कोराना काल के संकट और अपनी दुनिया में अकेले बच्‍चे

जब हम कोरोनाकाल के संकटों की बात करते हैं तो इसके दुष्‍प्रभावों में अर्थव्‍यवस्‍था के नुकसान, बेरोजगारी, सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य पर खतरों को गिनते हैं. लेकिन बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा के अधिकार की बात भूल जाते हैं. बड़ा तबका हाई स्‍कूल और हायर सेकेंडरी के बच्‍चों के कॅरियर के लिए महत्‍वपूर्ण एक साल बिगड़ने पर चिंतित है. मगर, इस चिंता पर यह कह कर मरहम लगाया जाता है कि यह साल बर्बादी की फिक्र करने से अधिक जान बचाने का समय है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 22, 2020, 10:56 AM IST
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कोराना काल के संकट और अपनी दुनिया में अकेले बच्‍चे
कोरोनावायरस के चलते दुनिया में अधिकतर स्कूल बंद हैं.
दीपावली उत्‍सव के बीच टीवी पर एक विज्ञापन दिखलाई दिया था. इसमें एक दम्‍पत्ति अपने ड्राइवर को यह कहते हुए नया मोबाइल उपहार में देते हैं कि अब दूसरा मोबाइल होने से न तुम्‍हारी बेटी की पढ़ाई अधूरी छूटेगी और उसकी ऑनलाइन क्‍लास के कारण तुम्‍हें अपनी ड्यूटी पर आने में देरी भी नहीं होगी.

इन संवेदनशील मनोभाव को लोगों ने सराहा भी मगर असल बात छिपी रह गई. वास्‍तव में इस विज्ञापन ने समाज की एक दूसरी विभीषिका की ओर इशारा किया है जिसे हममें से अधिकांश ने नजरअंदाज किया. यह विभिषिका है कोरोना काल में बच्‍चे, उनका स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा का अधिकार. जब हम कोरोनाकाल के संकटों की बात करते हैं तो इसके दुष्‍प्रभावों में अर्थव्‍यवस्‍था के नुकसान, बेरोजगारी, सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य पर खतरों को गिनते हैं. दुष्‍प्रभाव की इस कड़ी में हम लॉकडाउन के दौरान और अनलॉक के बाद भी स्‍कूल आरंभ न होने की चिंता भी शामिल है. बड़ा तबका हाई स्‍कूल और हायर सेकेंडरी के बच्‍चों के कॅरियर के लिए महत्‍वपूर्ण एक साल बिगड़ने पर चिंतित है. मगर, इस चिंता पर यह कह कर मरहम लगाया जाता है कि यह साल बर्बादी की फिक्र करने से अधिक जान बचाने का समय है. जब हरियाणा में स्‍कूल खुलते ही 83 बच्‍चों के कोरोना संक्रमित होने की खबर आती है तब लगता है कि वास्‍तव में यह समय सुरक्षित रहने का है. इसलिए स्‍कूल बंद ही रहना चाहिए.

कोरोना संकट के बीच बच्‍चों की सेहत और पढ़ाई को लेकर हमारी चिंताएं वास्‍तव में बहुत सतही हैं. कोरोना काल में बच्‍चों की सेहत और शिक्षा को लेकर हमारा समाज बड़े-बड़े दो भागों में बांटा जा सकता है. सेहत के मामले में एक भाग उन बच्‍चों का जिन्‍हें कोरोना के कारण बुनियादी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं नहीं मिली हैं. दूसरा भाग उन बच्‍चों का है जो साधन सम्‍पन्‍न घरों में रह कर ऑन लाइन पढ़ाई करते हुए विभिन्‍न स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का शिकार हो गए हैं. शिक्षा के मामले में एक भाग उन बच्‍चों का जो स्‍कूल बंद होने और ऑनलाइन पढ़ाई नहीं होने के कारण शिक्षा से वंचित रह गए हैं और दूसरा भाग उन बच्‍चों का जो ऑनलाइन पढ़ तो पाए लेकिन इस पढ़ाई के बाद भी तरह-तरह की मनोवैज्ञानिक समस्‍याओं को भोग रहे हैं.


इन बिंदुओं को जरा विस्‍तार से समझते हैं. भोपाल में सितंबर 2020 में चाइल्ड राइट अब्जर्वेटरी (सीआरओ) और यूनिसेफ द्वारा जनप्रतिनिधियों और बच्चों के बीच आयोजित एक सीधे संवाद में किशोरों ने स्कूलों में चल रहीं आनलाइन कक्षाओं को लेकर कहा था कि मोबाइल पर पढ़ाई करने से उनकी आंखों पर असर हो रहा है. कुछ का कहना था कि उनके पास मोबाइल फोन नहीं है और इस कारण वे ऑनलाइन कक्षाओं से जुड़ नहीं पाते. मध्‍य प्रदेश के ग्रामीण इलाके से उठी इस आवाज को आंकड़ों में समझते हैं. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरजी) ने अगस्त 2020 में बताया है कि 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अभी भी ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत में कितने प्रतिशत बच्चों की पहुंच किसी भी डिज़िटल माध्यम जैसे टीवी, रेडियो, इंटरनेट आधारित डिवाइस, मोबाइल और लैंडलाइन तक नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत के 18,188 बच्चों पर किए गए एक सर्वे में यह तथ्‍य सामने आया है कि लगभग 80 फ़ीसदी बच्चों के पास लैपटॉप नहीं है और लगभग 20 फ़ीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं है. एनसीआरटी ने माना है कि भारत में 27 प्रतिशत से अधिक बच्चे, उनके परिजन और शिक्षक ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान स्मार्टफोन की कमी से जूझ रहे हैं.
कहने में यह बात एक आंकड़ा भी महसूस होती है मगर इसकी गंभीरता इस बात से समझनी चाहिए कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में में कथित रूप से स्मार्टफ़ोन नहीं होने के कारण ऑनलाइन क्लास नहीं ले पाने से दु:खी बच्‍चों ने जान देने जैसा कदम उठा लिया. केवल मोबाइल होना या न होना मुद्दा नहीं है. मुद्दा तो उस स्‍मार्टफोन की क्‍वालिटी, इंटरनेट कनेक्‍शन न होना, इंटरनेट की धीमी गति, बिजली गुल होने और इन सबके कारण क्‍लास से वंचित रह जाना भी है. कुछ परिवरों में एक से अधिक बच्‍चे हैं लेकिन स्‍मार्ट फोन एक ही है. अब यदि दो बच्चों की पढ़ाई का समय एक ही हुआ या पिता को फोन लेकर जाना हुआ तो पढ़ाई का हर्जा होना तय है. डेटा की उपलब्‍धता, डेटा के लिए धन का अभाव, ऑनलाइन क्‍लास में शिक्षक की बात समझ न आना, माता पिता का दबाव, पढ़ाई में पिछड़ जाने की आंतरिक पीड़ा जैसे बिंदु भी हैं. इन सबसे उपजा मानसिक कष्‍ट बच्‍चों के लिए असहनीय है. हमारे आसपास का हर बच्‍चा ऐसे ही मानसिक कष्‍ट को भोग रहा है.

इसलिए, जब कोरोना काल में शिक्षा की बात करते हैं तो यह तथ्‍य रेखांकित किया जाना चाहिए कि 21 मार्च को लॉकडाउन लगने के बाद देश में बच्चों का एक बड़ा वर्ग शिक्षा के अपने मूल अधिकार से वंचित हो गया है. ऐसा समय जहां शिक्षा सिर्फ़ स्मार्टफ़ोन या लैपटॉप रखने वालों तक सिमट कर रह गई है. जिनके पास मोबाइल या लेपटॉप, इंटरनेट या बिजली नहीं हैं, वे बच्‍चे ऑनलाइन पढ़ाई से ड्रॉपआउट हैं.


अब जिन बच्‍चों ने मोबाइल या लेपटॉप पर ऑनलाइन क्‍लास ली है उनकी सेहत की चिंता भी की जाए. सीबीएसई और प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ऑनलाइन पाठ्यक्रम को लेकर बड़ी तैयारी की लेकिन कुछ ही दिनों में बच्‍चों की आंखों में दर्द, गर्दन में दर्द जैसी समस्‍याएं उठ खड़ी हुई हैं. लगातार ऑन लाइन पढ़ने और घर में कैद रहने का अधिकांश समय टीवी देखकर गुजारने से उन्‍हें मानसिक परेशानियां हो रही हैं. वे चिड़चिड़े हो रहे हैं. बड़े बच्‍चे चैटिंग या अन्‍य कामों में मोबाइल पर अधिक समय गुजार रहे हैं. 10 से 12 घंटे तक मोबाइल, टीवी या कम्प्यूटर की स्क्रीन के सामने बैठे रहने वाले बच्‍चों की आंखें डिहाइड्रेट हो रही हैं. बच्चे सर्वाइकल स्पांडलाइटिस यानि गर्दन में दर्द, आंखों मे जलन और बैचेनी, घबराहट, सिर दर्द, नींद न आने की शिकायत लेकर डॉक्‍टरों के पास पहुंच रहे हैं. माता-पिता अपने काम के बोझ को देखते हुए बच्‍चों को फोन पकड़ा कर उन्‍हें टाल देते हैं मगर यह अनदेखी बच्‍चों को अकेला और भावनात्‍मक रूप से कमजोर बना रही है.सम्‍पन्‍न समाज के बच्‍चों की इन परेशानियों के उलट गांवों और वंचित वर्ग के बच्‍चों के लिए कोरोनाकाल तो जीवन का संकट लेकर आया है. देश में चिकित्‍सकीय आपातकाल के चलते मैदानी स्‍तर तक टीकाकरण और बुनियादी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. आशा और उषा कार्यकर्ताओं ने स्‍वास्‍थ्‍य की दूसरी सेवाएं संभाली व आंगनवाड़ी केंद्र बंद रहे हैं. बाल अधिकारों के लिए कार्य करने वाले वैश्विक संगठन यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 महामारी दुनिया भर के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के लिए ऐसा नुकसान कर रही है जिसकी भरपाई असंभव होगी. प्रमुख सेवाओं में रुकावट और गरीबी दर के बढ़ जाने का सबसे बड़ा खतरा बच्चों पर है. कोरोना महामारी का संकट जितना लंबा चलेगा उतने लंबे इसकी हानि से निपटने वाले प्रयास भी चलेंगे और इन सबके कारण बच्चों की एक पूरी पीढ़ी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और कल्याण के अपने अधिकारों से वंचित रह जाएगी. 140 देशों पर केन्द्रित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग एक तिहाई देशों में टीकाकरण और मातृ स्वास्थ्य सेवाएं जैसी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में 10 फीसदी तक की गिरावट आई है. अगर सेवाओं में रुकावट और कुपोषण का बढ़ना जारी रहता है तो इससे अगले 12 महीनों में 20 लाख अतिरिक्त बच्चों की मौत हो सकती है और 2 लाख मृत जन्म हो सकते हैं. अक्टूबर तक 26.5 करोड़ बच्चे स्कूल में मिलने वाला भोजन से वंचित रहे. इसके अलावा पांच वर्ष की उम्र के लगभग 25 करोड़ बच्चों को विटामिन ए का लाभ नहीं पाया. रिपोर्ट में बताया गया है कि स्कूल बंद होने के कारण स्कूल जाने वाले 33 फीसदी बच्चे प्रभावित हुए हैं. यूनिसेफ ने वैश्विक स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पोषण, स्वच्छता या पानी की पहुंच के बिना गरीबी में रहने वाले बच्चों की संख्या में 15 फीसदी की वृद्धि होने की आशंका जताई है.

साफ है कि, कोरोना के खतरे केवल उतने नहीं है जितने हमें दिखाई दे रहे हैं. खास कर बच्‍चों के मामले में कई खतरे अब तक अनचिह्ने हैं. उच्‍च वर्ग से लेकर निम्‍न वर्ग के बच्‍चे अपने स्‍तर पर कई तरह की समस्‍याएं भोग रहे हैं. सर्वसुविधाओं के होने और सुविधाओं के अभाव में भी, ये बच्‍चे अपनी दुनिया में अकेले हैं. ऐसे ही संकट के समय में 20 नवंबर को पूरी दुनिया ने विश्‍व बाल दिवस मनाया है. हमें कोरोनों के कारण बच्‍चों की दुनिया पर आए संकट को संवेदनशीलता से समझना होगा. समझना होगा कि अपने काम के लिए वक्‍त निकालने के लिए बच्‍चों को मोबाइल थमा देना या टीवी ऑन कर देना समझदारी भरा कदम नहीं हैं. सरकारों और समाज को भी सोचना होगा कि वंचित तबके के लिए विभिन्‍न अभियानों और योजनाओं में बच्‍चों की समस्‍याओं को पृथक से संबोधित करना आवश्‍यक है. ऐसे सामूहिक प्रयास भी तब ही संभव होंगे जब व्‍यक्तिगत स्‍तर पर हम बच्‍चों के मन को समझेंगे. उनके पास बैठ कर उनकी सुनेंगे और जिन बच्‍चों तक स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, पोषण सहित सुविधाओं की पहुंच नहीं हैं उन तक इन सेवाओं की उपलब्‍धता बढ़ाने की चिंता करनी होगी. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी समस्‍याओं के साथ हर बच्‍चा अकेला है और हमें उसकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाना है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: November 22, 2020, 10:56 AM IST
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