डैम के इस पार का सच कौन दिखाएगा

सरदार सरोवर डैम के जलग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश के कारण बांध 75 फीसद भर गया है. इससे दुनिया की सबसे लंबी पक्की सिंचाई नहर (नर्मदा) में 17 हज़ार करोड़ लीटर पानी हो चुका है. जो क्षमता का 77 फीसद है. 458 किलोमीटर लंबी केनाल सरदार सरोवर डैम के पास से ही शुरू होती है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 18, 2020, 7:47 PM IST
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डैम के इस पार का सच कौन दिखाएगा
साबरमती का जो सच बताया नहीं गया वो कुछ और है. (सांकेतिक तस्वीर)
रात के 11 बज चुके हैं. बीच सड़क पर तेज आवाज़ में गाना बज रहा है, शहर के पुलिस मुखिया शराब के नशे में मदमस्त हो कर नाच रहे हैं. साथ में और भी तमाम छुटभैये नेता मस्त हैं. पब्लिक झूम रही है, सब नशे में चूर हैं, किसी का भी बच पाना मुश्किल लग रहा है, गाने का शोर बढ़ता जा रहा है. अचानक गाना बंद हो जाता है. शहर में नए-नए आए ईमानदार पुलिस वाले ने म्यूजिक सिस्टम का तार उखाड़ दिया है. छुटभैये नेताओं सहित, पब्लिक गुस्से में आ जाती है. एक नेता पुलिस वाले से बदतमीजी करते हुए पूछता है कि उसकी हिम्मत कैसे हुई गाना बंद करने की, पुलिसवाला उसमें एक थप्पड़ रसीद करता है औऱ उससे पूछता है कि क्या उन लोगों के पास रात में 11 बजे के बाद गाना चलाने की परमिशन है. छुटभैये ने परमिशन जैसा शब्द पहली बार सुना है. वो कहता है ‘आज भैया जी की शादी की सालगिरह है’. पुलिस वाला उससे गाना बजाने की परमिशन मांग रहा है और वो भैया जी की शादी की सालगिरह के बारे में बता रहा है, क्योंकि उसकी नज़र में अगर भैया जी के यहां खुशी की बात है तो जनता को खुश होना है, सबको नाचना है, इसमें परमिशन कहां से आ गई. शूल फिल्म के इस दृश्य को हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि अक्सर ऐसा होता है कि जब कोई व्यक्ति ऊंचे ओहदे पर पहुंचता है तो बहुत सारी ज़िम्मेदारियॆं का बोझ उसके कंधों पर होता है. ऐसे में वो उनके भरोसे होता है जो उसके साथ काम कर रहे हैं. औऱ नीचे की जमात ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति को सिर्फ अच्छा दिखाना पसंद करती है. छुटभैये नेता तो ऐसे मौके पर पूरी तरह अपना राज मान कर चलने लगते हैं. वो इस बात की फिक्र करना भी छोड़ देते हैं कि इससे उस व्यक्ति की गरिमा को भी ठेस पहुंच सकती है जिसके बलबूते पर वो इतरा रहे हैं. और कभी कभी जानते हुए भी उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को कुछ बातों को नज़र अंदाज करना पड़ता है.

बधाई हो, हमारी बनाई नदी भर गई है
ये सब कहानी इसलिए क्योंकि सरदार सरोवर डैम के जलग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश के कारण बांध 75 फीसद भर गया है. इससे दुनिया की सबसे लंबी पक्की सिंचाई नहर (नर्मदा) में 17 हज़ार करोड़ लीटर पानी हो चुका है. जो क्षमता का 77 फीसद है. 458 किलोमीटर लंबी केनाल सरदार सरोवर डैम के पास से ही शुरू होती है. गुजरात की लाइफलाइन कही जाने वाली इन नहर से एक तरफ के 10 हज़ार गांवो को पानी मिलता है, इस नहर से खेती लायक ज़मीन की 15 फीसद हिस्सा सींचा जाता है. प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए गुजरात सरकार ने सरदार सरोवर को पूरी क्षमता तक भरने की ऐसी जिद ठान ली है कि उसके दरवाजे नहीं खोले गए और नतीजतन मध्यप्रदेश के बड़वानी औऱ धार जिले के करीब 45 गांव पूरी तरह नष्ट हो गए. निसरपुर, राजघाट, चिखल्दा आदि तो बड़े कस्बे हैं औऱ यहां कई दिनों से 8-10 फुट पानी भरा हुआ था. अब जरा पिछले साल की बात करते हैं.

एक दृश्य जो दोहराया जा रहा है
पिछले साल जब गुजरात के केवड़िया जिले में लोग खुशियों के झूम रहे थे. जब सरदार सरोवर बांध तिरंगे की रोशनी में जगमगा रहा था. जब गुजरात के लोग नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के लबालब भरे जाने पर नर्मदा मैया को धन्यवाद दे रहे थे. उस वक्त केवड़िया में अपना 69वां जन्मदिन मनाने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ‘कौन कहता है कि प्रकृति और विकास साथ-साथ नहीं चल सकता. सरदार सरोवर बांध इसका जीता जागता उदाहरण है’. बांध के आसपास विकसित किये गए बटरफ्लाई पार्क में उड़ती तितलियां देखकर लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था औऱ ठीक उसी वक्त सरदार सरोवर बांध के पीछे जहां से नर्मदा चल कर गुजरात में पहुंचती है यानि मध्यप्रदेश, वहां पर लोगों के ठिकाने छिन गए थे. दोनों ही तरफ एक ही पार्टी की सरकार थी और है लेकिन हैरानी की बात ये है कि फिर भी करीब 30000 लोग ऐसे थे जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था .

जानी मानी समाजसेवी मेधा पाटकर ने नर्मदा बांध की वजह से विस्थापित लोगों के समर्थन में 25 अगस्त से अनिश्चिकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. लेकिन उनकी आवाज़ कौन सुनता है वो तो वैसे भी बीते 34 वर्षों से नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले सरदार सरोवर बांध की वजह से विस्थापित हुए लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. जिसका नतीजा बस इतना निकला है कि वो एक विकास विरोधी तत्व बन कर रह गई हैं.

उधर, डूब क्षेत्र को लेकर गुजरात सरकार का कहना था कि उन्होंने नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी (एनसीए) के किसी दिशानिर्देश का उल्लंघन नहीं किया है. एनसीए के आदेशों के तहत ही बांध का जलस्तर बढ़ाया गया है. गौरतलब है कि इस बार बांध का जलस्तर 138.68 मीटर हो गया है. दो साल पहले बने इस बांध का जलस्तर क्षमता के अनुसार पहली बार सबसे अधिक भरा हुआ है. पीएम मोदी ने साल 2014 में पदभार संभालते ही बांध पर दरवाजा लगाने की मंजूरी दिलाई थी. गुजरात का सीएम रहते हुए उन्होंने बांध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए 51 घंटे का उपवास भी किया था. और अपने जन्मदिन के दिन ही यानि 17 सितंबर 2017 को उन्होंने इस बांध का उद्घाटन किया था.जिस तरह से मध्यप्रदेश के निवासियों की अनदेखी करते हुए सरदार सरोवर के गेट बंद रखे गए और हज़ारों लोगों की जिंदगी को दांव पर लगाया गया. उससे साफ था कि गुजरात सरकार बांध को लबालब भरकर प्रधानमंत्री को खुश करना चाहती थी औऱ है. . सरदार सरोवर के लबालब भर जाने से जहां गुजरात के लोगों की पानी की दिक्कत खत्म हो गई है वहीं मध्यप्रदेश में रहने वाले 30000 लोगों की जिंदगी में दिक्कतों का सैलाब आया हुआ था.

उत्सव अभी बाकी है
बीते कुछ सालों से बारिश का पैटर्न बदला है, जिसकी वजह से बारिश अब पूरे मौसम ना होकर कुछ दिन की रह गई है. और जब बारिश होती है तो लगातार होती है, तेज होती है. इस साल लॉक़डाउन की वजह से उद्योग धंधे बंद रहे जिसके वजह से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल नहीं हुआ. ये भी एक वजह थी की डैम पहले से ही कम खाली हुए थे. और इच्छाशक्ति की कमी से जूझती सरकारों से नदियों को पानी देते नहीं बना. बारिश ने अपना रूप दिखाया और मानव निर्मित नदियां भरी हुई दिखने लगी. इसी के चलते गांधीनगर के संत सरोवर से 10 हज़ार क्यूसेक पानी छोड़ा गया. जिससे अहमदाबाद में साबरमती और नर्मदा नदी का संगम हो गया. साबरमती नदी जो अहमदाबाद के बीच से गुजरती है उसे नर्मदा योजना के तहत बनी नहर से साल भर पानी मिलता है. नर्मदा के पानी को नदी तक पहुंचाने के लिए कराई के पास एक सायफन का एस्केप ( एक तरह की रचना) बनाया गया है. बारिश ज्यादा हुई, डैम को खोला गया नहीं था, संत सरोवर –गांधीनगर से साबरमती में पानी छोड़ना शुरू किया गया औऱ इस तरह से ऐसा महसूस करा दिया गया कि दो नदियों का संगम हो गया है.

क्या है संत सरोवर या साबरमति का सच
दरअसल साबरमती का जो सच बताया नहीं गया वो कुछ और है. उदयपुर के पास अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाली ये नदी खंबात की खाड़ी में गिरती है. 370 किलोमीटर लंबी इस नदी पर 1978 में धारोई में एक डैम बनाया गया जिससे 165 किलोमीटर लंबे नदी के प्राकृतिक बहाव को पूरी तरह रोक दिया गया. इसके बाद लगातार बनते उद्योगों, शहरी प्रदूषण और तमाम तरह की नदी को बीमार करने वाली वजहों से नदी के निचले बहाव को पूरी तरह से बरबाद कर दिया. फिर बारी आई दिखाने वाले सच की तो नदी के 10.5 किलोमीटर लंबे एक टुकड़े को साफ सुथरा बनाया गया, ठीक उसी तरह जैसे घाट बना कर गंगा की सफाई की दुहाई दी जा रही है. इस 10.5 किलोमीटर के टुकड़े पर दोनों तरफ कंक्रीट के बाड़े बना दिए गये और 330-380 मीटर चौड़े पाट को समेट कर 275 पर ला दिया. इससे नदी लबालब दिखने लगी. फिर इसी के पास स्टेच्यू ऑफ यूनिटी बनाया गया. फिर साबरमती नाम के स्वीमिंग पूल में नर्मदा पर बने एक और डैम सरदार सरोवर के कैचमेंट वॉटर में - जो मगर पल रहे थे - उन्हें उठा कर डाल दिया गया. इस तरह से मगरों को ये अहसास कराया गया कि दरअसल वो जिस नदी या तालाब (जो भी कहें) को अपना मान कर चल रहे थे वो दरअसल उन्हें लीज पर दिया गया था. लीज पूरी हो जाने पर उनसे वो ले लिया गया और चूंकि उनकी इजाजत की ज़रूरत तो थी नहीं, तो उनके बसे बसाए घर को उजाड़ कर उनके लिए दूसरा घर बसा दिया गया. इस तरह भारत की पहली मानव निर्मित नदी का सच छिपा कर उसे भारत की सबसे साफ सुथरी नदी बताया गया. और हकीकत ये है कि दिखाया जा रहा है वही सच माना जाता है.
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: September 18, 2020, 7:47 PM IST
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