कोरोना से पनप रहा डिप्रेशन, बढ़ा रहा मोटापा

बच्चों में बढ़ रहे मोटापे की समस्‍या (Obesity Problem) का दोष हम जंक फूड और बढ़ते गैजेट (Gadget) के इस्तेमाल पर लगाते हैं, लेकिन इस बीच हम भूल जाते हैं की हम खुद कितना अपने बच्चों को खेल कूद के लिए बढ़ावा देते हैं. मौजूदा दौर में हम लाख कोशिश करें बच्चों को नई तकनीक से जुड़ने और जंक फूड (Junk Food) खाने से नहीं रोका जा सकता.

Source: News18Hindi Last updated on: August 14, 2020, 1:13 PM IST
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कोरोना से पनप रहा डिप्रेशन, बढ़ा रहा मोटापा
2025 तक भारत में मोटापे से पीड़ित बच्चों की संख्या 1.7 करोड़ तक पहुंच जाएगी.
आयोवा का एक छोटा सा शहर है एंडोरा (Andorra), वहां गिलबर्ट ग्रेप नाम का एक सीधा सादा इंसान रहता है. उसका एक छोटा भाई है, जिसकी मानसिक हालत (Mental Condition) ठीक नहीं है. उसकी मां है जो बेहद मोटी है. उसका मोटापा (Obesity) इस कदर उस पर हावी है कि वो घर से बाहर तक नहीं निकल पाती है. दिन भर वो बस अपनी रिक्लाइनर चेयर पर बैठी रहती है. गिलबर्ट के पिता ने 17 साल पहले फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी. उसके बाद से उसकी मां ने खुद को घर में कैद कर लिया. वो दिन भर सिर्फ काउच पर बैठ कर टीवी देखती रहती है और खाती रहती है. इससे दिन पर दिन उसका मोटापा बढ़ता जाता है, इस वजह से वो अपने बच्चों की देखरेख भी नहीं कर पाती है. यही नहीं ये मोटापा उसके लिए भी जानलेवा हो चुका है. आगे कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि गिलबर्ट की मां 17 सालों से जिस चेयर पर बैठ रही थी, उसे छोड़ कर सीढ़िया चढ कर उस कमरे में जाती है, जहां उसके पति ने आत्महत्या (Suicide) की थी.

जब गिलबर्ट और उसकी बहनों को पता चलता है तो वो कमरे में पहुंचते हैं. उनकी मां उन्हें मरी हुई मिलती है. गिलबर्ट नहीं चाहता कि उसकी मां के अंतिम संस्कार के लिए वो क्रेन बुलाए, क्योंकि क्रेन बुलाया जाना यानी अपनी मां का पूरे शहर में मज़ाक बनाना. वो एक फैसला लेता है.

वह अपनी बहनों के साथ मिलकर पूरे घर का सामान बाहर लाता है. फिर घर में आग लगा देता है. कोरोना ने लोगों को घर में कैद करके रख दिया और बच्चों से लेकर बड़ो तक में जिस सक्रियता की कमी लगातार देखी जा रही थी, वो लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है. इसकी वजह से मोटापे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. इसके पीछे वजह सिर्फ घर में रहना ही नहीं अवसाद और भविष्य की चिंता भी मोटापे को बढ़ाने में अहम योगदान दे रहे हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी तरह की मानसिक स्थिति के बिगड़ने पर इंसान का अपनी भूख पर काबू नहीं रह जाता है. या तो ज्यादा खाने लगता है या कम खाता है. रिपोर्ट ये भी बताती हैं कि कोरोनावायरस मोटे लोगों के लिए अधिक घातक हो सकता है.

ब्रिटेन सरकार ने इस बात की गंभीरता को संमझते हुए लोगों का मोटापा कम करने और उन्हें फिट रखने के लिए एक अनूठी पहल की है. दरअसल, ब्रिटेन यूरोप का दूसरा सबसे मोटे लोगों का देश है. यहां के दो-तिहाई युवा मोटापे की चपेट में हैं. यहां के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 10 से 11 साल के तीन बच्चों मे से एक अधिक वज़न वाला होता है. सरकार का मानना है कि ब्रिटेन का रहने वाला हर बाशिंदा अगर अपना वज़न ढाई किलो कर ले तो पांच साल में सरकार के 960 करोड़ रुपए बच सकते हैं. यही नहीं कोरोना से मोटापे का संबंध जुड़ जाने के बाद अब जिंदगियों को बचाने के लिए भी लोगों का फिट रहना बेहद ज़रूरी हो गया है. इसलिए ब्रिटेन सरकार एक नई नीति के तहत कई ऐसे उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने वाली है, जो सेहत के लिए बेहतर नहीं हैं.
यही नहीं साथ में दुकानों को फलों और सब्जियों पर अधिक डिस्काउंट देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. इसके अलावा अधिक नमक, शक्कर, और वसा वाले पदार्थों के ऑनलाइन विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने पर भी सलाह ली जाएगी. रेस्त्रां, कैफे, और टेकअवे के लिए ज़रूरी होगा कि वो अपने सभी खाद्य पदार्थों पर कैलोरी का लेबल लगाएं. इसके साथ ही जो डॉक्टर वज़न घटाने में मदद करेंगे, उन्हें इंसेटिव दिया जाएगा.

ये एक ऐसी पहल है जिसका तमाम देशों को गंभीरता से पालन करना चाहिए. लगातार काउच पोटेटो (आलसी टट्टू) की श्रेणी में जाते जा रहे बच्चों से लेकर जवान तक को लेकर हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक भारत में मोटापे से पीड़ित बच्चों की संख्या 1.7 करोड़ तक पहुंच जाएगी. द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपी एक और रिपोर्ट कहती है कि चीन के बाद भारत में मोटापे से ग्रसित बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है. इन बच्चों की संख्या 1 करोड़ 40 लाख से भी ज्यादा है. हालांकि भारत और चीन की जनसंख्या अधिक होने का बहाना बनाकर हम कह सकते हैं कि ये संख्या किसी भी यूरोपियन देश या अमेरिका से कम है, लेकिन बच्चों में लगातार सक्रियता का अभाव इस ओर इशारा करता है कि इसी तरह संख्या के बढ़ने और दुनिया में हमें नंबर वन आने से कोई नहीं रोक सकता.

अक्सर बच्चों में आ रही इस शिकायत को लेकर हम जंक फूड और बढ़ते गैजेट के इस्तेमाल पर दोष लगाते हैं, लेकिन इस बीच हम भूल जाते हैं की हम खुद कितना अपने बच्चों को खेल कूद के लिए बढ़ावा देते हैं. मौजूदा दौर में हम लाख कोशिश करें बच्चों को नई तकनीक से जुड़ने और जंक फूड खाने से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता. उस पर कोरोना की वजह से ऑनलाइन क्लास ने बच्चों का स्क्रीन टाइम में तिगुना इज़ाफा किया है. इसे पूरी तरह से रोका भी नहीं जा सकता है, क्योंकि वक्‍त के साथ तालमेल बैठाना जीवन जीने का सबसे आवश्यक तत्व है.इन दिनों या तो हम बच्चों के लगातार मोबाइल या किसी दूसरे गैजेट से चिपके रहने को लेकर चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं या उनके खान पान के रवैये को लेकर परेशान हैं. लेकिन इस बीच वर्क फ्रॉम होम करते पालक अपने काम और घर में तालमेंल बैठाने में इस कदर संघर्षरत हैं कि वो खुद इसी समस्या से जूझ रहे हैं. चूंकि वो अपना काम छोड़ नहीं सकते हैं और बच्चा उनको कॉपी करता है तो ऐसे में बच्चे का गैजेट से चिपके रहना लाज़िमी है. वहीं वक्‍त की कमी के चलते बाहर से खाना मंगाना भी आम बात हो चली है, जिसके चलते ऐसा खाना जो सेहतमंद नहीं है उसका खाया जाना आम हो गया है. दरअसल, पालक शहरी जीवन के साथ तालमेल बैठाते-बैठाते इतने उलझ चुके हैं कि उन्हें लगता है कि कुछ देर वह शांति से रह सकें, लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि आखिर इसका समाधान क्या है.

दरअसल, निदान उस संतुलन में है जो हमने जिंदगी के साथ बैठाना छोड़ दिया है. बच्चा अगर किसी गैजेट के साथ खेलना चाहता है तो खेले क्योंकि तकनीक के साथ तालमेल भी उसे कुछ सिखाएगा ही. लेकिन साथ में वो थोड़ी देर अगर पार्क में दौड़ लगा ले तो जंक फूड भी बुरा नहीं है. जिस तरह चारों तरफ बच्चों पर खेलने से ज्यादा व्यस्त रहने का दबाव बढ़ रहा है, वो चर्बी के रूप में शरीर में दिखेगा ही. उस पर कोरोना ने तो बच्चों को पूरी तरह घर में समेट कर रख दिया है. साथ ही एक बच्चे की नीति के साथ जीवन जीने वाले पालक अपने बच्चों को लेकर इस कदर सजग हो गए हैं कि उनके शरीर से बहता हुआ पसीना भी हमें डरा देता है. गर्मी में जैसे ही बच्चे के शरीर से पसीना बहता हुआ दिखता है, तो जो पालक अपने बचपन में दिन भर बाहर घूम कर पसीने में डूबे रहते थे, चाहे लू भरे दिन हो या चिपचिपाती शाम हो बच्चे
तल्लीनता के साथ पसीना बहाते थे और कभी डीहाइड्रेशन का शिकार भी नहीं होते थे.

बस ज्यादा से ज्याद कुछ होता था, तो दिन भर आवारगर्दी करने पर घर में डांट पड़ती थी, जिसे बच्चा अपनी माथे पर बहते पसीने के साथ अपनी शर्ट की बाजू से पोंछ लेता था और फिर खेलने में जुट जाता था. वो ही आज ज़रा सा पसीना आने पर अपने बच्चों को एसी में बैठा देते हैं. स्कूल भी सबसे पहले अपने कैंपस के एसी होने का दावा पेश करता है. जबकि अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि आज भी खेल में मशगूल बच्चे को पसीने या गर्मी से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन हम कुछ ज्यादा ही सजग होते जा रहे हैं.

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कोरोना काल आने के बाद जिस तरह से ऑनलाइन क्लास में इज़ाफा हो रहा है और सरकारें भी दबी छिपी ज़बान में इसको प्रोत्साहित ही कर रही हैं. जबकि अगर आप किसी भी पैरेंट्स से पूछें तो पाएं कि मुश्किल से कुछ ही बच्चें होंगे जो इन कक्षाओं में ध्यान दे रहे होंगे. लेकिन फिर भी हम इन कक्षाओं को लगातार किए जा रहे हैं और घर में कैद बच्चा और अपनी स्क्रीन में कैद होता जा रहा है. शहरी माहौल में वैसे ही सिकुड़े जीवन में हमने इन तरीकों से बच्चों के हिस्से की खिड़की को एक छोटे से रोशनदान में तब्दील कर दिया है.

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शिक्षक बच्चों को प्रतियोगिता और गति सिखा रहे हैं. कई माता-पिता भी बच्चों की गति को लेकर चिंतित है. लेकिन उनकी प्रगति को लेकर हमारा ध्यान लगभग हट ही चुका है और जिस तरह से कोरोना ने पूरी दुनिया को ये बताया है कि अगर जीना है तो शरीर का फिट रहना बेहद ज़रूरी है और फिट रहने के लिए ऑनलाइन क्लास से ज्यादा सरकारों को अपनी शिक्षा नीति में राइट टू प्ले के विकल्प पर गंभीरता से विचार करना होगा.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: August 14, 2020, 12:59 PM IST
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