हम 'पर्यावरण बचाओ' रटते रहेंगे और इसका मटियामेट करते रहेंगे

द्वीप पर पेड़ पौधे ब्लाइट (Blight) की वजह से खराब होने लगे हैं और द्वीप (Island) पर खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा है. ब्लाइट यानी आम बोल चाल में हम इसे पौधों का मुरझाना या कुम्लहाना समझ सकते हैं. वनस्पति विज्ञान में इसे 'क्लोरोसिस' कहते हैं. इस बीमारी में पौधे पर्याप्त मात्रा में क्लोरोफिल (Chlorophyll) नहीं बना पाते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 20, 2020, 11:15 AM IST
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हम 'पर्यावरण बचाओ' रटते रहेंगे और इसका मटियामेट करते रहेंगे
पौधो में मौजूद पानी भी तेजी के साथ वाष्पीकृत हो रहा है ऐसे में वनस्पति का मुरझाना लाजिमी है.
एक पोलेनेशियन आइलैंड (Polynesian Island) पर आदिवासियों का एक कबीला रहता है. इस कबीले के लोग समुद्र में नहीं उतरते हैं, क्योंकि कबीले के सरदार के मुताबिक समुद्र (Sea) के अंदर जाना जानलेवा है. कबीले के सरदार 'तुई' की एक बेटी है 'मोएना', जिसे समुद्र के अंदर जाने और दुनिया के बारे में पता करने की बहुत इच्छा है, लेकिन उसके पिता उसे कभी भी समुद्र के करीब नहीं फटकने देते. मोएना अपने माता-पिता की अकेली लड़की है इसलिए आगे चलकर उसे ही कबीले का सरदार बनना है. मोएना बार-बार समुद्र के अंदर जाने को होती है और उसका पिता उसे डपट देता है. इस तरह 16 साल बीत जाते हैं. मोएना की समुद्र में जाने की इच्छा और बलवती होती जाती है. और उधर इनके द्वीप पर पेड़ पौधे ब्लाइट (Blight) की वजह से खराब होने लगे हैं और द्वीप (Island) पर खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा है. ब्लाइट यानी आम बोल चाल में हम इसे पौधों का मुरझाना या कुम्लहाना समझ सकते हैं. वनस्पति विज्ञान में इसे 'क्लोरोसिस' कहते हैं. इस बीमारी में पौधे पर्याप्त मात्रा में क्लोरोफिल (Chlorophyll) नहीं बना पाते हैं. क्लोरोफिल वहीं पदार्थ है जो पत्तियों को हरा रखता है.

इसका नतीजा यह होता है कि पत्तियां पीली पड़ने लगती है और उनमें पोलिसिंथेसिस की प्रक्रिया नहीं हो पाती है जिसकी वजह से वे अपने लिए भोजन यानी कार्बोहाइड्रेट नहीं बना पाते हैं औऱ धीरे-धीरे मरने लगते हैं.कहानी आगे चलती है औऱ समुद्र जिसने मोएना का एक नाविक के तौर पर चुनाव किया है औऱ जो लगातार उससे बात करता है. वह उसे एक हरे रंग का पत्थर 'पोनामु' देता है.

पोनामु- दक्षिण न्यूजीलैंड में पाया जाने वाला एक तरह का कठोर पत्थर, जो न्यूजीलैंड क्षेत्र में पाई जाने वाली पोलेनेशियन प्रजाति माउरी, जो अब विलुप्त होने की कगार पर है. उनके बीच ये पत्थर बहुत अहमियत रखता है औऱ बहुमूल्य माना जाता है. इसे वो एक खजाने की तरह मानते हैं. पोनामु यानी हरा पत्थर आमतौर पर समुद्र में पहाड़ों के कटाव के बाद जो चट्टाने पाई जाती है उनमें पाया जाता है और ये आज भी बहुत दुर्लभ है, लेकिन मोएना के पिता उसे समुद्र में जाने की इजाज़त नहीं देते हैं. असमंजस में फंसी मोएना को उसकी दादी एक राज बताती है. दरअसल मोएना के पूर्वज नाविक थे और समुद्र में दूर दूर तक जाया करते थे. वे मछली पकड़ते थे, दूसरे द्वीप खोजते थे. चारों तरफ हरियाली थी. सभी कबीले के लोग एक देवी को मानते थे, जिनका नाम था 'ते फिति'.

'ते फिति' हरियाली की देवी है. एक दिन 'माउई ' नाम का एक अवतार (पोलेनेशियन पुराणों में माउई को एक रूप बदलने वाला अवतार माना जाता है) लालच में आकर 'ते फिति' का दिल चुरा लेता है, जो एक तरह का पोनामु पत्थर है. जब माउई उसे ले जा रहा होता है तभी कुछ दूसरे लोग उससे वो पत्थर छीन लेते हैं. और लड़ाई झगड़े में पत्थर या 'ते फिति' का दिल समुद्र में गिर जाता है औऱ किसी को नहीं मिल पाता है. धीरे-धीरे 'ते फिति' गायब हो जाती है औऱ पूरे समुद्री द्वीपों में हरियाली खत्म होने लगती है. वहीं दूसरी तरफ एक नई राक्षसनी पैदा हो जाती है जिसका नाम है 'ते का'.
पोलेनेशियन भाषा में 'ते का' का मतलब होता है जलनेवाला, 'ते का' किसी को नुकसान नहीं पहुंचाती है, वह 'ते का आइलैंड' पर चुपचाप रहती है. लेकिन वह भयानक गर्म है. और लगातार जलती रहती है. इस वजह से आसपास का माहौल गर्म होता जा रहा है और पेड़-पौधे बीमार पड़ते जा रहे है. इसलिए सभी इंसानों को लगता है कि 'ते का' ही वो वजह है जिसने इंसानों की जिंदगी से हरियाली और भोजन छीन लिया है. मोएना को 'ते का आइलैंड' पर जाकर इस दिक्कत से छुटकारा पाने के लिए समुद्र जिम्मेदारी देता है औऱ साथ में 'ते फिति' का दिल भी उसके पास होता है. जो उसे वहां मृत पड़ी 'ते फिति' को सौंपना है. जिससे 'ते फिति' फिर से जीवित हो जाए औऱ 'ते का' का आंतक समाप्त हो. साथ ही हरियाली लौट सके.

अपनी दादी के कहने पर वो समुद्र में निकल पड़ती है और वहां पर उसे माउई मिलता है. काफी बहस मुबाहिसे के बाद वो उसका साथ देने को राजी हो जाता है और अंत में जब मोएना 'ते फिति' का दिल लेकर पहाड़ पर चढ़ती है ताकि 'ते फिति' को उसका दिल लौटा सके तो वो पाती है कि 'ते फिति' तो वहां है ही नहीं. मोएना हैरान रह जाती है. तभी उसकी नज़र 'ते का' पर पड़ती है. वो देखती है कि 'ते का' के दिल वाली जगह पर ठीक वैसा ही निशान है जैसा उसके हाथ में मौजूद हरे रंग के पत्थर या दिल में हैं. वो समझ जाती है कि 'ते का' ही 'ते फिति' है और दिल निकाल लिए जाने की वजह से वो अपना अस्तित्व भूल चुकी है. मोएना 'ते का' को दिल या हरा पत्थर उठा कर दिखाती है. 'ते का' दौड़ती हुई उसके पास पहुंचती है. माउई को लगता है कि हमारी सारी मेहनत बरबाद हो जाएगी और 'ते का' वो दिल ह़ड़प लेगी. लेकिन मोएना उसके दिल वाली जगह पर हरा पत्थर लगा देती है और इस तरह से ते फिति फिर से अपने रूप मे लौट आती है.

आप सोच सकते है कि इस कहानी को इतना विस्तार में बताने की क्या ज़रूरत है. हो सकता है कि आपमें से कई लोगों ने ये फिल्म देखी भी होगी. दरअसल हमें ये समझना होगा कि हम ही हैं जिसने धरती के दिल को चुरा लिया है और उसे जलने के लिए छोड़ दिया है. खास बात ये है कि हम भी उस पोलेनेशियन निवासियों की तरह जलती हुई धरती को अपनी बरबादी का ज़िम्मेदार मान रहे हैं. अभी हाल ही में एक खबर आई कि अमेरिका के पूर्वी कैलिफोर्निया के रेगिस्तानी इलाके जिसे डैथ वैली के नाम से भी जाना जाता है. वहां तापमान 53.3 डिग्री तक जा पहुंचा. ये धरती पर रिकॉर्ड किया गया सबसे अधिक तापमान था. मौसम में आई तब्दीली की वजह से अमेरिकी मौसम विभाग ने दक्षिण अमेरिका में रहने वाले 5 करोड़ लोगों को तेज गर्मी और लू से बचने के लिए चेतावनी जारी की है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कार्बन उत्सर्जऩ इसी तरह बढ़ता रहा तो 2030 तक घाटी का तापमान 60 डिग्री तक पहुंच सकता है.कैलिफोर्निया का ये रेगिस्तान करीब पौने तीन हज़ार किलोमीटर में फैला हुआ है. इसके आस-पास मौजूद बोर्गर, टेक्सास, एमारिलो, फोनिक्स, रोजवेल औऱ न्यू मैक्सिको में भी तापमान 40 से 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. जो सामान्य से दो डिग्री अधिक है. गौर करने वाली बात यह है कि डैथ वैली का तापमान इससे पहले 1913 में 56 डिग्री पहुंचा था. यानी आज से 100 साल पहले. यह वही वक्त था जब विश्व ने एक महामारी का सामना किया था. आमतौर पर गर्म रहने वाली डैथवैली के तापमान में कार्बन उत्सर्जन ने 600 गुना इज़ाफा किया है. यही नहीं साइबेरिया जैसे कोल्ड डेजर्ट मे भी तापमान में 5 डिग्री का इज़ाफा देखने को मिला है. इसके पीछे भी ग्रीन हाउस गैसों का ही हाथ है और वहां लगी आग से जो 11.5 लाख हेक्टेयर में मौजूद जंगल जले उसे करीब 5.6 करोड़ टन कार्बन का उत्सर्जन हुआ जिसने पूरे साइबेरिया को राख से ढंक दिया था.

सरकारें जंगल काटती रहेंगी, पेड़ लगाती रहेगी. हमारी कथित चिंता कोरी लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं.
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वनस्पति से गायब होती पोषकता
2014 मे हुई एक शोध के बताती है कि वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड बढ़ने की वजह से गेंहू, चावल, सोयाबीन मक्का जैसी फसलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन के स्तर में 3 से 17 फीसद की कमी देखने को मिली है. इस तरह वनस्पति से पोषकता का घटना चिंता का विषय है, खासकर उन गरीब औऱ विकासशील देशों के लिए जो पहले से ही कुपोषण की मार झेल रहे हैं. दुनिया भर में कुपोषण से ग्रसित बच्चों की संख्या दो सौ करोड़ के करीब पहुंच चुकी है. वहीं हर साल करीब 6 करोड़ बच्चे आयरन औऱ जिंक की कमी से मौत का शिकार हो जाते हैं. वहीं 225 तरह के खाद्य पदार्थों पर की गई एक शोध बताती है कि जिस तेजी के साथ हम चल रहे हैं उस हिसाब से 2050 आते आते तक 450 पार्ट्स पर मिलियन की मात्रा में पाया जा रहा कार्बन डाइ ऑक्साइड बढ़कर 550 पार्ट्स पर मिलियन तक पहुंच जाएगा.

इसका क्या मतलब है
इस शोध में आ रहे आंकड़ों का मतलब है कि और ज्यादा कुपोषण और ज्यादा आयरन और जिंक की कमी के शिकार बच्चे, यानी एक ऐसा समाज जो कमज़ोर इम्यूनिटी के साथ बढ़ेगा. गौर करने वाली बात ये है कि कोरोना काल में जब हम वायरस के साथ तालमेल बैठाने में लगे हुए हैं. तब भी पूरे विश्व के वैज्ञानिक एक बात को लेकर एकमत हैं, वो है मजबूत प्रतिरोधात्मक क्षमता यानी स्ट्रांग इम्यूनिटि. वैज्ञानिकों को अभी तक ये तो पता नहीं चल पाया है कि कार्बन बढ़ने से पौधों की पोषकता पर असर क्यों पड़ रहा है लेकिन शोध से ये बात समझ आई है कि तापमान मे बढ़ोतरी इसकी एक वजह हो सकती है. क्योंकि उससे पौधो की फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ रहा है. और चूंकि वातावरण से नमी घटती जा रही है, साथ ही पौधो में मौजूद पानी भी तेजी के साथ वाष्पीकृत हो रहा है ऐसे में वनस्पति का मुरझाना लाजिमी है.

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मोएना ही गले में घंटी बांध सकती है
यहां कार्बन उत्सर्जन को लेकर जो बात लिखी है, वो हज़ारों बार अलग अलग जगह लिखी जा चुकी होगी. वातावरण में बढ़ रही गर्मी से हम सब त्रस्त हैं ये बात भी किसी से छिपी नहीं है. लेकिन जब हम इसके समाधान की बात पर आते हैं तो पूरे विश्व में मौजूद सरकारों की स्थिति उस बुजुर्ग चूहे की तरह हो जाती है जो बिल्ली से बचाव के लिए उसके गले में घंटी बांधने की सलाह देता है. खास बात ये है कि आज तक ना बिल्ली के गले में घंटी बंधी और ना ही चूहों का मरना कम हुआ. चूंकि हम जो बात कर रहे हैं वो हमारे संस्कार में नहीं हैं. हम पर्यावरण बचाओ रटते रहेंगे और साथ में उसका मटियामेट भी करते रहेंगे. सरकारें जंगल काटती रहेंगी और पेड़ लगाती रहेगी. इस तरह हमारी कथित चिंता कोरी लफ्फाजी के अलावा कुछ नहीं रह जाती है. ऐसे में जो नई पीढ़ी है. वही है जो मोएना बनकर 'तेका' को 'ते फिति' में बदल सकती है. इसलिए वक्त आ गया है कि हम धरती की ज़िम्मेदारी मोएना को सौंप दें.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: July 20, 2020, 10:29 AM IST
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