कोरोना काल और दवाओं का मजमा

कोरोना वायरस (Corona virus) की दवा ‘कोरोनिल’ ईजाद करने के दावे पर बाबा रामदेव (Baba Ramdev) की आलोचना हुई. वहीं बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण सहित 5 लोगों पर एफआईआर(FIR)दर्ज की गई है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 29, 2020, 10:01 AM IST
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कोरोना काल और दवाओं का मजमा
पतंजलि आयुर्वेद द्वारा तैयार कोरोना की दवा की किट.
श्री 420 का नायक किसी भी तरह से अमीर बनना चाहता है. वो समुद्र के किनारे अपना मजमा लगाता है. वहीं पर एक नेता भाषण दे रहा है. जो बता रहा कि देश के विकास के लिए कपड़ों से लेकर चप्पल तक सब कुछ स्वदेशी होना ज़रूरी है. वहीं नायक दूसरी तरफ बताता है कि उसके कपड़े विदेशी हैं लेकिन उसका दिल हिंदुस्तानी है. नेता बोलता है कि आज देश में जो कठिन समस्याएं हैं उसमें सबसे अहम सवाल है, तभी नायक उसकी बात काटते हुए कहता है कि सबसे कठिन सवाल रोटी का है. बस यही बात लोगों को उसकी तरफ आकर्षित करती है. नायक बोलता है कि ‘जिसे रोटी खानी हों वो मेरे पास आ जाए और जिसे हवा खानी हो वो उसी तरफ रह जाए’. सारे लोग नायक की तरफ पहुंचते हैं.

अब नायक कहना शुरू करता है. वो वहां खड़ी जनता से एक सवाल पूछता है कि ‘रोटी खाने के लिए किस चीज़ की ज़रूरत होती है’, लोग कहते हैं ‘पैसों की’. नायक कहता है, ‘ठीक कहा पैसों की लेकिन बगैर पैसों के भी रोटी, झूठ बोल कर, चुरा कर, लूट कर भी खाई जा सकती है. मगर जिस चीज़ के बगैर कोई रोटी नहीं खा सकता है वो है दांत’. इस तरह वो रोटी खाने से लेकर पचाने तक दांतों की अहमियत का बखान करता है और फिर धीरे से मुद्दे पर आते हुए अपना दंत मंजन बाहर निकालता है. वो बात-बात में ये भी बता देता है कि अगर दांत मजबूत नहीं हुए तो राष्ट्र मजबूत नहीं होगा और हम फिर से गुलाम बन जाएंगे. और राष्ट्र को बचाने के लिए दांत बचाना ज़रूरी है, इसके लिए दंत मंजन खरीदना ज़रूरी है. इस तरह लोगों की भीड़ जुट जाती है और लोग भर भर कर दंत मंजन खरीदना शुरू कर देते हैं. थोड़ी ही देर बाद कोई बताता है दंत मंजन में तो रेत है. बस इसके बाद जनता नायक पर पिल पड़ती है और वो वहां से भागता है.

कोरोना वायरस की दवा ‘कोरोनिल’ ईजाद करने के दावे को लेकर पहले जहां पूरे देश भर में बाबा रामदेव की आलोचना हुई वहीं अब उन पर और उनके निकट सहयोगी आचार्य बालकृष्ण सहित 5 लोगों पर एफ आई आर दर्ज की गई है. राजस्थान में जयपुर के ज्योति पुलिस स्टेशन में इन सभी पर कोविड-19 के इलाज का भ्रामक दावा करने का आरोप लगाया गया है. रामदेव बालकृष्ण के अलावा डॉ बलवीर तोमर, डॉ अऩुराग तोम, अऩुराग वार्ष्णेय पर भी धोखाधड़ी की धाराओं में केस दर्ज हुआ है.

जब से बाबा रामदेव ने दवा की घोषणा की और आयुष मंत्रालय ने उन्हें भ्रामक प्रचार करने से रोका. साथ ही उन्हें चेताया भी गया, तब से भारत में दो तरह से स्वर उठने लगे. एक वो जो बाबा रामदेव की कोरोनिल का मज़ाक बना रहे थे और एक वो जो इसे अंग्रेजी दवा उद्योग की साज़िश मान रहा है.
क्या आयुर्वेद से कोई परेशानी है

दिक्कत आयुर्वेद या किसी भी वैकल्पिक दवा व्यवस्था से नहीं है. अगर ऐसा होता तो आयुष मंत्रालय काढ़ा पीने की सलाह क्यों देता ? अगर ऐसा होता तो भारतीय आयुर्विज्ञान अऩुसंधान केंद्र वर्तमान में 63 अलग अलग तरह की शोध करने में क्यों लगा हुआ है? जिसमें गिलोय, च्यवनप्राश, अश्वगंधा, तुलसी जैसी आयुर्वेदिक औषधियों सहित होम्योपैथी की दवाओं मिलाकर 15 शोध शामिल हैं. यही नहीं भारतीय आयुर्विज्ञान अऩुसंधान केंद्र के गंगाजल के कोविड-19 पर प्रयोग क्यों नहीं कर रहा है इस पर भी सवाल खड़े किए गए, जिसमें ये कहा गया है कि प्रयोग करने में क्या बुराई है.

डॉ गोर्डन गुयात्त जो मैक्मास्टर यूनिवर्सिटि, कैनेडा से जुड़े रहे हैं उन्होंने 1991 में एक परिभाषा दी थी, ‘एविडेंस बेस्ड मेडिसिन यानि ईबीएम’ जिसका साधारण भाषा में मतलब होता है किसी भी दवा का ईमानदारी औऱ न्यायिक तरह से पड़ताल करना. मतलब ये समझना की वो कितनी कारगर है. पूरी दुनिया में कोई भी दवा जब ईजाद होती है, तो उसका अलग अलग चरणों में आकलन होता है ये समझा जाता है कि वो कितना असर कर सकती है. कमाल की बात ये है कि दुनिया में आज तक जितनी भी दवाएं निकली हैं वो सब तमाम तरह की परीक्षाओं से होकर गुज़रती हैं लेकिन फिर भी ये दावा नहीं करती हैं कि वो 100 फीसदी कारगर साबित हो सकती हैं. यहां तक कि छोटी से छोटी शल्य चिकित्सा में भी डॉक्टर आपसे एक फॉर्म भरवाता है क्योंकि हम लाख दावा कर लें, लेकिन ना तो हम आज तक किसी सूक्ष्मजीव को पूरी तरह समझ पाए है और ना ही हम अपने शरीर को पूरी तरह समझे हैं. यहां तक कि इस दुनिया की जैवविविधता में से हम महज़ 10 फीसदी को ही जानते हैं. दवा का ईजाद, शरीर विज्ञान की जानकारी, ये सब एक सतत चलने वाली प्रक्रिया होती है, विज्ञान इसी प्रक्रिया पर काम करता है. वो अपनी खोज पर भी सवाल खड़े करता हैपंतजलि आयुर्वेद का 69 फीसद मरीज ठीक होने का दावा

वहीं पंतजलि आयुर्वेद समूह ने अपनी ईजाद की हुई कथित दवा को लेकर दावा कर दिया कि उनकी दवा से तीन दिन में 69 फीसद मरीज ठीक हुए वहीं 7 दिन में मरीजों के ठीक होने का प्रतिशत 100 था. बस यही वो बात है जो आयुर्वेद, होम्योपैथ, यूनानी पद्धति पर सवाल खड़े कर देती है या यूं कहा जाए कि वो जिनके हाथों में है उनका ये बचकाना रवैया ही सदियों से चले आ रहे इन तरीकों को आज तक स्थापित नहीं कर पाया है.

ये कुछ-कुछ उस बाबा बंगाली के दावे की तरह है जो स्थानीय चैनलों या पोस्टरों के माध्यम से ये प्रचार करते फिरते हैं कि उनके पास भारत-चीन समस्या से लेकर घरेलू समस्या तक और कैंसर, एड्स से लेकर किसी भी तरह की बीमारी का शर्तिया इलाज है. ये शर्तिया शब्द शक खड़ा कर देता है.

जो लोग आज बाबा रामदेव के समर्थन में खड़े होकर झंडा बुलंद किए हुए है, उन्हें ये भी समझना होगा कि क्या पूरे कोरोना काल में पतंजलि की गिलोय धड़ल्ले से नहीं बिकी. बगैर किसी क्लीनिकल ट्रायल के गिलोय को लोगों ने खूब खाया. यहां तक कि एक वक्त इसकी कमी तक हो गई थी. जबकि खाने वाले को ये तक नहीं पता था कि वो गिलोय कुछ करता है या वो महज़ एक प्लेसिबो इफेक्ट (गोली के नाम पर जब मरीज को चीनी की गोली खिला दी जाती है और उसे दवा समझ कर खाने की वजह से उस पर उसका असर होता है क्योंकि वो ऐसा सोचता है कि उसने दवा खाई है.) की तरह है.

पतंजलि ने क्या हड़बड़ी दिखाई

दरअसल पतंजलि ने वही हड़बड़ी दिखाई जो दुनिया भर की अलग अलग दवा कंपनी दिखा रही है. कोविड-19 में एक बाज़ार खड़ा करना, जिससे उन्हें त्वरित लाभ मिल सके. मीडिया जिस तरह से एक्सक्लूसिव हुई जा रही है ऐसे में वो हर दावे को असल खोज की तरह पेश भी कर रही है. ‘ऑस्ट्रियन इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ टेक्नोलॉजी असेसमेंट’ के मुताबिक वर्तमान में दुनियाभर में कोविड-19 से मुकाबला करने के लिए करीब 155 दवा औऱ 79 वैक्सीन विकसित की जा रही हैं. यहां सवाल ये खड़ा होता है कि क्या ये वाकई में किसी मानवता की रक्षा के लिए इतनी आतुरता है या महज़ आपदा में अवसर है.
इस बाज़ार को देखकर बचपन की एक घटना याद आती है. मैं आठवीं कक्षा में था, स्कूल से घर का सफर 4 किलोमीटर का था जिसे पैदल ही तय करना होता था, कभी दोस्त होते थे कभी अकेला आना होता था. उस पूरे सफर में एक जगह पर मैं अक्सर रुकता था. वहां पर एक आदमी जोर जोर से सांप-नेवले की लड़ाई दिखाने के लिए बुला रहा होता था. मैं भी जिज्ञासावश वहां रुक जाता था. सड़क के किनारे बैठा वो शख्स कुछ पोटलियां लिए हुए होता था और उकंड़ूं बैठा रहता था, उसके एक बाजू में एक नेवला सड़क में लगी हुई खूंटी से बंधा रहता था. और दूसरी तरफ एक सांप बैठा रहता था. नेवले की फुफकार को देखकर लगता कि आज इसको खोला तो ये सांप का बैंड बजा देगा, दूसरी तरफ सांप इस तरह सुन्न बैठा रहता था गोया उसने अपनी मौत को स्वीकार कर लिया है. उनके बीच में बैठा आदमी लगातार नेवले का बखान कर रहा होता था.. वो बताता जाता था कि आखिर क्यों नेवला सांप को चुटकियों में मार देता है, सांप का सुन्नपन, नेवले की फुंफकार औऱ बीच में बैठे आदमी का ज्ञान सब कुछ मिलकर एक ऐसा माहौल खड़ा कर देते थे कि वहां खड़ा हर शख्स रोमांचित हो उठता था. फिर धीरे से वो आदमी अपनी पोटली से एक शीशी निकालता था, संयोग से ये शीशी ठीक वैसी ही होती थी जैसी ऊपर श्री 420 का नायक लिए हुए था.

आदमी बताता कि इस शीशी में वो ताकत कैद है जो नेवले को इतना खूंखार बना देती है. फिर वो वहां खड़े लोगों से पूछता कि क्या वो भी ऐसे ही बलवान और खूंखार होना चाहते हैं. सभी की गर्दन हां में हिल जाती, कोई थोड़ा सचेत रहता तो वो अपनी गर्दन को हिलने से रोकने की कोशिश करता तो भी उसकी गर्दन की हरकत नज़र आ जाती है. फिर वो आदमी बताता कि महज पांच रूपए में यहां खड़ा हर आदमी मर्द बन सकता है. इस तरह मर्द बनने की आतुरता में लोग उससे दवा खरीद लेते. यहां एक खास बात औऱ थी उस आदमी के कुछ साथी भीड़ का हिस्सा हुआ करते थे जो दवा खरीदने की इतनी जल्दी दिखाते कि वहां खड़े हर आदमी को लगता कि दवा खत्म होने वाली है. बस इस तरह से मजमा निपट जाता. एक साल तक इंतज़ार करने के बाद भी कभी सांप औऱ नेवले की लड़ाई देखने को नहीं मिली. फिर नेशनल ज्योग्राफिक पर जाकर अपनी क्षुधा को शांत किया. तो इंतज़ार कीजिए कोरोना काल में दवाओं का मजमा कब उठता है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: June 28, 2020, 8:14 PM IST
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