‘टाइगर जिंदा है’ की अपार सफलता के बाद ‘डॉल्फिन जिंदा है’

देश के प्रधान सेवक ने शेर (Lion) औऱ हाथियों (Elephants) को बचाने की मुहिम छेड़ी थी, उसकी कथित सफलता के बाद उसी तर्ज पर अब गंगा डॉल्फिन (Dolphin) सहित समुद्री डॉल्फिन को बचाने का काम किया जाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: August 22, 2020, 2:22 PM IST
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‘टाइगर जिंदा है’ की अपार सफलता के बाद ‘डॉल्फिन जिंदा है’
गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन यानि सूंस जो नदी का शेर है.
1993 में आई फिल्म ‘फ्री विली’ की कहानी अपने मां बाप से बिछड़े एक मछली के बच्चे और इंसानी रिश्तों की है. इस कहानी में इंसान ही मछली के बच्चे को कैद करते हैं और फिर एक इंसान का बच्चा ही विली को फ्री कराने की जद्दोज़हद करता है. कहानी मुश्किलों से होती हुई हमें एक सुखद अंत की ओर ले जाती है. जहां हम इंसान और मछली के बीच एक अनूठे रिश्ते की सकारात्मक कहानी देखते हैं. और कहीं ना कहीं प्रकृति से ऊपर खुद को महान बताने का एक पुराण रचते हैं. इस फिल्म के अंत में एक गाना है जिसमें माइकल जैक्सन ने विली के भावों को शब्द दिए हैं...

इंसानों पर भरोसा करने वाले ये मासूम जानवर फ्री विली में कहते हैं..
मुझे ऐसा संभालना जैसे जॉर्डन नदी संभालती है,
तब मैं कह पाऊंगा की तू मेरा दोस्त है,
मुझे वैसे गले लगाओ जैसे मैं तुम्हारा भाई हूं
मां की तरह मुझे प्यार करो
क्या तुम मेरे साथ ऐसे रहोगे,थक जाऊं, तो क्या मुझे संभालोगे
जब मैं गलत हूं तो मुझे डांटोगे,
मैं भटक जाऊं तो मुझे ढूंढोगे.
मैंने सुना है कि इंसान को भरोसेमंद होना चाहिए,
जब तक हो चलते रहना चाहिए
आखिर तक लड़ते रहना चाहिए,
तो क्या तुम वहीं इंसान हो,
पर हर कोई मुझ पर काबू पाना चाहता है,
लगता है जैसे दुनिया ने मेरे किरदार तय कर लिया है,
मैं समझ नहीं पा रहा हूं,
क्या तुम मुझे बताओगे,
क्या तुम मेरे साथ ऐसे रहोगे,
और क्या मेरी देखरेख कर पाओगे,
मुझे प्यार करो, मुझे खिलाओ
मुझे चूमो, मुझे आजाद रहने दो
तभी मैं खुश रह पाऊंगा..

इस गाने को हिंदी में करने के दुस्साहस को लेकर शायद माइकल जैक्सन मुझे माफ करेंगे. हो सकता है जो खूबसूरत भाव फ्री विली के इस गाने में हैं वो भाव यहां अनुवाद में नहीं आ पाए हैं. लेकिन लब्बोलुआब बस ये है कि मुझे प्यार करो, मुझे खिलाओ, मुझे चूमो सब कुछ करो लेकिन मुझे आज़ाद रहने दो, तभी मैं खुश रह पाउंगा. कुल मिलाकर मुझे जीने दो. हम इंसानों ने सभी के जीने का हक अपने पास सुरक्षित रख लिया है. अब किसी का जीना ना-जीना प्रकृति नहीं हम तय करने लगे हैं.

इसी का नतीजा है कि गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन यानि सूंस जो नदी का शेर है और इकोलॉजी के हिसाब से खाद्य श्रंखला में सबसे ऊपर आता है. हमने उसे लगभग समाप्त कर दिया है. और इसी वजह से पानी का पूरा का पूरा इकोसिस्टम गड़बड़ा गया है. जिस तरह से देश के प्रधान सेवक ने शेर औऱ हाथियों को बचाने की मुहिम छेड़ी थी , उसकी कथित सफलता के बाद उसी तर्ज पर अब गंगा डॉल्फिन सहित समुद्री डॉल्फिन को बचाने के काम किया जाएगा. दरअसल देश के 74 वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रोजेक्ट डॉल्फिन की घोषणा की गई, जिसका मकसद देश की नदियों और समंदर में पाई जाने वाली डॉल्फिन को बचाना है. डॉल्फिन जो गंगा में आकर सूंस कहलाती है वो पानी के इकोसिस्टम की सेहत की रक्षक मानी जाती है. पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक इस कदम से प्रजातियों के संरक्षण में उठाए जा रहे कदमों को बढ़ावा मिलेगा . ये परियोजना लगभग 10 साल चलेगी.

भारत की नदियों में कुल जमा डॉल्फिन
गंगा औऱ ब्रह्मपुत्र भारत की दो मुख्य नदियां है जिसमें डॉल्फिन आमतौर पर पाई जाती है. वैसे तो ये प्रजाति इन दोनों नदियों की छोटी सहायक नदियों जैसे चंबल, सोन, गंडक, घाघरा कोसी में भी देखी गई है लेकिन वो नाममात्र के लिए ही है. जिस भौगोलिक क्षेत्र में डॉल्फिन नियमित तौर पर देखी जाती है उसमें पूरे उत्तर के मैदान हैं जो गंगा औऱ ब्रह्मपुत्र द्वारा बनाए गए हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड शामिल है. इसके अलावा भारत के पड़ोसी देश जिसमें नेपाल और बांग्लादेश शामिल है वहां पर भी ये प्रजाति पाई जाती है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय नदियों में लगभग 3700 डॉल्फिन बची हैं. प्रोजेक्ट डॉल्फिन की कवायद डॉल्फिन के ज़रिये मोदी सरकार के नमामि गंगे मिशन की मदद करना है जिससे गंगा नदी को निर्मल बनाया जा सके. ये बात और है कि बीते छह सालों में नदी के निर्मल बनाने की अऩिवार्य शर्त उसका अविरल रहना ही पूरा नहीं हो सका है. लेकिन सरकार अगर कह रही है तो आपको मानना होगा. जैसे सरकार ने कहा कि उनकी सेव टाइगर मुहिम के बाद अचानक से बाघ बढ़ गए. हमने ये बात भी मानी. खास बात ये भी है कि प्रोजेक्ट डॉल्फिन की घोषणा एन बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव के वक्त ही हुई है. अब ये जैवविविधता को बचाने की कवायद है या चुनाव बचाने की ये तो खैर ऊपर के लोग जाने. वैसे भी लाल किले से की गई घोषणा में डॉल्फिन को बचाए जाने की कोशिश को लोगों के जीवन यापन और पर्यटन विकास से जोड़ा गया है. और सरकारें कोई भी काम सिर्फ इसलिए तो कर ही नहीं सकती है जो बस प्रकृति के लिए है. हर काम में हमारा नफा कितना है ये भाव निहित होता ही है.

2016 के बाद चार साल गुज़र गए
राष्ट्रीय गंगा परिषद (एनजीसी) की पहली बैठक कानपुर में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई थी. बैठक में गंगा डॉल्फिन को बचाने और उनकी आबादी बढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव पर गंभीरता से चर्चा की गई. इस बैठक में गंगा नदी के किनारे के पांच राज्य – उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्री सहित 9 केंद्रीय मंत्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष शामिल थे. बैठक में नदियों से जुड़े शहर, घरो में जल निकासी समेत विभिन्न ऐसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जिससे गंगा के जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है. गंगा औऱ सहायक नदियों में डॉल्फिन की तेजी से कम हो रही संख्या को पर्यावरण से जुड़ा एक बड़ा खतरा माना गया है. इस बैठक को हर साल होना था लेकिन 2016 से ये अब तक नहीं हुई है.

टाइगर जिंदा है... सच में ?
डॉल्फिन के बारे में कुछ बात करें इससे पहले ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ की सफलता पर वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण पर नज़र डाल लेते हैं. प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय बाघ अनुमान रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट के हिसाब से देश में बाघों की संख्या 2014 की 1400 से बढकर 2019 में 2977 हो गई. औऱ उन्होंने कहा था कि जो कहानी ‘एक था टाइगर' के साथ शुरू होकर ‘टाइगर जिंदा है' तक पहुंची है, वो वहीं न रुके, इसके लिए केवल टाइगर जिंदा है, से काम नहीं चलेगा. सरकार के इस कदम पर वैज्ञानिकों की राय एकदम जुदा थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि बाघों के बढ़ोतरी को लेकर सरकार का अतिउत्साह दिखाना, और गलत तरीके से आंकड़ों को मीमांसा करना लंबे समय में संवर्धन को बहुत नुकसान पहुंचाएगा. वाइल्ड लाइफ कन्ज़र्वेशन सोसाइटी के एशिया के अध्यक्ष वैज्ञानिक के. उल्लास कारंथ मानते हैं कि सरकार जो सर्कस कर रही है, इसकी ज़रूरत नही हैं, उनके मुताबिक बाघों की संख्या का बढ़ा बताना अवैज्ञानिक है.

दरअसल, इस प्रक्रिया में पूरे भारत भर के बाघों की संख्या की गणना की गई जबकि जो पिछला आंकड़ा बताया गया वो केवल अभ्यारण्य और संरक्षित वनों का था. वर्ल्ड वाइड फंड से संबंधित अनुराग डांडा का कहना है कि ‘बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई कहने के बजाए हमें कहना चाहिए अब हम 30 फीसदी और बाघों को जानते हैं. जिनकी पहले गणऩा नहीं हो पाई थी.’ वैज्ञानिकों का मानना है कि चार साल में 30 फीसदी बढ़ोतरी अकल्पनीय है. हालांकि बाघों की जन्मदर काफी अधिक होती है लेकिन साथ ही उनकी मृत्यु दर भी काफी उच्च होती है. दरअसल बाघों के ज्यादा दिखने के पीछे उनके घरों का यानि जंगलों का खत्म होना भी है, जिसकी वजह से वो बाहर निकल गए हैं. इसके अलावा खुद केंद्र सरकार के आंकड़ों में विवाद था. जहां एक तरफ पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 30 फीसदी की बढ़ोतरी बताई. वहीं देश के प्रधानमंत्री के आंकड़े 40 फीसदी बढ़ोतरी के थे. कुल मिलाकर आंकड़ों की बाज़ीगरी में अब दुनिया के सबसे पुराने जीव का नंबर आ चुका है.

डॉल्फिन के बारे में-
अनोखे गले की मालिक डॉल्फिन करीब 600 तरह की आवाज़ निकाल लेती है. ये सीटी बजाने वाली एकमात्र जलीय जीव है. इसके अलावा वह म्याउं-म्याउं से लेकर मुर्गे की तरह बांग भी दे सकती है. ऐसा माना जाता है कि डॉल्फिन का जन्म दो करोड़ साल पहले हुआ था लेकिन आधिकारिक तौर पर गंगा डॉल्फिन की पुष्टि 1801 में हुई थी. धरती के सबसे पुराने जीवों में शामिल डॉल्फिन ने लाखो साल पहले जल से जमीन पर बसने की कोशिश की लेकिन धरती का वातावरण डॉल्फिन को रास नहीं आया और फिर उसने वापस पानी में ही बसने का मन बना लिया. एक वक्त ये भारत, नेपाल औऱ ब्रह्मपुत्र के नदी तंत्र की गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली-सांगु नदी में पाई जाती थी, लेकिन अब ये लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है.

डॉल्फिन का शरीर टॉक्सिक और हेवी मेटल से भरा हुआ होता है. उसके मांस में तेज दुर्गंध होती है, उसे खाने से लोग बीमार पड़ सकते हैं. डॉल्फिन के तेल को लेकर जो भ्रांतिया फैली हुई है उसकी वजह से इसकी तस्करी भी बहुत होती है, खासकर बांग्लादेश की सीमा से लगे पाकुड़ क्षेत्र जो भागलपुर से 150 किमी दूर है. यहां इसकी काफी सप्लाई होती है. गंगा की डॉल्फिन की आंख तो होती है लेकिन वो लगभग अंधी होती है, आंख पर मौजूद मोटी झिल्ली की वजह से वो कोई भी इमेज बनाने में सक्षम नहीं होती है. इसलिए वो अल्ट्रासोनिक वेव से किसी की मौजूदगी का पता लगाती है.

घोषणा और चिंता की बात
सरकार ने प्रोजेक्ट डॉल्फिन की घोषणा करते हुए गंगा डॉल्फिन को लेकर भले ही चिंता जताई हो लेकिन इसके साथ एक सवाल भी खड़ा होता है , एक तरफ सरकार भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव सूंस को बचाने की बात कर रही है, दूसरी तरफ वो बनारस से हल्दिया तक सस्ते जलमार्ग ट्रांसपोर्ट का तेजी से विस्तार कर रही है. हालांकि पिछले साल इसके उद्घाटन के दौरान ही हल्दिया से बनारस तक जहाज लाने में सरकार को इतना पसीना आ गया था कि कुछ देर के लिए गंगा का पानी खारा सा हो गया था.

सरकार ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 2016 में जब राष्ट्रीय गंगा परिषद की कानपुर में बैठक करके डॉल्फिन पर चिंता ज़ाहिर की थी उसी दौरान राष्ट्रीय जलमार्ग कानून के तहत 111 अंतर्देशीय जलमार्ग भी चिन्हित किए जा रहे थे. इनमें से 38 जलमार्ग डॉल्फिन के घर से गुज़रते है. इसका साफ मतलब है कि अगर हम विकास के मार्ग पर चलते हैं तो हम सीधे तौर पर गंगा के पारिस्थितिकीय तंत्र के साथ समझौता कर रहे हैं. यानि एक तरफ सरकार अपने कोष से करोड़ों रुपए गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए दान करके सुर्खियां बटोर रही है. दूसरी तरफ वही सरकार गंगा को प्रदूषित करने में कोई कोर कसर नही छोड़ रही है. जलमार्ग विकास परियोजना का लक्ष्य गंगा के वाराणसी और हल्दिया के बीच ऐसे जहाज चलाना है जो 1500 से 2000 टन माल ढो सके. इसका मतलब है इन मालवाहक जहाजों से निकलने वाला तेल, धुआं गंगा को प्रदूषित करेगा, ड्रेनिंग की समस्या और बढ़ जाएगी और साफ है कि इसका असर गंगा में रहने वाले जीवों पर पड़ेगा. इसलिए अब बस इंतज़ार कीजिए. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: August 22, 2020, 1:45 PM IST
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