मीट खाना स्वाद से ज्यादा प्रतिष्ठा का प्रश्न

मांस का सेवन करना बुरा या अच्छा हो सकता है, लेकिन जिस तरह से इसे पौरुष या प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है उस आधार पर ये निजी मामला नहीं रह जाता है. और जब कोई कहता है कि वो मीट नहीं खाता है तो मज़ाक के तौर पर या सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर ये जताया जाता है कि अगर तुम मीट नहीं खाते हो तो तुम समाज में बराबरी का हक नहीं रखते हो.

Source: News18Hindi Last updated on: January 4, 2021, 9:23 AM IST
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मीट खाना स्वाद से ज्यादा प्रतिष्ठा का प्रश्न
दिलचस्प बात ये है कि बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति मीट की खपत भारत से भी कम है. (प्रतीकात्मक)
आई सेड ‘ईट द मीट’... एमी अवार्ड विजेता दिल्ली क्राइम में पुलिस अधिकारी अपराधियों को पकड़ने के लिए सुदूर बिहार के इलाके में जाते हैं. पुलिस अधिकारी अंदर से डरे हुए हैं, क्योंकि उनके पास सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं है. और इलाका पूरी तरह से नक्सल प्रभावित है. वहां की पुलिस उनकी मदद करती है, लेकिन पुलिस अधिकारी की अपनी अकड़ है, और कहीं ना कहीं उसके दिमाग में ये बैठा हुआ है कि दिल्ली वाले अपने आप को ज्यादा ही होशियार पुलिस वाला समझते हैं. जबकि नक्सल प्रभावित क्षेत्र की पुलिस उनसे कहीं ज्यादा मुश्किलों से दो चार होती रहती है. ये बात बिहार का पुलिस अधिकारी हर कदम पर ज़ाहिर करने की कोशिश करता रहता है. इस पूरी प्रक्रिया में एक ऐसा मौका आता है, जब बिहार पुलिस का अधिकारी दिल्ली पुलिस की स्वागत में दावत रखता है. दारू की बोतल खुली हुई है, उनके सामने एक मुर्गा लाया जाता है. और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को दिखा कर उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्हें मुर्गा पसंद आया? संयोग से दिल्ली पुलिस का अधिकारी शाकाहारी है. वो मुर्गे को काटने से मना करता है. बिहार पुलिस का अधिकारी अड़ जाता है, वो कहता है कि इसके दाम दे दिए हैं इसलिए ये कटेगा. दिल्ली पुलिस का अधिकारी जो अभी तक डरा सहमा है, वो अचानक मरने मारने पर उतारू हो जाता है. बिहार पुलिस का अधिकारी भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मान लेता है. काफी तू तू-मैं मैं के बाद मुर्गे को दिल्ली पुलिस के अधिकारी पर अहसान करते हुए छोड़ दिया जाता है. दीवार पर दो हाथ मुर्गा थामे हुए बाहर निकलते हैं, और मुर्गे को छोड़ देते हैं. मुर्गा पंख फड़फड़ाता है और आज़ाद हो जाता है.

राहत देने वाले इस दृश्य में मुर्गा काटने वाला अपनी ताकत का गुमान दिखाता है औऱ आखिरकार वो दिल्ली पुलिस वाले को अपने आगे झुकाने के बाद मुर्गे को छोड़ने का अहसान करता है. दरअसल मीट खाना कई बार निजी मामले से ज्यादा आपके पौरुष, आपके सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है.


लगान फिल्म में एक दृश्य है जिसमें राजा ब्रिटिश अधिकारी के साथ बैठकर खाना खा रहा होता है, तभी ब्रिटिश अधिकारी की बहन राजा को कुछ खाने का प्रस्ताव देती है. राजा कहता है कि ‘एज आई टोल्ड यू, आई डोन्ट ईट मीट’ ब्रिटिश अधिकारी इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न और आदेश की अवहेलना समझ लेता है वो चुपचाप उसे देखता रहता है और धीरे से कहता है कि ‘आई सैड, ईट द मीट’ इस तरह मीट नहीं खाना एक पूरी कहानी को जन्म देता है.

मांसाहार पौरुष का मामला
मीट खाना शुरू से ही प्रतिष्ठा से जुड़ा रहा है. प्राचीन काल से ही इसे बल, शक्ति और पौरुष से जोड़ कर देखा जाता रहा है. भोजन के तौर पर इसे काफी मूल्यवान माना जाता रहा है. हमारे आहार में आज भी इसकी मुख्य भूमिका बनी हुई है. एक वक्त था, जब घरों में रविवार को ही मीट खाने को मिलता था. कहीं पर इसे सोमवार से शनिवार तक हर दिन की धार्मिकता के साथ जोड़कर, खाने पर पाबंदी थी, तो कहीं पर इसकी उपलब्धता सहज और सस्ती नहीं थी. अब ऐसा नहीं रहा है, अब इसकी उपलब्धता सहज और सरल है. यह हर वक्त मिल सकता है और वो भी ज्यादा मात्रा के साथ बेहद सस्ते दामों में. इसी तरह अगर आप बार्बेक्यू के चलन और इस पर मीट को पकाने की पूरी प्रक्रिया को देखें तो इसमें आपको पूरी पौरुष से जुड़ी तस्वीर नज़र आती है. मसलन शोले फिल्म में जब गब्बर को रामगढ़ से आते एक सीधे सादे लड़के अमजद को मारना है, तो उस दृश्य में गब्बर की ताकत और उसके पौरूष को न्यायसंगत बनाने के लिए लेखक ने दृश्य की शुरुआत मीट के बार्बेक्यू पर पकने से की थी.

पौरुष से जोड़े जाने की वजह
पाषाण काल से ही ये माना जाता रहा है कि जब इंसान जानवर को मार कर खाता है तो उसकी ताकत उस आदमी के अंदर आ जाती है. कई खोजे बताती हैं कि पुराने वक्त में शिकार करना पुरुषों का काम हुआ करता था. यहां तक की मीट खाने के चुनाव को लेकर भी लैंगिकता का असर नज़र आता है. जैसे महिलाओं को वाइट मीट भाता है, क्योंकि मुर्गी का मीट रेड मीट से ज्यादा सेहतमंद होता है, वहीं पुरुष रेड मीट ज्यादा पसंद करते हैं. वजह यही है कि जहां महिलाएं इसे सेहत से जोड़ कर देखती हैं वहीं पुरुष इसे ताकत से जोड़ कर देखते हैं.हालांकि अगर आप अपने इर्द गिर्द शाकाहारी लोगों पर नज़र डालेंगे तो आपको ज्यादातर महिलाएं ही शाकाहारी मिलेंगी. महिलाएं स्वाभाविक तौर पर शाकाहारी होती हैं. खास बात ये है कि भारतीय समाज में कहीं कहीं पर महिलाओं के मांसाहार को अच्छी नज़र से देखा भी नही जाता है, वहीं पुरुष का शाकाहारी होना भी गलत माना जाता है और उसे पुरुष की पुरुषत्व से जोड़ कर देखा जाने लगता है.

कौन से देश कितना मीट खाते हैं?
अगर देशों के हिसाब से देखें तो अमेरिका में प्रति व्यक्ति 25 किलो मीट सालाना खाया जाता है तो चीन में प्रति व्यक्ति मीट खाने की दर 52 किलो प्रति व्यक्ति सालाना है जो भारत से कहीं ज्यादा है. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति मीट की खपत भारत से भी कम है. जहां भारत में प्रति व्यक्ति 4.4 किलो मांस खाया जाता है वहीं बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति मीट की खपत 4 किलो है. बुरूंडी में ये खपत 5.3 किलो प्रति व्यक्ति है, तो श्रीलंका में 6.3 किलो है, वहीं रवांडा में दर 6.5 किलो प्रति व्यक्ति है तो मोजाम्बिक में साल भर में औसतन हर आदमी 7.8 किलो मांस का सेवन करता है. इथियोपिया में यही दर 8.5 किलो सालाना है, नाइजीरिया और तंजानिया में 9.5 किलो प्रति व्यकित मांस का सालाना सेवन हो जाता है, नेपाल में यही दर 9.9 किलो सालाना है, तो युगांडा में हर साल प्रति व्यक्ति औसतन 11 किलो मांस खा लेते हैं. यहां गौर करने वाली बात ये है कि अगर हम दुनियाभर में कम मांस का सेवन करने वाले देशों पर नज़र डालें तो ये वो देश है जो अविकसित या विकासशील की श्रेणी में आते हैं. यानि जहां पर ये देश कम मांस का सेवन करके कार्बन उत्सर्जन कम करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं विकसित देश का मांसाहार बताता है कि इस मांस का सेवन उनके लिए स्वाद से ज्यादा प्रतिष्ठा और खुद को ताकतवर ज़ाहिर करने का प्रश्न भी है.

साथ ही मांस के सेवन से ही ताकत आती है, इस तरह की गलतफहमियां भी इसके सेवन को बढ़ावा देती है. जबकि उड़द की दाल में पाया जाने वाले प्रोटीन को मांस के बराबर माना जाता है लेकिन दाल को हम उतना ताकतवर कभी मान नहीं पाते हैं. हालांकि माइक टायसन, कार्ल लुइस, वीनस विलियम्स, मार्टिना नवरातिलोवा, से लेकर सुशील कुमार तक खेल की दुनिया में नाम रोशन करने वाले दिग्गज शाकाहारी हैं.


दरअसल मांस का सेवन करना बुरा या अच्छा हो सकता है, लेकिन जिस तरह से इसे पौरुष या प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है उस आधार पर ये निजी मामला नहीं रह जाता है. और जब कोई कहता है कि वो मीट नहीं खाता है तो मज़ाक के तौर पर या सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर ये जताया जाता है कि अगर तुम मीट नहीं खाते हो तो तुम समाज में बराबरी का हक नहीं रखते हो. इस तरह इंसान की प्रतिष्ठा की वजह से जानवर प्राण गंवा रहे हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: January 4, 2021, 9:23 AM IST
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