एक पेड़ बचाओ और जंगल हटाओ

सरकार की नीयत और नीतियां बताती हैं कि सरकार भले ही सार्वजनिक मंच पर पर्यावरण का कितना भी गाना गाए लेकिन उसका झुकाव आर्थिक हितों या औद्योगिक हितों की तरफ ही रहा है. और वो अपने फैसले पर अटल है बाकी पर्यावरणविदों का विरोध, तारीख आगे बढ़ाना महज़ खाना पूर्ति ही है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 9, 2020, 12:44 PM IST
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एक पेड़ बचाओ और जंगल हटाओ
पेड़ बचाओ
रूलिंग पार्टी के नेता का हज्जाम, सीधा-सादा, अपने काम से मतलब रखने वाला है. नेता जी को भी उसी के हाथ से हजामत करवाना पसंद है. फिर चुनाव आते हैं औऱ नेता जी जिस सीट से चुनाव लड़ने वाले होते हैं वहां की सीट आरक्षित हो जाती है. नेता जी को लगता है कि हज्जाम तो अपना ही गुर्गा है वो उसे पार्टी से टिकट दिलवा कर चुनाव लड़वा देते हैं. हज्जाम चुनाव जीत भी जाता है. लेकिन आगे चलकर फिर वो इस तरह के पैंतरे चलता है कि खुद मुख्यमंत्री बन जाता है.

फिर शुरू होता है भ्रष्टाचार का खुला खेल. मुख्यमंत्री एक रिलीफ फंड भी खोल देता हैं जिसका नाम होता मुख्यमंत्री प्राइवेट रिलीफ फंड. एक दिन होटल उद्योग का एक डेलिगेशन मुख्यमंत्री के पास मेमोरेंडम प्रस्तुत करने पहुंचता है. जिसमें उनकी मांग है कि खाने-पीने के दाम बढाए जाएं क्योंकि सभी चीजों के दाम बढ़ गए हैं. मुख्यमंत्री कहता है कि उसे लगता है दाम कम कर देना चाहिए. बात-बात में वो पूछता है कि उनके होटल में तंदूरी रोटी के क्या दाम है. होटल वाले बताते हैं कि रोटी का दाम इन दिनों 75 पैसे चल रहा है, जबकि पांच सितारा होटल वाले इसी रोटी के लिए 5 रूपए वसूल रहे हैं.

मुख्यमंत्री बोलता है कि सभी लोगों ने लूट मचा रखी है, औऱ ये कहते हुए वो आदेश देता है कि रोटी के दाम घटा कर 50 पैसे कर दिए जाएं. होटल वाले गिड़गिड़ाने लगते हैं और वो मुख्यमंत्री के पीए को इशारा देते हैं. पीए मुख्यमंत्री के कान में बताता है कि वो लोग रिलीफ फंड में पैसा देने को भी तैयार हैं. मोल भाव होते हुए पांच लाख पर बात पक्की होती है. मुख्यमंत्री होटल वालों से पूछता है कि वो कितना दाम बढ़ाना चाहते हैं. होटल वाले कहते है कि दाम दोगुना होना चाहिए. मुख्यमंत्री कहता है कि तिगुना कर दो.

होटलवालों के जाने के बाद पीए बोलता है कि इससे तो बड़ा अफरा तफरी मच जाएगी. मुख्यमंत्री कहता है कि मचने दो, लोगों को पत्थर मारने दो, विरोध होने दो.. जब विरोध बढ़ने लगेगा तो वो दाम गिरा कर दोगुना कर देगा, इस तरह होटल वाले भी खुश और जनता भी खुश.
आज का एमएलए रामअवतार फिल्म का ये दृश्य राजनीति की वो हकीकत पेश करता है जो सालों गुज़र जाने के बाद भी नहीं बदली. ये वो पैंतरा है जो हर बार, हर क्षेत्र में अपनाया जाता है. औऱ प्रचार तंत्र में माहिर सरकार के लिए तो इसे अपनाना और भी आसान है.

बीते दिनों एक खबर छपी थी कि सांगली ज़िले में स्टेट हाइवे रोड प्रोजेक्ट के आड़े एक 400 साल पुराना बरगद का पेड़ आ गया., विकास को द्रुत गति से बढ़ाने के लिए सड़क चाहिए, सड़के के लिए पेड़ का काटा जाना ज़रूरी है. लेकिन भोसे गांव के लोग आंदोलन पर उतर आए और ठीक चिपको आंदोलन की तरह उन्होंने पेड़ को काटे जाने का पुरजोर विरोध किया. सोशल मीडिया के दौर में बातें कहां छिपती है आजकल तो कोरोना से ज्यादा खबरें वायरल होती है. बस राज्य के पर्यावरण औऱ पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी को चिट्ठी लिखी कि सड़क निर्माण के लिए जिस पेड़ को काटा जा रहा है वो 400 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला हुआ 400 साल पुराना पेड़ है. यही नहीं इस पेड़ के साथ गांव का इतिहास जुड़ा है और ये कई पशु पक्षियों का घर भी है. आखिरकार केंद्रीय मंत्री ने मुद्दे को लपकते हुए नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया को कुछ करने का आदेश दिया. औऱ उन्होंने करके दिखा भी दिया. इस तरह केंद्रीय मंत्री ने आगे बढ़ते हुए एक पेड़ का जीवन बचा लिया. महाराष्ट्र सरकार के मंत्री ने भी उन्हें इसके लिए धन्यवाद ज्ञापित किया. और बाकि जो वाहवाही मिलनी थी वो तो खैर मिली ही.

अब आगे चलते हैं औऱ एक पेड़ की कीमत जानते हैं. जो सरकारें वसूल रही है. उड़ीसा के क्योंझर जिले में बेहतरीन जंगलों को साफ करने की अनुमति दे दी गई है. वहीं गंधलपाड़ा गांव और उससे सटा 181 हेक्टेयर का जंगल बस अपने खत्म होने की राह देख रहा है. क्योंकि यहां पर स्थानीय आदिवासियों का जबरिया विकास किया जाना है जिसके लिए वहां खनन की इजाज़त दे दी गई है. अब वनोपज पर जीवित रहने वाले आदिवासियों को एक बार सभ्य बनाने के प्रयास के तहत मजदूर, ड्राइवर कुली जैसे पदों पर पदस्थ किया जाएगा. मुंडा और भुंइया जैसे आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं. भुइंया तो अति पिछड़े आदिवासी समुदाय से आते हैं. लेकिन सरकार तय करेगी ना कि किसका औऱ कितना विकास होना है. और सरकार चाहती भी है कि विरोध होता रहे जिससे वो उस विरोध के सुर के साथ सुर मिलाकर कोई फैसला ले औऱ बताए कि हम जनता के विरोधी नहीं है. इसलिए राज्य सरकार ने ग्रीनफील्ड खनन की नीलामी आमंत्रित करने के लिए लॉकडाउन का वक्त चुना ताकि विरोध हो भी औऱ मुखर भी ना हो.. बाद में इसे राष्ट्र विकास का नाम दिया जाना तो सरकार के बाएं हाथ का खेल है.इसी तरह एनवायर्नमेंट इंपेक्ट असेसमेंट नोटिफिकेशन 2020 यानि पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 को जनता कि विचार जानने औऱ बहस की तारीख दिल्ली हाइकोर्ट ने बढ़ाकर 11 अगस्त कर दी गई थी. हालांकि 11 अगस्त को भी वही फैसला होना है जो सरकार ले चुकी है. कुल मिलाकर विकास तो होकर रहेगा की तर्ज पर सरकार इस कानून में हुए बदलावों को लाने का मन बना चुकी है औऱ जनता के विचार, बहस महज़ कोरी लफ्फाजी रह गई है.

लॉकडाउन में ही याद क्यों आई
सरकार की नीयत और नीतियां बताती हैं कि सरकार भले ही सार्वजनिक मंच पर पर्यावरण का कितना भी गाना गाए लेकिन उसका झुकाव आर्थिक हितों या औद्योगिक हितों की तरफ ही रहा है. और वो अपने फैसले पर अटल है बाकी पर्यावरणविदों का विरोध, तारीख आगे बढ़ाना महज़ खाना पूर्ति ही है. दरअसल भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय ने पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 (EIA Notification 2020) का ड्राफ्ट 23 मार्च 2020 को जारी किया और मंत्रालय की वेबसाइट पर ये 11 अप्रैल को डाला गया . इसके बाद 30 जून 2020 तक आम लोगों से इस पर आपत्ति या सुझाव मांगे. इसी बीच कोरोना ने अपने जबड़े फैला दिए और देशभर में लॉकडाउन लग गया. अब सवाल ये उठता है कि सरकार को ऐसी क्या जल्दी पड़ रही थी कि पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 का ड्राफ्ट तो जारी हुआ ही लॉकडाउन के बावजूद 30 जून तक ही इस पर टिपण्णी भी मंगवा ली गई, ये रवैया सरकार की हड़बड़ी की ओर इशारा करता है.

पहले कार्यकाल में ही रख दी गई थी नींव
पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 (EIA Notification 2020) पर भले ही 2020 में चर्चा हो रही है. और खनन नीतियों को लेकर तमाम पर्यावरणविदों की आपत्ति आ रही हो. सरकार भी जनता की राय लेने जैसी लफ्फाजी करके प्रजातांत्रिक ढांचे की पुष्टि करने की कोशिश कर रही हो लेकिन असलियत ये है कि इसकी नींव उस समय ही रख दी गई थी जब 2014 के बाद से पर्यावरण नीतियों में कई ऐसे बदलाव किये गए, जो पर्यावरण संरक्षण या मौसम बदलाव को रोकने के अनुकूल नहीं हैं.

तटीय क्षेत्र नियमों में बदलाव
तटीय क्षेत्र जो पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील और अहम हैं, वहां कई प्रकार की गतिविधियां जो पहले प्रतिबंधित थी उन्हें अनुमति दी गयी और अन्य बदलाव किये गए, जिससे निर्माण उद्योग और पर्यटन उद्योगों को लाभ मिले. इसके लिए सरकार ने कोस्टल रेग्युलेशन ज़ोन के नियमों को उलट पलट के रख दिया. जिससे विकास के नाम पर भारत की 7500 किलोमीटर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील तटीय रेखा खतरे में पड़ गई है. जब 2014 में एनडीए की सरकार बनी उसके अगले महीने यानि जून 2014 को ही कोस्टल रेग्युलेशन जोन नोटिफिकेशन 2011 पर काम शुरू हो गया, जिसका नतीजा अगले चुनाव से एक साल पहले यानि 2018 मे कोस्टल रेग्युलेशन जोन नोटिफिकेशन के ड्राफ्ट के रूप में बाहर आया. जिसे 28 दिसंबर 2018 को पास कर दिया गया.

सरकार ने दावा किया कि इस नोटिफिकेशन के बाद तटीय क्षेत्रों में आर्थिक विकास होगा और ज्यादा से ज्यादा तरीकों से रोज़गार पैदा हो सकेंगे. जबकि मुछआरा समुदाय इसके विरोध में है उनका मानना है कि इससे विकास तो कुछ नहीं होगा, लेकिन तटीय इलाकों में बड़े स्तर पर रियल स्टेट का कब्जा ज़रूर होता जाएगा. Olencio Simoes of the Goenchea Ramponkarancho Ekvott गोवा के मछुआरा समुदाय का एक समूह है उनका कहना है 1991 औऱ 2011 में बना कोस्टल रेग्युलेशन ज़ोन नोटिफिकेशन तटीय़ क्षेत्रों की सुरक्षा, पर्यावर्णीय संवेदनशील इलाकों की देख-रेख, मैंग्रोव्स को बचाने जैसी सिद्धांतो के आधार पर बना था लेकिन नया नोटिफिकेशन बस तमाम तटीय इलाकों में कंक्रीट का जंगल खड़ा करने पर जोर देने वाला है.

इसी तरह वन,वन्यजीव और उनके घरों में भी सेंध लगाने का काम 2014 से ही शुरु हो गया था. बल्कि यूं कहना चाहिए जब 2014 में पूरा भारत, अबकी बार... चिल्ला रही थी, उसी दौरान समझ आ गया था कि पर्यावरण के बजाए सरकार उद्योगों को तरजीह देने वाली है. और आगे चलकर कानून में ऐसे संसोधन होंगे जो विकास से जुड़ी परियोजनाओं में पर्यावरण को आड़े ना आने दें और द्रुत गति से विकास हो सके.
पहले साल में ही यानि अगस्त 2014 से अप्रैल 2015 के बीच प्रधानमंत्री कार्यालय को भारतीय उद्योग संघ ने एक 60 बिंदुओं की सूची सौंपी जिस पर तेजी से कार्य करने के लिए प्रस्ताव रखा गया.

पीएमओ ने तुरंत उस पर विचार करना शुरू किया यानि उद्योगों को लगाने के लिए आने वाली पर्यावरण संबंधी अड़चनों को हटाने की तैयारी शुरू कर दी गई. उसी दौरान पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक रिव्यू कमेटी का गठन किया गया जिसे प्रकृति औऱ पर्यावरण से जुड़े छह अहम कानून, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, वन्य (संवर्धन) अधिनियम 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, जल ( प्रदूषण के निषेध एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974, हवा ( प्रदूषण के निषेध एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 औऱ भारतीय वन अधिनियम 1927 में ज़रूरी बदलाव करने को कहा. लेकिन घोर विरोध की वजह से ये पूरी तरह से हो नहीं पाया .

पर राष्ट्रीय समिति में स्वतंत्र सदस्यों की संख्या में कमी, अत्यंत प्रदूषित क्षेत्रों में नई परियोजनाओं पर रोक को हटाना, वन कानूनों के प्रावधानों को कमजोर करते हुए संरक्षित क्षेत्रों के काफी करीब तक विभिन्न परियोजनाओं की स्वीकृति, औद्योगिक एवं संरचनागत परियोजनाओं की स्वीकृति देने के लिये वन कानूनों के मानकों में बदलाव जैस कुछ नीतिगत बदलाव इस सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ में ही किये गए थे, जिनसे औद्योगिक तथा ढ़ाचागत परियोजनाओं को पर्यावरणीय तथा वन स्वीकृति मिलना आसान हो गया। यही नहीं भाजपा सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के संस्थाओं को भी कमज़ोर किया .
पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2006 में भी हाल के सालों में कई अहम बदलाव ला कर उसे बेहद लचीला बनाया दिया गया,, मसलन कोयला खदानों के विस्तार को पर्यावरण प्रभाव अध्ययन के तहत होने वाली जन सुनवाई से मुक्त कर दिया गया, 2000 हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले सिंचाई परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति से छूट दे दी गई. ये फेहरिस्त काफी लंबी हो सकती है.

ऐसे में पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020’ का मसौदा लाया है जिसके लिए कहा तो ये जा रहा है कि वो परियोजनाओं के ज़रिये पर्यावरण से जुड़े नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए लाया गया है लेकिन कायदे में ये उन उल्लंघनों को वैधता प्रदान करेगा.
सरकार ने इसी तरह 2017 में एक आदेश लाकर बग़ैर पर्यावरणीय अनुमति (EC/EP) के निर्माण कार्य प्रारंभ करने वाली परियोजनाओं को बाद में अनुमति प्रदान करने का प्रावधान किया था. और अब पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2020 में इसे बाक़ायदा संस्थागत कर दिया गया है, अर्थात उद्योग बिना पर्यावरणीय अनुमति (EC/EP) परियोजना कार्य प्रारम्भ कर सकेंगे और बाद में यह अनुमति ले सकेंगे .

इसी प्रकार से सरकार ने मसौदा अधिसूचना 2020 में कई प्रकार की परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति लेने की आवश्यकता से मुक्त कर दिया है, जिनके लिए पहले अनुमति लेनी आवश्यक थी. पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2020 लागू होने पर खनन परियोजनाओं को 50 साल के लिए पर्यावरणीय अनुमति मिल सकती है, जो पहले 30 वर्ष के लिए दी जाती थी.

इसी तरह सरकार एक पेड़ की जिंदगी को बचाकर लगातार दिन भर तमाम मीडिया चैनलों में खबरनवीसों के मुखारबिंद से खुद के पर्यावरण प्रेमी होने का ढोल पिटवाती रहेगी और उंधर किसी दिन जब आप रोमांचित होकर भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘सतपुड़ा के घने जंगल’ अपने बच्चों को सिखाने की कोशिश करेंगे तो बच्चा आपसे सवाल पूछेगा.. कहां है वो घने जंगल.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: August 9, 2020, 12:43 PM IST
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