'विकास' के धनुष पर चढ़ा तीर मरुस्थल बना रहा है

जब हम मरुस्थल (Desert) की बात करते हैं तो हमारे दिमाग (Brain) में दूर दूर तक फैला रेगिस्तान आ जाता है लेकिन हमें ये समझना होगा कि मरुस्थल का मतलब सिर्फ रेत नहीं बल्कि मरु-स्थल यानि वो जगह जहां पर जीवन (Life) नहीं है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 18, 2020, 6:42 PM IST
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'विकास' के धनुष पर चढ़ा तीर मरुस्थल बना रहा है
अगर हमने जल्दी इस काम को युद्ध स्तर पर करना शुरू नहीं किया तो यहां की ज़मीन भी रेगिस्तान में बदल जाएगी.
साल 2009 में आई फिल्म ‘रोड मूवी’ एक इंसान की खुशी की तलाश औऱ जिंदगी के सफर को दिखाती है. फिल्म की कहानी एक ट्रक के सफर पर निकले नायक की है. फिल्म में ट्रक चल रहा है और रेगिस्तान को पार कर रहा है. ट्रक की कांच से रेगिस्तान का कैनवास उभरता है और नजर आती हैं गाना गाती हुई एक कतार में जाती महिलाएं जिनके सिर पर मटके हैं. ‘पानी की तलाश कर रही हैं. जाने कितने दिनों से चल रही हैं’-नायक के साथ सफर में शामिल हुआ एक मैकेनिक बताता है. कहानी आगे बढ़ती है और ट्रक को एक पुलिस वाला रोकता है, उसका कहना है कि कथित सड़क पर पानी का माफिया पानी की तस्करी कर रहा है. जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है रेगिस्तान का विकराल रूप और उसके संघर्ष सामने आते जाते हैं.

एक मंदिर मिलेगा उसके पास एक कुंआ है
एक जगह पर स्वार्थी नायक अपने साथ सफर में शामिल बच्चे से छिपा कर पानी पीता है. तो साथ चल रहा मैकेनिक बच्चे को ट्रक के रेडियेटर से निकाल कर पानी पिलाता है और नायक से कहता है कि तेरे सीने में दिल नहीं है क्या. फिल्म के लंबे लंबे दृश्य सिर्फ रेगिस्तान में चलते ट्रक और बेहाल ट्रक सवारों को दिखाते हैं. कई घटनाओं से गुथी हुई फिल्म में रास्ता ढूंढते हुए उन्हें एक आदमी मिलता है जिससे जब वो रास्ता पूछते हैं तो वो कहता है कि ‘यहां से आगे जाओगे तो एक बावड़ी मिलेगी, वो सूख गई है उसमें पानी नहीं है, उससे थोड़ा सा आगे बढ़ने पर एक मंदिर मिलेगा उसके पास एक कुंआ है, उसमें भी पानी नहीं है, वहां से मुड़ोगे तो एक और कुआं है वो भी सूख गया है. क्योंकि पानी चुरा लिया है. पानी चोर है तू, सब पानी चोर है. ये कहते हुए वो आदमी उनकी तरफ दौड़ता है.

पानी माफिया मिलता है
उससे बचते हुए जब नायक और उनके साथी आगे बढ़ते हैं तो उन्हें वो पानी माफिया मिलता है जिसने पूरे इलाके के पानी पर कब्जा कर रखा है. उसकी एक पानी की बावड़ी से पानी निकालने के चक्कर में नायक और उसके साथियों को माफिया के गुर्गे दबोच लेते हैं. पानी माफिया, नायक से कहता है कि यहां पर जितनी दूर भी नज़र जाती है वहां पर मौजूद हर एक बूंद मेरी है, अगर यही पानी मैं किसी बोतल में बंद करके देता तो लोग मुझे कॉर्पोरेशन कहते, मुझे अवॉर्ड मिलता और मेरे इंटरव्यू लिए जाते हैं. नायक के साथ सफर में जुड़ी लड़की बताती है कि ये चोर है हमारा पानी चुराता है और हमें ही बेचता है.

जल की मांग और आपूर्ति
संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़ 2025 तक दुनिया के दो-तिहाई लोग जल संकट की परिस्थितियों में रहने को मजबूर होंगे. उन्हें कुछ ऐसे दिनों का भी सामना करना पड़ेगा जब जल की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर होगा. ऐसे में मरुस्थलीकरण के परिणामस्वरूप विस्थापन बढ़ने की संभावना है और 2045 तक करीब 13 करोड़ से ज़्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है. फिल्म में जिस रेगिस्तान को दिखाया गया है, हमने उसे बढ़ाकर भारत की कुल ज़मीन का 30 फीसदी तक ला दिया है. 17 जून को विश्व मरूस्थलीकरण रोकथाम दिवस मनाया गया. जिस तरह भारत के 21 जिलों का 50 फीसदी हिस्सा मरुस्थल में तब्दील हो चुका है और एक बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए तरस रही है ऐसे में ये समझ पाना मुश्किल है कि इस दिवस को हमने पर्व के रूप में लिया या चिंतन के रूप में.लोगो में पानी संचय की प्रवृत्ति को बढ़ाना
बीते दिनो झाबुआ में हलमा बुलाया गया, उसके पीछे वजह थी लोगो में पानी संचय की प्रवृत्ति को बढ़ाना. हलमा एक तरह का एकजुट होकर, समाज के लिए कुछ काम करने का आदिवासियों का तरीका है. इस कार्यक्रम के तहत झाबुआ के हाथीपावा पहाड़ पर जब देशभर के लोग पहुंचे तो उन्होंने देखा कि आदिवासी किस तरह से एक जुट होकर पहाड़ पर कंटूर ट्रेचेस बना रहे हैं जिससे जब बारिश हो तो पहाड़ की प्यास बुझे और धरती में पानी का संग्रहण बढ़े. यहां पर मौजूद एक वैज्ञानिक ने बताया कि अगर हमने जल्दी इस काम को युद्ध स्तर पर करना शुरू नहीं किया तो यहां की ज़मीन भी रेगिस्तान में बदल जाएगी. उन्होंने बताया कि किस तरह झाबुआ की ज़मीन और पहाड़ धीरे धीरे रेगिस्तान में बदलने की और कदम बढ़ा रहे हैं.

मरुस्थलीकरण 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है
जिस 30 फीसदी ज़मीन की बात की गई उसका 80 फीसदी हिस्सा भारत के 8 राज्यों में मौजूद है, जिसमें राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओड़िशा, मध्यप्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2003-05 से 2011-13 के बीच भारत में मरुस्थलीकरण बढ़कर 18.7 लाख हेक्टेयर तक फैल चुका है. यही नहीं भारत के वो जिले जो सूखा प्रभावित है उनमें से भी 21 जिले ऐसे हैं, जहां का 50 प्रतिशत से अधिक इलाका मरुस्थल में बदल चुका है. 2003-05 से 2011-13 के बीच नौ जिले में मरुस्थलीकरण 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है. भारत 29.32 फीसदी क्षेत्र इस मरुरस्थल में बदलने की ओऱ अग्रसर है. इसमें 0.56 फीसदी का बदलाव देखा गया है. भारत में वन क्षेत्र की स्थिति रिपोर्ट 2019 (आईएसएफआर) के मुताबिक पिछले दो वर्षों में देश के हरित क्षेत्र में 5188 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है. इसमें वनक्षेत्र औऱ उससे इतर पेड़ों का हरित क्षेत्र भी शामिल है. वहीं इसी रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वोत्तर भारत में वन आच्छादित क्षेत्र में 765 वर्ग किलोमीटर (लगभग 0.45 फीसद) तक की कमी आई है.

क्या प्रवासियों का लौटना उम्मीद जगाता है
कोरोना काल में जिस तरह से भारत के मजदूर तबके ने पलायन किया और वो अपने खेतों की तरफ लौटे हैं उससे लगता है शायद हम भारत में बढ़ते मरुस्थलिकरण को रोक सकते हैं. दरअसल जमीन की गुणवत्ता को बहाल करके ही जलवायु संकट के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है. जमीन के उपयोग से जुड़े सेक्टर का करीब 25 फीसद वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है. अगर भूमि को फिर से जोता जाने लगे उसे उपजाऊ बनाया जाए तो करीब 30 लाख टन कार्बन को वातावरण से हटाया जा सकता है.

मरुस्थल और बंजर होती जमीन को कैसे रोकें
जब हम मरुस्थल की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में दूर दूर तक फैला रेगिस्तान आ जाता है लेकिन हमें ये समझना होगा कि मरुस्थल का मतलब सिर्फ रेत नहीं बल्कि मरु-स्थल यानि वो जगह जहां पर जीवन नहीं है. दूसरा ये ऐसी कोई महामारी नहीं है जो कुछ दिन या साल रुककर नियंत्रण में आ जाएगी, हमें इसे नियंत्रण में लाना होगा. दरअसल ज़मीन की जो नाजुक परत है हमें उसकी रक्षा करनी है औऱ उसे बहाल करना है, ये वही परत है जो धऱती के एक तिहाई हिस्से को समेटे हुई है और धरती की जैवविविधता और जलवायु पर मंडराते खतरे से लड़ने में मददगार साबित हो सकती है. भारत में रहने वाला हर बाशिंदा रामायण से वाकिफ है, जिसमें जब राम लंका पर आक्रमण करने पहुंचते हैं और 3 दिन तक समुद्र से रास्ता मांगते रहते हैं और वो रास्ता नहीं देता तो राम को क्रोध आ जाता है और वो कहते हैं -

विनय न मानत जलधि जड़ गए 3 दिन बीत ।
बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत ।।

ये कहते हुए वो लक्ष्मण से अपना तीर धनुष मांगते है जिससे समुद्र को सुखा दिया जाए. जब समुद्र घबरा कर उनसे माफा मांगता है तो राम कहते हैं कि तीर तो अब धनुष में चढ़ चुका है इसलिए उसे कहीं तो छोड़ना होगा. तब समुद्र कहता है कि उसे उत्तर दिशा की तरफ छोड़ दिया जाए क्योंकि वहां समुद्र का स्तर कम है और जीव जंतु कम हैं. अगर राम ने समुद्र पर तीर चलाया तो कई जीव जंतु भी मारे जाएंगे और उत्तर दिशा में तीर छोड़ने पर कम जीव जंतु मारे जाएंगे. इस तरह छोड़े गए तीर से थार का रेगिस्तान बना जो बताता है कि कभी यहां पर समुद्र रहा होगा. दरअसल राम का चढ़ा हुआ तीर जो उस वक्त भी रास्ता बनाने के लिए चढ़ाया गया था, वो आज ‘विकास’ नाम के धनुष पर चढ़कर धरती को मरुस्थल में बदल रहा है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: June 18, 2020, 6:40 PM IST
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