संतुलन का खोना है कोरोना वायरस का होना

कार्टूनिस्ट प्राण का एक किरदार है बिल्लू. बिल्लू जिसकी हेयरस्टाइल कुछ इस तरह की है कि उसकी आंखे कभी नज़र नहीं आती है. बिल्लू एक बॉय नेक्सट डोर जैसा किरदार है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2020, 3:08 PM IST
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संतुलन का खोना है कोरोना वायरस का होना
कार्टूनिस्ट प्राण का एक किरदार है बिल्लू. बिल्लू जिसकी हेयरस्टाइल कुछ इस तरह की है कि उसकी आंखे कभी नज़र नहीं आती है. बिल्लू एक बॉय नेक्सट डोर जैसा किरदार है.
कार्टूनिस्ट प्राण का एक किरदार है बिल्लू. बिल्लू जिसकी हेयरस्टाइल कुछ इस तरह की है कि उसकी आंखे कभी नज़र नहीं आती है. बिल्लू एक बॉय नेक्सट डोर जैसा किरदार है. उस की सोच, उसका मुसीबतों से डील करने का तरीका ठीक वैसा ही है जैसा एक आम इंसान का होता है. एक दिन बिल्लू अपने घर से सज-धज कर कहीं जाने के लिए निकलता है. रास्ते में उसका दोस्त मिल जाता है.

दोनों बातों में इतना मशगूल हो जाते हैं कि बिल्लू को पता ही नहीं चलता है कि कब एक कुत्ता उसके पास आकर उसकी पतलून एक तरफ से चबा गया है. जब बिल्लू की नज़र अपनी पतलून पर पड़ती है तो वो परेशान हो जाता है. फिर वो और उसका दोस्त मिलकर एक युक्ति निकालते हैं. वो सोचते हैं कि कुत्ते से दूसरी तरफ की पतलून भी थोड़ी चबवा ली जाए, इस तरह दोनों तरफ से पतलून एक जैसी हो जाएगी और नया फैशन जैसा कुछ लगेगा. वो अपनी इस युक्ति को आजमाते हैं औऱ कुत्ते को पतलून चबाने के लिए उकसाते हैं, कुत्ता आज्ञाकारी निकलता है और पतलून चबा लेता है. लेकिन उसके मुंह में कोई इंचटेप तो है नहीं, तो वो गलती से थोड़ा ज्यादा चबा लेता है. एक बार फिर पतलून का संतुलन बिगड़ जाता है. अब दूसरी तरफ की पतलून खिलवाई जाती है, लेकिन फिर नाप में गड़बड़ी हो जाती है. इस तरह कुत्ता यहा से वहां, वहां से यहां होता है. और हम कहानी के अंत में देखते हैं कि बिल्लू की पतलून संतुलन बिठाते-बिठाते कच्छे में तब्दील हो गई है.

ये कहानी इसलिए क्योंकि हमारा जीवन के साथ संतुलन बनाने का यही तरीका है जो हमें एक वक्त ऐसी हालत में लाकर छोड़ देता है कि हम पतलून को पतलून नहीं रहने देते हैं. इस वक्त सारी दुनिया को कोरोना ने उथल-पुथल करके रख दिया है. और हम एक अतिरेक संतुलन को बनाने में लगे हुए जिसकी बदौलत हमने सब कुछ असंतुलित कर दिया है. हम या तो इतने ज्यादा सुरक्षा के घेर में चले गए हैं कि आजू बाजू वाला कोई अपने घर में ज़ोर से सांस भी ले लेता है तो हम भाग कर अपने बाथरूम में जाकर नहा धो लेते हैं. खुद तो नहा ही रहे हैं, सब्जियों, नोटों तक को नहलाने में लगे हुए हैं. या फिर इतने लापरवाह हैं कि खुद को बाली और कोरोना को रावण समझ रहे हैं, और तमाम बातों को कांख में दबाकर बाहर घूमने निकल रहे हैं.

हमें कोई भी बात वैसी नहीं करनी है जैसी उसे करने की दरकार हो. देश के प्रधानमंत्री हाथ जोड़ कर कहते हैं कि जो इस वक्त अपनी जान को दांव पर लगाकर हमारे लिए काम कर रहे हैं उनके लिए ताली-थाली बजाकर उनका सम्मान करें. तो हम ताली-थाली के साथ जुलूस लेकर सम्मान देने निकल पड़ते हैं. मोदी जी कहते हैं कि उम्मीद की किरण जलाइए तो हम उत्साह के पटाखे फोड़ देते हैं. हमारा व्यवहार उस मेंढक की तरह हो जाता है जिन्हें अगर तराजू में रखकर संतुलित करने का प्रयास किया जाए तो वो कभी नहीं हो सकता है.
हमारी ये आदत आज से नहीं है, हम शुरू से इसी असंतुलन के आदि रहे हैं. इसी आदत की बदौलत हमने खुद को इस हाल में लाकर खड़ा कर दिया है. 1965 के वक्त में जब भारत युद्ध के दौर से गुज़र रहा था, उस दौरान हमें अनाज की कमी से भी गुज़रना पडा, हमने अमेरिका से गेंहू मांगा तो उसने भी मना कर दिया. नतीजा ये निकला कि हम अनाज के मामले में इतने आत्मनिर्भर बन गए कि मांगने के बजाए हम देने की स्थिति में आ गए. हमने हरित नाम की जो क्रांति की, इसी की बदौलत क्रांति से हमने कृषि में ऐसा असंतुलन पैदा कर दिया कि हमारी ज़मीनों को रसायनिक खाद और कीटनाशकों की लत लग गई. ज़मीन की उर्वरता कम होती गई औऱ रसायनिक खाद की मात्रा बढ़ती गई. फिर सरकारों को याद आया कि इस तरह से तो चौ- तरफा नुकसान हो रहा है. खाद पर सब्सिडी भी जा रही है और ज़मीन की उर्वरता भी मिट रही है, जानवरों में इंसानो में तमाम तरह के विकार भी पैदा हो रहे हैं और पानी की भी लगातार कमी होती जा रही है. फिर सरकार ने संतुलन बनाने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देने की पहल कर दी.

भगवान ने हमारी तरह ही पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को भी बनाया है. इनके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का काम सृष्टि में सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी होने का दावा करने वाले मनुष्य का ही है. विकास का अर्थ होता है मानव और प्रकृति के बीच संतुलन, लेकिन हम तो किसी और तरीके का संतुलन बिठाने लगे.
हमें नदियां मिली, जंगल मिले और वो तमाम संसाधन मिले जो हमारे जीवन को संतुलित करने के लिए थे. लेकिन हमने सबसे पहले इनमें ही असंतुलन पैदा कर दिया. फिर हमें लगा कि नहीं कुछ तो संतुलन बना कर रखना होगा तो हम नदियों के घाट सुंदर करने लगे, नदी को बताने लग गए कि हम से साफ कर रहे हैं. उसे थोड़ा थोड़ा पानी देने लग गए जो हमने बांध बना कर रोक लिया था. यही हाल जंगलो का हुआ, हमने जंगलो को अच्छी तरह से तबाह किया, अब हम पेड़ लगाते फिर रहे हैं. ये हमारे संतुलन बैठाने का तरीका है.जबकि 1984 में जर्मन सायकोएनालिस्ट एनरिक फ्रोम्म ने एक थ्योरी दी, जिसे बायोफिलिया हायपोथिसिस कहा गया, इसका मतलब होता है हर जीवित प्राणी से प्यार करना. अमेरिकन बायोलॉजिस्ट एडवर्ड ओ विल्सन ने इसी बायोफिलिया के विचार को आगे बढ़ाते हुए बताया कि इंसानो का प्रकृति के प्रति लगाव जेनेटिक होता है. लेकिन हम लगातार उससे दूर जाते जा रहे हैं. और दूर बैठे बैठे उसके साथ संतुलन बनाना चाहते हैं.

मसलन एक सूक्ष्मजीव होता है जिसका नाम है माइकोबेक्टीरियम वेकी जो मायकोबेक्टेरियेसी से निकला है. ये एक तरह का सॉइल बैक्टीरिया होता है यानि मिट्टी में पाया जाता है. यहां वेकी का मतलब लेटिन में गाय से है. क्योंकि ये सबसे पहले गाय में पाया गया था इसलिए इसका नामकरण माइकोबेक्टिरियम वैकी किया गया. इस सूक्ष्मजीव की चर्चा इसलिए क्योंकि इसका मानसिक और शारीरिक सेहत को दुरुस्त करने में बहुत बड़ा हाथ माना जाता है. शोध बताती हैं कि माइकोबेक्टीरियम वैकी जिसे आम भाषा में ‘हेप्पी बेक्टिरिया’ भी कहा जाता है उसका अस्थमा, कैंसर, अवसाद, फोबिया, डर्मेटाइटिस यहां तक कि ट्यूबरक्लोसिस के इलाज में भी काफी योगदान रहता है. यहां चौकाने वाली बात ये है कि टीबी यानि ट्यूबरक्लोसिस के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया का नाम भी माइकोबेक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस ही है. इसे माइकोबेक्टीरियम कहा इसलिए जाता है क्योंकि ये बैक्टीरिया है लेकिन दिखता फंगस की तरह है.
2004 में मेरी ओ ब्राइन ने एक शोध में पाया कि माइकोबेक्टीरियम वैकी को शरीर में इंजेक्ट करने या डाल देने से जिन लोगों को क्रोनिक यानि पुरानी फेफड़े की बीमारी थी उस पर इसका अच्छा असर देखने को मिला औऱ वो जल्दी ठीक होने लगे. साथ ही ये भी पाया गया कि इस बैक्टीरिया के जाने से लोगों में सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिला.

2007 में चूहों पर की गई एक शोध में पता चला कि माइकोबेक्टिरियम वैकी के शरीर मे जाने पर ये दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर को सक्रिय कर देता है जिससे सेरोटोनिन जिसे ‘हेप्पी हार्मोन’ भी कहते हैं वो रिलीज होने लगता है. इसके अलावा इससे फ्लू जैसे इन्फेक्शन में इम्यूनिटी बढ़ने और दिमाग को दुरुस्त करने में भी कारगर पाया गया. शायद इस बैक्टीरिया के लिए ही कहा गया है कि पैर जितने मिट्टी में सने हों, दिल उतना ही खुश रहता है.

ये ठीक वैसा ही है जैसे गंगा में पाया जाने वाला बेक्टिरियोफेज़ जिस हम गंगा का निंजा वायरस कहते हैं, वो गंगा में पाये जाने वाले दूसरे सूक्ष्मजीवों से लड़ता है औऱ उनका भोजन कर लेता है. इस तरह से गंगा में गंगत्व मौजूद था. दूसरे शब्दों में गंगा का गंगत्व यही बेक्टीरियोफेज़ ही था. लेकिन हमने लगातार ‘संतुलित असंतुलन’ पैदा करके गंगा के इस बैक्टीरियोफेज को लगभग खत्म होने की कगार पर ला खड़ा किया है.
कृषि क्रांति के बाद भी जब हमने पहले पहले खेती-बाड़ी करना शुरू की तो हमारे खेतों में सबका हिस्सा होता था. मसलन फसल लगती तो उस पर कीड़े लगते, वो अपना हिस्सा खाते, औऱ जब बढ़ने लगते तो चिड़िया और दूसरे जीव का भोजन बन जाते, फिर यही चिड़िया औऱ दूसरे जीव ब़डे जीवों का आहार बन जाती. एक आहार श्रंखला चलती जिसमें परस्पर सांमजस्य के साथ संतुलन बना रहता था.

यहां इस बैक्टीरिया और आहार श्रंखला का जिक्र इतना विस्तार में इसलिए किया गया क्योंकि हमें ये समझना होगा कि हम चाहें लाख कोशिश कर लें हमारे पास किसी सूक्ष्मजीव से लडने की ताकत नहीं है. ‘गब्बर सिहं की भाषा में समझे तो, गब्बर के ताप से तुमको एक ही आदमी बचा सकता है, खुद गब्बर’.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: April 11, 2020, 2:22 PM IST
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