संपन्न राष्ट्रों और नगरों को ऊंचाई पर बसने की आदत है

विकसित देश (Developed Country) अपनी ज़मीन को साफ सुथरा करने में लगे हैं. इस काम के लिए वो विकासशील देशों औऱ उनसे लगे समुद्र (sea) को कचरा घर बना रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 7, 2020, 4:21 PM IST
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संपन्न राष्ट्रों और नगरों को ऊंचाई पर बसने की आदत है
प्रतीकात्मक फोटो.
1946 में हयातुल्लाह अंसारी की कहानी पर बनी फिल्म  ‘नीचा नगर’ एक ऐसे शहर की कहानी है, जो दो भागों में बंटा हुआ है.एक ऊंचा नगर जहां संभ्रांत वर्ग के लोग रहते हैं औऱ दूसरा है नीचा नगर जहां मज़दूर तबका रहता है. कहानी आगे ढ़ती है जब एक सरकार नाम का बेईमान बिल्डर ऊंचा नगर के पास से बहने वाले नाले को नीचा नगर की ओऱ मोड़ने की पहल करता है ताकि अमीर तबके के लिए सुंदर और अच्छी कॉलोनी का निर्माण किया जा सके.

नीचा नगर के लोग इस बात का विरोध करते हैं, लेकिन सरकार उनमें से कुछ लोगों को अपने साथ मिला लेता है, और सरकारी विभाग के लोगों को भी लालच देकर अपनी तरफ कर लेता है. इस तरह साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ अपनाकर नाले का रुख नीचा नगर की तरफ कर दिया जाता है. जिससे पूरा इलाका बीमारी की चपेट में आ जाता है और कई लोगों की मौत हो जाती है. खलनायक खुद को नीचा नगर का हिमायती बताने के लिए वहां एक अस्पताल भी खुलवाता है, लेकिन हीरो के कहने पर पूरा नीचा नगर अस्पताल का विरोध करके मरना मंजूर करता है और आखिर जीत नीचा नगर की होती है.

फिल्म में एक जगह पर खलनायक को यह कहते हुए देखा जाता है कि नीचा नगर के लोग बेवजह हंगामा कर रहे हैं, वो कोई नाला थोड़े ही है, वो तो एक नहर है जिससे नीचा नगर में रहने वाले मवेशी पानी पी सकेंगे, खेतों को पानी दिया जा सकेगा और इस तरह नाले को नहर सिद्ध कर दिया जाता है.

अब आप इस फिल्म को किसी भी स्तर पर रख कर देख सकते हैं. मसलन पॉश कॉलोनियों के कचरे से बजबजाती नालियों के ऊपर कई मलिन बस्तियां बसी हुई हैं. उसी तरह विकसित देश भी अपने देश की गंदगी का रुख विकासशील देशों की ओर कर रहे हैं. इन देशों में कई ऐसी कंपनियां काम कर रही हैं जो इस कचरे का आयात निर्यात कर रह है.


दुनिया के विकसित देश अपनी ज़मीन का साफ सुथरा, शुद्ध रखने के प्रयास में लगे हुए हैं. कुल मिलाकर वो कचरे को अपनी नज़रों से हटाना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें सबसे आसान तरीका लगता है कि विकासशील देशों औऱ उनसे लगे समुद्रों को कचराघर बना लिया जाए. यहां तक कि कार्बन क्रेडिट भी इसी तरह अपनी गंदगी सरकाने का एक तरीका बन कर रह गया था.

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इसे साधारण शब्दों में यूं समझा जा सकता है कि अमीर और संपन्न राष्ट्र प्रदूषण करने में कोई कमी नहीं करेगा, इसके बदले में वो दूसरे देशों या कंपनियों से कटौती करवा कर उनकी कार्बन की बचत को खरीद लेगा.

इस तरह कार्बन बाज़ार के तहत दुनिया के तमाम देश या कंपनिया ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाकर एक प्रमाण-पत्र हासिल करती हैं, जिसे प्रमाणित उत्सर्जन कटौती या कार्बन क्रेडिट कहा जाता है. कंपनी या देश इस क्रेडिट को खरीद या बेच सकते हैं. कार्बन क्रेडिट में एक यूनिट एक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) या कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर किसी उत्सर्जन का माना जाता है.

इस तरह से दुनिया भर में दिक्कतों की शुरुआत होती है. किसी भी विकसित राष्ट्र के लिए विकासशील देशों में अपना कचरा गिराना या उसे रिसाइकिल करवाना बहुत सस्ता सौदा होता है. यही नहीं गरीब राष्ट्रों में ऐसे कई उद्योंग पनप गए हैं, जो ग्रीन उद्योग का तमगा लेकर काम कर रहे हैं.वह रिसाइकल करने के बजाए सस्ता तरीका अपनाते हुए प्लास्टिक के कचरे को या तो जला देते हैं या ज़मीन में दफ्न कर देते हैं. या फिर उन्हें समुद्र में डाल दिया जाता है. इसका असर वातावरण पर कितना गहरा पड़ रहा है ये बात किसी से छिपी नहीं है.

गलती किसकी है
ऐसे मामले में अक्सर स्थानीय शासन अपने भ्रष्ट रवैये के चलते ये काम होने देता है. विडंबना ये है कि कचरा देने वाले औऱ लेने वाले दोनों ये मान कर चल रहे हैं कि वो किसी स्पेसयान में बैठे हुए हैं. औऱ धरती से उनका कोई लेना देना नहीं है. यहां पर गिरने वाले कचरे से उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. जबकि कोरोना काल में इसका व्यापक असर साफ देखने को मिला. देखा जाए तो वो राष्ट्र ज्यादा नुकसान में रहे जहां पर्यावरण, जैव विविधता को धता बताई गई है.

कोरोना काल में पैदा कचरा और उसका निस्तारण
डब्ल्यूएचओ की माने तो दुनियाभर में हर महीने 90 लाख मास्क, 76 लाख ग्लव्स और 16 लाख से ज्यादा गॉगल्स की जरूरत पड़ रही है, भारत ही अब तो अकेले रोजाना 4.5 लाख से ज्यादा  पीपीई किट्स बना रहा हैं. देखा जाए तो इस महामारी से बचने के लिए हमे फिलहाल इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा है. लेकिन साथ में जिस प्लास्टिक को लेकर हम पहले से ही चिंतित थे उसकी निस्तारण को लेकर मामला औऱ गंभीर होता जा रहा है. वैसे तो विकसित देशों से लेकर विकासशील देशों तक में मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर स्पष्ट दिशा निर्देश बनाए गए हैं.



पालन कितना हो रहा है.
एक अनुमान के मुताबिक, सालाना 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में जाता है। अब कोरोना काल मे इस कचरे में और इज़ाफा हुआ है,  अगर इसे अभी कंट्रोल नहीं किया गया तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा.

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लेकिन ये तमाम बाते जानते हुए भी कचरे के सही निस्तारण की बजाए उसे पैसों से जोड़कर देखा जा रहा है और अमीर देश अपना कचरा गरीब देशों की तरफ सरकाते जा रहे हैं. इसी के चलते संपन्न राष्ट्र, गरीब देशों पर वनों के संरक्षण करने, क्लीन या वैकल्पिक उर्जा के इस्तेमाल को लेकर या प्रदूषण करने वाले उद्योंगों को घटाने को लेकर दबाव बनाते हैं.

लेखक ‘पॉल ड्रिसेन’ अपनी किताब –‘ईकोइंपीरियलिज्म—ग्रीन पॉवर, ब्लैक डैथ’ में बताते हैं कि किस तरह से दुनिया में एक नए तरीके का साम्राज्य स्थापित होता जा रहा है, जहां विकसित देशों का फायदा विकासशील देशों को गर्त में ले जाता जा रहा है. विडंबना ये हैं कि आगे चलकर इस रवैये का नतीजा विश्वव्यापी होना ही है. क्योंकि हवा,पानी जंगल किसी की बपौती नहीं हो सकते हैं और इसमें हुआ असर किसी भी दो देशों में छिड़े युद्ध से अलग है. यहां ऐसा नहीं है कि विकासशील देश का ही नुकसान होगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले यूनाइटेड किंगडम से 660,000 टन प्लास्टिक दर्जनों देशों में भेजा गया. इन देशों में मलेशिया सबसे ऊपर था. जहां 1,29,000 टन प्लास्टिक डाला गया. इससे भी ज्यादा चिंता की बात ये थी कि इस कचरे को किसी रिसाइकिल उद्योंग मे जाने के बजाए या तो रेनफॉरेस्ट में दफ्न कर दिया गया या फिर जला दिया गया.

नीचा नगर के लोग हो रहे हैं जागरुक
जिस तरह से अपने यहां के लोगों को बीमार पड़ता देख नीचा नगर के लोग विरोध में खड़े हो जाते हैं. वो असर अब धीरे धीरे एशिया के देशों में भी नज़र आने लगा है. कई सालों तक अपनी ज़मीन पर कचरा डलवाने के बाद चाइना ने जनवरी 2018 में तमाम तरह के प्लास्टिक के कचरे के आयात पर पाबंदी लगा दी थी. उसी तरह से भारत ने भी अपने यहां किसी भी तरह का ई-कचरा लेने से साफ इंकार कर दिया था. इस कड़ी में मलेशिया भी शामिल हो गया है



जब चीन ने प्लास्टिक कचरे के आयात पर पाबंदी लगाई तो कई देशों ने अपना अनचाहा कचरा दक्षिणपूर्व एशिया के देशों में भेजना शुरू कर दिया था. लेकिन मलेशिया ने इसका विरोध किया और वहां की पर्यावरण मंत्री येओ बी यिन ने पहल करते हुए कई देशों का कचरा वापस उन देशों को लौटा दिया. ऐसे  13 देश हैं जहां पर कचरा अभी तक वापस भेजा गया है उनमें फ्रांस के 43 कंटेनर, यूके के 42, अमेरिका के 17, कनाडा के 11 और स्पेन के 10 कंटेनर शामिल हैं. बाकी कंटेनर हांगकांग, जापान, सिंगापुर, पुर्तगाल, चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और लिथुआनिया को भेजे गए. इन 150 कंटेनरों में 3737 मेट्रिक टन कचरा भेजा जा चुका है. पर्यावरण मंत्री ने चेतावनी दी है कि जो देश मलेशिया को दुनिया का कूड़ेदान बना देना चाहते हैं, उनके सपने कभी भी पूरे नहीं होंगे.

दरअसल ये दुनिया में हर कोने की एक परंपरा रही है कि अमीर हमेशा ये सोचता है कि वो पैसा देकर सब कुछ शांत कर सकता है. उस दौरान वो ये भी भूल जाता है कि पैसों से समुद्र का ज्वार नहीं खरीदा जा सकता है, जब कोरोना जैसी आपदाएं आती है तो वो बस फैलना जानती हैं. और विकासशील देशों को नीचा नगर मान कर वहां कचरा गिराने से बेहतर है ये सोचा जाए की कचरा खत्म कैसे हो. क्योंकि नीचा नगर ने प्रवाह रोका तो भी नुकसान है, प्रवाह होने दिया तो भी नुकसान है.

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: July 7, 2020, 4:18 PM IST
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