धुएं की धुंध में सौंदर्य तलाश रहे हैं हम

रिपोर्ट बताती हैं कि दुनियाभर में हार्ट अटैक, डायबिटीज़, लंग कैंसर, पुरानी फेफड़ों की बीमारी से होने वाली 67 लाख मौतों के पीछे, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहना एक अहम वजह है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 23, 2020, 11:16 PM IST
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धुएं की धुंध में सौंदर्य तलाश रहे हैं हम
वैकल्पिक ऊर्जा के दौर में कोयला मौत की वजह (news18 English creative)
एक गांव में कोई कार्यक्रम चल रहा होता है, तभी अचानक वहां बिजली चली जाती है. पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है. गांव वाले थोड़ी देर तक चुप रहते हैं, फिर मिलकर भजन गाने लगते है. उस भजन का अर्थ ये है कि ऊपरवाले हमें अंधेरे से बचाओ, अंधेरे में जीने की ताकत दो. भजन को सुनकर बाहर से आया एक युवक बुरी तरह झुंझला जाता है और गांव वालों से कहता है ऐसा लगता है जैसे आपको अंधेरे में रहने में मज़ा आऩे लगा है. आप अंधेरे को मिटाना नहीं चाहते हो बल्कि अंधेरे के साथ तालमेल बैठाने में लगे हुए हैं. स्वदेश फिल्म का ये दृश्य हमारी प्रदूषण को लेकर सोच को ज़ाहिर करता है. हर साल हमें मालूम होता है और हर साल हम यही रवैया अपना रहे होते हैं. हर साल दिल्ली पराली पर दोष मढ़ रहा होता है. हर साल पराली जल रही होती है. हर साल केंद्र और राज्य के बीच में तना तनी होती है और धुंध में सब कुछ ढंक जाता है. इस तरह खांसते-छींकते अगला साल आ जाता है. ये साल थोड़ा ज्यादा तकलीफभरा भी हो सकता है क्योंकि परंपरागत स्मॉग के साथ इस बार घर में कोरोना नाम का अनचाहा मेहमान भी आ गया है.

उस पर बुधवार को जारी की गई ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ की वार्षिक रिपोर्ट ने इस स्थिति की गंभीरता को औऱ बढ़ा दिया है. रिपोर्ट बताती हैं कि दुनियाभर में हार्ट अटैक, डायबिटीज़, लंग कैंसर, पुरानी फेफड़ों की बीमारी से होने वाली 67 लाख मौतों के पीछे, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहना एक अहम वजह है. इन मौतों में जहां चीन में 18 लाख मौतें हुईं वहीं भारत 16 लाख मौतों के साथ दूसरे नंबर पर है. रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में लोगों की मौत की वजह में वायु प्रदूषण चौथे नंबर पर है. और भारत में ये सबसे अहम वजह में शुमार है.

इसी तरह नवजात शिशुओं पर वायु प्रदूषण के असर का आकलन करने वाली एक रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में 5 लाख नवजात शिशुओं की मौत हुई जिसमें से भारत में ये आंकड़ा 1,16,000 था. चौंकाने वाली बात ये है कि इसमें से दो तिहाई मौतों कहीं ना कहीं से वायु प्रदूषण से जुड़ी हुई थी.

वैकल्पिक ऊर्जा के दौर में कोयला मौत की वजह
भारत भले ही दुनिया के सामने खुद को पर्यावरण प्रहरी बता रहा हो. भले ही हम तमाम मंचों पर वैकल्पिक ऊर्जा की बात कर रहे हों लेकिन हकीकत इसके उलट है. भारत कोयले से बिजली पैदा करने के मामले में लगातार खुद को अव्वल रखे हुए हैं. भारत की करीब तीन-चौथाई बिजली कोयले पर टिकी हुई है. ये दुनिया के मुकाबले 6 फीसद प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है. यही नहीं 1994 से अब तक भारत में कोयला खनन की गति दोगुनी होकर 500 मिलियन टन हो चुकी है. इसी वजह से क्षेत्रीय इलाकों में वक्त से पहले होने वाली मौतो मे वायु प्रदूषण को एक अहम वजह माना गया है. ‘इकोलॉजिकल इकोनॉमिक्स ’ में छपा एक अध्ययन बताता है कि हर साल कोयला खनन वाले क्षेत्रो मे होने वाली मौतों का आंकड़ां 80 हज़ार से 1,15000 प्रतिवर्ष हो चुका है.

पहले भी चेता चुकी हैं रिपोर्ट
इससे पहले भी लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 2015 में वायु, जल, और अन्य प्रदूषण की वजह से सबसे ज्यादा मौतें हुई थी. 2015 में प्रदूषण की वजह से 25 लाख लोगों को जिंदगी गंवानी पड़ी थी. शोधकर्ताओं ने बताया है कि इनमें से ज्यादातर मौतें प्रदूषण की वजह से होने वाली दिल की बीमारियों, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और सांस की गंभीर बीमारियों की वजह से हुई है. इस अध्ययन के अनुसार इसमें सबसे अधिक मौतों की वजह वायु प्रदूषण हैं.पर्यावरण की बिगड़ती हालत को बताता वृत्तचित्र ‘इयर्स ऑफ लिविंग डेंजरसली’ में एक जगह अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट ओबामा बोलते हुए नज़र आते हैं कि उन्हें उनके एक गवर्नर ने बोला था कि हम शायद वो पहली पीढ़ी है जिसने प्रदूषण को महसूस किया है और अगर हम आज से ही शुरूआत नहीं करते हैं तो शायद हम आखिरी पीढ़ी होंगे.

दरअसल हम अपने घर में छोटी सी धूप जलाएं या पंजाब हरियाणा के किसानों की तरह पराली जलाएं. हम ये मान कर चल रहे होते हैं कि इतने से कुछ नहीं होता है. हमारे अकेले के करने से क्या होता है, एक अकेला मैं करूंगा तो उससे क्या नुकसान होगा. ये वो मानसिकता है जो थोड़ा थोड़ा करके इस धरती को तबाह कर रही है. ये ठीक वैसा ही है कि एक बार एक राज्य में सूखा पड़ने की आशंका को देखते हुए वहां के राजा को किसी ने इससे निपटने के लिए एक सलाह दी. दूसरे दिन राजा ने मुनादी पिटवा दी कि गांव में सूखे को दूर करने के लिए हमें मिलकर कदम उठाना पड़ेंगे. ये इश्वरीय प्रकोप है इसलिए फैसला किया गया है कि सभी लोग अपने अपने घर से एक एक लोटा या जो जितना दे सकता है उतना दूध गांव के पास बनी हुई अलग अलग बावली में डाल दें. इस दूध से भगवान का अभिषेक किया जाएगा. आज रात तक सभी लोग अपना सहयोग दे दें. राज्य में ये बात फैल गई और सभी को सहयोग देने की बात मालूम चल गई. दूसरे दिन जब सुबह हुई तो राज्य की तमाम बावली पानी से भरी हुई थी.

हर आदमी ने यही सोचा की सभी लोग तो दूध डाल ही रहे होंगे, मेरे एक लोटे पानी से क्या बिगड़ जाएगा और किसको मालूम चलेगा कि मैंने पानी डाला है या दूध. यही वो मानसिकता है जो लगातार इस दुनिया को गर्त में भेज रही है. हम अपने 2-3 साल के बच्चे की शैतानी की बात बताते हुए भी एक तरह से उसकी तारीफ कर रहे होते हैं. पीएम 2.5 औऱ पीएम 10 जैसे मुद्दों पर भी हमारा ऐसी ही लहज़ा लगता है. जब हम चिंता जाहिर कर रहे होते हैं तो लगता है जैसे हमें उसे बताने में मजा आ रहा है. जैसे हम होड़ लगाते हुए कह रहे हैं ज़रा देखो तुम्हारे शहर में तो इतना कम प्रदूषण है और हमारे शहर को देखो हमने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं.

इसके पीछे की एक वजह हमारी समस्या को देखने के तरीके में छिपी हुई है. हम ये मान कर चल रहे है कि हम जो भी कुछ कर रहे हैं उससे हम धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं. हम कुछ बेहतर करेंगे तो धरती को फायदा पहुंचाएंगे. इस तरह से हम धुएं की धुंध में सौंदर्य तलाश रहे हैं. लेकिन जाने माने पर्यावरणविद सोपान जोशी अपनी किताब ‘जल, थल, मल ’ में इस गलतफहमी को बड़ी ही सहजता से दूर कर देते हैं. वो अपनी पुस्तक के ज़रिये बताते है-

किस तरह आज से साढे तीन अरब साल पहले धरती पर सायनोबैक्टीरिया, यानि हरे-नीले रंगे के बैक्टीरिया हुआ करते थे. वो सूरज की रोशनी औऱ हवा में मौजूद कार्बन गैस से अपना खाना बनाते थे. आज हमारे पेड़ पौधे भी इसी तरह से जीते हैं. ये बैक्टीरिया भी एक एक जहरीली गैस छोड़ते थे जिस तरह हम कार्बनडाय ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं. ये जीव अच्छे से फले–फूले औऱ कई करोड़ों साल तक धऱती पर इनका राज चला. कोई ढाई अरब साल पहले इनका राज मिटने लगा, यहां से हमारी बात शुरू हुई. इनकी संख्या बढ़ी तो इनकी सांस से निकलने वाली विषैली गैस का उत्सर्जन भी बढ़ा. ये गैस धरती के तत्वों से प्रतिक्रिया करके ठिकाने नहीं लग पा रही थी और इसकी मात्रा बढ़ने लगी. इतनी बढ़ी की धरती पर प्रलय आ गया. हमारे ग्रह औऱ वायुमंडल पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा. कई तरह के जीवन लुप्त होने लगे. कुछ वैज्ञानिक इसे जीवन के इतिहास का सबसे विनाशक अध्याय मानते हैं. शायद आज तक का सबसे बड़ा प्रलय, पृथ्वी का सबसे विशाल प्रदूषण.

लेकिन पृथ्वी पर जीवन खत्म नहीं हुआ. उसका रूप बदल गया. इस तरह धरती पर वो जीव पनपे जो इस विषैली गैस को सहन करना जानते थे. जो नही सीख पाए वो या तो लुप्त हो गए या किसी सीमित जगह तक सिमट कर रह गए. जैसे दलदलों और समुद्रों की गहराइयों में. दूसरे सभी जीवों ने आगे चलकर इस विषैली गैस का इस्तेमाल करना सीख लिया. सायनोबैक्टीरिया के भी जिन प्रकारों ने इस जहर को सहना करना सीख लिया वो आज भी जीवित है. आगे चलकर यही विषैली गैस जीवन का स्रोत बन गई.
ये विषैली गैस थी ऑक्सीजन. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: October 23, 2020, 11:16 PM IST
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