नदियां मिलती हैं, गठजोड़ नहीं करतींं

जो भारत कभी कृषि प्रधान हुआ करता था, उसकी ज़मीन, उसके खेतों को लीलने का सत्ताओं ने हरसंभव प्रयास किया है. 1966 में सरकार ने अपने राजस्व का 22% भाग सिंचाई में खर्च किया था. वहीं 1990 के दशक तक आते-आते ये हिस्सा घटकर 6% रह गया.

Source: News18Hindi Last updated on: September 10, 2020, 2:52 PM IST
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नदियां मिलती हैं, गठजोड़ नहीं करतींं
देश का पहला गठजोड़ केन-बेतवा नदी पर तैयार किया जा रहा है. इस परियोजना से साफ हो जाता है कि सरकार की सोच उसकी नियत किस तरफ इशारा कर रही है.
“पानी, मिस्टर रैंगो, पानी, इसके बगैर धूल औऱ विनाश के अलावा कुछ नहीं है, और अगर पानी है तो जिंदगी है, ज़रा इन लोगों को देखों ये जीने के लिए कितने बेकरार है, इसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं, सत्ता का एक ही नियम है पानी पर नियंत्रण और फिर तुम सब को अपने कब्जें में कर सकते हो”  ये संवाद रैंगो फिल्म में मेयर बना कछुआ पुलिस ऑफिसर बने रैंगो गिरगिट के सामने बोलता है. दरअसल पानी एक ऐसी चीज़ है जो इस वक्त सत्ता पर काबिज होने के लिए सबसे अहम है। पानी की ताकत से सत्ता छीनी भी जा सकती है और पाइ भी जा सकती है.

नदियों का गठजोड़ इसका जीता जागता उदाहरण है. देश का पहला गठजोड़ केन-बेतवा नदी पर तैयार किया जा रहा है. इस परियोजना से साफ हो जाता है कि सरकार की सोच उसकी नियत किस तरफ इशारा कर रही है. इस परियोजना के तहत बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के पन्ना नेशनल टाइगर पार्क पर सबसे पहले गाज गिरेगी. इसी वन क्षेत्र से निकलने की वजह से केन नदी का काफी हिस्सा बचा हुआ था. लेकिन ऐसा ज्यादा दिन तक नहीं रह पाएगा. इस अभ्यारण्य के अंदर 73.40 मीटर ऊंचा औऱ 1468 मीटर लंबा बांध बनाया जाएगा. इस बांध से 231.45 किलोमीटर लंबी एक नहर निकाली जाएगी, जो परीछा से पहले बेतवा में मिलाई जाएगी. इससे 1020 क्यूबिक मिलियन पानी बेतवा को दिया जाएगा. इन नहरों से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की कितनी जमीन दलदली होगी, इसका सिर्फ अनुमान ही व्यक्त किया जा सकता है. अवैध शिकार के चलते यहां पहले ही बाघ न के बराबर बचे थे. अब सरकार ने करोड़ों खर्च कर फिर से बाघों को यहां बसाने की शुरुआत की है. वो कवायद भी इसके बाद बरबाद हो जाएगी.

दरअसल सत्ताधीशों ने आम जनता को ये समझा दिया है कि दो नदियों को एक नहर के माध्यम से इसलिए जोड़ा जा रहा है ताकि ज्यादा पानी वाली नदी कम पानी वाली नदी को पानी दे सके, लेकिन केन-बेतवा के संदर्भ में इसका मतलब है एक विशाल बांध और भी कई सारे बांध और ढेरों नहरें.

गौरतलब है कि बेतवा नदी मध्य भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है. और केन में कोई पानी भरा नहीं पड़ा है लेकिन सरकार को नदी जोड़ना है तो जोड़ना है. भले ही इसके लिए कितनी भी पर्यावरण और देश की आर्थिक हालत की कमर टूटे. 2003 में इस परियोजना की कीमत 1988 करोड़ रू थी जो आज बढ़कर 35000 करोड़ हो चुकी है. इस पानी को स्थानान्तरित करने या यूं कहे नदियों को जोड़ने का सीधा सा गणित है. बेतवा पर बरारी बेराज, नीमखेड़ा,रीछन और केसरी बांध बनाए जाने हैं. जिसकी परियोजना पहले से ही लागू की जा चुकी है. यानि भैंस आने से पहले ही खूंटा गाड़ने की प्रक्रिया की जा चुकी है.
कब्जे के लिए कुछ भी करेंगे
सरकार देश की सारी नदियों और तमाम जल संसाधनों पर कब्जे को लेकर इस कदर आतुर है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कितना खर्च हो रहा है और क्या कानून आड़े आ रहा है. सरकार सब बदलने को तैयार है बल्कि बदल भी दिया है. मसलन नदियों को जोड़ने की परियोजना को पहले चरण में तीन तरह की पर्यावरणीय मंजूरी की जरूरत होती है। एक पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के तहत, दूसरी वन्यजीव संरक्षण कानून, 1976 के तहत और तीसरी वन्य संरक्षण कानून, 1980 के तहत. अन्य सभी परियोजनाओं की तरह केन-बेतवा परियोजना के लिए भी पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंजूरी अलग-अलग दी गई. और पिछले साल तो इन तमाम कानूनों में इस कदर फेरबदल कर दिया गया है कि अब देश भर में कहीं भीं मंजूरी को लेकर कोई पेंच फंसना ही नहीं है. उस पर सरकार ने पानी राज्य का विषय होता है जैसे संवैधानिक अधिकार को ही लगभग खत्म कर दिया है. अब पानी राज्य का विषय है तो लेकिन तब तक जब तक केंद्र सरकार चाहे.
बाकि तो सब कुछ उनके ही हाथों में होगा, 13 नदियों पर बनी रिवर बेसिन अथॉरिटी के नाम पर केंद्र सरकार सब कुछ अपने हाथों में ले लेना चाहती है जिससे प्रजातंत्र उनके हाथों की कठपुतली बन कर रहे और जैसे ही नदियों पर दो राज्यों के बीच विवाद हो तो केंद्र सरकार तुरंत मामले को हाथ में ले ले और फिर सब कुछ हाथ में ले ले.


नदी गठजोड़ परियोजना में कौन सा गणितनदी गठजोड़ परियोजना दरअसल एक बहुत बड़े घोटाले का प्रारूप है. आज भी देश भर की ना जाने कितनी छोटी मझोली परियोजनाएं पैसों के अभाव में पूरी नहीं हो पा रही है ऐसे में नदी गठजोड़ परियोजना के बारे में सोचना ही ज़ाहिर करता है कि सरकार किस दिशा में जा रही है. दरअसल केन-बेतवा जैसी परियोजनाओं के ज़रिये सरकार कई लोगों के हित साधने में लगी हुई है. जैसे पन्ना टाइगर रिज़र्व जो अब तक अछूता था इस परियोजना के बाद उसके अंदर उद्योंगों का प्रवेश होगा. होटल उद्योग अलग से तैयारी करके बैठा है. जैसे ही परियोजना पूरी होगी, अभ्यारण्य के अंदर नहर के किनारे, जंगल के बीच में, रिवर व्यू, फॉरेस्ट व्यू, डेंस फॉरेस्ट एक्सपीरियंस, जैसी तमाम होटल खुलेंगे, जानवर मरेंगे, पेड़ कटेंगे, औऱ सरकार कहेगी इससे पानी तो मिलेगा ही पर्यटन को बढावा भी मिलेगा. इस खेल में जो पैसों का हेरफेर होगा उसका तो अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है. बस ये समझ लीजिए की ये स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के नाम पर हुए घोटाले का लगभग सौ गुना होगा. इसके लिए पहले पैसों का अभाव बताया जाएगा जो कोरोना काल के बाद बेहद ही आसान हो गया है.

फिर पैसों के अभाव में सरकार इन योजनाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी तमाम संस्थानो की तरह इसे भी निजी हाथों में सौपेंगी. जिस तरह से बायपास सड़कों के निर्माण के बाद ठेकेदार उस पर चलने वाले वाहनों से शुल्क वसूलती है क्या उसी तरह से बांध निर्माण के बाद क्या फसलों की सिंचाई से लेकर पेय जल तक लगने वाले शुल्क को ठेकेदार तय करेंगे. ये वो विचार है जो डराता भी है औऱ हराता भी है.


क्या होगा इस गठजोड़ का असर
पन्ना टाइगर नेशनल पार्क का 50 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र डूब में आएगा. जिससे पार्क में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अऩुसूची 1 के तहत 10 ऐसी प्रजातियों पर खतरा मंडराएगा जिसे लुप्तप्राय मान लिया गया है. इसके अलावा और कई सारी प्रजातियां और 18 लाख से अधिक पेड़ों का खात्मा होगा. 6017 हेक्टेयर का वो वन क्षेत्र जिससे केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना को निकाला गया है उसका अधिकांश हिस्सा पन्ना टाइगर रिज़र्व में आता है. ऐसा कहा जा रहा है कि इस नहर की बदौलत बुंदलेखंड की 6.35 लाख हेक्टेयर भूमि की प्यास बुझ सकेगी. लेकिन अगर ये सच होता तो ललितपुर जिला जहां एशिया के सबसे ज्यादा बांध मौजूद हैं वहां पर 30-40 फीसद भूमि असिंचित क्यों रहती. इस परियोजना की वजह से 10 गांव विस्थापित हो जाएंगे. अंतर्राज्यीय विवाद बढ़ेंगे क्योंकि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सिंचाई विभाग का कहना है कि जितना पानी स्थानान्तरित करने के लिए कहा गया है, केन नदी में उतना पानी ही नहीं है.

इस गठजोड़ की वजह से बांदा के 10 गांव और 75 हज़ार हेक्टेयर कृषि भूमि सूखे की चपेट में आ जाएगी वहीं हमीरपुर जिले में 200 गांव और 4 लाख हेक्टेयर भमि बाढ़ से प्रभावित होगी. केन-बेतवा की लागत और लाभ का अगर अऩुपात निकाला जाए तो साफ हो जाता है कि इससे लाभ तो किसी तरह का नहीं है.


इतिहास में नज़र डालें तो समझ आता है कि सरकार किस तरह से बाज़ार की गिरफ्त में आती गई और कभी जो भारत कृषि प्रधान हुआ करता था उसकी ज़मीन को, उसके खेतों को लीलने का सत्ताओं ने हरसंभव प्रयास किया है. 1966 में सरकार ने अपने राजस्व का 22 फीसद भाग सिंचाई में खर्च किया था वहीं 1990 के दशक तक आते-आते ये हिस्सा घटकर 6 फीसद रह गया.

कुल मिलाकर आप मैडमैक्स फ्यूरी फिल्म को हकीकत में देखने के लिए तैयार हो जाइए जिसमें एक कथित भगवान ने तमाम जनता को अपना गुलाम बना लिया है क्योंकि पानी पर उसका कब्जा है. और वो भगवान प्रकृति की इस हकीकत को नकारने में लगा हुआ है कि नदियां मिलती हैं उनका गठजोड़ नहीं होता. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: September 10, 2020, 2:49 PM IST
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