आजाद भारत हो या गुलाम भारत, गंदगी तो ‘नीचा नगर’ की ओर ही बहती है

दिल्ली और हरियाणा सीमा से लगा हुआ गांव रावता की सैंकड़ों एकड़ ज़मीन गटर से निकले मटमैले पानी औऱ बदबू से पट गई है.1000 एकड़ खेत का करीब 70 फीसद आज गटर के पानी में डूबा हुआ है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 25, 2020, 2:08 PM IST
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आजाद भारत हो या गुलाम भारत, गंदगी तो ‘नीचा नगर’ की ओर ही बहती है
दिल्ली और हरियाणा सीमा से लगा हुआ गांव रावता मटमैले पानी औऱ बदबू से पट ग गया है.(फाइल फोटो)
एक शहर है जो दो भागों में बंटा हुआ है, एक ऊंचा नगर जहां संभ्रांत वर्ग के लोग रहते हैं औऱ दूसरा है नीचा नगर जहां मज़दूर तबका रहता है. शहर में एक सरकार नाम का बेइमान बिल्डर रहता है वो ऊंचा नगर के पास से बहने वाले नाले को नीचा नगर की ओऱ मोड़ने की पहल करता है ताकि अमीर तबके के लिए सुंदर और अच्छी कॉलोनी का निर्माण किया जा सके.

नीचा नगर के लोग इस बात का विरोध करते हैं लेकिन सरकार उनमें से कुछ लोगों को अपने साथ मिला लेता है और सरकारी विभाग के लोगों को भी लालच देकर अपनी तरफ कर लेता है. इस तरह साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ अपनाकर नाले का रुख नीचा नगर की तरफ कर दिया जाता है, जिससे वह पूरा इलाका बीमारी की चपेट में आ जाता है और कई लोगों की मौत हो जाती है. खलनायक खुद को नीचा नगर का हिमायती बताने के लिए वहां एक अस्पताल भी खुलवाता है लेकिन कहानी के नायक के कहने पर पूरा नीचा नगर अस्पताल का विरोध करके मरना मंजूर करता है और आखिर जीत नीचा नगर की होती है.

फिल्म में एक जगह पर खलनायक को यह कहते हुए देखा जाता है कि नीचा नगर के लोग बेवजह हंगामा कर रहे हैं, वो कोई नाला थोड़े ही है, वो तो एक नहर है जिससे नीचा नगर में रहने वाले मवेशी पानी पी सकेंगे, खेतों को पानी दिया जा सकेगा और इस तरह नाले को नहर सिद्ध कर दिया जाता है.

1946 में हयातुल्लाह ख़ान की कहानी पर बनी फिल्म नीचा नगर की कहानी इतने सालों के गुज़र जाने के बाद आज भी मौजू लगती है. क्योंकि वक्त तो गुज़रा लेकिन हमारी फितरत नहीं बदली है.
दरअसल दिल्ली और हरियाणा सीमा से लगा हुआ गांव रावता की सैंकड़ों एकड़ ज़मीन गटर से निकले मटमैले पानी औऱ बदबू से पट गई है. यहां के करीब 5000 निवासी गुरुग्राम से आ रही बदबूदार गंदगी के बीच रहने को मजबूर हैं क्योंकि नजफगढ़ नाले पर बाउंड्री वॉल नहीं बन पाई है. ये समस्या आज की नहीं है बल्कि 20 सालों से यहां के निवासी इस दिक्कत को झेल रहे हैं औऱ बीते दो दशकों में बस इतना ही हुआ कि समस्या दिन पर दिन बढ़ती गई. बीते सालों में इस बदबूदार पानी ने 120 एकड़ खेती की ज़मीन को लील लिया और अब तो ये पानी लोगों के घरों के अंदर तक घुसने लगा है. 1000 एकड़ खेत का करीब 70 फीसद आज गटर के पानी में डूबा हुआ है. इसी का नतीजा है कि 700 एकड़ ज़मीन पर लगाए गए धान के खेत गुरुग्राम से आ रहे सीवेज के पानी से बर्बाद हो चुके हैं.

अगर एक बार औऱ तेज़ बारिश हुई तो ये गंदगी लोगों के घरों के अंदर घुस जाएगी. इस वजह से लोगों की त्वचा पर विकार पैदा होने लगे हैं. इसके अलावा डेंगू जैसी जलजनित बीमारियों के पनपने का खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है. खास बात ये है कि जिस जगह की बात हो रही है वो देश की राजधानी और सबसे सपंन्न शहरों में से एक गुरुग्राम के बीच में है.
यूं तो स्वच्छ भारत अभियान ज़ोर शोर से जारी है लेकिन अभी भी ऐसे अधिकांश इलाकों के लिए यह अभियान दूर की कौड़ी नज़र आता है. दरअसल शहर हो या गांव, मलिन बस्तियों को लेकर हमारी मानसिकता कुछ इसी तरह की हो गई है गोया गंदा रहना इन बस्तियों की नियति हो. स्वच्छ भारत अभियान जैसी स्वच्छ पहल भी यहां आकर नाकाम सी लगती है.


सोचिए क्या वजह है कि अधिकांश सफाई कर्मचारी जो पूरे शहर को सुबह सुबह अपनी झाड़ू से बुहार कर रहने लायक बनाते हैं, उनकी खुद की बस्ती उतनी साफ सुथरी क्यों नहीं रह पाती है. बीते दिनों स्वच्छ भारत अभियान के तहत ही अमिताभ बच्चन का एक सरकारी विज्ञापन आया था जिसमें वह बीमारी बंद करने के लिए दरवाज़ा बंद करने की बात करते हैं. हालांकि बच्चन तो शौच के लिए ‘दरवाज़ा बंद’ करने की बात कह रहे हैं लेकिन यह लाइन इन नज़रअंदाज किए गए गांवो और मलिन बस्तियों की तरफ सालों से चले आ रहे प्रशासनिक रवैया पर भी काफी फिट बैठती है. ऐसा लगता है मानो मलिन बस्तियों की तरफ खुलने वाले दरवाजों को हमने हमेशा के लिए बंद कर दिया है और जो परेशानियां वहां पर हैं वो उसके आसपास के ऊंचा नगर में बनने वाली ऊंची इमारतों की आड़ में दिखना भी बंद हो जाए.या यूं कहें कि शायद दिखना बंद भी हो गया है. वैसे भी अगर देखा जाए तो नीचा नगर या ऊंचा नगर एक फितरत है जो बहते हुए नाले में नहीं विचारधारा में भी नज़र आती है. इस देश में रहने वाला एक तबका ऐसा है जो ये मानता है कि मलिन बस्तियों में रहने वाले जैसे रह रहे हैं, वैसे रहने के पीछे उनकी तकदीर है और उनकी खुद की गलतियां है.

ज्यादा वक्त नहीं गुज़रा, हरियाणा के फतेहाबाद की एक छात्रा ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिख कर अपने गांव का नाम बदलने की गुज़ारिश की है. उसके गांव का नाम ‘गंदा गांव’ हैं जहां के लोग कई सालों से अपने गांव का नाम बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं.


ब्रिटिश काल में गांव में गंदगी देख कर उसका नाम गंदा गांव कर दिया गया था. शासन ने भी इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई क्योंकि वो इसे उसकी नियति मान कर बैठे हैं. भोपाल शहर में गंदी बस्ती निर्मूलन मंडल का बोर्ड लगने के बाद वहां बसी हुई मलिन बस्ती का नाम गंदी बस्ती पड़ गया. अपार गंदगी को समेटे हुए गंदी बस्ती पिछले तीन दशकों से बसी हुई है. वहीं भोपाल में ही सफाई कर्मचारियों के लिए बनी हुई नेहरू कॉलोनी का नाम भंगी कॉलोनी कर दिया गया. सरकारी कागज़ों में भले ही उसे नेहरू कॉलोनी कहा जाता हो लेकिन उसकी पहचान भंगी कॉलोनी के नाम से ही है. वहां बसी हुई एक कुलीन कॉलोनी का नाम जहां द्वारका कॉलोनी है वहीं मलिन बस्ती को सुदामा नगर के नाम से पहचान मिली हुई है।

ऐसे ना जानें कितने उदाहरण होंगे जो ये साबित करते हैं कि हर शहर में कई शहर बसते हैं और उन शहरों में एक खास शहर होता है जिसकी तीमारदारी करने के लिए पूरा तंत्र मौजूद रहता है. किसी नगर का ऊंचा होना गलत नहीं है. वहां सफाई रहना, उसका चमकदार होना भी अच्छा है. लेकिन वहां से निकलने वाले नाले का रुख जब किसी नीचा नगर की तरफ मोड़ दिया जाता है या गुरुत्वाकर्षण बल का तर्क देकर नाले के नीचा नगर की तरफ गिरने को नियति मान लिया जाता है तो यह किसी भी अभियान को स्वच्छ नहीं रहने देती.

ये लेख लिखते तक दक्षिण पश्चिम दिल्ली के गांव रावता की परेशानी को सरकार समझ चुकी है और अब वो नुकसान का आकलन करने में लगी हुई है जिससे मुआवज़ा तय किया जा सके. हालांकि गांव वालों को हर साल होने वाली इस परेशानी से निजात दिलाने की कोई बात नहीं कही गई. कुल मिलाकर गुरुग्राम की अट्टालिकाओं की गंदगी आती रहेगी, गांव के लोग भुगतते रहेंगें, फसल तबाह होती रहेगी और सरकार मुआवज़ा देती रहेगी. वैसे भी जान हो, सम्मान हो या फिर खेतों में लहलहाता धान हो. सरकार ने सबका मुआवज़ा तय कर रखा है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: August 25, 2020, 2:08 PM IST
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