‘राम’ के नाम पर पले ख्वाब ‘राम’ के ही भरोसे

कई करसेवक जेल में थे. ये सारे वो युवक थे जो बेरोजगार थे जिनके मन में राम का नाम था, एक उत्साह था और साथ ही एक अंदरूनी ख्वाहिश थी कि जिसने राम की अलख जगवाई है वो नेता जब आएंगे तो हमारे लिए रोजगार और कुछ खुशिया लाएंगे. ये उम्मीद पनपती रही. देश आगे बढ़ता रहा...

Source: News18Hindi Last updated on: August 4, 2020, 11:55 AM IST
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‘राम’ के नाम पर पले ख्वाब ‘राम’ के ही भरोसे
अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान नजारा (File Photo)
5 अगस्त भारत के इतिहास में दर्ज होने वाला दिन होगा. ऐसा पहली बार होगा जब अयोध्या में राम दीपावली से पहले पधारेंगे. सोचिए ना जिस देश में ट्रेन अगर दस मिनिट बिफोर टाइम आ जाए तो हम खुद को सौभाग्यशाली मानने से पीछ नहीं हटते. उस देश में स्वयं राम श्रावण के अंत के साथ पधार रहे हैं. यानि कार्तिक से पूरे दो महीने पहले. पूरी अयोध्या को सजा दिया गया है. राम जिसे हम पालनहार के अवतार के रूप में मानते हैं उनकी सुरक्षा के चाक चौबंद इंतज़ाम किए गए हैं. कोरोना ना होता तो जलवे और ही कुछ होते. पूरी दुनिया, पूरा देश की मीडिया इस पर नज़र गड़ाई हुई है. नब्बे के दशक में राम के नाम पर एक ख्वाब पला था. ये वो ख्वाब था जिसने कई ख्वाबों को सींचा और फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया. सुना है इस ख्वाब को रथ पर सवार करके ले जाने वाले इस ख्वाब के पूरा होने के वक्त नहीं होंगे. ख्वाब साकार करने का सपना उनसे किसी और के हाथों में चला गया. ऐसा ही तब भी हुआ था जब इस ख्वाब के अंकुर फूटे थे.
ये उस वक्त की बात है जब शहर दूरदर्शन से केबल टीवी की ओर मुड़ रहे थे. विदेशी टीवी पर प्रसारित हो रहे बोल्ड एंड दि ब्यूटीफुल ने लोगों का ध्यान खींच रखा था. उसे प्रतियोगिता देने के लिए एक हिंदी चैनल शुरु हो चुका था जिस पर रात में 7 बजे प्रसारित होने वाली फिल्में नई तो नहीं होती थी, लेकिन उसे केबल के ज़रिये देखने को लेकर लोगों में खासा उत्साह था . इस दौर में 24 घंटे चैनल नहीं चल रहे थे और रात में 11 बजे टीवी पर एक नमस्कार की तस्वीर के साथ नमस्ते ज़ी लिखा आ जाता था और रात भर गाने चलते रहते थे. इस दौर में न्यूज के लिए अलग से चैनल नहीं खुले थे.

पिताजी को नया घर अलॉट हुआ था तो घर में नई टीवी भी आई थी. टीवी भी रंगीन थी और उस पर नया नया केबल, टीवी लग जाने से जो कार्यक्रम आ रहे थे, वो उसकी रंगीनियत को और बढ़ा रहे थे. दूरदर्शन देखने वालो को पिछड़ा मानने की परंपरा का आगाज़ हो चुका था. हमारे केबल ऑपरेटर थे फहीम भैया .
फहीम भैया के पिताजी सरकारी नौकरी में काफी ऊंचे ओहदे पर थे लेकिन उन्होंने उस दौर में ही आत्मनिर्भर बनने का मन बनाया अपना काम शुरू करने की सोचा और केबल जैसे नए नए खुले व्यवसाय में हाथ आजमाया था. सरकारी कॉलोनी में मौजूद करीब 6 सौ घरों ने उनके काम को हाथों हाथ लिया . उस समय वहां कोई दूसरा ऑपरेटर भी नहीं था तो फहीम भैया सबकी आंख के तारे बने हुए थे.
1986 की रामायण को अब लोग धीरे-धीरे भुला रहे थे और नए ड्रामा की तरफ रुख कर रहे थे. लेकिन राम को ऐसे तो नहीं भुलाया जा सकता है. तो राम को ज़हन में बैठाने के लिए एक रथ निकल पड़ा था जो लोगों में राम अलख जगा रहा था.

हम इस अलख के लिए बहुत छोटे थे तो हम बस देख रहे थे. एक शब्द अचानक से जोर पकड़ चुका था करसेवा .कईयों को इसका अर्थ भी नहीं पता था लेकिन ये सेवा देने को आतुरता बढ़ती जा रही थी . हमारे घर में मामा-मौसी का हमेशा से अभाव रहा क्योंकि मम्मी घर की अकेली लड़की थी . ऐसे में दूर के मोहल्ले के ही जयंत भैया (नाम बदला हुआ) जो मेरे बड़े भाई से 7-8 साल बड़े थे, उनका घर पर आना जाना था . कॉलेज की पढ़ाई कर रहे जयंत भैया उन्हीं जवान लड़कों जैसे थे जो कॉलेज में जाते हैं लेकिन उद्देश्य खोज रहे होते हैं. ऐसे युवक राजनीति के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. इन्हें बड़ी ही आसानी से उद्देश्य रटवाया जा सकता है. हालांकि जयंत भैया में और लड़कों जैसे जवानी वाले रोग नहीं फूटे थे, यानि वो तमाम प्रकार के ऐब से दूर थे. रोज़ नियम से शाखा जाते थे. फिल्म कम देखते थे और अगर देख ली तो बाद में ये भी बताते थे कि इस फिल्म से उन्हें क्या शिक्षा मिली . एक दिन जयंत भैया ने मम्मी को दीदी बोला और उनसे राखी के मौके पर राखी बंधवा ली. उसके बाद से जयंत...भैया ना होकर मामा बन गए. घर में आना जाना बदस्तूर जारी था. पिताजी से काफी खौफ खाते थे. और उनकी बातों की कभी अवहेलना भी नहीं करते थे.
एक दिन जयंत भैया घर पर आए और मम्मी से घर में मौजूद वीसीआर मांगा. मम्मी वीसीआर देने से कतराती थी क्योंकि पिताजी उसे बहुत संभाल कर रखते थे (इतना की आज भी घर में शोले फिल्म की कैसेट और वीसीआर शानदार हालत में रखा हुआ है) . लेकिन संयोग की बात थी कि पिताजी घर में ही थे तो उन्होंने मामा से पूछ लिया कि उन्हें क्यों चाहिए. मामा पिताजी से झूठ नहीं बोल पाते थे तो उन्होंने बताया कि एक वीडियो कैसेट है जो वो देखना चाहते हैं. जवान लोग कौन से वीडियो देखना चाहते हैं ये बात किसी से छिपी तो नही है लेकिन जयंत मामा से इस बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी. तो पिताजी ने जानने की कोशिश की कि आखिर वो देखना क्या चाहते हैं. मामा ने अपने बैग से एक कागज़ में लिपटी हुई वी़डियो कैसेट को निकाला और पिताजी को थमा दिया. वीडियो में राम, आंदोलन, कर सेवा जैसी बातें थी जो उत्सुकतावश देखने की वजह से मुझे याद रह गई .वीडियो देखते ही पिताजी को सारा माजरा समझ में आ गया . उन्होंने मामा को हिदायत दी कि किसी भी तरह के फालतू पचड़ों में पड़ने की ज़रूरत नहीं है. मामा ने उनकी बात में हामी भर दी. उसके बाद कई दिन तक मामा घर नहीं आए. उनका गांव मंदसौर में था, उनके पिताजी वहीं रहते थे तो वो उनसे मिलने का कह कर चले गए.

उसके बाद 6 दिसंबर आ गया, करसेवकों ने कर की सेवा दे दी थी, एक ईमारत गिर गई थी. लोगों में जोश था. रामायण के राम ने योद्धा की शक्ल ले ली थी. उनके तस्वीर के साथ करसेवकों का हुजूम कसम खा कर राम का नाम जप रहे थे. देश में एक अजीब सा उन्माद फैल गया था.

कॉलोनी में सेना की गाड़ियों ने दस्तक दे दी थी. फहीम भैया और कई सारे भैया और अंकल रातों रात गायब हो गए थे. केबल हालांकि चल रहा था, उसकी बागडोर किसी ओर के हाथ में आ गई थी. दो दिन के बाद ही जयंत मामा घर लौटे. वो थोड़े डरे हुए थे. चाय पी कर थोड़ी सांस आने पर उन्होंने बताया कि वो अयोध्या गए थे. वहां जो भी हुआ उसका उन्होंने तिनका तिनका बता दिया. मम्मी पापा हैरान थे. पिताजी उनको डांट भी लगा रहे थे. वो चुप हो कर सब सुन रहे थे. फिर पिताजी ने उन्हें संभल कर रहने को कहा ,उन्होंने फिर हामी में सिर हिलाया और चले गए. अगले दिन कुछ पुलिस वाले उनको ढूंढते हुए उनके मोहल्ले में पहुंचे. वजह क्या थी ये तो पता नहीं लेकिन वहां मौजूद लड़को ने जब उनके बारे में बताने से इंकार किया तो पुलिस वालों ने उनकी पिटाई करना शुरू कर दिया. लड़कों को इस तरह पिटता देख कर जयंत मामा ने बाहर आकर खुद को पुलिस के हवाले कर दिया. उसके बाद वो एक महीना जेल में रहे.

उनके साथ कई करसेवक जेल में थे. ये सारे वो युवक थे जो बेरोजगार थे जिनके मन में राम का नाम था, एक उत्साह था और साथ ही एक अंदरूनी ख्वाहिश थी कि जिसने राम की अलख जगवाई है वो नेता जब आएंगे तो हमारे लिए रोजगार और कुछ खुशिया लाएंगे. ये उम्मीद पनपती रही. देश आगे बढ़ता रहा. जयंत मामा जेल से छूटे भी और कुछ नए कामों में हाथ भी आजमाया. फिर उनके रथयात्रियों को जिनके रथ के वो पहिए बने थे उन्हें सत्ता भी मिली. बहुत कुछ बदला लेकिन जयंत मामा के हाल नहीं बदले. बाद में उनकी शादी हुई जोकि हो ही जाती है. दो बच्चे भी हुए वो भी हो ही जाते हैं. लेकिन उनकी जिंदगी के अमूल्य पल जो उन्होंने कर सेवा में दे दिए थे उसका हासिल उन्हें कुछ नहीं मिला आज मामा जैसे तैसे अपने घऱ को पाल रहे है और जिंदगी रामभरोसे ही चल रही है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: August 4, 2020, 11:55 AM IST
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