स्‍मृति शेष: कम्‍प्‍यूटर गेम वाली पीढ़ी के लिए अहद प्रकाश जैसे बाल साहित्‍य की दरकार

अहद प्रकाश की जितनी ख्‍याती कवि/शायर के रूप में है उससे अधिक उनका नाम बाल साहित्‍यकार के रूप में पहचाना जाता है. उनके अवदान को जानने के लिए मोटे रूप में इतना ही कहा जा सकता है कि 90 दशक से हिंदी बाल साहित्‍य जहां भी, जिस भी रूप में प्रकाशित हुआ है वहां अहद प्रकाश अपनी रचनाओं के साथ अवश्‍य दिखाई दिए हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 8, 2020, 6:51 PM IST
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स्‍मृति शेष: कम्‍प्‍यूटर गेम वाली पीढ़ी के लिए अहद प्रकाश जैसे बाल साहित्‍य की दरकार
स्‍मृति शेष: बाल साहित्‍यकार अहद प्रकाश
नीम की छैयाँ ता-था-थैया/ आई गिलहरी देखो भैया,
दौड़ रही है, नाच रही है/ खेल रही है खो-खो भैया!
चंचल, सुंदर, सबसे न्यारी/ प्यारी-प्यारी सरल गिलहरी,
माँ को बहुत भली लगती है/ सिया-राम की चपल गिलहरी!
इन बाल काव्‍य पंक्तियों के लेखक अहद प्रकाश का भोपाल में निधन हो गया. मातृभाषा उन्नयन संस्थान व हिन्दीग्राम के संरक्षक पद पर रह कर साहित्‍य कर्म में सक्रिय अहद प्रकाश का स्‍वास्‍थ्‍य बीते सप्‍ताह बिगड़ा था. उन्‍होंने भोपाल के निजी अस्पताल में उपचार के दौरान 8 दिसंबर को तड़के अंतिम साँस ली. परिजनों और प्रशंसकों ने पैतृक ग्राम रायसेन में उनकी पार्थिव देह को सुपुर्देखाक किया. 69 वर्षीय अहद प्रकाश का अवसान बाल साहित्‍य के सेवक का अस्‍त हो जाना है.

अहद प्रकाश की जितनी ख्‍याती कवि/शायर के रूप में है उससे अधिक उनका नाम बाल साहित्‍यकार के रूप में पहचाना जाता है. उनके अवदान को जानने के लिए मोटे रूप में इतना ही कहा जा सकता है कि 90 दशक से हिंदी बाल साहित्‍य जहां भी, जिस भी रूप में प्रकाशित हुआ है वहां अहद प्रकाश अपनी रचनाओं के साथ अवश्‍य दिखाई दिए हैं. 'बाल साहित्‍य का इतिहास' लिखते हुए प्रकाश मनु ने रेखांकित किया है कि नौवें दशक में उभरे सशक्त बालकवि अहद प्रकाश की बाल कविताओं में भाषा की रवानी के साथ-साथ नए किस्म के बिम्बों का आकर्षण दिखाई देता है. 17 जून, 1951 को रायसेन जिले के बरेली में जनमे अहद प्रकाश की कविताओं में कहीं-कहीं "अप्पक अप्पा, टप्पक टप्पा/ ढूंढ़ लो हमको चप्पा-चप्पा" जैसी खेलकूद की कौतुकपूर्ण मस्ती और मजा अलग समां बांधता है. अहद प्रकाश की बाल कविताओं का बड़ा ही सुंदर संग्रह है 'आँखों में आकाश'. 1990 में प्रकाशित इस संग्रह में 'पैसा, पैसा, पैसा', 'चुम्मक-चुम्मक', 'नानी जी के दाँत' जैसी कई दिलकश कविताएँ हैं.

अहद प्रकाश असल में हिन्दी में बाल साहित्‍य की उस आकाश गंगा के सितारे हैं जहां मैथलीशरण गुप्‍त, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. कामता प्रसाद गुरु, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, मस्तराम कपूर, सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे दैदिप्‍यमान नक्षत्र जगमगाते हैं.
अहद प्रकाश बाल साहित्‍य के लिए ज्‍यादा जाने जाते हैं.


अहद प्रकाश अपने रचना संसार की दूसरी रचनाओं से अधिक यदि अपने बाल साहित्‍य के लिए जाने जाते हैं तो इसकी एक खास वजह उनकी रचनाओं में बाल सुलभ सहजता और सरलता की उपस्थिति है. जिन कवियों का ऊपर जि‍क्र किया गया उनके सहित हिन्‍दी साहित्‍य के हर बड़े रचनाकार ने बच्‍चों के लिए कुछ न कुछ जरूर लिखा है. कथा सम्राट प्रेमचंद ने भी 'कुत्‍ते की कहानी' लिखी है जिसे हिन्‍दी के पहले बाल उपन्‍यास की संज्ञा दी गई है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामवृक्ष बेनीपुरी, जहरबख्श, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, मन्नू भंहारी, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, देवेंद्र सत्यार्थी जैसे जाने कितने ही बड़े लेखकों ने बाल साहित्‍य रचा है.

बाल साहित्‍य के महत्‍व को जान कर ही हिन्‍दी की तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने अपने यहां समय समय पर बाल साहित्‍य के लिए कॉलम, साप्‍ताहिक पृष्‍ठ और विशेष अंक जैसे उपक्रम नियमित रूप से किए हैं. जब हम बच्‍चों के लिए पत्रिकाओं का का जिक्र करते हैं तो सहज ही शिशु, बाल सखा, चंदा मामा, मनमोहन, नंदन, पराग, बालभारती, चंपक, चकमक, देवपुत्र, बाल पत्रिका स्‍नेह के नाम याद आते हैं. विस्‍तार की संभावनाओं के बाद भी अन्‍यान्‍य कारणों से इन बाल पत्रिकाओं ने गहरा संकट काल भी देखा है. कई पत्रिकाएं व्‍यावसायिक युग में कदमताल नहीं कर सकने के कारण बंद हो गईं है तो कुछ को व्‍यक्तिगत प्रयासों से किसी तरह बचा कर रखा गया है.

बाल साहित्‍य की दशकों पुरानी इस पूरी यात्रा में यह संदेश साफ दिखाई देता है कि बाल साहित्‍य एक पोटली में समा जाने जितना ही नहीं है बल्कि यह आकाश जितना व्‍यापक है. पापुलर मीडिया में कमर्शियल ब्रेक के दौरान बच्‍चे उत्‍पाद की बिक्री के लिए बतौर मॉडल तो पेश किए गए हैं मगर उनके लिए रचे गए साहित्‍य के लिए कोई मॉडल ‘कमर्शियली फिट’ नहीं पाया गया है. अनेक बाल साहित्‍यकारों ने समय समय पर आगाह किया है कि बच्‍चों की रूचि का साहित्‍य कॉमिक स्‍ट्रीप्‍स, कॉमिक्‍स या कार्टून शो तक ही सीमित नहीं है. दिन प्रतिदिन रचे जा रहे बाल साहित्‍य को रूचिकर रूप, रंग के साथ प्रस्‍तुत किया जाए तो यह अपने लिए बड़ा विन्‍यास रच सकता है. हाल के वर्षों में इस तरह के कुछ प्रयासों ने ध्‍यान आकर्षित किया भी है. इंदौर से प्रकाशित देवपुत्र ने जहां देश भर के स्‍कूलों में पहुंच कर बिक्री और व्‍यावसायिक सफलता के नए कीर्तिमान स्‍थापित किए हैं तो भोपाल में स्‍नेह बाल पत्रिका के साथ बच्‍चों का अखबार प्रकाशित कर बाल साहित्‍य की गाढ़ी उपस्थिति को दर्ज करवाया गया है. ये दोनों बाल पत्रिकाएं संस्‍थागत और व्‍यक्तिगत प्रयासों से हासिल की गई सफलता के उज्‍जवल उदाहरण हैं. इन पत्रिकाओं की सफलता ने यह भी सिद्ध किया है कि पाठ्य पुस्‍तकों से अलग बाल साहित्‍य की आवश्‍यकता है. ऐसा साहित्‍य जो बच्‍चों की दुनिया का ही एक अंग हो. जहां कविता का एक-एक शब्‍द बच्‍चों के सामने एक नई दुनिया खोलता है. जहां कथा इस सहजता से गुजर जाती है जैसे बच्‍चे पानी से छपाछप करते हुए कूदते फांदते निकल जाते हैं.

ऑनलाइन शिक्षा के इस समय में बच्‍चे घंटों नीली स्‍क्रीन के आगे जमा हैं और जाने क्‍या क्‍या सामग्री उनके मस्तिष्‍क व दृष्टि को धुंधला कर रही हैं. यह हमारे समय की चुनौती है कि देश की भावी पीढ़ी के लिए रचा गया साहित्‍य और उसकी प्रस्‍तुति पंचतंत्र की कहानी जितना सहज, मोबाइल गेम जितना रूचिकर और अहद प्रकाश की लेखनी जितना भाषाई तरल भी हो.

बाल साहित्‍यकार अहद प्रकाश के अवसान के क्षणों में बाल साहित्‍य की स्थिति पर पल भर के लिए किया गया यह चिंतन और इस दिशा में सूझी कोई राह ही उन्‍हें हमारी सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी. ऐसा इसलिए भी है कि हम सभी उम्र के हर मोड़ पर जब थोड़ा ठहरते हैं तो बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी, मां से सुनी कहानियां जरूर याद आती हैं. सफलता के शिखर पर हों या संकट के भंवर में, इन कहानियों से मिली शिक्षा हमारी राह सुझाती हैं. बाल मन पर छाप छोड़ने वाली इन कहानियों और कविताओं ने हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने में निर्णायक भूमिका निभाई हैं. इसलिए हमें अब बच्‍चों को साहित्‍य के इंद्रधनुषी लोक तक तो लाने के जतन करने ही होंगे. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: December 8, 2020, 6:45 PM IST
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