जिसके शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं होता

दरअसल शिक्षक का काम बच्चे को पढ़ाना नहीं होता है बल्कि एक नज़रिया देना होता है. तमाम प्रकार के बोझ से लदा हुआ शिक्षक जिसे शिक्षण संस्थान पढ़ाने के अलावा और भी तमाम तरह के चोचलों के वजन सा ढंक देता है वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 5, 2020, 12:34 PM IST
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जिसके शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं होता
शिक्षक दिवस
कविता का शीर्षक है ‘दृष्टिकोण’ — कक्षा का एक बच्चा ये कहते हुए कविता को पढ़ना शुरू करता है.
ऊपर से देखूं तो है खुला आसमान
बादलों से भरा भरा तेरा ये जहान
जब तक ना तरस जाएं पीने को हाथी
या कूद के दिखाएं ये मेरे साथी
साइकल की घंटी या कंकड़ या माटी
या तुझ पर बरस जाए अंधे की लाठी तब सब को दिखे है तू पानी सी नदी
तू तो हे तू अपनी प्यारी सी नदी.
कविता पढे जाने के बाद शिक्षक एक छात्र से इसका अर्थ पूछते हैं. बच्चा कहता है – ‘जो दिखता है, हमको लगता है, वो है, औऱ जो नहीं दिखता है हमको लगता है वो नहीं है, लेकिन कभी कभी जो दिखता है वो नहीं होता और जो नहीं दिखता है वो होता है’. बच्चे के अर्थ समझाने पर शिक्षक नाराज़ हो जाते हैं और उसे फटकार देते हैं फिर दूसरे बच्चे से कविता का अर्थ समझाने को कहते हैं दूसरा बच्चा कविता की एक रटी-रटाई व्याख्या सुना देता है. जिस बच्चे को डांट पड़ी थी उसके बगल में बैठा बच्चा कहता है कि कविता का सही अर्थ तो तुमने बताया बाकी तो सब रटा रटाया था. ये दृश्य तारे ज़मीन पर फिल्म का है. जो हमें एक मज़ाकिया अंदाज़ में थ्री ईडियट्स में भी नज़र आता है. अब ऐसी ही एक स्थिति का वास्तविक अनुभव साझा करता हूं.

बड़े शहरे के एक बेहद बड़े और नामीगिरामी स्कूल में नर्सरी की क्लास चल रही थी. चालीस बच्चों पर एक शिक्षिका और एक उनकी सहायक. घूम-घूम कर पढ़ा रही हैं. एसी की ठंडक में बच्चे तल्लीनता बनाए रखने में लगे हुए हैं. इसी बीच शिक्षिका ने सभी बच्चों को एक शीट और कुछ रंग दिए. सामने स्मार्ट बोर्ड पर एक चित्र बन गया था. जिसमें रात का एक दृश्य था. चांद, तारे, पेड़ सब कुछ मौजूद था. बच्चों ने चित्र देख कर अपने पास की शीट में रंग भरना शुरू कर दिया. जब सभी बच्चों से शीट वापस ली गई तो एक बच्ची ने चांद में लालिमा लिए गुलाबी रंग भर दिया था. मैडम ने मुस्कुराते हुए उस बच्ची को बताया कि चांद सफेद होता है. और फिर चांद की असली तस्वीर दिखाई. बच्ची उलझ गई थी. उसने धीरे से बोला मैडम मैंने ऐसा चांद देखा है. मैडम ने उसे कहा कि बेटा देखा होगा लेकिन असली चांद ऐसा ही होता है. बच्ची को कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसके पापा ने उसे कुछ दिनों पहले ही ग्रहण का चांद दिखाया था. वो समझ नहीं पा रही थी कि जो चांद उसने देखा है वो सही था या जो मैडम पढ़ा रही है वो सही है. उसने जो देखा था उसकी के मुताबिक चांद में रंग भर दिया. वैसे भी बच्चे की नजर में हर चीज़ में कोई ना कोई रंग ज़रूर होता है वो किसी भी चीज़ को सफेद नहीं देख पाता है. उस बच्ची की उम्र इतनी नहीं थी कि वो अपनी बात को बेहतर तरीके से व्यक्त कर सके. और चुप रहने वाली उस बच्ची के ज़हन में शायद हमेशा के लिए वो उलझन बनी रह जाती. लेकिन उसी दौरान संयोग से स्कूल की बुज़ुर्ग शिक्षिका गुजर रही थी. उन्होंने पूरी बातचीत सुनी और बच्ची को अपने पास बुलाया और धीरे से कहा कि जो चित्र उसने बनाया है वो भी सही है और जो मैडम ने बताया वो भी सही है. बस वक्त अलग अलग है, जैसे जब आप गुस्से में होते हो तो आपके चेहरे का रंग लाल हो जाता है. और जब आप डर जाते हो तो रंग बदल जाता है और जब आप नॉरमल रहते हो तो चेहरे का रंग अलग रहता है. ऐसे ही जब चांद सूरज पर गुस्सा हो जाता है तो लाल हो जाता है.. और जब नॉरमल रहता है तो सफेद रहता है. अब बच्ची के मुरझाया चेहरा खिल गया था.

दरअसल शिक्षक का काम बच्चे को पढ़ाना नहीं होता है बल्कि एक नज़रिया देना होता है. तमाम प्रकार के बोझ से लदा हुआ शिक्षक जिसे शिक्षण संस्थान पढ़ाने के अलावा और भी तमाम तरह के चोचलों के वजन सा ढंक देता है वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता है. ऐसे में अगर कोई शिक्षक कुछ अलग करने की कोशिश करता भी है तो उस पर प्रबंधन और साथी शिक्षको का ऐसा दबाव पड़ता है कि वो किताबी शिक्षा देने पर मजबूर हो जाता है.


उस पर कोरोना ने हमें वो दिन दिखा दिए जिसके बारे में हमारे लिए सोचना भी मुश्किल था. इसके बाद हमारी जिंदगी में एक ऐसी मुश्किल खड़ी हुई जिसने हमारी सब कुछ उलटा पुलटा करके रख दिया. इन सभी मुसीबतों का सबसे ज्यादा शारीरिक और मानसिक रूप से किसी पर असर पड़ा तो वो हैं बच्चे. कक्षाओं में शोर मचाने वाले बच्चे जो शिक्षक की डांट खा कर बुरा नहीं मानते थे बल्कि उनकी हंसी खुसपुसाहट भरी मुस्कान में बदल जाती थी. अब उन बच्चों ने हंसना छोड़ दिया है. पढ़ाई कंप्यूटर औऱ मोबाईल के स्क्रीन पर सिमट गई है. पहले से ही गत बनी शिक्षा व्यवस्था का और बुरा हाल हो चुका है. उस पर बाज़ार में खड़ी हुई शिक्षा और शिक्षक दोनों ही दुकान बने स्कूलों के प्रबंधन के साथ तालमेल बैठाने में लगे हुए हैं. सरकारें कह रही हैं कि ऑनलाइन कक्षाएं भविष्य हैं. यानि कुल मिलाकर तय हो चुका है कि भविष्य अब स्क्रीन के ज़रिये बनना है. पालक से लेकर शिक्षक तक सभी ने इसे ही नया सामान्य मान लिया है और वो इसके साथ बच्चों की पटरी बैठाने में लगे हुए हैं.

स्कूल और शिक्षा व्यवस्था ऐसे बच्चे तैयार करने में लगी हुई है जो कमांड लेना जानती हों। जिससे उनका काम आसान हो सके. क्योंकि उसे केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं है और बहुत से ऐसे काम है जो करने हैं जिससे स्कूल का बाजार बना रहे. अगर हम आधुनिक भारत में शिक्षा के विकास पर नज़र डालें तो हमें समीतियां बहुत नज़र आती हैं, सुझाव भी बहुत दिखते हैं लेकिन बदलाव उस स्तर का नज़र नहीं आता है। हम आज भी लॉर्ड मैकाले के तरीके का अनुसरण कर रहे है। जिसका मकसद भारत में शिक्षा फैलाना नहीं था बल्कि ऐसी बाबुओं की कौम तैयार करना था जो सत्ता की कमांड को मान सके.

इसमें शिक्षकों का दोष नहीं है. ये तरीका हमारे सिस्टम में इस कदर रच बस गया है कि हमारे लिए शिक्षा का मतलब किताब पढ़ाना है। भले ही किताब में गलत ही क्यों ना लिखा हो.

जबकि शिक्षा प्रकृति की तरह होना चाहिए जो जिक्षासा बढाए और सत्य की खोज करने में सहायक हो. और शिक्षक ऐसा जो बताने से ज्यादा देखना और आंखे खोले रखना सिखाए. जैसे एक बार एक युवा एक गुरू के पास पहुंचा और उसने गुरू से कहा कि ‘गुरूजी में सत्य को जानना चाहता हूं, , धर्म क्या है ये समझना चाहता हूं , क्या करूं, कैसे करूं,’ गुरू ने कहा ‘ पास में झरने के गिरने की आवाज़ सुनाई दे रही है ’ लड़के ने कहा ‘साफ साफ सुनाई दे रही है’ गुरू ने कहा ‘बस वहीं से शुरू करो, वही सच का दरवाजा है.’ वाकई में शिक्षा और ज्ञान इतना ही सरल और सहज होना चाहिए. जैसे प्रकृति होती है. गुरू वो होता है जो बस उस ज्ञान के साथ सामंजस्य बैठाना सिखाता है.

कॉलेज में बच्चों को पढ़ाने के दौरान कई बार ऐसा अनुभव हुआ कि अगर आप बच्चों को किताब से इतर कुछ समझाने या बताने की कोशिश करते भी हैं तो कभी प्रबंधन, कभी बच्चों के पालक तो कभी खुद बच्चे इस बात को लेकर चिंता जाहिर कर देते हैं कि कोर्स पूरा नहीं हुआ है. ये समझा पाना बेहद मुश्किल हो जाता है कि जिंदगी किताब से नहीं चलती है जिंदगी की पढाई अलग है. और अगर मान लीजिए कोई बच्चा जिज्ञासु है तो शिक्षक उसे हतोत्साहित कर देते हैं. क्योंकि हर सवाल का एक जवाब है. जो सवाल को पूरा करता है.
शिक्षा सवाल पूछना ही सिखाती है. और शिक्षक वो होता है जो सवाल का जवाब देता है या छात्र के साथ जवाब खोजता है. वो बच्चे को ये कहकर चुप नहीं कराता है कि चांद सफेद ही होता है. वो बच्चे के बोलने पर कि चांद गुलाबी भी हो सकता है नाराज़ नहीं होता है बल्कि उसकी बात को मानता है या उसके गलत होने पर उसे समझाता है.


विश्वास कीजिए जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था चांद को सफेद के साथ लाल होना नहीं स्वीकारती है तब तक चांद असलियत में सफेद नहीं हो पाएगा. क्योंकि शिक्षा वही है जो हर संभावना को स्वीकारती है। औऱ शिक्षक वही होता है जो अपने हर छात्र के काम के लिए ये कहे ‘ऐसा भी हो सकता है, ये भी संभव है..’
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: September 5, 2020, 12:29 PM IST
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