गीता जयंती पर विशेष: बाबा विनोबा भावे की दृष्टि में गीता ज्ञान

यदि नम्रता न हो, तो यह ‘जय’ कब ‘पराजय’ में परिणत हो जायेगी, इसका पता भी नहीं चलेगा. इस तरह सामने ‘निर्भयता’ और पीछे ‘नम्रता’ को रखकर सब सद्गुणों का विकास किया जा सकेगा.

Source: News18Hindi Last updated on: December 25, 2020, 9:56 AM IST
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गीता जयंती पर विशेष: बाबा विनोबा भावे की दृष्टि में गीता ज्ञान
Gita Jayanti 2020: आज 25 दिसंबर को गीता जयंती मनाई जा रही है. आज एकादशी के दिन ही भगवान श्रीकृष्‍ण के श्री मुख से पवित्र श्रीमदभगवद् गीता का जन्‍म हुआ था. इसलिए गीता जयंती मनाई जाती है. भारत की सनातन संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता न केवल पूज्य बल्कि अनुकरणीय भी है. यह दुनिया का इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाई जाती है. श्रीमद्भगवद्गीता के कई श्लोकों में जीवन का सार छिपा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब आप किसी परेशानी या समस्या में हों तो गीता का ज्ञान आपको सही मार्गदर्शन दे सकता है. आज हम आपके लिए लेकर आए हैं श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ उपदेश और उनका अर्थ... (photo credit: instagram/krishna.realfriend)
माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता की उत्पत्ति मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में की थी. गीता की उत्पत्ति के इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी 25 दिसंबर को गीता जयंती मनाई जा रही है. श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय हैं, जिनमें 6 अध्याय कर्मयोग, 6 अध्याय ज्ञानयोग और आखिर के 6 अध्याय भक्तियोग पर आधारित हैं. गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिस पर दुनियाभर की विभिन्‍न भाषाओं में संभवत: सबसे ज्यादा भाष्य, टीका, व्याख्या, टिप्पणी, निबंध, शोधग्रंथ आदि लिखे गए हैं. गीता का सबसे पहला भाष्य आद्य शंकराचार्य ने लिखा , जिसे ‘शांकर भाष्य’ कहा जाता है.

संत ज्ञानेश्वर, बालगंगाधर तिलक, परमहंस योगानंद, महात्मा गांधी, सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन, महर्षि अरविन्द घोष, एनी बेसेन्ट, गुरुदत्त, विनोबा भावे, ओशो रजनीश, श्रीराम शर्मा आचार्य आदि अनगिनत विद्वानों ने गीता को अपनी तरह से देखा है और उस पर अपनी बात रखी है. गीता कर्म का संदेश ही नहीं देती है बल्कि जीवन द्वंद्व में हमेशा पथ प्रदर्शन करती है.

मराठी में व्याख्यान दिए जिन्हें बाद में हिंदी समेत कई भाषाओं में अनुवादित किया
महात्मा गांधी ने 1925 में ‘यंग इण्डिया’ में लिखा था कि जब निराशा मेरे सामने आ खड़ी होती है और जब बिल्कुल एकाकी मुझको प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती, तब मैं गीता की शरण लेता हूं. कोई न कोई श्लोक मुझे ऐसा दिखाई पड़ जाता कि मैं विषम विपत्तियों में भी तुरन्त मुस्कराने लगता हूं – मेरा जीवन विपत्तियों से भरा रहा है – और यदि वे मुझ पर अपना कोई दृश्यमान, अमिट चिन्ह नहीं छोड़ जा सकीं, तो इसका सारा श्रेय भगवद्गीता की शिक्षाओं को ही है.
महात्‍मा गांधी के आध्‍यत्मिक उत्‍तराधिकारी कहे जाने वाले भूदान आंदोलन के जनक आचार्य विनोबा भावे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 18 जनवरी से 14 जुलाई 1932 तक धुले जेल में राजनीतिक कैदी थे. इन दौरान उनके गीता प्रवचन को कैदियों के साथ-साथ जेल अधिकारी रस से सुना करते थे. उन्होंने मराठी में व्याख्यान दिए जिन्हें बाद में हिंदी समेत कई भाषाओं में अनुवादित किया गया.

बाबा विनोबा भावे ने गीता प्रवचन के महत्‍व पर कहा है कि जो बाबा का दर्शन करेगा उसको क्या दिखेगा? बाह्य आकृति से अधिक कुछ नहीं दिखेगा. परंतु बाबा का दर्शन बाबा के 'गीता प्रवचन' में होता है. "गीता प्रवचन मेरी जीवन की गाथा है और वही मेरा संदेश है. ‘गीता-प्रवचन’ को विनोबा जी ने नित्य पठनीय कहा है. गीता के 18 अध्‍यायों पर बाबा विनोबा गीता प्रवचन को सुनना, पढ़ना हमें अधिक कर्मशील, अधिक गहरी आध्‍यात्मिक समझ वाला बना सकता है.

तो ऐसी राष्ट्र-भक्ति भी बड़ी भयंकर वस्तु होगी...गीता जयंती पर बाबा विनोबा के गीता प्रवचन का पाठ करते हैं तो हमें उनके विचार आज अधिक प्रासंगिक अनुभूत होते हैं. जैसे, अठारहवें अध्याय में फलत्याग की पूर्णता : ईश्वर-प्रसाद पर चर्चा करते हुए बाबा विनोबा कहते हैं कि अच्छी चीज की भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए. आसक्ति से घोर अनर्थ होता है. क्षय के कीटाणु यदि भूल से भी फेफड़ों में चले जाते हैं, सारा जीवन भीतर से खा डालते हैं. उसी तरह आसक्ति के कीटाणु भी असावधानी से सात्त्विक कर्म में घुस जायेंगे, तो स्वधर्म सड़ने लगेगा. उस सात्त्विक स्व-धर्म में भी राजस और तामस की दुर्गंध आने लगेगी. अतः कुटुंब रूपी यह बदलने वाला स्व-धर्म यथा समय छूट जाना चाहिए. यह बात राष्ट्र धर्म के लिए भी है. राष्ट्र-धर्म में अगर आसक्ति आ जाये और केवल अपने ही राष्ट्र के हित का विचार हम करने लगें, तो ऐसी राष्ट्र-भक्ति भी बड़ी भयंकर वस्तु होगी. इससे आत्म-विकास रुक जाएगा.

कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के पूर्व अर्जुन ने युद्ध न करने की इच्‍छा जताई थी और उसे दिशा दिखाने के लिए श्रीकृष्‍ण ने गीता का ज्ञान दिया था. बाबा विनोबा के अनुसार अर्जुन ने युद्ध के विरूद्ध जो दलीलें दी थीं वे गलत नहीं थीं. पिछले महायुद्ध के ठीक यही परिणाम दुनिया ने प्रत्यक्ष देखे हैं. परन्तु सोचने की बात इतनी ही है कि वह अर्जुन का तत्त्वज्ञान (दर्शन) नहीं था, कोरा प्रज्ञावाद था. कृष्ण इसे जानते थे. इसलिए उन्होंने उस पर जरा भी ध्यान न देकर सीधा उसके मोह-नाश का उपाय शुरू किया. अर्जुन मोह के वश होकर युद्ध टालना चाहता था और गीता का मुख्यतः इस मोह पर ही गदा प्रहार है. अर्जुन अहिंसा की ही नहीं, संन्यास की भी भाषा बोलने लगा. परन्तु क्या वह अर्जुन का स्वधर्म था? उसकी वह वृत्ति थी क्या? अर्जुन संन्यासी का वेश तो बडे मजे से बना सकता था पर वैसी वृत्ति कैसे ला सकता था.

‘धर्म’ शब्द का अर्थ हिन्दू-धर्म, इस्लाम-धर्म, ईसाई-धर्म आदि जैसा नहीं
बाबा विनोबा कहते हैं कि संन्यास के नाम पर यदि वह जंगल में जाकर रहता, तो वहां, हिरन मारना शुरू कर देता. अतः भगवान ने साफ ही कहा- ʺअर्जुन, तू जो यह कह रहा है कि मैं लडूंगा नहीं, वह तेरा भ्रम है. आज तक जो तेरा स्वभाव बना हुआ है, वह तुझे लड़ाए बिना रहेगा नहीं." अर्जुन को स्वधर्म विगुण मालूम होने लगा. परन्तु स्वधर्म कितना ही विगुण हो, तो भी उसी में रहकर मुष्य को अपना विकास कर लेना चाहिए, क्योंकि उसमें रहने से ही विकास हो सकता है. इसमें अभिमान को कोई प्रश्न नहीं है. यह तो विकास का सूत्र है.

स्वधर्म ऐसी वस्तु नहीं है कि जिसे बड़ा समझकर ग्रहण करें और छोटा समझकर छोड़ दें. वस्तुतः वह न बड़ा होता है, न छोटा. वह हमारे नाप का होता है. गीता- वचन में ‘धर्म’ शब्द का अर्थ हिन्दू-धर्म, इस्लाम-धर्म, ईसाई-धर्म आदि जैसा नहीं है. प्रत्येक व्यक्ति का अपना भिन्न भिन्न धर्म है. आज का धर्म दस वर्ष बाद टिकेगा नहीं. चिंतन और अनुभव से जैसे-जैसे वृत्तियां बदलती जाती है, वैसे-वैसे पहले का धर्म छूटता जाता है और नवीन धर्म प्राप्त होता जाता है. हठ पकड़कर कुछ भी नहीं करना है. दूसरे का धर्म भले ही श्रेष्ठ मालूम हो, उसे ग्रहण करने में मेरा कल्याण नहीं है.

बाबा ने अपने प्रवचन में कहा है कि सच्चाई के बिना सद्गुण का कोई मूल्य नहीं है, किंतु सच्चाई के लिए निर्भयता आवश्यक है. भयभीत वातावरण में सद्गुण फैल नहीं सकते, बल्कि भयभीत वातावरण में सद्गुण भी दुर्गण बन जाएंगे, सत्य प्रवृत्तियां भी कमज़ोर पड़ जाएंगी. निर्भयत्व सब सद्गुणों का नायक है; परंतु सेना को आगा और पीछा, दोनों संभालना पड़ता है. सीधा हमला तो सामने से होता है, परंतु पीछे से चुपचाप चोर-हमला भी हो सकता है. सद्गुणों के सामने ‘अभय’ खम ठोंककर खड़ा है, तो पीछे से ‘नम्रता’ रक्षा कर रही है. इस तरह बड़ी सुंदर रचना की गयी है. यहाँ कुल छब्बीस गुण बताये गये हैं.

इनमें से पच्चीस गुण प्राप्त हो जायें और यदि कहीं उसका अहंकार हो जाये, तो पीछे से एकाएक चोर-हमले से सारी कमाई खो जाने का भय है. इसीलिए पीछे ‘नम्रता’ नामक सद्गुण रखा गया है. यदि नम्रता न हो, तो यह ‘जय’ कब ‘पराजय’ में परिणत हो जायेगी, इसका पता भी नहीं चलेगा. इस तरह सामने ‘निर्भयता’ और पीछे ‘नम्रता’ को रखकर सब सद्गुणों का विकास किया जा सकेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: December 25, 2020, 8:43 AM IST
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