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हमने कुत्तों को सिर्फ पाला ही नहीं उनको ढाला भी है....

कुत्तों (Dogs) के इस खूबसूरत शरीर और वफादारी (Loyal) के पीछे 15 हज़ार साल पुराना इतिहास (History) है जो कुत्तों को इतना जटिल बनाता है. ये धरती (Earth) की ऐसी प्रजाति है जिसमें आपको जो भी भिन्नता नज़र आती है वो प्राकृतिक नहीं है, हमने उसे ऐसा बनाया है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 23, 2020, 1:25 PM IST
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हमने कुत्तों को सिर्फ पाला ही नहीं उनको ढाला भी है....
आज मौजूद 80 फीसदी कुत्तों की नस्ल 150 साल पहले मौजूद ही नहीं थी. हमने बेचने या फिर अच्छा दिखाने के मकसद के लिए इस जानवर में हेरफेर की.
साल 2006 में आई फिल्म (Film) 'एट बिलो' जो 1983 में बनी जापानी फिल्म एंटार्किटिका ( नानक्योकु मोनोगातारि लिट यानि साउथ पोल स्टोरी) की रिमेक (Remake) थी. फिल्म की कहानी एक वैज्ञानिक (Scientist) की है जिसे दूसरे ग्रह (Planet) से आए एक उल्कापिंड को ढूंढने के लिए अंटार्कटिका जाना है, लेकिन वहां पर बर्फ (Snow) की वजह से जाना मुश्किल है. ऐसे में वैज्ञानिक कुत्तों (Dogs) के ज़रिए चलने वाली गाड़ी स्लेज से जाना तय करता है. वहां पहुंच कर हालात बिगड़ जाते हैं और वैज्ञानिक की वापस आने की जुगाड़ बन जाती है लेकिन वो अपने साथ कुत्तों का वापस नहीं ला सकता है. वो कुत्तों के उस समूह की जो लीडर है माया उससे वादा करता है कि वो उन्हें लेने आएगा, साथ ही वो उन्हें कहता है कि जब तक वो वापस ना आएं तब तक वो कहीं ना जाएं. इस तरह पांच महीने बीत जाते हैं लेकिन वैज्ञानिक वापस नहीं लौट पाता है क्योंकि कोई वहां कुत्तों को वापस लाने के लिए इतना बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहता है.

किसी तरह से वैज्ञानिक अपनी जमा पूंजी लगा कर वहां जाने का इंतज़ाम करता है. उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं है कि वहा कोई बचा होगा. लेकिन फिर भी वो अपना वादा निभाने के लिए वहां जाता है. और जब वो तमाम बाधाओं को पार करके वहां पहुंचता है तो वहां का नजारा उसे भावुक औऱ हैरान कर देता है. माया वहां पर उसका इंतज़ार कर रही होती है. ऐसे ही आपको 1985 में आई ‘तेरी मेहरबानियां’ याद होगी जिसमें कुत्ता अपने मालिक की हत्या का बदला लेता है. मर्द फिल्म में अमिताभ हो या बोल राधा बोल में मौजूद काले रंग का लेब्राडोर या फिर हम आपके कौन का टफी(पामरेनियन) हो या फिर हमारे पुराणों में मौजूद युधिष्ठिर के साथ अंत तक चलने वाला कुत्ता या फिर रामायाण काल में भरत को तोहफे में मिलने वाला बघेरी नस्ल का कुत्ता. इन सभी के साथ जो भी कहानियां जुड़ी उनमें एक बात समान थी- वफादारी.

ज़मीर फिल्म में जब नायक से ज़मीदार पूछता है कि क्या वो मालिक के प्रति वफादार है. तो नायक जवाब देता है ‘वफादार चाहिए तो कुत्ता पालो’. अगर आपसे मैं कहूं कि कुत्ते की जिस वफादारी को लेकर हम इंसान उसे अपने करीब रखते हैं या दूसरे शब्दों में जब हम उसकी वफादारी को आगे रखकर उसे पालते हैं या उस पर दया दिखाते है. वो वफादारी दरअसल हमने ही उसके अंदर डाली है. या यूं कहिए कि जो कुत्ता आपको दिख रहा है उसे उस तरह से हमने ही बनाया है. पिछले लेख में आपसे इस विषय पर बताने के लिए कहा था तो आज चलिए कुत्तों के वफादार बनाए जाने के सफर पर चलते हैं.

कब और कहां से हुई शुरुआत
कुत्तों के इस खूबसूरत शरीर और वफादारी के पीछे 15 हज़ार साल पुराना इतिहास है जो कुत्तों को इतना जटिल बनाता है. ये धरती की ऐसी प्रजाति है जिसमें आपको जो भी भिन्नता नज़र आती है वो प्राकृतिक नहीं है, हमने उसे ऐसा बनाया है. हमने डॉग्स की कुछ चुनी हुई ब्रीड के ज़रिए उनके विकास की कहानी लिखी है. आज मौजूद 80 फीसदी कुत्तों की नस्ल 150 साल पहले मौजूद ही नहीं थी. हमने बेचने या फिर अच्छा दिखाने के मकसद के लिए इस जानवर में हेरफेर की. इंसानो की कुत्तों को बेहतर बनाने की इस कोशिश ने इतिहास में सबसे लंबे चलने वाले (प्रजनन के लिए प्रजाति चुनने यानि selective breeding) के प्रयोग को जन्म दिया.

15 हज़ार साल पहले ये सफर भेड़िये के साथ शुरू हुआ. हम सभी जो भी थोड़ा बहुत कुत्तों के बारे में जानते हैं वो इसी सत्य को जानते हैं कि कुत्तें, भेड़िये के परिवार से हैं. लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि ये हुआ कैसे और किस तरह एक क्रूर और भयाक्रांत करने वाला भेड़िया एक वफादार जानवर में तब्दील हो गया? कुछ मत हैं कि जब शिकारी एक जगह बसने लगे, तो उन्होंने कूड़ा करना शुरू किया और भेड़िये मुफ्त के खाने को मना नहीं कर सके और उन्होंने वहां घूमना शुरू कर दिया. वक्त के साथ कूड़े ने शिकार की जगह ले ली और भेड़िये का शिकार करना धीरे धीरे कम होता गया वो ज्यादा पहुंच में होते गए और खाने के लिए काम करने को तैयार रहते थे.

इस तरह सालों तक भेड़िया इंसानों का पालतू बन कर रहा. लेकिन पहली बार इजिप्ट के आर्टवर्क में कुत्तों की नस्ल के सबूत मिले थे. इस तरह विदेशों में पाई गई कई सील में बघेरी नस्ल के कुत्तों का ज़िक्र पाया जाता है. हालांकि कुछ लोग भेड़ियों के कुत्तों में तब्दीली को सही नहीं मानते हैं उनका मानना है कि कुत्ते की प्रजाति पहले से ही मौजूद थी और उनका भेड़ियों से समागम नहीं हो सकता है क्योंकि दो अलग प्रजातियों के समागम से या तो प्रजनन होता नहीं है और जो प्रजनन होते देखा गया है वो घोड़े और गधे के बीच में पाया गया है जिससे टट्टू पैदा होता है जो एक ऐसी नस्ल है जिसमें प्रजनन की क्षमता नहीं होती है. लेकिन कुत्तों के झुंड में शिकार करने की प्रवृत्ति और सूंघने, सुनने की ताकत उन्हें भेड़िये से मिलने की पुष्टि करती है.कुत्तों में कैसे हुआ परिवर्तन
ऐसा माना जाता है कि इजिप्ट में शिकारी कुत्तों के बीच सूघने की क्षमता का खेल खेला जाता था और जो इस खेल में जीतता था उसे इनाम में प्रजनन के लिए अच्छे और योग्य साथी मिलते थे. ये ठीक वैसा ही था जैसे किसी योद्धा को इनाम में दासियां उपहार में दी जाती थी. इस तरह से उनके जीन्स मिलते गए और बढ़ते गए. इस शिकारी कुते हाउंड का पुरखे आज भी सालुकी के रूप में मौजूद हैं. आधुनिक सालुकी आज भी नॉर्थ अफ्रीका में शिकार के खेल में इस्तेमाल होता है. वहीं यूनाइटेड स्टेट्स में इसे दौड़ की प्रतियोगिता के लिए पैदा किया किया जाता है.

इसे आप कुत्तों की दुनिया का फार्मूला नंबर वन भी कह सकते हैं, ये चालीस मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ता है. सदियों से सालुकी को लंबी दूरी का धावक बनाने के लिए ही तैयार किया जा रहा है. ये लंबी दूरी तक भाग सकता है और मुश्किल से हांफता है और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हम ऐसा चाहते थे. यही वो नस्ल है जिसके भेड़िये से नज़दीकी संबंध देखने को मिलते हैं.

19 वीं सदी में आई बाढ़
विक्टोरियन काल में जब औद्योगिक क्रांति, रेल्वे, फोटाग्राफी, इलेक्ट्रिक लाइट्स, डार्विन और बढ़ती हुई आराम तलब जिंदगी चरम पर थी, और इस जिंदगी ने नए नवाबों को जन्म दिया था. पश्चिमी दुनिया हर चीज अपने मन मुताबिक चाहने लगी थी. ऐसे में इमारतों, पार्कों और तमाम तरह की कलाकृतियों में छेड़छाड़ या उन्हें अपने मनमुताबिक बनाने के बाद कुत्तों की बारी आई. नए पनपते मध्यम वर्ग में कुत्ते वो भी डिज़ाइनर कुत्तें रखना रईसी की निशानी हो चुका था.

उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में पहली बार कुत्तों में दिलचस्पी को बढ़ते देखा गया. लोग खास तरह की नस्लों चुनते ही नहीं थे बल्कि ये भी तय करते थे कि उनका वंश किस तरह आगे बढ़ाना है. इसी कोशिश या शौक के चक्कर में हमें बड़े और लटके कान वाले, घुमी हुई पूंछ वाले, पग जैसी नाक और छोटे पैरों वाले डॉग्स मिले. यही नहीं 19वीं सदी में डोबरमेन पिन्सचर, बुलडॉग और बुल टेरियर जैसे कुत्ते बनाए गए. यहां तो महज तीन नाम दिए हैं, ऐसी सैंकड़ों नस्ल थी जो उस दौरान बनाई गई.

सुंदरता के बाद अब काबीलियत की बारी
हमने कुत्तों के जेनेटिक गुणों में हेरफेर करके उसके स्वभाव और प्रवृत्ति दोनों में बदलाव किया है. कुत्तों को कानों का पैनापन अपने पूर्वज भेड़ियों से मिला है, जिन्हें लंबी दूरी पर खड़े शिकारियों के झुंड को सुनना पड़ता था. जो आवाज़ कुत्ते सुन लेते हैं वो हमारे बस की बात नहीं है. इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि कुत्तें के कानों के लिए जो सबसे ऊंचा नोट होता है उस तक पहुंचने के लिए हमें पियानों में 48 कीज और जोड़नी पड़ेगी. इसी तरह कुत्ते की सूंघने की ताकत का भी कोई सानी नहीं है. जहां हमारे पास सूंघने के लिए 50 से 1 करोड़ रिसेप्टर्स होते हैं वहीं कुत्तों के पास 22 करोड़ रिसेप्टर्स होते हैं यानि कुत्ते की नाक हमसे 22 गुना ज्यादा ताकतवर होती है.

हमने इन दोनों काबीलियतों को अपने काम के हिसाब से तैयार करवाया और कुत्तों में चयनित प्रजनन (selective breeding) किया. मेडिकल शोधार्थी बताते हैं कि कुत्ते इंसान की सांस या पेशाब से एक विशेष किस्म के कैंसर को सूंघ सकते हैं. यही नहीं इसी सूंघने की ताकत वाली नस्ल के साथ मिलकर हमने स्निफर नस्ल को तैयार किया. ये वही कुत्ते होते हैं जो ड्रग्स से लेकर बम तक सभी कुछ सूंघ कर ढूंढ निकाल लेते हैं.

कैसे होता है बदलाव
रूस के एक वैज्ञानिक डॉक्टर थे ‘सुलिमोव’, उन्होंने दूर से खतरा भांप लेने और सूंघने की क्षमता को मिलाकर और कई दूसरे तरीकों मिलाकर नई नस्ल तैयार करने में उल्लेखनीय योगदान दिया. ये नस्ल सुलिमोव नस्ल के नाम से जानी जाती है. सुलिमोव कुत्तों की थोड़ी नई ब्रीड है और उनकी तादाद अभी बहुत ज्यादा नहीं है. इस कुत्ते को तैयार करने की प्रक्रिया सत्तर के दशक में कैनिड और वाइल्ड डॉग नस्ल को मिलाकर किया गया. इसी नस्ल का कुत्ता था जैकाल जिसकी खतरे को भांप लेने की अद्भुत क्षमता ने उन्हें आकर्षित किया.

इस तरह गोल्डन जैकाल और लेपलैंड हर्डिंग हाउंड नस्ल की प्रजनन की प्रक्रिया लगातार सात नस्लों तक की जाती रही. इस नस्ल में खूबियां तो थी लेकिन इसे प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता था. फिर इस नस्ल को कुछ और अलग तरह की नस्लों के साथ मिलाया गया जिनके नाम रेनडीर हर्डिंग हाउंड, फॉक्स टेरियर आदि थे. इस तरह 25 सालों की अथक मेहनत के बाद एक ऐसी नस्ल सामने थी जो अपने काम में माहिर थी और जिसे आसानी से सिखाया भी जा सकता था.

इसी तरह जेनेटिक इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना है गोल्डन रिट्रीवर और यैलो लैब्स. ये वो कुत्तें हैं जो नेत्रहीनों के गाइड की भूमिका निभाने के लिए पैदा किए जाते हैं. पहले विश्व युद्ध के दौरान जो सैनिक नेत्रहीन हुए थे उनकी मदद के लिए इस काम की शुरुआत हुई और 90 साल लग गए एक ऐसी नस्ल बनाने में जो नेत्रहीनों के लिए गाइड बन सकती है. आज इस नस्ल के सैंकड़ों बच्चे पैदा किए जाते हैं और ये एक व्यवसाय बनकर उभरा है.

क्या है इसके पीछे का विज्ञान
किस तरह से इंसानों ने एक कुत्ते को क्रूरता और बेपनाह प्यार दोनों दिखाने के लायक बना दिया है. इस तरह की हैरान करने वाली विविधता सिर्फ डीएनए की वजह से ही संभव है. डीएनए हर जीवधारी की बुनियादी निर्देश पुस्तिका की तरह होती है. ये दोहरी रस्सी नुमा डीएनए चार अमीनो एसिड,(एडीनिन, ग्वानिन, सायटोसिन और थायमिन ) से मिलकर बनी होती है. इन्हीं के अलग अलग संयोजन से विभिन्न प्रजातियां बनती हैं. कुत्तों में इनके मेल के 240 करोड़ जोड़े होते हैं. इन्हीं अमीनो एसिड के क्रम से हज़ारो जीन्स बनते हैं. सैंकड़ों सालों की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों ने चयनित प्रजनन की प्रक्रिया के साथ इनके जीनोम में बदलाव करना सीख लिया है.

इस तरह से एक अकेले जीन में छोटा सा बदलाव करके कुत्ते के आकार से लेकर उसके प्रकार तक हर चीज में बदलाव कर दिया जाता है. यहां सवाल ये आता है कि ऐसा दूसरी प्रजातियों के साथ क्यों नहीं हो पाया है. तो इसका जवाब वैज्ञानिक ये कहकर देते हैं कि भेड़ियों से लेकर लोमड़ी और कुत्तों तक में एक बात की समानता पाई जाती है कि इन सभी के जीनोम में एक बदलाव की तरफ या आसान शब्दों में वक्त के साथ खुद को बदल लेने या पलट (जिसे slipping quality कहते हैं) जाने की खासियत होती है. हम गाय के रंग में तो बदलाव कर सकते हैं लेकिन दिखेगी वो गाय ही.

कुल मिलाकर हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए सदियां लगाकर एक खिलौना बनाया है जिसके पूंछ हिलाने पर हम भावविभोर होते हैं और उसकी वफादारी की तारीफ करते हुए नहीं थकते हैं, जबकि हमें इस बात का इल्म तक भी नहीं है कि उसे इस पूंछ हिलाने का गुण हमने अपनी ही आत्मसंतुष्टि के लिए ही दिया है. आज जब कोरोना काल में हमारा वफादार और सबसे करीबी साथी सड़कों पर मारा मारा फिर रहा है और खाने के लिए हम इंसानों की तरफ लालसा से देख रहा है और जो उसे खाना खिला रहे हैं वो भी शायद ये बात नहीं समझ पा रहे हैं कि हमने आदमी के इस सच्चे दोस्त को फैक्ट्री में बनने वाला प्रोडक्ट बना दिया है.
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ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: May 23, 2020, 1:22 PM IST
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