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25 फरवरी को आपके हाथ में हो सकता है गाय से जुड़ा एक प्रश्न पत्र

एक घंटे चलने वाली इस परीक्षा में 100 बहु-विकल्प वाले सवाल होंगे, जो हिंदी, अंग्रेजी और 12 प्रांतीय भाषाओं में पूछे जाएंगे. खास बात ये है कि इस परीक्षा के लिए कामधेनु आयोग ने एक पाठ्यक्रम भी जारी किया है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 13, 2021, 12:18 PM IST
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25 फरवरी को आपके हाथ में हो सकता है गाय से जुड़ा एक प्रश्न पत्र
गाय के बारे में ज्ञान बढ़ाने की कोशिश. (File pic)
मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी है, दो बैलों पर. इस कहानी में बैलों का मालिक उन्‍हें बहुत प्यार करता है, फिर किसी कारणवश उसे अपने बैलों को अपने ससुराल में छोड़ना पड़ता है. जहां उन पर जुल्म होते हैं. दोनों बैल वहां से भाग निकलते हैं और वापस अपने मालिक के घर आ जाते हैं. यहां से फिर उन्हें कसाई के यहां छोड़ दिया जाता है लेकिन वो वहां से भी बच निकलते हैं और फिर अपने घर लौट जाते हैं. इस बीच दोनों बैलों की दोस्ती, उनका सांड से मुकाबला करना जैसे कई एडवेंचर भी सामने आते हैं. आपको बताना है कि मुंशी प्रेमचंद की इस कहानी में बैलों के किरदार का नाम क्या था? गाय और सुअर के चिल्लाने में क्या अंतर होता है? किसका दूध दुनिया का सबसे अच्छा दूध होता है?

25 फरवरी को गाय से जुड़ा एक प्रश्न पत्र भारत के कई लोगों के हाथ में हो सकता है. इस प्रश्नपत्र के जरिये यह पता करने की कोशिश की जाएगी कि आप गाय के बारे में कितना जानते हैं. भारत में 'गौ-विज्ञान' पर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा आयोजित की जाएगी. इस परीक्षा का आयोजन गौ-कल्याण के लिए काम करने के लिए केंद्र सरकार की बनाई गई संस्था राष्ट्रीय कामधेनु आयोग करने वाला है. एक घंटे चलने वाली इस परीक्षा में 100 बहु-विकल्प वाले सवाल होंगे, जो हिंदी, अंग्रेजी और 12 प्रांतीय भाषाओं में पूछे जाएंगे.

परीक्षा का उद्देश्य लोगों के अंदर गाय के प्रति जागरुकता पैदा करना और उन्हें इसके प्रति संवेदनशील बनाना है. खास बात ये है कि इस परीक्षा के लिए कामधेनु आयोग ने एक पाठ्यक्रम भी जारी किया है.


गाय का गोबर और जानवर की मौत से भूकंप
कामधेनु आयोग के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा जिसे ‘पंचगव्य’ नाम दिया गया है, उसमें गौमूत्र, गोबर के उपयोग और उसके औषधीय फायदों के बारे में जानकारी दी गई है. इसमें बताया गया है कि किस तरह भोपाल गैस त्रासदी के दौरान भोपाल में करीब 20 हज़ार लोगों की मौत हो गई थी, वहीं जो लोग गाय के गोबर से लिपी हुई दीवारों के भीतर रहते थे. उन पर इस ज़हरीली गैस का असर नहीं पड़ा था. यहां तक कि आज भी भारत और रूस में न्यूक्लियर पॉवर सेंटर में रेडियेशन से बचाव के लिए गाय के गोबर को बाकायदा शील्ड के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

यही नहीं पाठ्यक्रम में बताया गया है कि गौहत्या और भूकंप का एक दूसरे से संबंध होता है. इसके पीछे तर्क दिया गया है कि कई देशी और विदेशी वैज्ञानिकों ने ये सिद्धांत दिया है और बताया है कि पशु वध का प्राकृतिक आपदाओं से संबंध होता है. इसे आइंस्टीन पेन वेव से जोड़कर बताया गया है. कई सालों से शोध में लगे प्रोफेसर-वैज्ञानिक डॉ. मदन मोहन बजाज, जिनके नाम पर 300 से ज्यादा रिसर्च पेपर हैं. उन्होंने दो और वैज्ञानिक, इब्राहिम, और विजयराज सिंह के साथ मिलकर एक किताब लिखी ‘एटियोलॉजी ऑफ अर्थक्वेक- ए न्यू अप्रोच’. इस किताब में उन्होंने बताया है कि रोज़ाना मारे जा रहे करोड़ों जानवर जिसमें मवेशी, पक्षी, मछली सभी शामिल हैं, उनकी चीत्कार भूकंप का कारण बनती है.

ये किताब दरअसल नया कुछ नहीं बताती है बस आइंस्टीन के पेन वेव्स के सिद्धांत को आगे बढ़ाती है. हालांकि कई भूगर्भ विज्ञानी इस बात को पूरी तरह नकारते हैं. लेकिन विज्ञान का काम ही हर संभावना को तलाशना होता है. वैसे भी कुछ वक्त पहले अमेरिका में एक प्रयोग हुआ था, जिसमें एक बड़े से स्टेडियम में हज़ारों की संख्या में लोगों को खड़ा किया गया और उन्हें एक साथ एक ही वक्त पर उछलने के लिए कहा गया. उनके एक साथ ज़मीन पर पैर लगने से जो धमक पैदा हुई उसे जांचा गया तो पता चला कि इतने सारे लोगों के उछलने से जो धमक पैदा हुई थी वो एक बहुत कमज़ोर भूकंप के बराबर थी. ऐसे में जानवरों के चीत्कार से उत्पन्न हुई वेव्स से प्रलय को लेकर इंकार नहीं किया जा सकता है.क्या जागरुकता काफी है
गाय के बारे में जानकारी वाकई में एक अच्छी पहल है, लेकिन क्या महज़ जानकारी देने भर से काम हो जाएगा. इसका जवाब आपको मिलेगा, जब आप सड़क मार्ग से दिल्ली से भोपाल या प्रयागराज से रीवा जाएंगे. 4-6 लेन के फर्राटा हाइवे पर जब आपको सड़क पर झुंड में बैठी हुई, गाय नज़र आएंगी, या वाहनों में भरकर उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश की सीमा पर छोड़ी जा रही गाय नज़र आएंगी. तब आपको समझ आएगा कि सरकार जानकारी तो दे रही है लेकिन कदम उठाने के मामले में अभी भी बहुत पीछे है.

इसी तरह गंगा तट पर बसा एक गांव है कलिंजर. काली और दोमट मिट्टी की बेहतरीन उपजाऊ जमीन, सिंचाई के लिए गंगा के पानी की उपलब्धता, कुल मिलाकर वो सब कुछ जो एक किसान और उसकी फसल को समृद्ध बनाने के लिए ज़रूरी होता है. लेकिन विडंबना ये है कि इस गांव के किसान पिछले कुछ सालों से खेती ही नहीं कर रहे हैं. इस इलाके में सैकड़ों बीघा जमीनें बिना जुताई के यूं ही पड़ी हुई हैं. छोटे से लेकर बड़े किसान सबका हाल एक जैसा ही है. वजह है खुली घूमती नील गाय के सैकड़ों समूह और छुट्टे पशु जिन्होंने इन खेतों पर कब्जा कर लिया है. इस इलाके में ज्यादातर छोटी जोत के किसान हैं. औसतन एक या दो बीघा वाले किसान. घर में दूध ना देने वाली गाय के चारे का इंतजाम बेहद मुश्किल होता है. मजबूरन उसे घर से दूर छोड़ दिया जाता है. सिर्फ इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यह संख्या लाखों में है.

छुट्टा पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, उत्तर प्रदेश सरकार इनकी संख्या करीब आठ लाख बताती है, वास्तविकता में यह तीन गुना से भी ज्यादा है.


लब्बोलुआब ये है कि गौवंश बचाने की सरकारी कोशिशें जिस रोमांटिसिज्म को पैदा करती हैं वो किसी करोड़पति के चंदे से चलने वाली गौशाला तक सिमट कर रह जाती हैं. इसके उलट जब कोई छोटी जोत का किसान अपनी मेहनत से बोई ही सब्जी को मिटते हुए देखता है तो वो भूल जाता है कि गाय उनकी माता है, वो बेहद हिंसक रवैया अपनाता है, जिसमें गाय पर एसिड फेंकना, करंट लगाना या तार के कांटों से बंधे डंडे से गाय को मारना एक आम बात है.

क्या इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा?
अब सवाल ये खड़ा होता है कि गाय के बारे में तमाम जागरुकता पैदा करने वाला आयोग, जो राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा आयोजित कर रहा है. उनके पाठ्यक्रम में कलिंजर के इर्द गिर्द घूमते जानवर, उन पर हो रही ज्यादती (जिसमे किसी का कोई दोष नहीं है), और उनके लिए सरकार के उठाये गए कदमों के सवाल भी शामिल किए जाएंगे. शायद इसका जवाब यही होगा कि आयोग प्रतियोगी को लिख कर दे दे. ‘गाय हमारी माता है, तुम्हें कुछ नहीं आता है’.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: January 13, 2021, 12:16 PM IST
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