वीगन डाइट भी हमेशा हरी नहीं होती

World Vegan Day: इस लेख को लिखने का उद्देश्य किसी की भावनाओं का आहत करना नहीं है. बस ये बात समझने की कोशिश करना है कि आखिर ओरिजनल है क्या? क्या जब हम वीगन होने की बात करते हैं तो वाकई में धरती को बचाने की बात कर रहे होते हैं. या वीगन होना महज़ अपनी और जानवरों की सेहत के बारे में सोचना है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 1, 2020, 12:50 PM IST
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वीगन डाइट भी हमेशा हरी नहीं होती
दरअसल अगर हम वीगन होकर धरती को बचाने की बात सोचते हैं तो वो पूरी तरह से सही नहीं है.
बंदिश बैंडिट्स नाम की वेब सीरिज में एक संगीत कंपनी के मालिक को खुश रखने के लिए, कंपनी में निर्देशक की भूमिका निभा रहा किरदार उसके लिए हमेशा कॉफी लेकर आता है. बॉस वीगन है तो निर्देशक हमेशा उसकी कॉफी की सामग्रियों के बारे में ज़रूर बताता है, जिसमें खास बात है बादाम का दूध (यहां बादाम के दूध का मतलब, बादाम को पीस कर उससे निकाले गए रस से है). एक वक्त ऐसा आता है जब उसकी किसी बात को लेकर उसके बॉस से झड़प हो जाती है, क्योंकि उसका बॉस नैतिक रूप से ठीक नहीं है. तो निर्देशक उसकी लाई हुई कॉफी पास पड़े हुए डस्टबिन में डाल देता है और उससे कहता है कि जो आदमी ओरिजनल कॉफी पीना नहीं जानता वो क्या ओरिजनल काम की बात करेगा.

इस लेख को लिखने का उद्देश्य किसी की भावनाओं का आहत करना नहीं है. बस ये बात समझने की कोशिश करना है कि आखिर ओरिजनल है क्या? क्या जब हम वीगन होने की बात करते हैं तो वाकई में धरती को बचाने की बात कर रहे होते हैं. या वीगन होना महज़ अपनी और जानवरों की सेहत के बारे में सोचना है.

दरअसल अगर हम वीगन होकर धरती को बचाने की बात सोचते हैं तो वो पूरी तरह से सही नहीं है. वजह ये है कि हम वीगन होकर विकल्प तलाश रहे होते हैं. मसलन दिल्ली के हर छोटे-बड़े बाज़ार में बिकता सोया चाप. जिसे ठेलों पर इस तरह लटकाया जाता है कि वो दूर से तंदूरी चिकन की तरह ही लगे. उसे तंदूरी चिकन के विकल्प की तौर पर ही लिया भी जाता है. इसी तरह दूध या दूसरे जानवरों के उत्पन्न उत्पादों के विकल्प के तौर पर कहीं बादाम का या मूंगफली का दूध या उसकी दही. घी के विकल्प के तौर पर वनस्पति घी.

हाल ही में आईआईटी ने अंडे और चिकन के लैबजनित विकल्प को बनाने की बात भी की थी. इस पर काम भी तेजी से हो रहा है. ये सब वो तरीके हैं जो ये बताते हैं कि आपसे चीज़ छूट नहीं रही है. इससे भी बढ़कर बात ये है कि जब आप इसे विकल्प के तौर पर अपना रहे हैं तो भले ही आपको लगता हो कि आप धरती का भला कर रहे हैं लेकिन ये पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि जिन उत्पादों को आप विकल्प के रूप में देख रहे हैं उनका कार्बन फुट प्रिंट काफी है. जो ये बताता है कि हम धरती को एक तरफ से बचा रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ से उसे नुकसान ही कर रहे हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि मीट-बीफ के अत्यधिक उत्पादन और प्रयोग से धरती पर सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है. इसके प्रयोग से ज्यादा धरती और पानी का इस्तेमाल होता है यानि ज्यादा पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. ईट-लेंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक जानवरों के उत्पाद के उपभोग में कमी लाकर हम अपनी सेहत और धरती की सेहत को दुरुस्त रख सकते हैं. लेकिन फिर भी अगर किसी ने वीगन होना या शाकाहार का चुनाव महज़ पर्यावरण की रक्षा के लिए किया है, तो उसे ये समझ लेना चाहिए कि उसके भोजन में कई ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें विकल्प के तौर पर चुन कर वो एक भारी कीमत चुका रहा है.

कुछ अच्छे दिखाई देते आंकड़े
पर्यावरण को लेकर चिंता पूरी दुनियाभर में लगातार बढ़ती जा रही है. उतनी ही तेजी से लोग शाकाहार अपना रहे हैं. इस साल ही अकेले यूके में जितने लोगों ने शाकाहार को अपनाया उससे जो ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को रोका गया वो करीब 1,60,000 कारों के चलने या करीब 4 से 5 लाख लोगों का फ्लाइट से लंदन से बर्लिन जाने के बराबर था. इसमें कोई शक नहीं है कि जानवरों के उत्पादन से वातावरण को बहुत नुकसान पहुंचा है. वर्तमान में मीट या डेयर उत्पादों की वजह से जितना कार्बन उत्सर्जन हो रहा है वो धरती पर चल रही तमाम कार, शिप, ट्रेन और फ्लाइट के बराबर है. एक अनुमान के मुताबिक अगर पूरी धरती शाकाहारी हो जाए तो 2050 तक धरती से कार्बन उत्सर्जन की दर को 70 फीसद तक कम किया जा सकता है. सुनकर अच्छा लग रहा है ना! लेकिन असली बात विस्तार में होती है
हो सकता है आप वीगन हो या होने की सोच रहे हों. हो सकता है बतौर वीगन आपके खाने में कुछ अहम विटामिन, प्रोटीन, सेचुरेटेड फेट छूट रहे हों. इसके लिए आपने अपने खाने में कुछ वैकल्पिक व्यवस्था की हो. तो चलिए कुछ ऐसे ही विकल्पों की बात कर लेतें है जो पर्यावरण के लिए कतई ठीक नहीं है.


वैकल्पिक दूध
वैज्ञानिक शोध बताती है कि जानवर उत्पादित दूध की तुलना में वनस्पति जनित दूध कम कार्बन उत्सर्जित करते हैं और उनका वाटर फुटप्रिंट भी कम होता है. लेकिन ऐसा कौन सा विकल्प है जो सबसे कम होता है. ऑक्सफोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक 200 एमएल जानवर जनित दूध उत्पादन से जितनी कार्बन उत्सर्जित होती है और जो इसका वॉटर फुट प्रिंट होता है, वो सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करने वाले वनस्पतिजनित दूध से तीन गुना होता है. यानि जहां जानवर जनित दूध के एक गिलास के पूरे साल भर के उत्पादन के लिए 7000 वर्गफीट जगह, और 120 लीटर पानी लगता है. वहीं एक गिलास बादाम के दूध में इससे थोड़ा ही कम करीब 74 लीटर पानी लगता है. वहीं चावल के दूध के एक गिलास के लिए 54 लीटर पानी की ज़रूरत पड़ती है. इसकी तुलना में ओट या सोया के एक गिलास दूध उत्पादन में 20 और 10-15 लीटर पानी लगता है.

अगर कार्बन उत्सर्जन की बात करें तो जहां जानवरजनित दूध के एक गिलास के उत्पादन में औसत करीब 700 ग्राम कार्बन उत्सर्जित होती है वहीं वनस्पति आधारित दूध में इस तालिका में सबसे ऊपर चावल है जिसके एक गिलास उत्पादन में करीब औसत 200-300 ग्राम कार्बन उत्सर्जित होती है वहीं सबसे कम कार्बन बादाम के दूध में करीब 100 ग्राम कार्बन उत्सर्जित होती है.

एवाकाडो
बीते दिनों दुनिया पूरी तरह से सेहत को लेकर फिक्रमंद नज़र आने लगी है. यही वजह है कि इन दिनों खाना पकाने और खाने से जुड़े दूसरे चैनल और वीडियो सबसे ज्यादा देखे जाने लगे हैं. इसकी वजह से कुछ ऐसे फल भी हैं जो सेहत को लेकर काफी चर्चा में आ गए हैं. अगर आप वीगन हैं और वीगन होने की ‘लक्ज़री’ को संभाल सकते है. तो कीवी और एवोकाडो ज़रूर आपकी सूची में होगा. लेकिन अगर आप पर्यावरण के लिए भी कुछ करने का मन बना रहे हैं. तो बस इतना जान लीजिए कि वॉटर फुटप्रिंट नेटवर्क के मुताबिक एक किलो एवाकाडो के उत्पादन में करीब 2000 लीटर पानी लग जाता है. ये किसी भी अच्छी गुणवत्ता वाले संतरे का चार गुना और टमाटर का 10 गुना है. तो लोकल के लिए वोकल बनिए और उन फलों को खाइए जो आसानी से उपलब्ध हों. और आपके देश में या आसपास ही उगाए जाते हों.

सोया
सोया एक ऐसा उत्पाद बनकर उभरा है जिसने मीट और पनीर जैसे जानवर और उनके जनित उत्पादों की जगह को बहुत अच्छे से ली है. सोया टोफू, आटा, मीट मुक्त बर्गर, शाकाहारी सॉसेज और पता नहीं क्या क्या.

अगर किसी शाकाहारी की नज़र से देखा जाए तो ये एक अच्छी बात है. लेकिन अगर डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ की बात पर गौर करें तो ये काफी डराने वाला है. दरअसल सोया दुनियाभर में बीफ के बाद जंगलों को नुकसान पहुंचाने में दूसरे नंबर पर है. अमरेका से लेकर अमेज़न के जंगलों तक, जंगल, घास के मैदान, सिंचित ज़मीन हर जगह सोया के उत्पादन के लिए जगह बनाई जा रही है. यहां एक अहम बात और है कि दुनियाभर में जो सोया का उत्पादन किया जा रहा है उसका महज़ 6 फीसद ही इंसान प्रत्यक्ष रूप से खाते हैं.

पाल्म ऑइल
साबुन से लेकर मिठाई और मेक-अप तक आज दुनिया के किसी भी सुपर मार्केट में पाल्मऑइल लगभग आधी उत्पादों में उपयोग किया जा रहा है. वीगन के अपनाए कई उत्पादों में ये विकल्प के तौर पर अपनी जगह बना चुका है, मसलन आइसक्रीम, चीज़.

वैसे देखा जाए तो पाल्म ऑइल के उत्पादन में कोई बुराई नहीं है, लेकिन दिक्कत उसी संतुलन की है जिसकी हम शुरू से बात कर रहे हैं. बीते दिनों पाल्म ऑइल का उत्पादन इस कदर तेजी से बढ़ा है, विशेषकर दक्षिणपूर्व एशिया के क्षेत्रों में इसकी वजह से ओरेंगुटान जैसे जीव विलुप्त होने की कगार पर आ गये हैं. क्योंकि पाल्म ऑइल के उत्पादन के लिए लगातार जंगलों को काटा जा रहा है. ग्रीनपीस संगठन की मानें तो इंडोनेशिया में पाल्म ऑइल उत्पादन के लिए हर 25 सेकेंड में एक फुटबॉल के मैदान के बराबर जंगल साफ कर दिया जाता है.

भविष्य में कैसा होगा खाना
वैज्ञानिकों की माने तो आने वाले वक्त में हर चीज लैब जनित या वनस्पति आधारित होगी. जो मीट का विकल्प होंगी. बिल गेट्स या ब्रूस फ्रेडरिक इसे भविष्य का खाना कहते हैं जो या तो लैब में पैदा किया जाएगा या वनस्पति से लिया जाएगा. अगर हम आने वाले वक्त में पूरी तरह से वनस्पतियों पर और लैब पर निर्भर हो जाते हैं तो क्या उससे हमारे पर्यावरण पर असर प़ड़ेगा. आज की तारीख में अगर अनुमान लगाए तो जवाब शायद हां में होगा.

लेकिन बात भविष्य को संवारने की है. ना कि विकल्प निकालने की. और प्रकृति हमें लगातार इसका उदाहरण देती है. प्रकृति ने कभी किसी को शाकाहारी होने के लिए नहीं कहा. अगर कहा होता तो हमारे दांतो में केनाइन दांत नहीं होते. जो किसी भी प्राकृतिक हार्बीवोरस में नहीं पाए जाते हैं या बहुत मामूली होते हैं. उसकी जगह पर उनके पास इनसीज़र होते हैं. दरअसल आप वीगन हों या ना हों. प्रकृति के साथ संतुलन रहना बेहद ज़रूरी है. और इंसानों की प्रवृत्ति संतुलन खोने की ही होती है. हम किसी भी दशा में चरम पर पहुंचते हैं जो हमारी और आस पास की दिशा को बदल देती है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: November 1, 2020, 12:44 PM IST
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