तकनीक के जरिए क्या हमें कभी मौसम की सही जानकारी मिल सकेगी?

डे आफ्टर टुमारो फिल्म में वैज्ञानिक की ये बात काफी हद तक सच साबित होती दिखती है. दुनियाभर के मौसमविज्ञानी लगातार अपने तकनीक को बेहतर बनाने में लगे हुए हैं. लेकिन उसके बावजदू, बीते दिनों दुनियाभर में आए तूफान और बाढ़ ने बता दिया कि हम कितने लाचार हैं. लेकिन इंसान की कोशिश रहती है कि वो प्रकृति पर जीत हासिल करें.

Source: News18Hindi Last updated on: November 6, 2020, 8:57 PM IST
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तकनीक के जरिए क्या हमें कभी मौसम की सही जानकारी मिल सकेगी?
भारत की अर्थव्यवस्था के लिये मानसून हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है लेकिन मानसून पूर्वानुमान की क्षमता काफी नहीं थी.
एक सभागार में दुनियाभर के वैज्ञानिक चर्चा के लिए मौजूद हैं. बदलते मौसम, पर्यावरण और मौसम की जानकारी को लेकर सब अपने विचार पेश कर रहे होते हैं. तभी उनमें से एक वैज्ञानिक मंच पर पहुंचता है. सभी को संबोधित करते हुए कहता है कि दुनिया का कोई भी मौसम विज्ञान, मौसम की सही जानकारी नहीं दे सकता है. प्रकृति को लेकर हम सट्टा खेलते हैं और बस अनुमान लगाते हैं. जिसका अनुमान सटीक बैठ जाए. अगर हम कह रहे हैं कि प्रकृति में कुछ बदलाव आ सकता है और इसके लिए अगर हम कोई वक्त देते हैं तो वो बस एक अनुमान है. उसमें वक्त कितना भी प्लस या माइनस हो सकता है. मसलन अगर आपसे कहें कि 20 साल बाद ऐसा कुछ होगा तो ज़रूरी नहीं हैं वो उतना वक्त हो, वो 100 साल भी हो सकता है और वो चंद महीनों में भी हो सकता है.

डे आफ्टर टुमारो फिल्म में वैज्ञानिक की ये बात काफी हद तक सच साबित होती दिखती है. दुनियाभर के मौसमविज्ञानी लगातार अपने तकनीक को बेहतर बनाने में लगे हुए हैं. लेकिन उसके बावजदू, बीते दिनों दुनियाभर में आए तूफान और बाढ़ ने बता दिया कि हम कितने लाचार हैं. लेकिन इंसान की कोशिश रहती है कि वो प्रकृति पर जीत हासिल करें. इसी के तहत पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसके मुताबिक कृषि से चलने वाले परिवारों ( जिसमें खेती और मवेशी पालन दोनों शामिल हैं) को मौसम के सही पूर्वानुमान की बदौलत सालाना 13 हजार करोड़ से ज्यादा का आर्थिक फायदा हुआ है. वहीं मौसम विभाग के सटीक पूर्वानुमानों ने किसानों को बहुत फायदा पहुंचाया और अनुमान है कि आगे के पांच सालों में इससे कृषि समुदाय को करीब 48 हजार करोड़ का फायदा पहुंच सकता है. रिपोर्ट की माने तो इससे मछुआरां वर्ग को भी सालाना करीब 663 करोड़ का फायदा हुआ और आने वाले पांच सालों में ये फायदा 2000 करोड़ तक जा सकता है. ये स्टडी सरकार के नेशनल मॉनसून मिशन में किए गए निवेश से हुए फायदों का आकलन करने के लिए की गई थी.

क्या है ये नेशनल मॉनसून मिशन
राष्ट्रीय मॉनसून मिशन की शुरूआत 2012 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने की थी. भारत की अर्थव्यवस्था के लिये मानसून हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है लेकिन मानसून पूर्वानुमान की क्षमता काफी नहीं थी. इसकी जरूरत तब महसूस हुई जब 2009 में मॉनसून, मौसम विभाग के अनुमान से बहुत कम निकला. इसी तरह मौसम विभाग ने 2002 और 2004 के सूखे का अनुमान लगाने में भी नाकामी मिली. इन नाकामियों ने ही मॉनसून मिशन की नींव रखी. इस मिशन के तहत मानसून पूर्वानुमान से जुड़े रिसर्च के काम और डायनेमिक मानसून फॉरकास्ट मॉडल के विकास पर जोर दिया गया. इस मिशन का उद्देश्य मौसमी और अंतर-मौसमी मानसून पूर्वानुमान में सुधार करना है. डायनैमिक मॉडल के जरिए पर्यावरण के त्रिआयामी गणितीय (3D mathematica)l मॉडल की मदद ली जाती है ताकि छोटे या एक विशिष्ट इलाके में होने वाली बारिश का भी अनुमान लगाया जा सके, जो पहले मौसम की जानकारी के लिए उपयोग में लाए जा रहे सिस्टम में संभव नहीं था.
सरकार ने अभी तक इस मिशन में 1000 करोड़ रु का निवेश किया है. पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन का कहना है कि सरकार को नेशनल मानसून मिशन से आने वाले पांच सालों में पचास गुना लाभ मिलेगा. यानि आने वाले पांच सालों में सरकार इस मिशन पर जो एक रुपया लगाएगी उसका पचास रुपया वापस मिलेगा.

कैसे हुई शोध
देश के 6 राज्य के 173 जिलें जो कृषि पर वर्षा पर निर्भर थे. वहां ये निकल कर आया कि मौसम से जुड़ी सलाह मिलने पर 98 फीसदी किसान अपनी कार्यशैली में बदलाव करते हैं. जैसे फसल की वैरायटी बदलना, कटाई के बाद फसल के भंडारण की क्या औऱ कैसे व्यवस्था करना है, जल्दी या देरी से कटाई करना, जल्दी या देरी से बीजारोपण करना, जुताई का वक्त बदलना, कीटनाशक के छिड़काव और सिंचाई का वक्त बदलना.सर्वे के मुताबिक 94 फीसदी किसानो ने बताया कि सही पूर्वानुमानों से उन्हें नुकसान से बचाया औऱ उनको इस जानकारी से फायदा भी मिला . यही नहीं 80 फीसदी मछुआरों माना कि समंदर में उतरने से पहले वो समुद्री राज्य मौसम की जानकारी यानि ocean state forecast की मदद लेते हैं और खाली हाथ लौटने से बचते हैं. इसी तरह से वो ज़ोन जहां मछली मिलने की संभावना ज्यादा रहती है उससे जुड़ी सलाह से भी मछुआरों को काफी फायदा होता है. इस तरह की सलाह की बदौलत किए गए 1079 मछली पकड़ने से जुड़े अभियान सफल हुए और उससे करीब 2 करोड़ की अतिरिक्त आय हुई.

लेकिन यहां पर एक सवाल ये आता है कि जब भी हम मौसम विज्ञान की बात करते हैं औऱ अगर वो बात किसान से जुड़ी हुई होती है तो सरकारें परंपरागत तरीकों और नैसर्गिक घाघ भड्ढरी जैसे कृषि विज्ञानियों के ज्ञान को संकलित करके उसका वृहत इस्तेमाल क्यों नहीं करती हैं. बीते दिनों कुछ वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काम भी किया और उन्हें आशातीत सफलता मिली.

हैदराबाद के सेंट्र्ल इंस्टिट्यूट फॉर ड्रायलेंड रिसर्च इन एग्राकल्चर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.के.रवि शंकर ने आंध्रप्रदेश के रंगारेड्डी, अनंतपुर, विशाखापट्टनम के गांवों में तीन साल तक रहकर वहां के लोक चलन, परंपराओं जो बारिश और मौसम से जुड़ी हुई है, उन पर शोध की है. अपनी शोध के दौरान वो घर-घऱ गए और वहां रहने वाले बुजुर्गों से उनके उन तरीकों और चलन को समझा जो परंपरा के तौर पर उनके जीवन में गहरी समाई हुई है. उन्होंने पाया कि अकेले आंध्रप्रदेश में 24 बायो इंडीकेटर ( कीट पतंगे, पौधे, जानवर) औऱ 42 गैर बायो इंडिकेटर ( बादल, हवा, बिजली चमकना) मौजूद है जिससे बारिश का अनुमान लगाया जाता है.

बारिश आने वाली हो तो मोर नाचने लगता है, या टिड्डे गाने लगते हैं ये एक ऐसा इंडिकेटर या इशारा हो जो बारिश को लेकर पूरे भारत भर में जाना जाता है. लेकिन बारिश आने पर बकरी अपने कानों को फडफड़ाने लगती है, उल्लू शोर मचाने लगता है, भेड़ एक साथ एकत्र हो जाती है. ये भी कुछे ऐसे तरीके है जो देश के कोनों में बारिश का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं. इसी तरह अगर अगर लोमड़ी सुबह शाम हूहू करे या पक्षी पेड़ पर कितनी ऊंचाई पर अपना घोसला बना रहा है ये भी बारिश का सटीक अनुमान लगाने में काम आता है. अगर घोंसला ऊंचाई पर बना है तो अच्छी बारिश होगी लेकिन अगर घोंसला नीचे बनाया गया है तो कम बारिश होने का अनुमान लगाया जाता है. इसी तरह कीटों की गतिविधि बारिश के बारे में सही जानकारी पता करने में बहुत कारगर साबित होता है.

जीव कैसे जानते हैं ?
वैज्ञानिकों का मानना है कि, कीट, पक्षी या जानवर हवा में आ रहे बदलाव, नमी और दबाव को समझ लेते हैं और इससे उनके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है. मसलन कीटों को अपने सिर पर लगे एंटीने से आद्रता का अनुमान हो जाता है. वहीं आद्रता के बढ़ने से बकरी असहज महसूस करती है औऱ वो अपने कानों को फड़फडा कर खुद को ठंडा रखने की कोशिश करती है. इसी तरह उल्लू भी उमस बढ़ने से हुई बेचैनी की वजह से चिल्लाता है.
पेड़-पौधों का क्या होता है रवैया
पौधों पर जलवायु संबंधी प्रभाव का विज्ञान जिसे प्लांट फीनोलॉजी भी कहते हैं, वो बताता है कि कई बार पौधों को देखकर सही अनुमान मिल जाता है, मसलन अमलतास का पेड़ बारिश होने के ठीक 45 दिन पहले अपने शबाब पर होता है यानि पूरी तरह से फूलों से भर जाता है, इसी तरह नीम के पेड का अच्छी तरह से फलना बताता है कि बारिश अच्छी होगी.

आओ लौट चले प्रकृति की ओर
अलजज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक मौसम विज्ञानी वाय.एस.रामकृष्ण का कहना है कि परपंरागत तरीकों के साथ विज्ञान की गणजोड़ से मानसून के अनुमान को और सटीक बनाया जा सकता है. उनका कहना है कि जब हमारे पास कई तरीके हैं जो सालों से किसान काम में ला रहे हैं तो उनका साथ लेने में बुराई क्या है, वैसे भी एक से भले दो होते हैं. और वैसे भी मौसम या प्रकृति के बारे में अगर कोई सबसे सही जानकारी दे सकता है तो वो खुद प्रकृति है. तो उससे दोस्ती बना कर रहने वाले बेहतर साबित हो सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: November 6, 2020, 8:57 PM IST
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