परंपरागत ज्ञान की ओर लौटने को मजबूर विज्ञान

लाड़कुई में दोस्त के ताऊजी का बड़ा सा खेत था. जंगलों के बीच घिरा हुआ खेत. उसमें लहलहाती फसल, और बीच खेत में बना हुआ कुंआ. जिसका पानी शरीर पर डाल लो तो सारी थकान मिट जाए और गले से उतार लो तो प्यास नदारद हो जाए.

Source: News18Hindi Last updated on: April 17, 2020, 10:08 PM IST
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परंपरागत ज्ञान की ओर लौटने को मजबूर विज्ञान
देश में कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल इंदौर में 891 पॉजिटिव केस मिले हैं, जिनमें से अब तक 47 की मौत हो चुकी है.
बात बहुत पुरानी है, इतनी पुरानी है कि जब बच्चों के हाथ में कंप्यूटर, मोबाइल जैसे हथियार नहीं आए थे. ये बात तब की है जब खेलने के साधन घर के बाहर मिलते थे. जब बच्चे बाहर घूमने जाते थे तो मां-बाप को चिंता नहीं सताती थी. जब खबरों के लिए सिर्फ अखबार या दूरदर्शन का सहारा था. कुछ चैनल पैर पसार रहे थे, सूचना की क्रांति होने को आतुर थी. हम सदी के अंत के मुहाने की ओर अग्रसर थे. ये तब की बात है जब भोपाल से महज 80 किलोमीटर दूर मौजूद सलकनपुर की देवी के मंदिर तक पहुंचने में 5-6 घंटे लग जाया करते थे. जब जिंदगी के लिए गति जरूरी थी, रफ्तार नहीं. उस दौरान जब किसी को सलकनपुर जाना होता तो उसे देलावाड़ी के जंगलों के बीच से गुजरना पड़ता था. ये जंगल आज भी मौजूद हैं. लेकिन अब इन जंगलो में एक आधुनिकता सी दिखने लगी है. अब जंगल जंगल नहीं रह कर अभ्यारण्य बन गए हैं. इसी सलकनपुर के पास एक गांव और था, नाम था लाड़कुई.

गर्मियों की छुट्टियां बस खत्म होने को थी
लाड़कुई में दोस्त के ताऊजी का बड़ा सा खेत था. जंगलों के बीच घिरा हुआ खेत. उसमें लहलहाती फसल, और बीच खेत में बना हुआ कुंआ. जिसका पानी शरीर पर डाल लो तो सारी थकान मिट जाए और गले से उतार लो तो प्यास नदारद हो जाए. ये वो वक्त था जब मौसम मेहरबान हुआ करता था और इंसान भी कद्रदान था. आधा जून बीत चुका था. गर्मियों की छुट्टियां बस खत्म होने को थी. अपने दोस्त के ताऊजी के घर जाने की योजना तैयार हुई. साथ में दो दोस्त और तैयार हो गए. दो गाड़ी चार दोस्त, घना जंगल, छह घंटे का रास्ता तय करके ताऊजी के घर पहुंचे. गर्मी और उमस ने बेहाल कर दिया था. ऊपर आसमान में सूरज ने अभी भी जाने का नाम नहीं लिया था.

दोस्तों ने कुएं पर नहाया
ताऊजी ने सबको कुएं का ठंडा पानी पिलाया, फिर सभी दोस्तों ने उसी कुएं पर नहाया. दोस्त ने ताऊजी से खेत पर मटन और बाटी पकाने को कहा. ताऊजी ने छूटते ही मना कर दिया और कहा घर पर बन जाएगा खेत पर मुश्किल होगा. हमें हैरानी हुई, दोस्त ने जिद करते हुए खेत पर ही बनाने को कहा तो ताऊजी ने नाराज होते हुए बताया कि खेत पर नहीं बन पाएगा, एक दो घंटे में बारिश शुरू हो जाएगी, मौसम हो रहा है. सभी दोस्त जो शहर से किनारे के गांव पहुंचे थे. उन्हें लगा कि ताऊजी हमें बेवकूफ बना रहे हैं. इतनी देर में हमने ताऊजी का मजाक भी बना लिया और अपने दोस्त को ताने भी कस दिए. हमने ताऊजी के लिए क्या कहा, उन्हें तो पता नहीं चला लेकिन शायद इंद्र ने हमारी बात सुन ली थी.

घर में बैठ कर मटन और बाटी खा रहे थे
हम खेत पर बैठे थे और सोच रहे थे कि ताऊजी ने पूरा प्लान चौपट कर दिया. उन्हें बहाना बनाने की क्या जरूरत थी. इतनी देर में अचानक बादल गड़गड़ाने लगे. हमारी हैरानी की सीमा नहीं थी, फिर जो पानी बरसा तो इतना कि सारे खेत तर हो चुके थे और खेत से घर जाना भी मुश्किल हो गया था. हम सब चुपचाप घर में बैठ कर मटन और बाटी खा रहे थे. उस दिन एक बात समझ आ गई थी कि जो प्रकृति के साथ दिन रात रहता है, प्रकृति उसे अपनी प्रकृति समझा देती है. ऐसे ही एक याद और है जो इस लेख के विषय पर आने से पहले साझा करना चाहता हूं. लकी नाम था उसका, अपनी प्रजाति से वो कुत्ता था.हवा को सूंघ रहा है
मेरे साथ रहता था. जब भी मौसम बदलता, बारिश होने वाली होती तो वो अपने कानों को पीछे कर लेता और अपने नथुनों को ऊपर करके, आंख बंद करके आसमान की तरफ मुंह कर लेता था. ऐसा लगता था जैसे वो हवा को सूंघ रहा है. उसका ऐसा करना बड़ा अच्छा लगता था. आज ये बात समझ आई की वो समझ जाता था कि बारिश होने वाली है. ये दोनों वाकये इसलिए क्योंकि किसान जिस तरह जानवर की आवाज, उनके व्यवहार, हवा के रुख को देखकर, समझकर सदियों से मानसून का अनुमान लगाता रहा है, जिसे पहले अवैज्ञानिक समझा जाता था और निहायत अपढ़ तरीका समझा जाता था.

मौसम का सत्यानाश कर दिया है
आज कृषि वैज्ञानिक मानसून का अंदाजा लगाने के लिए उसी तरीके को सही मानने पर मजबूर हो गए हैं. खास बात ये है कि जब तक विज्ञान इस बात को मानने पर राजी हुआ तब तक हमने मौसम का इतना सत्यानाश कर दिया है कि अब पक्षी, जानवर और पौधे इस मौसम में हो रहे बदलाव को लेकर उलझ गए हैं. और वो खुद भी नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या सही है और क्या गलत. कोरोना वैश्विक महामारी के फैलने के बाद जिस तरह पूरी दुनिया में तालाबंदी हुई और प्रकृति खुली हवा में सांस लेने लगी है उससे लगता है शायद एक बार फिर पौधे, पक्षी, जानवर सही अनुमान लगा सकें.

पारंपरिक ज्ञान और लोककथाओं को पहले विज्ञान सिरे से नकारता आया है
राष्ट्रीय मौसम विज्ञान अब इस देशी तकनीकि ज्ञान का सहारा लेकर बारिश का अनुमान लगाने और किस वक्त बुआई की जानी चाहिए इसमें रुचि दिखा रहा है. जिन पारंपरिक ज्ञान और लोककथाओं को पहले विज्ञान सिरे से नकारता आया है उसे ही लेकर अब विज्ञान गंभीरता से ले रहा है. अलजजीरा में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक हैदराबाद के सेंट्रल इंस्टिट्यूट फॉर ड्रायलेंड रिसर्च इन एग्रीकल्चर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. रवि शंकर ने आंध्रप्रदेश के रंगारेड्डी, अनंतपुर, विशाखापट्टनम के गांवों में तीन साल तक रहकर वहां के लोक चलन, परंपराओं जो बारिश और मौसम से जुड़ी हुई हैं, उन पर शोध की है. अपनी शोध के दौरान वो घर-घर गए और वहां रहने वाले बुजुर्गों से उनके उन तरीकों और चलन को समझा जो परंपरा के तौर पर उनके जीवन में गहरी समाई हुई हैं.

इंडिकेटर या इशारा
उन्होंने पाया कि अकेले आंध्रप्रदेश में 24 बायो इंडिकेटर (कीट पतंगे, पौधे, जानवर) और 42 गैर बायो इंडिकेटर ( बादल, हवा, बिजली चमकना) मौजूद है जिससे बारिश का अनुमान लगाया जाता है. बारिश आने वाली हो तो मोर नाचने लगते हैं, या टिड्डे गाने लगते हैं ये एक ऐसा इंडिकेटर या इशारा है जो बारिश को लेकर पूरे भारत भर में जाना जाता है. लेकिन बारिश आने पर बकरी अपने कानों को फड़फड़ाने लगती है, उल्लू शोर मचाने लगता है, भेड़ एक साथ एकत्र हो जाती है. ये भी कुछे ऐसे तरीके हैं जो देश के कोनों में बारिश का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.

घोंसला ऊंचाई पर बना है 
इसी तरह अगर अगर लोमड़ी सुबह शाम हूहू करे या पक्षी पेड़ पर कितनी ऊंचाई पर अपना घोंसला बना रहा है ये भी बारिश का सटीक अनुमान लगाने में काम आता है. अगर घोंसला ऊंचाई पर बना है तो अच्छी बारिश होगी लेकिन अगर घोंसला नीचे बनाया गया है तो कम बारिश होने का अनुमान लगाया जाता है. इसी तरह कीटों की गतिविधि बारिश के बारे में सही जानकारी पता करने में बहुत कारगर साबित होता है.

जीव कैसे जानते हैं ?
वैज्ञानिकों का मानना है कि कीट, पक्षी या जानवर हवा में आ रहे बदलाव, नमी और दबाव को समझ लेते हैं और इससे उनके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है. मसलन कीटों को अपने सिर पर लगे एंटीने से आद्रता का अनुमान हो जाता है. वहीं आद्रता के बढ़ने से बकरी असहज महसूस करती है और वो अपने कानों को फड़फड़ा कर खुद को ठंडा रखने की कोशिश करती है. इसी तरह उल्लू भी उमस बढ़ने से हुई बेचैनी की वजह से चिल्लाता है.

पेड़-पौधों का क्या होता है रवैया
पौधों पर जलवायु संबंधी प्रभाव का विज्ञान जिसे प्लांट फीनोलॉजी भी कहते हैं, वो बताता है कि कई बार पौधों को देखकर सही अनुमान मिल जाता है, मसलन अमलतास का पेड़ बारिश होने के ठीक 45 दिन पहले अपने शबाब पर होता है यानि पूरी तरह से फूलों से भर जाता है, इसी तरह नीम के पेड़ का अच्छी तरह से फलना बताता है कि बारिश अच्छी होगी.

आओ लौट चले प्रकृति की ओर
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक मौसम विज्ञानी वाय. एस. रामकृष्ण का कहना है कि परपंरागत तरीकों के साथ विज्ञान की गठजोड़ से मानसून के अनुमान को और सटीक बनाया जा सकता है. उनका कहना है कि जब हमारे पास कई तरीके हैं जो कई साल से किसान काम में ला रहे हैं तो उनका साथ लेने में बुराई क्या है, वैसे भी एक से भले दो होते हैं.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: April 17, 2020, 9:58 PM IST
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