बंगाल चुनाव के लिए क्या ‘भैरी’ में उतरेंगे ‘दीदी’ और ‘मोदी’ जी

West Bengal Assembly Elections: जैसे-जैसे शहर बढ़ता गया तो एक समस्या भी विस्तार लेने लगी, बरसात के समय बाढ़ आती तो हुगली में खुलने वाली नालियां उल्टी बहने लगती और पूरा शहर गंदगीमग्न हो जाता. ईस्ट इंडिया कंपनी ने शहर की गंदगी को निकालने के लिए कुछ नहर नुमा आकृतियां बनाई जो शहर की गंदगी को लेकर ढाल की तरफ

Source: News18Hindi Last updated on: March 12, 2021, 4:51 PM IST
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बंगाल चुनाव के लिए क्या ‘भैरी’ में उतरेंगे ‘दीदी’ और ‘मोदी’ जी
बंगाल चुनाव में सौ साल पुरानी इस व्यवस्था को जारी रखना प्रधानमंत्री मोदी और दीदी दोनो के लिए अहम हो सकता है.
हर शहर को एक नदी चाहिए, पानी के लिए, और अपनी गंदगी को बहाने के लिए, लेकिन कोलकाता भारत का एकमात्र शहर है, जहां शहर की गंदगी यानि सीवेज को किसी नदी में नहीं डाला जाता है. ऐसा नहीं है कि यहां की गंदगी नदी में जाती नहीं है, हुगली नदी में शहर की गंदगी जाती है, लेकिन चोरी-छिपे वो भी बहुत कम मात्रा में. खास बात ये है कि कोलकाता में किसी तरह का कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया गया है. फिर भी सौ सालों से यहां पर गंदगी निस्तारण बखूबी किया जा रहा है. यही नहीं कोलकाता की गंदगी को संभालने की यह व्यवस्था, सब्जी, तुलसी, सनफ्लॉवर सहित बड़े पैमाने पर मछली भी देती है. लेकिन 30000 हज़ार एकड़ में फैली इस व्यवस्था को धीरे-धीरे भूमाफिया लील रहे हैं. इस दलदली ज़मीन पर कब्जे की कहानी तो वामदल के काल से शुरू हो गई थी. उस दौरान भूमाफिया को लगा कि मछली पालन से ज्यादा फायद धान की खेती में होगा, इसी सोच के साथ यहां की ज़मीन को पाटना शुरू किया गया. लेकिन कुछ ही वक्त में यहां के बाशिंदो को इल्म हुआ कि धान से ज्यादा फायदा मछली देती है.

तो आगे ज़मीन को  भरना रुका. अब ये ज़मीन  बिल्डरों के कब्जे में जाती जा रही है. और जो जगह भारत के सबसे बड़े शहर की गंदगी बगैर एक रूपया खर्च किये ना सिर्फ साफ करती है बल्कि उसके एवज में कुछ देती भी है. वही ज़मीन अब इमारतों से घिरती जा  रही है. यही नहीं शहर से आने वाली गंदगी के साथ जो प्लास्टिक और चमड़ा आता है. उसे भी निकालकर यहां पर प्लास्टिक ग्रेन्यूल बनाने का काम किया जाने लगा है. जिससे ये जगह भी खराब होती जा रही है. खास बात ये है कि यहां पर काम करने वाले मछुआरे सरकार से किसी तरह का रहम या ग्रांट नहीं मांग रहे हैं, उनका बस इतना कहना है कि इस व्यवस्था को खराब नहीं किया जाए और उन्हें उनका काम करने दिया जाए. लेकिन ज़मीन का लालच किसी भी लालच के ऊपर है. इसी लालच ने पूरी दुनिया को एक ऐसे अजीब से विकास की दौड़ में ला खड़ा किया है जहां सब भाग रहे हैं और कोई कहीं नहीं पहुंच रहा है.

ऐसे में बंगाल चुनाव में सौ साल पुरानी इस व्यवस्था को जारी रखना प्रधानमंत्री मोदी और दीदी दोनो के लिए अहम हो सकता है. साथ ही इस व्यवस्था को संभाले रखना प्रकृति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है.

शुरुआत की कहानी
कोलकाता में मैले पानी की सफाई का तरीका एकदम अनूठा और पूरी तरह प्राकृतिक है. शहर के पूरब में कोई 30,000 एकड़ में फैले तालाब और खेत कोलकाता के कुल मैले पानी का दो तिहाई हिस्सा साफ करते हैं. इस इलाके में सैकड़ों साल पहले एक नदी बहा करती थी, विद्याधरी. धीरे-धीरे नदी पटती गई और 18वी सदी में जब अंग्रेज यहां पर आए तो शहर के पूरब में खारे पानी का विशाल दलदल था, जिसे अंग्रेज सॉल्ट लेक कहते थे. जब गंगा ने अपना रास्ता बदलना शुरू किया तो पूरब की नदियों को पानी मिलना बंद हो गया और धीरे-धीरे यहां की जमीन दलदली होती गई. खारे पानी का ये दलदल मछलियों, पक्षियों और मच्छरों को पनपने का मुफीद माहौल देता था. मच्छरों के डर से अंग्रेज तो इस इलाके से दूर बस गए लेकिन मछुआरे इस जगह आकर रहने लगे.

जैसे-जैसे शहर बढ़ता गया तो एक समस्या भी विस्तार लेने लगी, बरसात के समय बाढ़ आती तो हुगली में खुलने वाली नालियां उल्टी बहने लगती और पूरा शहर गंदगीमग्न हो जाता. ईस्ट इंडिया कंपनी ने शहर की गंदगी को निकालने के लिए कुछ नहर नुमा आकृतियां बनाई जो शहर की गंदगी को लेकर ढाल की तरफ यानि पूरब की तरफ माटला नदी में मिल जाती थी. और साल्ट लेक के दलदल से होती हुई माटला नदी विद्याधरी नदी में मिल जाती थी. ये नदी सुंदरबन से होती हुई बंगाल की खाड़ी में बहती थी.

सीवेज ट्रीटमेंट का अनूठा तरीका1810 में  पहली बार इस व्यवस्था को कायम करने पर काम  शुरू हुआ. 75 साल बाद शहर से निकालने के लिए कई नालियां बनाई गई और उनके बहाव को नियंत्रित करने के लिए स्लूस गेट भी लगाए गए. इसका एक नतीजा ये निकला कि विद्याधरी नदी 1928 तक आते-आते मृत घोषित कर दी गई. लेकिन शहर की गंदगी बहती रही और उन्हें दो अलग अलग जगह से लाया गया. शहर का सीवेज लाने वाले नाले को ‘टाउन हेड कट’ और जो नाला ग्रामीण अंचलो या बस्तियों की गंदगी लाता था उसे ‘सब अरबन हेड कट’ कहा जाता है. इन दोनों बहावों को  दो नहरों के जरिए इस दलदली इलाके में लाया गया. इन दो मुख्य नहरों को ‘ड्राय वेदर फ्लो’ और ‘स्टॉर्म वेदर फ्लो ’ कहा जाता है. इन दोनों गंदगी के नालों का नाम इनके बहाव के आधार पर रखा गया है. बारिश के मौसम में जब पानी बढ़ जाता है तो स्टॉर्म वेदर फ्लो से बहाव को नियंत्रित किया जाता है और इसके पानी को ड्राय वेदर फ्लो की तरफ मोड दिया जाता है. शहर के बहाव को नियंत्रित करने के लिए एक बांध बनाया गया जिसमें 10 गेट हैं. यहां एक स्केल लगाया गया है. जब बहाव ज्यादा हो जाता है और 9 फीट से बढ़ जाता है तो पानी अपने आप ग्रेविटी के जरिये 10 वें गेट से फिशिंग फीडर कैनाल में चला जाता है.

इन दोनों नालों को इस 30000 एकड़ के क्षेत्र में कई अलग अलग नहरों में बांट दिया जाता है. इन नहरों से आने वाला पानी स्थानीय मछुआरे एक पोखर में एकत्रित कर लेते हैं. पोखरों में  बड़े स्तर पर मछली पालन किया जाता है. बांग्ला भाषा में इन्ही पोखरों को ‘भैरी ’ कहा जाता है.

पुराने समय में इन नहरों से आने वाले पानी की जो उपधाराएं निकलती थी, उनकी ज़मीदारी होती थी. इन उपधाराओं को ज़मीदार के नाम से ही जाना जाता था. जैसे घोषेर खाल यानि घोष की खाल (नहर).

 पोखर या भैरी का विज्ञान
कहते हैं दुनिया में आज तक हुए सभी महान अविष्कारों में से ज्यादातर दुर्घटनावश हुए. या यूं कहिए किसी ने सोचा नहीं था और हो गया, आर्कमिडीज जब नहाने के लिए टब में उतरे तब उन्हें घनत्व का सिद्धांत मिला. बल्ब से लेकर डायनामाइट तक के अविष्कार के पीछे मंशा कुछ और थी और हुआ कुछ और. 1940 में कोलकाता महानगर पालिका के मुख्य इंजीनियर बीरेन्द्रनाथ डे ने जब शहर के गंदे पानी को नहर के माध्यम से भैरियों तक पहुंचाने का फैसला लिया, तब शायद उनके ज़हन में भी ये विचार नहीं होगा कि इससे मैले पानी से मछली उत्पादन किया जा सकता है. उनका उद्देश्य तो बस शहर के मैले पानी को बगैर किसी लाग-लपेट के प्राकृतिक तरीके से नदी के बजाए अपनी मनचाही दिशा में भेजना था. लेकिन प्रकृति से जुड़े रहने वाले मछुआरों को शायद इस बात का इल्म हो गया था कि ये पानी मछलियों के लिए कारगर साबित हो सकता है.

और इस तरह धीरे-धीरे करके विश्व का सबसे अनूठा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तैयार हुआ . दरअसल कोलकाता इस्टर्न वेटलैंड एक प्रकार से कोलकाता के लिए इको सब्सिडी है जो उन्हें प्रकृति से मिली है. जहां देना कुछ नहीं होता है बल्कि उससे मिल ही रहा है.

यहां आने वाली मैले पानी में मछुआरे, बरसाती पानी मिलाकर उसे तीन से चार फुट गहरी भैरियों में छोड़ देते हैं. यहां मैंले पानी को तीन हफ्ते तक रखा  जाता है. सूरज की रोशनी से एक विशेष परिस्थिति बनती है, औऱ फोटोसिंथेसिस की मदद से बैक्टीरिया और एल्गी यानि शैवाल एक दूसरे का खाना तैयार करते है. इस खाने का कच्चा माल होता है मैला. यानि कोलकाता शहर की वो गंदगी जिसे शहर ने बगैर कुछ खर्च किए, बगैर जाने की इसका क्या हो रहा है अपने-अपने घर से बहा दिया था.

विज्ञान को भले ही हाल के प्रयोगों से इस बात की जानकारी मिली हो कि इस प्रक्रिया से मैले पानी में मौजूद कोलीफार्म यानि रोगाणु, शैवाल और बैक्टीरिया का भोजन बन रहे हैं, पर मछुआरे ये बात जानते थे. बस फर्क इतना था कि वो इसे तकनीकि तौर पर नहीं जानते थे.
उन्हें बस इतना पता था कि इस मैले पानी से शैवाल पनपेगी और उससे मछली का उत्पादन हो सकेगा.  इसी तरह भैरी के किनारों पर जलकुंभी उगाना भी एक प्राकृतिक तरीका है. जलकुंभी पानी से तेल, ग्रीस जैसी चिकनाई को सोख लेता हे, यही नहीं मर्करी जैसी जहरीली धातु भी इस पौधे की वजह से पानी से साफ हो जाती है.

पूरे शहर की गंदगी यहां आने के बावजूद इस पूरे इलाके में बदबू का नामोनिशान तक नहीं होता है. खास बात ये है कि जिस पानी की गुणवत्ता जांच में बीओडी. सीओडी, कोलीफार्म सब संतुलित निकलता है. उस पानी को ट्रीट करने में मछुआरों की सहायता भी मछली ही करती हैं. मछुआरे हर दो हफ्ते में एक बार भैरी में उतरते हैं. फिर सारे मुछआरे एक जाल पकड़ कर मछलियो को पानी से बाहर लाते हैं. उछलती हुई मछलियों की सेहत से मछुआरों को अंदाज़ा मिल जाता है कि पानी कितना साफ हुआ है. अगर मछली बड़ी नहीं हो रही हैं. और पतली है तो उन्हें पता लग जाता है कि अब भैरी में और मैला पानी डालने का वक्त आ गया है. इस तरह मछुआरे मुख्य मैले की खाल से पोखर में पानी ले लेते हैं. इसके लिए कई जगह पुरानी तकनीक का रास्ता बना हुआ है जिसे खोल देने पर गुरुत्वाकर्षण की मदद से पानी खुद ब खुद पोखर में आ जाता है. कहीं कहीं इसे पंप की सहायता से पोखऱ में डाला जाता है. लेकिन मैला पानी डालने से पहले पोखऱ में मौजूद पानी को दूसरे पोखर में स्थानान्तरित किया जाता है. दूसरे पोखर में डाला गया पानी किसी भी एसटीपी प्लांट से शुद्ध किया गए पानी से ज्यादा साफ होता है.

उत्पादन ही उत्पादन
ऐसा माना जाता है कि 30 हज़ार एकड़ की ज़मीन में करीब 10 हज़ार एकड में भैरियां फैली हुई हैं. औऱ 15 हज़ार एकड़ में खेत हैं. हर साल इन भैरियों से करीब 10 हज़ार टन मछली का उत्पादन होता है. वहीं कोलकाता में बिकने वाली सब्जी का 40 फीसद यहीं पैदा होता है, इसके अलावा तुलसी, सनफ्लावर तो है ही. साथ ही पास ही मौजूद धापा गांव में कचरे से खाद बनाकर वहां पर भी सब्जी उत्पादन किया जाता है. ये इलाका करीब 30 हज़ार लोगों को रोज़गार देता है.

अगर मछली उत्पादन, सब्जी की पैदावार, बाढ़ नियंत्रण और सीवेज ट्रीटमेंट का पूरे शहर का खर्चा निकाला जाए तो ये करीब 200 करोड़ के आस-पास बैठेगा. जो सरकार का यूं ही बच रहा है.

ये एक ऐसी व्यवस्था है जिसके बिना कोलकाता बरबादी की कगार पर पहुंच सकता है. सोचिए कोलकाता जहां औसतन बारिश 1800 मिलीमीटर है . वहां इन भैरियों की बदौलत बाढ़ का खतरा नहीं मंडराता है. लेकिन अब धीरे-धीरे इन इलाकों में बिल्डरों का कब्जा हो रहा है. और ये हो ही नहीं सकता है कि इन बिल्डरों को शासन-प्रशासन की शह ना मिली हो.

लेकिन हैरानी की बात ये है कि फिर भी सरकारें यहां के मछुआरों की प्रशंसा के बजाए उनके रोजी रोटी को छीनने वालों का साथ दे रही है. ऐसे में अगर कोई भी पार्टी भैरियों को बचाने की बात करती है तो वो उनकी जीत में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है. बस अब देखना ये है कि भैरियों में उतरने का फैसला कौन लेता है, ‘मोदी’ या  ‘दीदी’.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: March 12, 2021, 4:47 PM IST
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