Covid19: ‘कोरोना के साथ’ जीने के मतलब क्या है ?

लॉकडाउन को डेढ़ महीने से ज्यादा समय बीत गया है और कोरोना का कहर रुकने को राजी नहीं है. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार के बयान से ऐसा संकेत मिला है कि कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी पड़ सकती है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 9, 2020, 4:30 PM IST
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Covid19: ‘कोरोना के साथ’ जीने के मतलब क्या है ?
देश में कोरोना वायरस के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं.
1993 में स्टीफन स्पिलबर्ग ने रजत पटल पर एक चमत्कार पेश किया था. जो उस दौर में बड़े हो रहे मेरे जैसे बच्चों के लिए हैरान कर देने वाला था. वैसे इस सिनेमा ने बड़ों को भी कम नहीं चौंकाया था. कमाई के रिकॉर्ड तोड़ने वाली इस फिल्म का नाम था 'जुरासिक पार्क'.

अपने सामने अचानक विशालकाय डायनासोर को देख कर मुंह से रोमांच भरी चीख निकल जाती थी. खैर हमारा विषय फिल्म की तकनीक को बताना नहीं है. ये तो महज़ आगे बढ़ने के लिए तैयार की गई भूमिका थी.

तो फिल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि वैज्ञानिकों के एक समूह को बहुत पुराने एक पेड़ से निकली गोंद का एक फॉसिल यानि जीवाश्म मिलता है. जिसके अंदर एक मच्छर भी फंसा हुआ है. वैज्ञानिक उस मच्छर को बाहर निकालते हैं. और उसकी जांच में पता चलता है कि उसके खून चूसने वाले पाइप में खून के कुछ कण रह गए हैं. और वो ऐसी ही हालत में जब पेड़ पर बैठा तो उससे निकली गोंद से वहीं चिपक कर रह गया. और लाखों साल पहले का यह फॉसिल या जीवाश्म जब वैज्ञानिकों को मिलता है तो वो उस ख़ून का डीएनए निकालते हैं औऱ मालूम चलता है कि वो किसी डायनासोर का डीएनए है. फिर वो उस डीएनए की मदद से फिर से डायनासोर तैयार कर लेते हैं.

साथ जीने की आदत डालनी होगी
ये बात इसलिए क्योंकि लॉकडाउन को डेढ़ महीने से ज्यादा समय बीत गया है और कोरोना का कहर रुकने को राजी नहीं है. लगातार बढ़ते मामलों के बीच पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री का बयान आता है कि हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा, उसके कुछ दिनों बाद केंद्र की तरफ से भी कोरोना के साथ जीने के संकेत मिलते हैं.

दरअसल यहां जुरासिक पार्क का उदाहरण देने की पीछे की वजह ही यही है कि जिस कोरोना को हम नया समझ रहे हैं, हो सकता है वो हमारे अस्तित्व से भी पुराना हो और किसी फॉसिल में दब गया हो और हमारी करनी ने उसे उकसा दिया हो. उदाहरण इसलिए भी क्योंकि हमारा जब से अस्तित्व है हम तभी से तमाम तरह के जीवाणु, विषाणु, कीटाणु के साथ रहते आए हैं.

बहुत पुरानी है लड़ाईयूं कह सकते हैं कि ये धरती पर रहने का संघर्ष है जिसमें आदिकाल से एक युद्ध चल रहा है. प्लेग से लेकर चिकन पॉक्स तक और सार्स से लेकर कोविड तक कभी हम खुद को लड़ने के काबिल बनाते हैं औऱ फिर वही विषाणु नई ताकत के साथ दोबारा आता है. हम भले ही उसके नाम बदलते जा रहे हैं लेकिन हकीकत यही है कि ये वायरस, बैक्टीरिया, फंगस शुरू से हमारे साथ ही रह रहे हैं. हमारा इनका जीवन कुछ इस तरह से ही चलता आ रहा है. ये धरती पर संघर्ष और विकास की एक बड़ी दास्तान कहता है. जहां पर हम एक दूसरे से उपजी गंदगी पर जीवित हैं लेकिन जब किसी जीव की गंदगी इतनी ज्यादा हो जाती है कि वो संभाले नहीं संभलती है तो वो दूसरे जीव के लिए उपहार बन जाती है. लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं है कि किसी जीव का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. बस जीने का ढर्रा बदल जाता है औऱ विकास की एक नई परिभाषा गढ़ ली जाती है.

सदियों से है साथ में
इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि एंटीबायोटिक जिसका तात्पर्य होता है कि जिंदगी के विरुद्ध उसका जन्म हुए करीब एक सदी बीत गई है. इस सदी में और अलग अलग तरीके के बैक्टीरिया औऱ वायरस जन्म लेते रहे, औऱ ज्यादा घातक रूप लेकर सामने आते गए, हमने और घातक एंटीबायोटिक बनाई औऱ वो उससे लड़ने के लिए औऱ ताकतवर बनते गए. फिर हमने उनके उस रूप के साथ रहना स्वीकार कर लिया. ये एक अंतहीन लड़ाई है. क्योंकि हम ना चाहते हुए भी इन रोगाणुओं के साथ बहुत वक्त बिताते हैं औऱ हमारे बीच एक नैसर्गिक गतिरोध हमेशा ही कायम रहता है.

हम लगातार कोरोना के बारे में अनुमान लगा रहे हैं, नए नए तर्क सामने आ रहे हैं लेकिन हम किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं, हो सकता है हम जिसे नया मान कर चल रहे हों वो सदियों से कहीं ग्लेशियर में दबा हुआ हो औऱ अचानक बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग ने उसे हमारे सामने खड़ा कर दिया हो.

पर्माफ्रोस्ट में दबा सूक्ष्मजीव का जीवन
जैसे अगस्त 2016 की बात है जब साइबेरिया के एक टुंड्रा प्रदेश यमन पेनिन्सुला में एक 12 साल के बच्चे की मौत हो गई करीब 12 लोग संक्रमण के चलते बीमार पड़ गए. इन्हें बीमार करने वाली वजह का नाम था एंथ्रेक्स. इसके पीछ ये वजह बताई गई कि करीब 75 साल पहले एक रेनडियर एंथ्रेक्स से संक्रमित होकर मारा गया था औऱ फिर उसका कंकाल ज़मी हुई मिट्टी जिसे पर्माफ्रोस्ट (यानि स्थाई रुप से जमी हुई ज़मीन) कहते हैं उसमें दब कर रह गया. 2016 में गर्मी की वजह से वो बाहर आ गया औऱ सक्रिय हो गया. और एंथ्रेक्स पास मौजूद मिट्टी और पानी में मिल गया. ये वही एंथ्रेक्स है जिसने एक बार पाउडर का रूप धर कर व्हाइट हाउस में हड़कंप मचा दिया था.

दरअसल एंथ्रेक्स एक विशेष प्रवृत्ति वाला बैक्टिरिया होता है जो स्पोर यानि बीजाणु पैदा करने में सक्षम होता है. इसी वजह से इस बैक्टिरिया का रूप बदला जा सकता है, यानि बैक्टिरिया को पीस लिया जाए, मिट्टी में दबा दिया जाए या किसी औऱ रूप में बदल दिया जाए लेकिन इस बैक्टिरिया के जीवन चक्र पर कोई असर नहीं पड़ता है और जैसे ही उसे अऩुकूल माहौल मिलता है वो खुद को सक्रिय कर लेता है. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि एंथ्रेक्स, माइकोबेक्टिरियम जैसे बैक्टिरिया हों या सार्स जैसे वायरस इन सबसे होने वाली बीमारी के लक्षण करीब करीब एक जैसे ही होते हैं. बस फर्क इतना होता है कि सिर्फ वायरस की बढ़ने के लिए जीवित कोशिका की ज़रूरत होती है जबकि बैक्टिरिया औऱ फंगस मृत कोशिका पर भी आसानी से पनप जाते हैं. यही वजह है कि वायरस ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि उसके लिए कोई आभासीय वातावरण बना पाना मुश्किल होता है औऱ इसलिए उसकी मैपिंग करने में दिक्कत होती है. लेकिन ये भी हमारा अनुमान ही है. क्योंकि जिस तरह से कोरोना को लेकर तमाम तरह की शोध आ रही है और मालूम चल रहा है कि ये मृत या स्थूल चीज़ों पर भी एक नियत वक्त तक जिंदा रह सकता है. ऐसे में सवाल खड़ा हो जाता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये वायरस भी किसी पर्माफ्रोस्ट के पिघलने का अंजाम हो. जो किसी जीवाश्म में दबा रह गया हो.

पर्माफ्रोस्ट सूक्ष्मजीवों को संरक्षित रखने का बेहतर उपाय होता है क्योंकि ये ठंडा होता है औऱ यहां ऑक्सीजन नहीं होती है. हो सकता है दुनिया में आज तक फैली महामारियों के पीछे ऐसा ही कोई दबा हुआ सूक्ष्मजीव जिम्मेदार हो.

जो कल था, वो आज है
1890 में हुए एक घटनाक्रम से इस बात को समझा जा सकता है जब साइबेरिया के एक शहर में स्मॉल पॉक्स महामारी की तरह फैला औऱ 40 फीसद आबादी मारी गई. मृतकों को कोलायमा नदी के पास पर्माफ्रोस्ट की ऊपरी सतह में दफनाया गया. इस बात का पता तब चला जब 120 साल बाद कोलायमा के बाढ़ का पानी किनारे से बहने लगा. और पर्माफ्रोस्ट के पिघलने ने इस कटाव को बढ़ा दिया. उस दौरान वैज्ञानिक दक्षिण साइबेरिया में पाषाण युग के अवशेषों की जांच कर रहे थे, इन्ही वैज्ञानिकों ने 19 वीं सदी में रशियन पर्माफ्रोस्ट में जमे हुए मुर्दों की जांच भी की थी. शोधकर्ताओं ने पाया कि पाषाण युग में जिन लोगो की जांच की गई थी उन पर भी उसी स्मॉल पॉक्स के वायरस के डीएनए पाए गये थे जिससे 19 वीं सदी में लोग मारे गए थे.

इसी तरह 2005 में नासा के वैज्ञानिको ने अलास्का के एक जमे हुए तालाब से 32000 साल पुराना बैक्टीरिया ‘कार्नोबैक्टिरियम प्लेस्टोसीनियम’ को फिर से जीवित करने में सफलता अर्जित की थी. यानि ये बैक्टिरिया उस दौर के थे जब धरती पर मैमथ घूमा करते थे. इसके अलावा ‘क्लोस्ट्रीडियम टिटेनी’ जो टिटनेस की वजह है, औऱ ‘क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम’ जो बोटुलिज्म जैसी घातक बीमारी की वजह है वो भी स्पोर पैदा करते हैं औऱ ऐसे माहौल में बचे रह सकते हैं. इसके अलावा 2014 की एक स्टडी में पाया गया कि कुछ वायरस भी पर्माफ्रोस्ट में बचे रह सकते हैं, यहां पर 30000 साल पुराना वायरस ‘पिथोवायरस साइबेरिकम’ औऱ ‘मोलीवायरस साइबेरिकम’ पाया गया था इन्हें जायंट या दैत्य वायरस कहा गया, क्योंकि ये इतने बड़े थे कि सामान्य माइक्रोस्कोप से भी देखे जा सकते थे. खास बात ये थी कि ये वायरस जैसे ही सक्रिय हुए वैसे ही काम पर लग गए, बस खुशकिस्मती से ये एककोशिकीय जीवों जैसे अमीबा पर ही हमला कर सकते थे.

ऐसा नही है कि सारे बैक्टिरिया या सूक्ष्मजीव पर्माफ्रोस्ट में बच सकते हैं, एंथ्रेक्स जैसे बैक्टिरिया इसलिए बच जाते है क्योंकि वो स्पोर पैदा करना जानते हैं जो उन्हें बर्फ में भी बचाए रखने में कारगर होती है.
इस पर्माफ्रोस्ट के कम होने या खत्म होने के पीछे एकमात्र वजह ग्लोबल वार्मिंग नहीं है लगातार हो रहे विकास, माइनिंग, तेल के लिए हो रही ड्रिलिंग भी इसके पीछे ज़िम्मेदार है. आमतौर पर वायरस बगैर किसी जीवित कोशिका जिसे हम होस्ट भी कहते हैं जीवित नहीं रह सकता है, औऱ कुछ नियत माहौल मे ही जीवित रह पाता है लेकिन ये नियम दैत्य वायरस पर लागू नहीं होता है.

हमारे पूर्वज भी इसी से थे पीड़ित
यहां ये बात भी गौर करने वाली है कि धरती पर पाये जाने वाले इंसानों के पूर्वज निएंडेंथ्रल औऱ डेनिसोवन्स 30-40 हज़ार साल पहले जिनके निशान रशिया में पाए गए थे. उनके भी साइबेरिया में विभिन्न वायरस का शिकार होने के सबूत मिलते हैं.
गंगा का गंगत्व भी करता है इस ओऱ इशारा

अगर हम पुराणओं पर विश्वास करते हैं तो गंगा की उत्पत्ति की कहानी का ज़िक्र भी यहां ज़रूरी हो जाता है. जब सगर के पुत्रों का तर्पण करना था तो उन्होंने तपस्या करके गंगा को धरती पर बुलाया था. इस कथा को हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जिन पुत्रों का तर्पण होना था उनका शरीर गल कर एक महामारी को दावत दे रहा था. औऱ गंगा ने उसे जब अपने में समाहित किया तो उस महामारी से बचाव हो गया, इसके पीछ वजह थी गंगा का वो गंगत्व जिसे हम बैक्टिरियोफेज के नाम से जानते हैं. ऐसा सूक्ष्मजीव जो दूसरे सूक्ष्मजीवों को खाकर अपना जीवन यापन करता है और कई तरह की बीमारियों से रोकथाम कर लेता है. हमारे पूर्वजों में वायरस के निशान मिलना औऱ उससे निपटने का तरीका ये ज़ाहिर करता है कि वायरस का खात्मा जैसी बात कितनी बेमानी है. औऱ ये हमारा खुद को सुरक्षित कर लेना एक भ्रम मात्र है.

इसलिए इससे बचाव के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं उस पर हमें फिर से गौर करना होगा और हमें वायरस के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए इस बात के अर्थ को समझना होगा.

ठीक डेमोलिशन मैन के उस किरदार की तरह जिसे उसी दौर के खलनायक के साथ जमा दिया जाता है. औऱ फिर किसी वजह से जब 40 साल बाद खलनायक अपनी जमी हुई बर्फ से बाहर निकल जाता है औऱ दुनिया में तबाही कर देता है. उससे निजात पाने के लिए बदल चुकी दुनिया औऱ तकनीक से लैस नई दुनिया उस पुराने खलनायक को नए हथियारों से बांधने का प्रयास कर रही है.ऐसे में फिर से जमाए गए नायक को बाहर निकाला जाता है क्योंकि वही है जो उस खलनायक की क्रूरता को सही तरह से समझ सकता है. औऱ उसके साथ लड़ने का आदि है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: May 9, 2020, 4:28 PM IST
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