बच्चे अब किताबों में ही देखते हैं केंचुए

पहले के दौर में बारिश के बाद घर के आस-पास तरह तरह के कीड़े निकलना शुरू हो जाते थे. जिन्हें हम कनखजूरा, मखमल रानी जैसे नामों से बुलाते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: April 11, 2021, 1:09 PM IST
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बच्चे अब किताबों में ही देखते हैं केंचुए
विलुप्‍त हो रहे हैं पृथ्‍वी से कीड़े. (File pic)
आज से करीब ढाई-तीन दशक पहले की बात है. भोपाल में घर के पास एक परिवार रहता था. उनको मछली पकड़ने का बहुत शौक था. हर रविवार को परिवार का बड़ा लड़का अपने छोटे भाइयों के साथ भोपाल में मौजूद भदभदा डैम के पास जाता और दिन भर मछली पकड़ता. शाम को जब वो घर लौटते तो उनका झोला तरह-तरह की मछलियों से भरा होता था. इस तरह हर रविवार को वो बगैर पैसा खर्च किए बढ़िया स्वादिष्ट मछली खाते थे. उस दौरान इस कदर बारिश होती थी कि पूरा भोपाल जलमग्न हो जाता था.

अक्सर तो हफ्तों तक बारिश होती रहती थी. बारिश के बाद घर के आस-पास तरह तरह के कीड़े निकलना शुरू हो जाते थे. जिन्हें हम कंबंल कीड़ा, कनखजूरा, मखमल रानी जैसे नामों से बुलाते थे. जिस लड़के को मछली पकड़ने का शौक था वो रविवार के दिन अपने झोले में इन कीड़ों को इकट्ठा करता और साथ ही पास में बने हुए मैदान की मिट्टी को खोद कर उसमें से केंचुए निकालता था. उसकी एक बार की कुदाली से निकली मिट्टी में सैंकड़ों केंचुए मिल जाते थे. जिन्हें वो मिट्टी के साथ ही अपने झोले में डाल लेता था. दरअसल ये कीड़ें और केंचुए मछली का भोजन हुआ करते थे. ताजे कीड़े और केंचुए देखकर मछली उनकी तरफ आकर्षित होती थी और उन्हें कांटें में फंस जाती थी. अब वो लड़का मछली नहीं पकड़ पाता है, क्योंकि जिस मैदान से वो केंचुएं खोदा करता था. वहां अब कुछ नहीं मिलता है. बारिश तो होती है लेकिन उतनी नहीं. और कीड़े तो बिल्कुल भी नहीं निकलते हैं.

जलवायु परिवर्तन, कीटनाशक, प्रकाश प्रदूषण और निदा नाशकों की वजह से धरती 1 से 2 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से कीटों को खो रही है.


कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के कीटविज्ञानी डेविड वागनर जो प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमीज ऑफ साइंसेज के मुख्य वैज्ञानिक और लेखक हैं. उनके मुताबिक कीटों के लुप्त होने की दर दूसरे जीवों की तुलना में ज्यादा बड़ी है, हालांकि इस पर अभी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कुछ शोधों के परिणाम इसकी तरफ इशारा करते हैं. वागनर का मानना है कि धरती पर पाए जाने वाले कीट, कीटनाशकों, खरपतावार नाशकों और प्रकाश प्रदूषण के हमलों का लगातार निशाना बन रहे हैं.
हालांकि वैज्ञानिकां अभी कीटों के लुप्त होने की पहेली का सारे सिरे नहीं पकड़ पाए हैं. इसलिए उन्हें इसका परिमाण और जटिलता को समझने में परेशानी हो रही है. यही वजह है कि वैज्ञानिक दुनिया का ध्यान भी इस ओर ठीक से नहीं दिला पा रहे हैं. इलिनोय यूनिवर्सिटी की कीटविज्ञानी मेय बेरेनबाउम का मानना है कि, "कीटों का कम होने की मात्रा का आकलन करना और घटने की दर का पता लगाना बहुत मुश्किल है." दरअसल कीटों के खत्म होने के पीछे एक अहम वजह इंसानो का ये भ्रम की कीट उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं और दूसरा इंसानों का उसे पसंद नहीं करना है.

जबकि इस धरती पर मौजूद इकोसिस्टम, जैवविविधता और तमाम तरह के फ्लोरा फ़ॉना को बरकरार रखने के लिए कीटों का होना बेहद ज़रूरी है. कीट दुनिया भर में खाने पीने की चीजों के लिए जरूरी परागण में मदद करते हैं, खाद्य श्रृंखला में अहम भूमिका निभाते हैं और कूड़े के निपटारे में मदद करते हैं. बावजूद इसके इंसान को इनकी परवाह नहीं है. वागनर कीटों को ऐसा धागा मानते हैं जिनसे धरती और जीवन का आधार बना है.

कीटों में सबसे ऊंचा दर्जा है मधुमक्खियों और तितलियों का. इन्हें देख कर कीटों की समस्याओं और उनकी घटती तादाद का आकलन किया जा सकता है. खासतौर से मधुमक्खी, बीमारियों, परजीवियों, कीटनाशकों, खर पतवार नाशकों और भोजन की कमी के कारण उनकी संख्या में नाटकीय कमी आई है. जलवायु परिवर्तन के कारण जिन इलाकों का वातावरण सूख रहा है, वहां तितलियों को भोजन की दिक्कत हो रही है. इसके अलावा खेती से खर पतावार और फूल हटाए जाने के कारण उन्हें मकरंद नहीं मिल पा रहा. वागनर कहते हैं कि अमेरिका में तो एक विशाल जैविक रेगिस्तान बन रहा है जिसमें बस सोयाबीन और मक्का ही बाकी बचेगा.
वैज्ञानिकों ने अब तक करीब 10 लाख कीटों की प्रजातियों का पता लगाया और माना जाता है कि अभी करीब 40 लाख प्रजातयों की खोज होनी बाकी है.


डेलावेयर यूनिवर्सिटी के डग टेलेमी इस रिसर्च में शामिल नहीं थे लेकिन उनका कहना है कि दुनिया ने बीते 30 सालों में कीटों को मारने के नए तरीके ढूंढने पर अरबों डॉलर खर्च किए हैं और उसकी तुलना में उन्हें संरक्षित करने पर महज चवन्नी अठन्नी ही खर्च किया है. कीड़े किस तरह से हमारी जिंदगी से खत्म हो गए हैं, इसे समझने के लिए सहज तरीका भी है जिससे आसानी से पता लग सकता है. बस अपने घर आने वाली सब्जी, फलों पर ध्यान दीजिएगा. आपको याद है आपने आखिरी बार कब मटर के अंदर से दानों के साथ इल्ली निकलते देखा था. कितना वक्त हो चुका है जब आपने फूलगोभी या पालक को धोने पर उसमें से किसी कीट को निकलते देखा था. बल्कि अब तो वैज्ञानिक कहने लगे हैं कि उन फलों या सब्जियों को लीजिए जिसमें किसी-किसी में कीड़ा लगा हो, इसका ये कतई मतलब नहीं है कि आपको कीड़ों वाली सब्जी खाने की सलाह दी जा रही है बल्कि कीड़े लगी सब्जी लेने का मतलब ही यही है कि इन सब्जियों में अभी जिंदगी यानि कुछ पोषक तत्व बाकी हैं. दरअसल ज़मीन को लगातार दिए जा रहे पेस्टीसाइड और दूसरे केमिकल की वजह से जिस तरह से कीट गायब हुए हैं उसी तेजी से खाद्य पदार्थों में से पोषक तत्व नदारद हो रहे हैं.

हमारे बचपन में मोहल्ले की एक आंटी जी अक्सर जब दुकानों पर चावल लेने जाती थी तो उनका एक विशेष तरीका होता था. वो दुकानदार से कहती ‘भैया कीड़े लगे चावल दीजिएगा’. दरअसल पहले जो चावल मिलते थे, उनमें अक्सर कुछ चावलों के गुच्छे से नजर आते थे. ये चावल में लगे कीड़े होते थे. जो ये दर्शाते थे कि चावल पुराना हो गया है. आज चावल से खुशबू और वो कीट दोनों गायब हो चुके हैं. अमूमन ये हालात हर खाद्य पदार्थ के साथ हैं.

जिस तरह से हमने कीटों को अपना दुश्मन मानकर उन्हें अपनी जिंदगी से गायब किया उसी का नतीजा है कि आज के बच्चे केंचुए जैसे धरती का दोस्त, और खेती के लिए लाभदायक जीव को किताबों में ही देख पाते हैं.


किसान प्रागैतिहासिक काल से कीट खा रहा है और आज भी यह सिलसिला जारी है. दुनिया में आज भी कुछ खास संस्कृतियां इनका इस्तेमाल किसी न किसी तरीके से करती हैं. कांगो देश में एक व्यक्ति जैतून के तेल में पकी इस भुनी हुई इल्ली को खा रहा है. यह खाना सस्ता है, साथ ही प्रोटीन का बहुत बड़ा स्रोत भी है.

दुनिया की आबादी लगातार बढ़ रही है जिसके चलते अब कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है. पिछले 40 सालों में दुनिया की तकरीबन एक तिहाई कृषि भूमि समाप्त हो गई है. वहीं पर्यावरण का असर मांस उत्पादन पर भी पड़ा है. ऐसे में कई लोगों का मानना है कि भविष्य में कीट युक्त भोजन ही एक बेहतर विकल्प होगा. मसलन जापान में अंड़े के साथ खाए जा रहे इस टिड्डे को एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: April 11, 2021, 1:09 PM IST
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