क्या दुनिया को अक्ल आ रही है ?

दरअसल अब वक्त आ गया है कि दुनिया वैकल्पिक उर्जा को ही मुख्य ऊर्जा बनाने की औऱ ध्यान दे. अभी हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने तटीय पवन चक्कियों यानि विंड फार्म्स को बढ़ावा देने के लिए 160 मिलियन पाउंड के निवेश की घोषणा की, साथ ही उन्होंने यूनाइटेड किंगडम के 30 फीसद हिस्से को संरक्षित करने की बात भी कही, जिससे जैवविविधता को बढ़ावा मिल सके.

Source: News18Hindi Last updated on: October 19, 2020, 10:44 PM IST
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क्या दुनिया को अक्ल आ रही है ?
भारत भी वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ा रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)
रिपब्लिक ऑफ मलावी दक्षिण एशियन अफ्रीका में मौजूद एक छोटा सा देश है. ये देश दुनिया के उन 44 देशों में से एक है जो बंदरगाह विहीन देशों (लैंडलॉक्ड कंट्री) की श्रेणी में शुमार है यानि ऐसे देश जिनका समुद्र से कोई नाता नहीं होता है. रिपब्लिक ऑफ मलावी को न्यासालैंड के नाम से भी जाना जाता है. इस देश में एक छोटा सा शहर है कुसुंगु और उसमें मौजूद है विंबे. सुदूर में मौजूद ये अफ्रीकन देश अभावों से घिरा हुआ है. और कुसुंगु में भी यही हाल हैं. गरीबी का यहां ये आलम है कि लोगों के पास दो वक्त के खाने का अभाव था. दरअसल बिजली पानी की कमी की वजह से यहां खेती करना बेहद मुश्किल हो गया था. और किसान सिर्फ बरसात के पानी के भरोसे ही थे. उस पर राजनीतिक हथकंडों के तहत गांव से घिरे पेड़ों को काटने की मुहिम चलाई जा रही थी. गांव के कुछ किसान इसका विरोध कर रहे थे क्योंकि उनका मानना था कि अगर इन पेड़ों को काट दिया जाएगा तो बारिश का पानी रुकेगा नहीं और वो खेतों को बरबाद कर देगा. और ज़मीन की नमी भी खत्म हो जाएगी. लेकिन अभाव के मारे लोगों को उस वक्त सिर्फ पैसा नज़र आ रहा था जिसकी बदौलत वो अपना घर चला सकें.

यहीं विंबे में विलियम कमक्वाम्बा भी रहता था. 13-14 साल का ये लड़का दिन भर दोस्तो के साथ घरों के पास कबाड़ें में कुछ खोजता रहता था. उसे स्कूल से निकाल दिया गया था, क्योंकि उसके पिता स्कूल की फीस जमा नहीं कर सकते थे. तमाम तरह की राजनीतिक उठापटकों के बीच आलम ये था कि एक वक्त ऐसी नौबत आ गई कि विलियम के किसान पिता को अपने परिवार से ये बोलना पड़ा कि सभी लोग अपने मनपसंदीदा खाने के वक्त का चुनाव कर लें. और परिवार के सदस्य को अपने चुने हुए वक्त ही खाना मिलेगा. इन तमाम तरह की विकट परिस्थितियों के बीच भी विलियम का दिमाग कहीं और ही रहता था. वो किसी भी तरह से अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता था. इसी कोशिश में वो चुप चुप कर अपने स्कूल की लाइब्रेरी में जाने लगा. इससे पहले भी वो कबाड़े के सामान से रेडियो बना चुका था. लेकिन जब वो लाइब्रेरी में पहुंचा तो उसे वहां एक किताब मिली ‘यूजिंग एनर्जी’. इस किताब को पढ़ने को बाद उसे अहसास हुआ कि उसका प्यार इलेक्ट्रॉनिक्स है. किताब को पढ़ने के दौरान ही उसे समझ में आया कि गांव की समस्या का हल उसके पास है. वो एक विंड टरबाइन बना कर पानी की दिक्कत को खत्म कर सकता है. इस टरबाइन को बनाने के लिए उसने कबाड़ से जुगाड़ लगाना शुरू की. और अपनी बहन के प्रेमी की साइकिल से डायनेमों जुगाड़ा. अपने पिता को किसी तरह से उनकी साइकिल की कुर्बानी देने के लिए मंजूर किया. फिर घर के पास मौजूद कबाड़े के ढेर से कुछ चीजें निकाली. और फिर यूकेलिप्टस यानि ब्लू गम के पेड़ पर इन सभी चीजों का इस्तेमाल करते हुए उसने एक विंड टरबाइन बना डाली. इस विंड टरबाईन की बदौलत विंबे के खेतों में पानी आने लगा और उसके पिता को बगैर किसी समझौते के खेतों को हरा भरा रखने का मौका मिल गया. बाद में विलियम कमक्वाम्बा को अपने इस अविष्कार के लिए कई मंचो पर सराहना मिली और उसकी वजह से सूदूर में मौजूद उसका गांव और देश दुनिया की नज़रो में आया.

अपनी किताब ‘द बॉय हू हार्नेस्ड दि विंड ’ में विलियम ने अपनी कहानी को काफी विस्तार से बताया है. जिससे पता चलता है विलियम ने इलेक्ट्रॉनिक्स का इस्तेमाल करते हुए प्रकृति के उस संसाधन को साधा है जो शाश्वत हैं. विलियम ने आगे चलकर एक पानी की मोटर बनाई जो सोलर एनर्जी पर चलती थी. इसकी बदौलत गांव वालों को पीने का पानी मुहैया हो सका.

दरअसल अब वक्त आ गया है कि दुनिया वैकल्पिक उर्जा को ही मुख्य ऊर्जा बनाने की औऱ ध्यान दे. अभी हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने तटीय पवन चक्कियों यानि विंड फार्म्स को बढ़ावा देने के लिए 160 मिलियन पाउंड के निवेश की घोषणा की, साथ ही उन्होंने यूनाइटेड किंगडम के 30 फीसद हिस्से को संरक्षित करने की बात भी कही, जिससे जैवविविधता को बढ़ावा मिल सके. ब्रिटेन ने 2030 तक विंड फार्म्स से करीब 30 से 40 गीगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है. उनका उद्देश्य है कि 2050 तक देश पूरी तरह से कार्बन उत्सर्जन मुक्त हो सके. हालांकि ये काम काफी चुनौतीभरा और मंहगा है लेकिन शायद जीवन से बढ़कर कोई भी चीज मंहगी नहीं होती है. ऐसे में विंड फार्म्स तटीय क्षेत्रों के आसपास बिजली उत्पादन का एक बेहतर विकल्प हो सकता है.
क्या होता है विंड फार्म्स
विंड फार्म्स यानि तटीय इलाकों में समुद्र के अंदर पवनचक्की स्थापित करना, और वहां मौजूद हवा से ऊर्जा का उत्पादन करना. यहां पर चलने वाली हवाएं, जमीन की हवाओं से काफी तेज होती हैं. और ज्यादा तेज हवा यानि ज्यादा ऊर्जा का उत्पादन. साथ ही समुद्री हवाएं ज़मीन पर चलने वाली हवाओं की अपेक्षा ज्यादा स्थिर रहती हैं इसकी वजह से ऊर्जा का उत्पादन सतत बना रहता है. दुनिया का एक बड़ा क्षेत्र तटों के किनारे बसा हुआ है. यहां के ऊर्जा उत्पादन से एक बड़े इलाके को लाभ मिल सकता है. समुद्र स्थित पवनचक्कियों से पैदा होने वाली बिजली और ज़मीन पर लगने वाली पवन चक्कियों से एक ही तरह का फायदा होता है. ये एक बेहतरीन वैकल्पिक ऊर्जा का माध्यम हो सकती है. औऱ इसके उत्पादन में पानी की किसी भी तरह से कोई बरबादी भी नहीं होती है. यहां तक कि डैम बनाकर जो हाइड्रोपॉवर पैदा किया जाता है उसकी बनिस्बत ये बेहतर इसलिए हैं क्योंकि इसे एक तो समुद्र में लगाया जा रहा है. दूसरा ये किसी भी तरह से बायोडायवर्सिटि में हस्तक्षेप नहीं करता है. बस इसके साथ एक ही दिक्कत है कि वर्तमान के हालात में ये काफी मंहगा और इसकी देखरेख में थोड़ी मुश्किल आती है. दूसरा समुद्र में 200 फीट गहराई तक जाकर इसे स्थापित करना फिलहाल मुश्किल है लेकिन अगर उस दिशा में मेहनत की जाए तो उसका हल निकाला जा सकता है. इसके अलावा दुनिया भर में कई ऐसे तटीय इलाके हैं जहां काफी आगे तक समुद्र में छिछला पानी होता है. जिसकी वजह से वहां विंड फार्म्स लगाना काफी आसान हो जाता है. अभी इसके लगाने से समुद्री जीव जंतुओं पर क्या असर होगा इसकी जांच होनी बाकी है.

चीन ने भी खाई है कसमजिस तरह से ब्रिटेन ने 2050 तक अपने देश को कार्बन उत्सर्जन मुक्त करने की शपथ ली है. उसी तर्ज पर चीन के राष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग ने बीते दिनों घोषणा की, कि 2060 तक चीन अपने कार्बन उत्सर्जन को घटा कर ज़ीरो पर ले आएगा. चीन के राष्ट्रपति का ये बयान दुनियाभर के पर्यावरणविदों को चौंकाने वाला था. दरअसल चीन दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देशों में से है. दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 28 फीसद अकेला चीन से पैदा होता है. और चीन इसे 40 सालों के अंदर ज़ीरो पर लाने की घोषणा कर रहा है. इसलिए ये घोषणा सबको हैरान करने वाली थी. क्योकि इससे पहले पर्यावरण को लेकर चीन ने कभी कोई छोटा मोटा वादा भी नहीं किया था. ऐसे में इतनी बड़ी बात लोगों को खास कर पर्यवरणविदों के लिए खुशी भरी हैरानी लेकर आई. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ज़ी जिनपिंग का बयान राजनीति से प्रेरित था, क्योंकि उनका बयान ठीक तभी आया जब ट्रंप ने उन पर दुनियाभर के लिए खड़ी हुई परेशानी की जड़ बताया था. इसके बाद चीन कहीं ना कहीं खुद को कोरोना के बाद के दौर में एक पर्यावरण प्रेमी के तौर पर स्थापित करने औऱ अपनी छवि सुधारने में लग गया है. जिनपिंग का ये कहना की पर्यावरण जैसे मुद्दों पर पूरे दुनिया को एक जुट होना पड़ेगा, या पूरी दुनिया एक दूसरे से जुड़ा हुई है इसलिए धरती पर पैदा होने वाली समस्या सबकी समस्या है. ये बात चीन के रवैये से काफी उलट थी. हालांकि चीन ने कोई रोडमैप तैयार करके नहीं दिया है कि वो आने वाले वक्त में किस तरह से कार्बन उत्सर्जन को ज़ीरो पर लाने वाला है.

वहीं अमेरिका में ट्रंप के सामने चुनाव में खड़े हुए जो बाइडेन ने घोषणा की है कि अगर वो प्रेसिडेंट चुने गए तो अमेरिका पेरिस समझौते के साथ फिर से जुड़ेगा औऱ हरित बदलाव और पर्यावरण के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश किया जाएगा.

वैकल्पिक ऊर्जा पर भारत का रुख
भारत भी वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ा रहा है. रीवा में सोलर ऊर्जा पर बड़े स्तर पर काम हुआ है. यहां 1590 एकड़ क्षेत्र में एशिया का सबसे बड़ा सोलर प्लांट लगाया गया है जिससे 750 मेगावाट बिजली उत्पादन की जाएगी. वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भी पिछले दिनो दिल्ली को देश का पहला सोलर सिटी बनाने की घोषणा की है, साथ ही देश की राजधानी में इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी देकर उसे भी बढ़ावा दिया जा रहा है. लेकिन भारत को अभी बहुत आगे कदम बढ़ाना है क्योंकि जहां एकतरफ रीवा में सोलर प्लांट लगाया जा रहा है वहीं गंगा और दूसरी नदियों पर लगातार बनाए जा रहे डैम, और वन्य जीवन को लेकर सरकार का रवैया एक दूसरी कहानी बयान करता है.

मोरक्को है मिसाल
वैकल्पिक ऊर्जा के मामले में मोरक्को दुनिया के सामने एक मिसाल पेश करता है. इससे पहले मोरक्को ऊर्जा के लिए पूरी तरह से तेल औऱ गैस के आयात पर निर्भर था. आज वो अपनी ज़रूरत की 40 फीसद ऊर्जा देश में बनाता है. इसके पीछे दुनिया का सबसे बड़ा सोलर फर्म है. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी कि 2050 तक मोरक्को सौर ऊर्जा का निर्यातक बन जाए.

आने वाले 20 सालों में हो सकता है कि वैकल्पिक ऊर्जा सबसे बड़ा माध्यम हो. इसमें कोई नई बात नहीं है कि सूरज इस धरती की ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है. हर दिन धरती पर मौजूद पेड़-पौधे तीन खरब किलोवॉट घंटो की सौर ऊर्जा को सोख लेते हैं. ये वो ऊर्जा है जो हम इंसानो की ज़रूरत की 20 गुना है. इसका साफ मतलब है कि हम फॉसिल फ्यूल यानि जीवाश्मों से जुड़ी ऊर्जा को पूरी तरह रोक कर, जो शाश्वत ऊर्जा यानि सूरज की रोशनी, हवा, पानी औऱ भू-ताप उससे ऊर्जा पैदा करें तो हमें किसी चीज़ की कमी भी नहीं होगी औऱ प्रकृति पर किसी तरह का कोई हस्तक्षेप भी नहीं होगा. बस इस पूरी प्रक्रिया में एक ही बड़ी समस्या है कि ताकतवर को अक्ल देर से आती है. तो जब तक अक्ल नहीं आती है तब तक इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज रामेन्दु

पंकज रामेन्दुलेखक एवं पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

पर्यावरण और इससे जुड़े मुद्दों पर लेखन. गंगा के पर्यावरण पर 'दर दर गंगे' किताब प्रकाशित।  

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First published: October 19, 2020, 10:44 PM IST
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