जिंदगी में ढीठ होना बेहद ज़रूरी है

सुशांत राजपूत (Sushant Rajput) की मौत के बाद ये बात इसलिए उभर कर आती है कि सुशांत जैसे होनहार कलाकर अगर आत्महत्या (Suicide) करने को राजी हो जाता है तो उसके पीछे की वजह क्या हो सकती है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 22, 2020, 10:32 PM IST
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जिंदगी में ढीठ होना बेहद ज़रूरी है
एक्टर सुशांत सिंह राजपूत का पाइल फोटो.
कुंगफू पांडा फिल्म एक मोटे थुलथुले पांडा के इर्द गिर्द घूमती है. पांडा जिसे दुनिया के सबसे आलसी जीवों में शुमार किया जाता है. जो दिन भर एक जगह पर बैठ कर बांस खाते हुए गुज़ार सकता है. उसके साथ कुंगफू जैसी फुर्ती वाले खेल को जोड़ना अपने आप में फिल्म को रोचक बना देती है. फिल्म में जो पांडा है उसे कुंगफू वारियर के तौर पर चुना जाता है. जिस गुरू ने ये काम किया है उसके बाकी के शिष्य जिसमें एक टाइग्रेस, स्नेक भी है. जो कुंगफू के माहिर है उन्हें अपने गुरू के फैसले पर हैरानी होती है. क्योंकि जिस तरह से पांडा ने कुंगफू वारियर का खेल जीता है उसमें उसकी कला कम औऱ संयोग ज्यादा नज़र आता है. लेकिन गुरू इसे प्रकृति का चुनाव बताता है. कहानी आगे बढ़ती है और एक खलनायक की एंट्री होती है. वो एक शेर है जो जेल से भाग गया है.

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संयोग से वो भी उक्त गुरू का ही शिष्य रह चुका है औऱ उसे इसी बात का मलाल है कि उसके अंदर पूरी योग्यता होने के बावजूद उसका चुनाव क्यों नहीं हुआ. कहानी में आपको एक बार शेर के साथ सांत्वना भी हो जाती है और आप सोच में पड़ जाते हैं कि फिल्मकार ने पांडा का चयन क्यों किया. हालांकि फिल्मकार दर्शकों को इस फैसले के पीछ के फलसफा का कई बार इशारा देता है. अंत में जब खलनायक शेर और पांडा की लड़ाई होती है तो शेर जो खेल का माहिर है वो पांडा की बुरी तरह धुनाई करता है. पांडा कभी लुढ़कता है, कभी गिरता है, शेर उसे मार रहा होता है लेकिन पांडा उसके घूंसो को इस तरह ले रहा होता है जैसे कोई उसकी मसाज कर रहा है. ऐसा लगता है जैसे वो पिटने में भी आनंदित हो रहा है. फिर एक वक्त आता है कि खलनायक शेर थक कर चूर हो जाता है और बस उसी वक्त पांडा अपने गुरू का सिखाया हुआ दांव चलता है औऱ शेर धराशायी हो जाता है.

फिल्मकार ने पूरी फिल्म में पांडा को एक ढीठ की तरह प्रस्तुत किया है. जिस पर किसी बात का कोई फर्क नहीं पड़ता है. वो गिरता है फिर उठता है और फिर काम पर लग जाता है. वो डांट भी खाता है फिर काम पर लग जाता है. वो किसी बात का बुरा नहीं मानता है या यूं कहे किसी बात को दिल से नहीं लगाता है.
फिल्मकार दरअसल उस स्वाकारोक्ति की तरफ इशारा करता है जो हमें प्रकृति ने प्रदान की है. प्रकृति जिसे हमारे जीने के लिए सबसे ज़रूरी और अनिवार्य शर्त मानती है. जिसके लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने ‘सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट ’ का सिद्धांत दिया था. इस सिद्धांत को लेकर कई तरह की बातें होती हैं. जिसमें ये कहा गया कि डार्विन का ये सिद्धांत बताता है कि जो फिट होगा वही जी सकता है. यानि अनफिट के लिए इस धरती पर कोई जगह नहीं है. जबकि अगर हम इस सिद्धांत के सही मायने समझे तो ये बताता है कि संघर्ष करके ही हम फिट रह सकते हैं.



हम इस बात को इमारतों की दरारों, चट्टानों और ऐसी कोई भी जगह जहां किसी पौधे को जीने के लिए कोई माकूल व्यवस्था नहीं होती है, वहां पर भी ऊगे हुए पीपल से समझ सकते हैं. दरअसल पीपल हमें वो जिजिविषा समझाता है कि आपको जीना है तो आप नमी तलाश लेते हैं.वहीं रशियन लेखक, चिंतक पीटर क्रोपोटकिन का मानना है कि डार्विन का सिद्धांत प्रतियोगी माहौल के उलट सहयोग की बात करता है. पीटर अपनी बात को साबित करने के लिए प्रकृति का ही सहारा लेते हैं औऱ बताते हैं कि धरती पर रहने वाली वो प्रजातियां जिनकी संख्या ज्यादा है वो अक्सर झुंड में रहना पसंद करती है क्योंकि इस तरह से वो एक दूसरे के लिए ताकत बनते हैं औऱ मिलुजल कर किसी भी मुसीबत से पार पा लेते हैं.
सुशांत राजपूत की मौत के बाद अवसाद पर खूब बात हो रही है. वैसे तो पिछले कुछ सालों से अवसाद एक लाइफ स्टाइल बीमारी की तरह उभरी है. मधुमेह, रक्तचाप की तरह ही अवसाद को भी हम जीवनचर्या से जुड़ी बीमारियों की तरह ही ले रहे हैं. डॉक्टर उसे दूर करने के उपाय भी सुझा रहे हैं. लक्षण भी बता रहे हैं. लेकिन बीते कुछ सालों में बच्चों की परवरिश को लेकर हमारे तौर तरीको पर बात भी खूब हो रही है.


नई पीढ़ी को लगातार समझाया जा रहा है कि बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव ना करें, बच्चों को ऐसा कुछ ना कहें, बच्चें जो चाहे उन्हें करने दे. उन पर ज्यादा दबाव ना बनाए, जब वो खाना चाहें खाने दें, जब पीना चाहे पीने दें. ये बात सही है कि बच्चों को प्रतियोगी माहौल नहीं देना चाहिए लेकिन साथ में ये बात समझना भी ज़रूरी है कि हमें बच्चों को लड़ना सिखाना भी ज़रूरी है. सुशांत राजपूत की मौत के बाद ये बात इसलिए उभर कर आती है कि सुशांत जैसे होनहार कलाकर अगर आत्महत्या करने को राजी हो जाता है तो उसके पीछे की वजह क्या हो सकती है. वहीं उसी उद्योंग में नवाजुद्दीन जैसे उदाहरण भी हैं जो अपने संघर्ष में दो दशक बिता देते हैं. सुशांत के पारिवारिक माहौल को देखें तो समझ में आता है कि उसका लालन पालन बहुत लाड़ प्यार से हुआ, उसे किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं रही, उस पर वो खुद भी कुशाग्र बुद्धि का था. सब कुछ ने मिलाकर उसके इर्द गिर्द एक सुरक्षा का माहौल बना दिया था जिससे उसे मुकाम तो हासिल हुआ लेकिन साथ में नाकाम होने का डर भी घिरता रहा. सुशांत उस कोमल फूल के पौधे की तरह था जो मौसम के बदलाव के आशंका से घिरा हुआ था वहीं नवाज़ुद्दीन जैसे पता नहीं कितने कलाकार हैं जो अपने ढीठ रवैये की वजह से उस पीपल की तरह बन जाते है जो अपने हिस्से की नमी खोज ही निकाल लेते हैं.



अगर हम पुरानी पीढ़ी के परवरिश को देखें तो हमें एक बात नज़र आती है कि उन्होंने हमें प्यार दिया तो मार भी दी. ये बात ठीक है कि किसी को मारना ठीक नहीं है लेकिन बच्चे को अतिसुरक्षा का माहौल देकर हम उसके अंदर मौजूद उस योद्धा पांडा के अस्तित्व को खत्म कर देते हैं जो उसे प्रकृति ने बनाया है.
कुंगफू पांडा से लेकर पीपल तक जितनी भी बात हुई उसमें एक बात निहित है जो समझना बेहद जरूरी है कि प्रकृति बार बार कहती है कि जीना है तो हमें बच्चों को ढीठ बनना सिखाना होगा. एक कहावत होती है चिकना घड़ा या औंधा घडा. इसका मतलब होता है ऐसा हो जाना कि कोई फर्क नहीं पड़े. पता नहीं कितने छात्रों को मैने हमेशा एक बात ज़रूर कही कि पढ़ाई करके जब बाहर निकलो तो अपनी चमड़ी को मोटा करके बाहर निकलना, आत्म सम्मान होना चाहिए लेकिन उसे क्षणभंगुर नहीं होना चाहिए.

जिंदगी को मोटे अनाज की तरह जीना चाहिए जिसे पनपने के लिए ज्यादा खाद की नहीं बस ज़मीन की ज़रूरत होती है. सपने देखना अच्छा है लेकिन उसके टूटने का डर नहीं उसे फिर से खड़ा करने की ताकत होनी चाहिए. उसके लिए ज़रूरी है ढीठ बनना. ठीक उस बेशर्म (भोपाल में खंतियों में ऊगा एक पौधा जिस पर पीले रंग के फूले उगते हैं, उसे किसी तरह के कोई रखरखाव की ज़रूरत नहीं पड़ती) के पौधे की तरह जिसे ऊगना होता है तो बस ऊगना होता है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: June 22, 2020, 10:16 PM IST
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