हिंदी की खूबसूरती उसके लचीलेपन में है

Hindi Diwas 2020 : हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे सब अपनी तरह इस्तेमाल करते हैं और वो होती जाती है. उसके इस उदार रवैये ने ही इसे बचा कर रखा हुआ है. लेकिन यहां ये सोचना भी ज़रुरी हो जाता है कि हम किस माध्यम के लिए लिख रहे हैं. किसके लिए लिख रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अपनी कमी छिपाने के चक्कर में हिंदी पर प्रहार कर रहे हैं. बीते दिनों कई टीवी सीरियल्स बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करने का मौका मिला. अलग अलग तरह के कार्यक्रम बनाने वाले इन सभी लोगों में एक बात एक जैसी थी.

Source: News18Hindi Last updated on: September 14, 2020, 4:26 PM IST
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हिंदी की खूबसूरती उसके लचीलेपन में है
आज भी लोग एबीसीडी तो फर्राटे से बोल लेते हैं, लेकिन क ख ग में जुबान अटक जाती है.
हिंदी सिनेमा को थोड़ा सा भी जानने वाले या गीत-संगीत में रुचि रखने वालों ने ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ गीत ज़रूर सुना होगा. इस गीत की शुरूआत है, 'ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों के दुनिया.' इस गीत की रचयिता थे साहिर लुधियानवी. उस दौर में साहिर की शख्सियत ऐसी थी कि वो गीत देते थे, उस पर संगीत बैठाया जाता था. उस दौर में संवाद औऱ पटकथा लेखक फिल्म निर्माण के दौरान सेट पर ही मौजूद रहते थे और किसी तरह की कमीबेशी को उसी वक्त दूर कर दिया करते थे. जब ये गीत फिल्माया जा रहा था तो संयोग से फिल्म के लेखक अबरार अल्वी वहां मौजूद नहीं थे. तो उनकी गैरमौजूदगी में ये गाना शूट कर लिया गया.

जब अबरार ने गाने के बोल सुने तो वो उससे इत्तेफाक़ नहीं रखते थे. उनका मानना था कि महलों, तख्तो, ताजों, ये तो किसी राजशाही दौर का गाना हो सकता है. आज के दौर में ये शब्द ठीक नहीं बैठते हैं. लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता था, क्योंकि गाना शूट हो चुका था और दूसरी बात साहिर को ये समझाना की गीत ठीक नहीं है, ये अपने आप में बेहद मुश्किल काम था. हालांकि साहिर ने इन शब्दों का प्रयोग रूपक के तौर पर किया था लेकिन अबरार का मानना था कि सिनेमा में साहित्य का पुट उतना होना चाहिए. जितना एक आम आदमी बगैर दिमाग लगाए समझ सके. इस बात को ध्यान में रखते हुए अबरार ने फिर गाने के बोल को न्यायसंगत बनाने के लिए ठीक गाने से पहले एक दृश्य रचा जिसमें रहमान मंच पर खड़े होकर कहते हैं. आज अगर विजय जिंदा होते तो देखते कि जिस जनता ने उन्हें ठुकरा दिया था वो आज उन्हें तख्त पर बैठाना चाहती है, उसके सर पर ताज पहनाना चाहती है. इस तरह भारत की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक प्यासा का निर्माण हुआ जो भारत की एकमात्र ऐसी फिल्म है जिसे लेखक से ज्यादा गीतकार के लिए जाना जाता है.

प्यासा जैसी फिल्म रचने वाले अबरार ने अपनी किताब ‘टेन इयर्स विद गुरु दत्त, अबरार अल्वीज़ जर्नी’ में अपने अनुभव साझा किए हैं. उसी किताब में वो बताते है कि भाषा को लेकर वो बेहद संजीदा रहते थे यही वजह थी जहां एक तरफ उन्होंने तख्तों, ताजों जैसे शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी, वहीं दूसरी तरफ गुरू दत्त की एक बेहद सफल कमर्शियल फिल्म ‘आर-पार’ में उन्होंने किरदारों से क्षेत्रीय बोली बुलवाई, इसमें उन्होंने ये ध्यान रखा कि किरदार कहां का रहने वाला और किस मजहब से संबंध रखता है.
 जैसे फिल्म में टैक्सी ड्राइवर की भूमिका निभा रहे गुरू दत्त जो कम पढ़े लिखे हैं और मध्यप्रदेश के किसी गांव में पले बढ़े है, वो एक जगह कहते हैं– ‘बखत-बखत की बात है लालाजी, आज यारों का बखत ढीला है, इसलिए गरज के बोलते हैं. ‘ अबरार ने वक्त की जगह बखत और मेरा की जगह यारों शब्द का इस्तेमाल किया . इसी तरह पारसी की भूमिका निभा रहे जॉनी वॉकर एक जगह बोलते हैं ‘मैं तुमसे पहलेइच बोला था, इधर से चलो करके’ – यहां ‘करके’ एकदम मुंबइया हिंदी है. इसका नतीजा ये था कि जहां एक तरफ संवाद मनोरंजक बने वहीं दूसरी तरफ दर्शक भी फिल्म से जुड़े. उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि सामने पर्दे पर जो इंसान है वो उनके जैसा ही कोई है.

अबरार अल्वी का कहना था कि किसी किरदार के लिए संवाद लिखते वक्त उस किरदार के रहन-सहन. किरदार कहां का रहने वाला है, किस वर्ग से संबंध रखता है इन बातों का ख्याल रखना ज़रूरी होता है, जिसे लेखन की भाषा में कैरेक्टर स्कैच कहा जाता है. अबरार मानते थे कि सिनेमा में अक्सर भाषा के लिहाज से अगर आप सही लिखना चाहते हो तो कई बार उसको गलत तरीके से लिखना पड़ता है. क्योंकि यहां किरदार कुछ पढ़ नहीं रहा है वो बोल रहा है यानी भाषा से ज्यादा बोली पर गौर करना पड़ता है.
वर्तमान में तो इस काम के लिए बाकायदा भाषा विशेषज्ञ रखे जाने लगे हैं जो अदाकार को क्षेत्रीय भाषा, उसे बोलने का तरीका (डिक्शन) समझाते है. इसकी वजह सिर्फ इतनी ही कि दर्शक उससे ज्यादा जुड़ाव महसूस कर सके.

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे सब अपनी तरह इस्तेमाल करते हैं और वो होती जाती है. उसके इस उदार रवैये ने ही इसे बचा कर रखा हुआ है. लेकिन यहां ये सोचना भी ज़रुरी हो जाता है कि हम किस माध्यम के लिए लिख रहे हैं. किसके लिए लिख रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अपनी कमी छिपाने के चक्कर में हिंदी पर प्रहार कर रहे हैं. बीते दिनों कई टीवी सीरियल्स बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करने का मौका मिला. अलग अलग तरह के कार्यक्रम बनाने वाले इन सभी लोगों में एक बात एक जैसी थी. अगर आप इन्हें कुछ भी देवनागरी में लिख कर देंगे तो आपके पास तुरंत फोन आ जाएगा कि इसे देवनागरी की जगह रोमन में लिख दीजिए. विडंबना देखिये कि किसी एक टीवी सीरियल में कभी कृष्ण की भूमिका निभाने वाले शख्स के लिए भी जब आप संवाद लिखते हैं तो उसे रोमन (अंग्रेजी लिपी में हिंदी लिखना) में लिख कर देना होता है क्योंकि ‘कृष्ण’ हिंदी पढ़ना नहीं जानते हैं.

ऐसा ही एक वाकया है, एक बार एक टीवी कमर्शियल के लिए जिंगल ( एक तरह का छोटा गाना) लिखने का काम मिला. निर्देशक ने बता दिया कि उसे एक मिनिट के जिंगल में क्या-क्या चाहिए. मजेदार बात ये हुई कि जिंगल लिखे जाने के बाद कम से कम 20-25 बार उसमें सुधार किया गया लेकिन बात ही नहीं जम रही थी. समझ में ये नहीं आ रहा था कि जो वो निर्देश दे रहे हैं लिखा तो वैसे ही जा रहा है आखिर दिक्कत कहां है. इस तरह करते –करते एक दिन निर्देशक महोदय अपनी टीम के साथ मुंबई से दिल्ली पहुंचे. अब हम आमने सामने थे, उन्होंने बड़ी संजीदगी और नर्म लहज़े में बताया कि वो क्या चाहते हैं. इस बार उनके सामने ही जिंगल लिखा और जब वो उसे पढ़ने लगे तब सारा माजरा समझ में आया. दरअसल वह हिंदी पढ़ ही नहीं पा रहे थे. इस ‘खुलासे’ के बाद जब पुराने जिंगल को मैंने रोमन भाषा में लिखकर दोबारा दिखाया तो उन्होने लगभग उछलते हुए कहा कि यही तो वह चाहते थे.
कई कार्यक्रमों के लिए लेखन करने के दौरान एक बात का सामना हमेशा करना पड़ता है, कार्यक्रम निर्माता एक बात ज़रूर बोलता है कि भाषा ‘यूथ’ से जुड़ी होनी चाहिए. जिस ‘यूथ भाषा’ की यहां पर बात की जाती है उसका मतलब होता है एक ऐसी स्क्रिप्ट जिसमें अंग्रेजी शब्दों की भरमार हो. इसके पीछे की वजह उस निर्माता का खुद का हिंदी ज्ञान होता है.
हालांकि बीते दिनों हिंदी को लेकर काफी सजगता बढ़ी है, खासकर ओटीटी प्लेटफार्म के आ जाने के बाद, लेकिन उसमें भी अगर आप हिंदी सबटाइटल देखें तो वहां भाषा का मटियामेट हुआ रहता है.

लेकिन इन दिनों तमाम चैनल पर आ रहे बच्चों के कार्टून आपके अंदर एक उम्मीद जगाते हैं उनमें प्रयोग की गई भाषा इस कदर खूबसूरत होती है कि आपको सहसा विश्वास नहीं होता है. शिनचैन, डोरेमोन, हनी, बनी का झोलमाल जैसे तमाम कार्यक्रम में जिसमें सहज और अच्छी हिंदी का प्रयोग देखने को मिलता है.

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हिंदी दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है.


हिंदी के लोकप्रिय टीवी उद्घोषक शम्मी नारंग जिनकी आवाज़ दिल्ली में चलने वाली मेट्रो में भी आपके कानों में पड़ती है, उन्होंने एक इंटरव्यू में उदाहरण देते हुए कहा था कि एक लेखक का दायित्व होता है कि वो अपने पाठक को सिर्फ पठन सामग्री ही न दे साथ में उसे शिक्षित भी करे. उदाहरण देते हुए नारंग ने बताया था ‘जैसे हमें अगर लगता है कि यूनिवर्सिटी शब्द विश्वविद्यालय से ज्यादा जाना पहचाना शब्द है तो इसे इस्तेमाल करते वक्त ‘यूनिवर्सिटी यानि विश्वविद्यालय’ लिखा जा सकता है ताकि जो पाठक इस शब्द का अर्थ नहीं जानता था वो भी जान जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं करके अब अंग्रेजी के शब्दों को अंग्रेजी की ही लिपि में हिंदी साहित्य में डाल दिया जाता है. अक्सर लोग एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं शुद्ध हिंदी. दरअसल शुद्ध हिंदी जैसा कुछ होती नहीं है. भाषा या तो कठिन होती है या सरल होती है. यह नियम हर भाषा पर लागू होता है. एक अंग्रेजी शेक्सपियर ने लिखी है जो समझना हर किसी के बूते की नहीं होती है. एक सहज और सरल अंग्रेजी है जिसने चेतन भगत को भारत के प्रसिद्ध लेखकों में शुमार कर दिया. लेकिन आपने कभी किसी अंग्रजी की किताब में किसी देवनागरी लिपि में लिखे हुए शब्द को देखा है. दरअसल यही वो बात है जो हमारी भाषा को कहीं का नहीं छोड़ती है. ये बात सही है कि जिस भाषा में जितनी स्वीकार्यता होती है वो भाषा उतनी ज्यादा समृद्ध होती है औऱ जीवित रहती है. लेकिन उसके लिए अंग्रेजी शब्द के इस्तेमाल से बेहतर देशज या बोली के शब्दों को प्रयोग होता है. और अगर अंग्रेजी शब्द डाले बगैर रहा नहीं जा रहा है तो कम से कम उसे देवनागरी में ही डाल दिया जाए.

हिंदी साहित्य के जानेमाले लेखक डॉ राही मासूम रज़ा ने अपनी किताब सिनेमा और संस्कृति में लिखा है कि ‘पंजाबी भाषा औऱ पंजाबी साहित्य  यह दोनों ही इस बात का सबूत हैं कि धर्म और भाषा में कोई दूरी या करीबी रिश्तेदारी नहीं है. पाकिस्तानी पंजाब का मुसलमान जो भाषा पढ़ता लिखता और बोलता है उसका नाम भी पंजाबी है. हिंदुस्तानी पंजाब का सिख जो भाषा लिखता पढ़ता औऱ बोलता है वह भी पंजाबी है. मुसलमान पंजाबी भाषा को उर्दू में लिखता है, हिंदू पंजाबी को देवनागरी में लिखता है और सिख गुरुमुखी में.

अगर पंजाबी जो भाषा गुरूमुखी में लिखता है, हिंदू उसी को देवनागरी में लिखता है औऱ कोई उसे उर्दू में लिखता है तो ऐसे ही अंग्रेजी को भी देवनागरी में लिखा जा सकता है. वैसे भी अंग्रेजी सहित न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों को हिंदी में समाहित किया जाता रहा है.

डॉ. रज़ा लिखते हैं कि ‘हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने के लिए सौ बरस तो दीजिए और जब तक के लिए या सारी हिंदुस्तानी लिपियों में लिखी जाने वाली हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाइये या देवनागरी को राष्ट्रलिपि कहिए औऱ भारत की सारी भाषाएं एक लिपि में लिखिए, लोगों को पास आने के लिए एक सड़क तो देनी होगी. यदि देश की सारी भाषाएं एक लिपि में लिखी जाने लगेंगी तो भाषाओं को और उनके भाषियों को घुलने मिलने का मौका मिलेगा. शब्दों का लेन देन होगा और यूं सौ सवा सौ बरस में एक राष्ट्रभाषा उग आएगी. इस नई भाषा का नाम गांधी जी पहले ही रख गए थे ‘हिंदुस्तानी’. वैसे भी हिंदी भाषा और देवनागरी की खूबसूरती इसके लचीलेपन में है, जिसकी वजह से इसकी स्वीकार्यता औऱ समझ किसी भी दूसरी लिपि से कहीं अधिक है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: September 14, 2020, 5:50 AM IST
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