एक तरफ कोसो दूसरी तरफ पोसो

इकोसाईड यानी ऐसा कोई अपराध जिसमें प्रकृति को नुकसान पहुंचता है. इस तरह 1972 में स्टॉकहोम में यूएन में हुई पर्यावरण बैठक में इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल हुआ. यहां पर स्वीडन के तात्कालीन प्रधानमंत्री ओलाफ पाल्म ने वियतनाम मामले को लेकर अमेरिका पर इकोसाइड का आरोप लगाया था. उस दौरान भारत की तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चीन के प्रधानमंत्री तांग ने सलाह दी थी कि पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के अपराध को मानवता के अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: July 13, 2020, 12:32 PM IST
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एक तरफ कोसो दूसरी तरफ पोसो
पौधारोपण
एक बाप अपने बच्चे के स्कूल पहुंचता है. वो बच्चे से नहीं मिलता सीधे उसके शिक्षक से मिलने जाता है. वो उसे बताना चाहता है कि शिक्षक ने बच्चे की जो समस्या बताई थी, उसकी बीवी ने उस समस्या के बारे में इंटरनेट से ढेर सारी जानकारी जुटा ली है. जब शिक्षक उससे पूछता है कि वो ये सब उन्हें क्यों बता रहे हैं, तो बाप कहता है कि इसलिए कि कहीं शिक्षक ये ना समझ बैठे कि वो अपने बच्चे का ख्याल नहीं रखते हैं.

शिक्षक बाप से बोलता है, ‘ख्याल रखना, बेहद ज़रूरी है, ख्याल रखना, इसमें इलाज की ताकत होती है, एक आधी झप्पी, छोटी सी पप्पी, बच्चे को ये कहना की कुछ हो तो मेरे पास आओ, मैं हूं ना, मैं तुमसे प्यार करता हूं, इसे ही कहते हैं ना ख्याल रखना’ ?

जब बाप को अपने दर्प का अहसास होता है तो वो वहां से जाने लगता है, तब शिक्षक उससे पूछता है कि क्या उसने कभी सोलोमन आइलैंड का नाम सुना है ? जब बाप इंकार करता हैं, तो शिक्षक बताता है कि सोलोमन आइलैंड पर जब आदिवासियों को खेती बाड़ी के लिए जंगल का कोई हिस्सा साफ करना होता है तो वो पेड़ दरख्तों को काटते नहीं है, बस सारे एक साथ हो कर उसके पास पहुंच जाते है और सारे मिलकर उसे जी भर कर गालियां देते हैं, कोसते हैं, औऱ देखते ही देखते पेड़ मुरझा जाता है औऱ खुद ब खुद ही गिर जाता है.

तारे ज़मीन पर फिल्म का ये दृश्य बच्चे की परवरिश के लिए कहा गया लेकिन जो उदाहरण पेश किया गया वो अब एक आइलैंड तक सीमित नहीं रह गया है. ये हम दुनिया भर की एक प्रवृत्ति बन गई है. एक तरफ अमेज़न से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक जंगलों की सफाई हो रही है. हमारे देश में ही झारखंड से लेकर उत्तराखंड तक लगातार जंगलों का विनाश हो रहा है. ये वो जंगल है जिन्हें किसी ने लगाया नहीं. वैसे भी जंगल लगाना किसी के बस की बात नहीं है. लेकिन जब कोई सत्ता पर काबिज़ होता है तो उसे लगता है कि हर काम, हर बात उसकी मुट्ठी में है. हर काम वो कर सकता है. शासन हासिल करने वाला ये समझता है कि वो सभी पर शासन कर रहा है चाहे फिर वो राज हो, समाज हो या फिर प्रकृति.
इसी मानसिकता के चलते एक तरफ सरकारें जंगल काटती जा रही हैं और दूसरी तरफ अखबारों में फुल पेज के विज्ञापन आते हैं जो बताते हैं कि फलानी सरकार ने बीते सालों में इतने करोड़ पेड़ लगा दिए. बीते दिनों दिल्ली सरकार की तरफ से ऐसा ही विज्ञापन आया जिसमें लाखों पेड़ लगाने की बात कही गई और ये कहा गया कि दिल्ली सरकार की तरफ से दिल्लीवासियों को पौधे दिए जाएंगे जिसे वो अपने आसपास लगा सकते हैं.

उसी तरह उत्तरप्रदेश में स्थापित योगी सरकार ने भी अपनी पीठ थपथपाने वाला विज्ञापन दिया जिसमें बताया गया है कि इस साल राज्य में रिकॉर्ड 25.87 करोड़ पौधे लगाए जाएंगे. यही नहीं उन्होंने बीते सालों का आंकड़ा भी बताया कि 17-18 में राज्य में 5.70 करोड़ पौधे, 2018-19 में 11.77 करोड़ पौधे और 2019-20 में 22.59 करोड़ पौधे लगाए गए थे. आंकड़े हमें हमेशा लुभाते हैं. और सरकारें इसी की बाजीगरी करती है. प्रचार तंत्र में उलझा शासन जो दिखा रहा है, हम वही देख रहे हैं. और इस कदर देख रहे हैं कि हम ना सिर्फ उसे सच मानने लगते हैं बल्कि हम उस पर आस्था ऱखने लगे हैं. उस पर सवाल खड़ा करना ईश्वर पर सवाल खड़ा करने जैसा हो गया है.

इसलिए करोड़ों पेड़ लगाने वाले से कोई नहीं पूछता कि पिछले करोड़ों में कितने बचे औऱ कहां पर है. सरकार ने उनका कितना ख्याल रखा. ये वो सरकारें हैं जो नदी के किनारे पर पौधा लगाने की सलाह देती है. लोग उत्साहित हो जाते हैं कोई पूछता तक नहीं है कि बाढ़ आएगी तो पौधे कहां पर जाएंगे.ये वही सरकारें हैं जो जब भी पौधे लगाती हैं तब जंगलों में कटौती हो जाती है. जितने करोड़ पौधे उतना हेक्टेयेर जंगल विकास के नाम पर साफ हो जाता है.
‘धरती को एक अच्छे वकील की ज़रूरत है.’

पॉल हिगिन्स एक बैरिस्टर थीं और उन्होंने अपना जीवन ईकोसाइड को अंतर्राष्ट्रीय अपराध का दर्जा दिलाने में लगा दिया. इसका मतलब धरती के प्राकृतिक तंत्र को गंभीर औऱ भयानक हानि और क्षति पहुंचाने वाले देश, उद्योग या व्यक्ति पर अंतर्राष्ट्रीय अपराधी की तरह मुकदमा चलाया जाए. ये बात किसी से छिपी नहीं है कि दुनियाभर के चंद ताकतवर लोग अपने नफे के लिए लाखों करोड़ों जिंदगियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं औऱ प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने पर तुले हुए हैं. एक शोध के अनुसार, दुनिया की पांच बड़ी गैस और ऑइल की कंपनियों ने क्लाइमेट ब्रेकडाउन को रोकने के लिए 200 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं. इसी का नतीजा है कि ट्रंप ने उस कानून को भी किनारे कर दिया जो ओबामा ने पर्यावरण की रक्षा के लिए पास किया था. और इसकी बदौलत मीथेन जैसी खतरनाक ग्रीन हाउस गैस लगातार वातावरण का सत्यानाश करने पर तुली हुई हैं. यानि आने वाले पांच सालों में अतिरिक्त 50 मीट्रिक टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वातावरण में घुल जाएगी.

इसी तरह मोंगाबे नाम की एक गैर-लाभकारी समाचार संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडोनेशिया के कब्जे वाले पश्चिमी पपुआ में बगैर वहां की लुप्त होती प्रजाति के लोगों से पूछे पूरे रेनफॉरेस्ट का सफाया कर दिया गया, ताकि वहां पर पॉल ऑइल के लिए पौधे लगाए जा सके. ऐसी घटनाएं दुनियाभर में हो रही हैं. भारत में ही गंगा नदी औऱ अलकनंदा पर मौजूद प्रयाग बांधों की बलि चढ़ गए हैं और सरकारों को वो बिजली नज़र आ रही है जो उत्तराखंड तक को रोशन नहीं कर पा रही है. इसी लालच के तहत ये जानते हुए कि कोरोना काल में बिजली की खपत कम होने पर तमाम बांधों में पानी में 67 फीसद की बढ़ोतरी देखने को मिली लेकिन फिर भी नदी के प्रवाह को कुछ वक्त के लिए नहीं खोला गया. अब जब बारिश के मौसम में लबालब भरे बांधों में पानी आएगा तो वो साथ में बाढ़ और तबाही लाएगा जिसका ठीकरा फिर प्राकृतिक आपदा पर फोड़ा जाएगा.

खास बात ये है कि खुले आम अपराध करने वाले इन अपराधियों पर बहुत हुआ तो जुर्माना लगा दिया जाता है लेकिन किसी को आज तक कोई सजा नहीं हुई इसलिए ईकोसाइड यानि प्रकृति की हत्या करने वाले इसे हत्या या अपराध मानते ही नहीं है. इसी ईकोसाइड अपराध को अंतर्राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में रखने के लिए पॉली हिगिन्स ने अपनी नौकरी छोड़ी, अपना घर बेचा औऱ इस कानून को बनाने के लिए अपनी जिंदगी के दस साल दे दिए. बीते दिनों जब उन्हें कैंसर होने की जानकारी मिली और डॉक्टर ने कहा कि उनके पास कुछ ही हफ्ते रह गए हैं तो उन्होंने बस यही कहा था कि अगर वो नहीं रही तो उनकी टीम इस कानून को बनाने की लड़ाई लड़ेंगी. और ऐसा ही हुआ उनके जाने के बाद भी ये काम, ये आंदोलन रुका नहीं.

इंदिरा गांधी ने किया था पहली बार इकोसाइड कानून का समर्थन
ईकोसाइड कानून को लेकर आवाज़ सबसे पहले 1970 में अमेरिकी जीवनिज्ञानी आर्थर गैलस्टन ने उठाई थी. इसका विचार वियतनाम युद्ध के दौरान उठा था. दरअसल आर्थन गैल्स्टन ने 1950 के दशक में डिफोलिएंट एजेंट (ये एक तरह का रसायन होता है जिसे पेड़ों पर डालने पर उनकी पत्तियां गिर जाती हैं) ’ऑरेंज रसायन’ को विकसित करने वाली प्रयोगशाला में काम किया था. ये वही रसायन था जिसका वियतनाम युद्ध में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था. इसकी वजह से वहां पर वनस्पतियों औऱ समुदायों के भयानक नुकसान पहुंचा था. इसी से हुए पछतावे के चलते आर्थर ने इकोसाइड अपराध की बात कही. इकोसाईड यानि ऐसा कोई अपराध जिसमें प्रकृति को नुकसान पहुंचता है. इस तरह 1972 में स्टॉकहोम में यूएन में हुई पर्यावरण बैठक में इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल हुआ. यहां पर स्वीडन के तात्कालीन प्रधानमंत्री ओलाफ पाल्म ने वियतनाम मामले को लेकर अमेरिका पर इकोसाइड का आरोप लगाया था. उस दौरान भारत की तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चीन के प्रधानमंत्री तांग ने सलाह दी थी कि पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के अपराध को मानवता के अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए.

शांति के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय अपराध और ईकोसाईड
2010 में पॉली हिंगिस ने रोम में अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग में इकोसाइड को एक अंतर्राष्ट्रीय अपराध के तौर पर शामिल करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव रखा. अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग संयुक्त राष्ट्र की संस्था है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का काम करती है. यहां पर ईकोसाइड के अपराध को शांति के खिलाफ 5वे अंतर्राष्ट्रीय कानून के तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया.

अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अभी चार अपराधों पर सुनवाई की जाती हैं-
1. नरसंहार का अपराध
2. मानवता के खिलाफ अपराध
3.युद्ध अपराध
4. आक्रमण का अपराध

इकोसाइड को अपराध की श्रेणी में अभी जुड़ना बाकी है.
पॉली हिंगिस की मृत्यु के बाद फ्रांस की वकील वेलेरी कैबनेस ने इसे कानून का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया है. जलवायु के नागरिक सम्मेलन में ये प्रस्तावित किया गया कि इस कानून के निर्माण में जनमत संग्रह की भूमिका को अहमियत दी जानी चाहिए.

कौन से देशों ने किया इकोसाइड कानून लागू
दुनिया में कुछ देश ऐसे हैं जिन्होंने ईकोसाइड को अपने यहां कानूनी मान्यता दी है. इनमें कजाकिस्तान किर्गिस्तान (1997),मोल्दोवा गणराज्य (2002), रूसी संघ (1996), तजाकिस्तान (1998), उज्बेकिस्तान (1994), वियतनाम (1990), जॉर्जिया (1999), आर्मेनिया (2003), यूक्रेन (2001) बेलारूस (1999) इक्वाडोर (2008) शामिल हैं. भारत ने भी कुछ श्रेणी में इसे कानूनी मान्यता तो दी है लेकिन उसमें इतना लचीलापन है कि अपराधी को ये अहसास ही नहीं होता है कि वो अपराध कर रहा है. और घने जंगलों में भी जल विद्युत और खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति आसानी से मिल जाती है. वर्तमान हाल को देखते हुए इस पर एक अंतर्राष्ट्रीय कानून की बेहद ज़रूरत है.

कोसना और पोसना
एक तरफ उद्योंगों, खनन के लिए हम लगातार वनों का विनाश कर रहे हैं. ये वो वन है जो अपने अंदर ना जाने कितना जीवन समेटे हुए हैं. एक जंगल के कटने पर सिर्फ पेड़ नहीं कटते हैं कई जिंदगियां कट जाती हैं.

इसी तरह बड़े पैमाने पर हो रहे प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की वजह से पारिस्थतिकीय तंत्र का विनाश हो रहा है. कुल मिलाकर हम हवा, पानी, मिट्टी, समुद्र चौतरफा प्रकृति को नुकसान पहुंचाने में लगे हुए हैं जो ईकोसाइड की श्रेणी में आता है. दूसरी तरफ हम पेड़ लगाने की बात कर रहे हैं. दरअसल इस दौर में सरकारें एक तरफ कथित विकास के लिए जंगलों को कोसने पर तुली हुई हैं वहीं दूसरी ओर आंकडों की बाजीगरी उन्हें पोसते हुए दर्शा रही है. जबकि पेड़ लगाने से ज्यादा ज़रूरत उसके ख्याल रखने की है. ये अहसास कराने की है कि हम तुमसे हैं, हम तुम्हारे हैं..
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: July 12, 2020, 4:10 PM IST
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