जो होगा असली गंगापुत्र, उसे ही दिखेगी सूंस

15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर से गंगा डॉल्फिन यानि सूंस (Dolphin) को बचाने की घोषणा की गई उसके बाद से ही देश के सियासी हलकों में डॉल्फिन को लेकर अतिरिक्त संवदेनशीलता पैदा हो गई है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 8, 2020, 11:22 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
जो होगा असली गंगापुत्र, उसे ही दिखेगी सूंस
डॉल्फिन को बचाने की कवायद शुरू हुई है.
एक राजा को सबसे अलग दिखने की बड़ी भूख थी. अपनी भूख मिटाने के लिए वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता था. एक दिन दरबार में एक कारीगर आया. उसने दावा किया कि उसे ऐसे कपड़े सिलने आते हैं, जो सिर्फ देवी-देवता ही पहनते हैं. कपड़े चूंकि देवताओं के हैं, इसलिए उसे बनाने में काफी सारे जेवरात लगते हैं. राजा ने उसे अपने लिए कपड़े बनाने के आदेश दिए. कपड़े सिलने में करीब छह महीने लगे. इसके बाद कारीगर बॉक्स लेकर दरबार पहुंचा. उसने दावा किया कि कपड़े दिव्य हैं, इसलिए ये उन्हीं को दिखेंगे, जिनका मन शुद्ध हो और जिन्होंने कोई पाप ना किए हों. फिर उसने डब्बा खोलकर कपड़े लहराने का नाटक किया, जबकि उसके हाथ में कुछ भी नहीं था.

इसके बावजूद दरबार में चारों तरफ कपड़ों की वाहवाही होने लगी. राजा परेशान था कि उसे कपड़े नज़र क्यों नहीं आ रहे हैं. फिर उसने कपड़े दिखने का नाटक किया. दरबारियों के कहने पर राजा ने ‘दिव्य कपड़े’ पहनकर जुलूस निकाला. राजा नग्न हालत में महल से बाहर निकला लेकिन सभी कपड़ों की सराहना कर रहे थे. तभी भीड़ में से एक बच्चे ने पिता से पूछा कि ‘राजा नंगा क्यों घूम रहा है?’ पिता मुस्कुराया और बोला, ‘चुप रह. अभी तू छोटा है. जब बड़ा होगा तो तुझे भी कपड़े दिखने लग जाएंगे.’

ये एक ऐसी कहानी है जो भारत में दोहराई जा रही है. 15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर से गंगा डॉल्फिन यानि सूंस को बचाने की घोषणा की गई उसके बाद से ही देश के सियासी हलकों में डॉल्फिन को लेकर अतिरिक्त संवदेनशीलता पैदा हो गई है. उसी के चलते गंगा से लगभग खत्म हो चुकी सूंस को दिखाने के लिए ‘डॉल्फिन जलज सफारी ’ की शुरुआत की जा रही है.

गंगा से जुड़े 6 इलाकों में ये सफारी करवाई जाएगी, जिसमें उत्त्तर प्रदेश का बिजनौर, बृजघाट, प्रयागराज, वाराणसी, बिहार का कहलगांव औऱ बंगाल का बंदेल शहर शामिल हैं.
इस बार का 5 अक्टूबर ऐतिहासिक रहा
5 अक्टूबर को गंगा नदी डॉल्फिन दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 2010 में इसी दिन गंगा डॉल्फिन यानि सूंस को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था. इस बार ये दिवस ऐतिहासिक रहा. इस दिन से राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने तीन राज्यों के 6 शहरों से डॉल्फिन जलज सफारी की शुरूआत कर दी. बिजनौर से शुरुआत करने के दौरान एनएमसीजी के अध्यक्ष राजीव रंजन मिश्रा ने इसे पर्यटन औऱ क्षेत्रीय रोज़गार के लिए एक अनूठी पहल बताया औऱ इस संकल्पना को अर्थ गंगा के तौर पर प्रस्तुत किया. इस सफारी के ज़रिए क्षेत्रीय समुदाय बोट से पर्यटकों को गंगा डॉल्फिन दिखाएंगे.

मेरी गंगा-मेरी डॉल्फिनइसके अलावा मेरी गंगा-मेरी डॉल्फिन नाम से एक अभियान की शुरूआत भी की गई है, जिसके तहत बिजनौर से नरोरा तक गंगा में वर्तमान में मौजूद सूंस की संख्या की गणना की जाएगी. फिलहाल इस 250 किलोमीटर के इलाके में सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 36 डॉल्फिन यानि सूंस मौजूद हैं. जिनमें से ज्यादातर हस्तिनापुर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में मौजूद हैं. बिजनौर का इलाका इसी सेंचुरी के अंदर आता है.

कितनी हैं डॉल्फिन
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक, असम और उत्तरप्रदेश की नदियों में 962 औऱ 1275 डॉल्फिन पाई गई हैं. जागरूकता बढ़ने से डॉल्फिन कुछ हद तक संरक्षित हो रही है. आंकड़ो पर गौर किया जाए तो पूरे भारत में डॉल्फिन की संख्या 3500 से ज्यादा हो जाएगी. अब तक देश में 2000 से भी कम डॉल्फिन बची होने का अनुमान था. लेकिन यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि गंगा में डॉल्फिन की संख्या में कोई खास इजाफा नजर नही आता है.

बता दें कि 2012 से गंगा डॉल्फिन को बचाने की कवायद शुरू हुई थी जिसे वर्ल्ड वाइड फंड और उत्तर प्रदेश से साझा प्रयास के साथ शुरू किया गया था. इस बार तो 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने इस मिशन को प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलिफेंट तरह सफल बनाने की बात कह दी. यानि जिस तरह से प्रधानमंत्री के इसे सफल करार देते ही जंगलों में अचानक बाघों और हाथियों की संख्या बढ़ने लगी, उसी तरह उम्मीद की जा सकती है कि महज़ छह महीने में बोट पर घूम रहे लोगों को गंगा में कुलाचें भरती हुई डॉल्फिन नज़र आने लगे!

अब वो बात अलग है कि कुछ सालों पहले वाराणसी में कछुआ सेंचुरी भी बनाई गई थी. फिर वो संचुरी औऱ उसके कछुए बह कर पटना चले गए. वो तो अच्छा हुआ कि चंबल को श्राप मिल गया और लोगों ने इसके पानी से दूर रहने में ही भलाई समझी, जिसकी वजह से इसमें मौजूद घड़ियाल बच गए. औऱ चंबल की घडियाल सफारी अपना सफर तय कर रही है. वो भी शायद ज्यादा दिन का नहीं रहे क्योंकि लोग भले ही चंबल में नहीं उतरते हों, लेकिन खनन माफिया को श्राप आपदा में अवसर की तरह लगता है और इसी का नतीजा है कि चंबल में बीते दिनों बेतहाशा खनन हुआ है.

डॉल्फिन के बारे में:
माना जाता है कि डॉल्फिन का जन्म दो करोड़ साल पहले हुआ और डॉल्फिन ने लाखो साल पहले जल से जमीन पर बसने की कोशिश की लेकिन धरती का वातावरण डॉल्फिन को रास नहीं आया और फिर उसने वापस पानी में ही बसने का मन बना लिया. डॉल्फिन का गला अनोखा होता है जिससे ये करीब 600 तरह की आवाज़ निकाल लेती है. ये सीटी बजाने वाली एकमात्र जलीय जीव है. यही नहीं ये म्याउं-म्याउं भी कर सकती है और मुर्गे की तरह बांग भी दे सकती है.

डॉल्फिन का शरीर टॉक्सिक और हेवी मेटल से भरा हुआ होता है. उसके मांस में तेज दुर्गंध होती है, उसे खाने से लोग बीमार पड़ सकते हैं. डॉल्फिन के तेल को लेकर जो भ्रांतिया फैली हुई है उसकी वजह से इसकी तस्करी भी बहुत होती है, खासकर बांग्लादेश की सीमा से लगे पाकुड़ क्षेत्र जो भागलपुर से 150 किमी दूर है में वहां इसकी काफी सप्लाई होती है.

गंगा की डॉल्फिन की आंख तो होती है लेकिन वो लगभग अंधी होती है, आंख पर मौजूद मोटी झिल्ली की वजह से वो कोई भी इमेज बनाने में सक्षम नहीं होती है. इसलिए वो अल्ट्रासोनिक वेव से किसी की मौजूदगी का पता लगाती है.


दरअसल गंगा के लिए डॉल्फिन उसी तरह ज़रूरी है जिस तरह जंगल के लिए शेर ज़रूरी होता है. डॉल्फिन के कम होने से पूरा इकोसिस्टम गड़बड़ा जाता है. तो बस इंतजार कीजिए कुछ दिनों बाद आपको गंगा में डॉल्फिन उछाल मारती और फोटो खिंचवाती नज़र आने वाली है. हो सकता है सफारी करवाने वाले क्षेत्रीय समुदाय को बोट में पर्यटकों को कहां कहां घुमाना है इस बात के साथ ये प्रशिक्षण भी दिया जाए कि जैसे ही पर्यटक बोट पर सवार हों, नाविक पर्यटकों को सूंस और उससे जुड़ी कुछ कपोल कथाएं सुनाते हुए बीच धारा में ले जाए और कथा को इस पंक्ति के साथ समाप्त करे कि ‘तब से अब तक जो असली गंगापुत्र होता है उसे ही सूंस दिखती है'. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: October 8, 2020, 11:22 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर