता है कि अकेले लखनऊ में ही गोमती 76 फीसद पानी भूगर्भ जल से लेती है. इससे समझ आता है कि किसी भी नदी के लिए आधार प्रवाह (बेसफ्लो) कितना ज़रूरी होता है.


आधार प्रवाह क्या होता है

जब बारिश कम होती है या फिर सूखा पड़ जाता है. उस दौरान भी जो नदियां बारामासी होती हैं वो बहती रहती है. इन नदियों को इसलिए भी बारामासी या सदानीरा कहा जाता है. क्योंकि इनकी धार भले ही पतली हो जाए लेकिन चलती रहती है. दरअसल ऐसे वक्त में नदी को उसका बेस फ्लो यानि तले के नीचे का पानी बचाता है. अगर ये सूख जाए या इसका स्तर गिर जाए तो नदी का प्रवाह बुरी तरह टूट जाएगा. यानि नदी तल के नीचे प्रवाहित जल प्रवाह को बेसफ्लो जल प्रवाह कहते हैं गोमती जैसी नदियों और इनकी सहायक नदियों से अत्य़धिक जल दोहन खास कर नलकूपों या ट्यूबवेल के जरिए किया जा रहा है. जिससे जल का स्तर गोमती के रिवरबेड से नीचे चला गया है. यही वजह है कि नदी को पानी नहीं मिल पा रहा है.


1984 से 2005 के बीच भूगर्भ जल स्तर घट कर 18 मीटर पर पहुंच गया और 2005 से अब तक स्तर में जो कमी हैं उसमें और इज़ाफा देखने को मिला है. जहां देश की सरकार हर घर, हर नल जल की बातें कर रही हैं, वहीं नदियों का सूखना बताता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं. दरअसल सरकार से लेकर प्रशासन तक सभी बस दोहन का विज्ञान सिखा रहे हैं. जबकि प्रकृति को लौटाना भी बेहद ज़रूरी है. जो पिछले 20 सालों में हम भूल ही गए हैं.


इसका परिणाम है कि बीते 50 सालों में देश की तमाम प्रमुख नदियों के जल स्तर में 30 से 60 फीसद तक गिरावट आई है. चूंकि प्रकृति में सभी चीजें एक दूसरे से जुड़ी होती हैं. यही वजह है कि नदी में प्रवाह कम हुआ तो उससे रीचार्ज सिस्टम पर असर पड़ा. अगर नदी में पानी की उपलब्धता बनाए रखनी है तो सतही जल के साथ – साथ भूगर्भ जल का प्रबंधन भी बेहतर होना बेहद ज़रूरी है. इसके लिए भूगर्भ जल को संरक्षित रखऩे वाले एक्वीफर यानि जलभृत को रीचार्ज किया जाना बहुत ज़रूरी होता है. ये करने के बजाए देश भर का तंत्र मिल कर प्रमुख और उनकी सहायक नदियों को दोहन और शोषण के ज़रिए नाला बना रहे हैं.


गोमती नदी और उसकी सहायक नदी

उत्तरप्रदेश के पीलीभीत में फुलहर नाम की एक झील है, यही गोमती का उद्गम स्थल है. यहां ये निकल कर वाराणसी और गाज़ीपुर की सीमा पर बसे गांव कैथी तक पहुच कर गंगा में मिलने तक गोमती 941 किलोमीटर का सफर तय करती है.इस पूरे सफर में गचई, जोकनई, भैंसी, चुहा, अंडी, खठीना, चितवा नाला, घरेरा नाला, नाखा नाला , अक्राइडी नाला, सरायन नदी, बेहता नदी, कुकरैल, लोनी नदी, रेठ, असैना नाला, कल्याणी, अराही नाला , कंदू नाला, गोबरिया नाला, सेवई नाला, पीली, सेवई नाला, बलोई नदी, सई नदी, नंद नदी, गोमती के बहाव में सहायता प्रदान करती हैं. वर्तमान में सई, खठीना, कुकरैल और बेहती नदी में ही आंशिक प्रवाह बाकी रह गया है.


और नदियों का भी है यही हाल

जुलाई 2018 में प्रकाशित नीति आयोग की रिपोर्ट भी धाराओं के सूखने पर गंभीरता से रोशनी डालती है. हिमालय और पानी संरक्षण पर काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से प्रकाशित “रिपोर्ट ऑफ वर्किंग ग्रुप 1 इनवेंट्री एंड रिवाइवल ऑफ स्प्रिंग्स इन द हिमालयाज फॉर वाटर सिक्योरिटी” के अनुसार, संपूर्ण भारत में 50 लाख धाराएं हैं जिनमें से 30 लाख अकेले भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में हैं. 30 लाख में से आधी बारहमासी धाराएं सूख चुकी हैं अथवा मौसमी धाराओं में तब्दील हो चुकी हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय क्षेत्र में छोटी रिहाइश को पानी उपलब्ध कराने वाली कम प्रवाह वाली करीब 60 प्रतिशत धाराएं पिछले कुछ दशकों में पूरी तरह सूख चुकी हैं. सिक्किम की धाराओं में पानी 50 प्रतिशत कम हो गया है. यह ऐसे राज्य के लिए बेहद चिंताजनक है जो पीने के पानी के लिए धाराओं पर पूरी तरह आश्रित है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: February 5, 2021, 2:30 PM IST
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