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पुण्‍यतिथि विशेष: शीर्ष वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा को कैसे याद करें?

भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा उन चुनिंदा मनीषियों में शुमार हैं जिन्‍हें हम आधुनिक भारत का निर्माता संबोधित करते हैं. देश के परमाणु कार्यक्रम की मजबूत नींव रखने वाले होमी भाभा की दूरदृष्टि का ही कमाल है कि आज भारत परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 24, 2021, 7:34 AM IST
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पुण्‍यतिथि विशेष: शीर्ष वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा को कैसे याद करें?
होमी भाभा
भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा उन चुनिंदा मनीषियों में शुमार हैं जिन्‍हें हम आधुनिक भारत का निर्माता संबोधित करते हैं. देश के परमाणु कार्यक्रम की मजबूत नींव रखने वाले होमी भाभा की दूरदृष्टि का ही कमाल है कि आज भारत परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है. भाभा की गिनती उन लोगों में होती है जिन्‍होंने अपना अध्‍ययन और कार्य विदेशों में किया लेकिन जब देश में आए तो यहीं के हो कर रह गए. भारत के इस महान स्वप्नदृष्टा वैज्ञानिक का महज 57 वर्ष की उम्र में 24 जनवरी 1966 में स्विट्जरलैंड में एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था.

वे केवल वैज्ञानिक ही नहीं थे बल्कि उनका समूचा व्‍यक्तित्‍व ऐसा था जिससे प्रभावित हो कर भारत के महान वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता सर सीवी रमन उन्हें भारत का लियोनार्डो डी विंची कहा करते थे. सभी जानते हैं कि लियोनार्डो डी विंची इटली के महान चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुशिल्पी, संगीतज्ञ, कुशल यांत्रिक, इंजीनियर तथा वैज्ञानिक थे. ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि पुण्‍यतिथि पर हम इस महान वैज्ञानिक और उतने ही बेहतरीन इंसान को किस तरह याद करें?

देश के शीर्ष वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए टाटा समूह के जेआर डी टाटा ने कहा था कि होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है. इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गाँधी और तीसरे थे होमी भाभा. होमी न सिर्फ़ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता और उद्यानकर्मी भी थे. इसके अलावा वो एक कलाकार भी थे. वास्तव में जितने भी लोगों को मैंने जाना है और उनमें ये दो लोग भी शामिल हैं जिनका मैंने ज़िक्र किया है, उनमें से होमी अकेले शख़्स हैं… जिन्हें “संपूर्ण इंसान’ कहा जा सकता है.


गौरतलब है कि होमी भाभा ने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और वर्ष 1945 में इसके निदेशक बने. तब देश के आजाद होने के बाद उन्होंने दुनिया भर में रह रहे भारतीय वैज्ञानिकों से भारत लौटने की अपील की थी. होमी भाभा के व्‍यक्तित्‍व के विभिन्‍न पहलुओं पर बात करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि मुंबई के एक अमीर पारसी परिवार में 30 अक्टूबर, 1909 को जन्‍म लेने वाले होमी के के पिता जहांगीर भाभा ने कैंब्रिज से शिक्षा प्राप्त की थी और एक जाने-माने वकील थे. पिता उन्‍हें मैकेनिकल इंजीनियरिंग करवाना चाहते थे और उनकी रुचि फिजिक्‍स में थी.
'भौतिकी मेरी दिशा'
पिता की शर्त को पूरी करने वे 1927 में इंग्लैंड गए और कैंब्रिज से स्नातक के बाद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की. अपने पिता की ख्वाहिश के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूर की लेकिन फिजिक्स के प्रति प्रेम को खत्‍म नहीं होने दिया. फिजिक्‍स के प्रति उनके लगाव को हम पिता को लिखे पत्र में समझ सकते हैं. इस पत्र में होमी भाभा ने लिखा था कि मैं आपसे गंभीरतापूर्वक कहता हूं कि इंजीनियर के रूप में व्यवसाय या नौकरी करना मेरी प्रकृति में नहीं है. यह मौलिक रूप से मेरे स्वभाव और विचारों के विपरीत है. भौतिकी मेरी दिशा है.

मुझे पता है कि मैं यहाँ बहुत अच्छे काम करूँगा. प्रत्येक व्यक्ति उसी क्षेत्र में सबसे अच्छा काम कर सकता है और केवल उस चीज में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है, जिसके प्रति वह खुद को जोश से लबरेज पाता है. मुझ में सफल आदमी बनने या किसी बड़ी फर्म का मुखिया बनने की कोई इच्छा नहीं है. इसके लिए कई बुद्धिमान लोग हैं, उन्हें ऐसा करने देते हैं. बीथोवेन को यह कहना व्‍यर्थ है कि उन्‍हें संगीतकार नहीं वैज्ञानिक होना चाहिए क्‍योंकि वैज्ञानिक होना अच्‍छी बात है. या सुकरात को यह कहना कि तुम इंजीनियर बनो; क्‍योंकि यह बुद्धिमान व्यक्तियों का काम है. इसलिए मुझे कृपया ईमानदारी से फिजिक्‍स में काम करने दें.होमी भाभा ने कहा था कि मेरी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि कोई ए या बी मेरे बारे में क्‍या सोचता है. मेरी सफलता मेरे काम से तय होगी. ऐसे ही एक जगह उन्‍होंने कहा था कि किसी का भी जीवन काल छोटा है. मृत्यु के बाद क्या आता है कोई नहीं जानता और न ही मुझे परवाह है. मैं जीवन की अवधि नहीं बढ़ा सकता हूं मगर इसकी तीव्रता बढ़ाकर जीवन काल बढ़ाऊंगा. अपने महज 57 वर्ष के जीवनकाल में होमी जहांगीर भाभा ने ऐसी रेखा खींची जिस पर चल कर भारत आज विश्‍व के विकसित देशों के समकक्ष खड़ा हुआ है.

अध्‍ययन के लिए 1927 में कैम्ब्रिज गए होमी भाभा विश्वयुद्ध के प्रारंभ में वर्ष 1939 में भारत लौटे थे. तब तक वे विज्ञान के क्षेत्र में ख्याति अर्जित कर चुके थे. वर्ष 1941 में मात्र 31 वर्ष की आयु में डॉ भाभा को रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया था जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी. उन्हें 1944 में प्रोफेसर बना दिया गया. उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और वर्ष 1945 में इसके निदेशक बन गए. वर्ष 1948 में भाभा ने भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया. इसके अलावा वे कई और महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख भी रहे.

होमी भाभा को पाँच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. वर्ष 1954 में भारत सरकार ने भाभा को पद्मभूषण से अलंकृत किया था. वर्ष 1955 में जिनेवा में संयुक राज्य संघ द्वारा आयोजित ‘शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग’ के पहले सम्मलेन में होमी भाभा को सभापति बनाया गया. जहाँ पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इस बात का प्रचार कर रहे थे कि अल्पविकसित देशों को पहले औद्योगिक विकास करना चाहिए तब परमाणु शक्ति के बारे में सोचना चाहिए ठीक उसी समय होमी भाभा इस विचार की जोरदार पैरवी कर रहे थे कि अल्प विकसित राष्ट्र परमाणु शक्ति का प्रयोग शान्तिपूर्वक तथा औद्योगिक विकास के लिए कर सकते हैं.

टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाना उनका प्रिय कार्य
यह तो होमी भाभा के व्‍यक्तित्‍व का वह पहलू है जिसके बारे में पूरी दुनिया जानती है मगर उन्‍हें द ग्रेट होमी भाभा केवल फिजिक्‍स के प्‍यार ने नहीं बनाया. शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला, चित्रकला तथा नृत्य आदि में समान रूचि और दक्षता उनके व्‍यक्तित्‍व का दूसरा पक्ष है. वह क्षेत्र जिसके लिए उन्‍होंने कहा था कि कला, संगीत, कविता और बाकी सब के पीछे में उद्देश्य जीवन की मेरी चेतना की तीव्रता को बढ़ाना है. चित्रकारों और मूर्तिकारों को प्रोत्साहित करने का उनका अपना तरीका था. वे उनके चित्रों और मूर्तियों को खरीद कर टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाना उनका प्रिय कार्य था.

मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन की पहली प्रदर्शनी का मुम्बई में उद्घाटन होमी भाभा ने ही किया था. वे अकसर अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाया करते थे. आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी के अनुसार भाभा ने मृणालिनी साराबाई और हुसैन के स्केच बनाए थे.

संगीत में उनकी बहुत रुचि थी. वे इस बात की फिक्र ही नहीं करते थे कि देश परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में किस तरह तरक्‍की करें बल्कि वे इस बात की भी चिंता करते थे कि किस पेंटिंग को उनके संस्‍थान में कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए. वे योजना बनाते थे कि इंस्‍टीट्यूट में कौन से पौधे लगाए जाएं. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च और ट्रॉम्बे एटोमिक एनर्जी एस्टैबलिशमेंट (भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर) में हरियाली का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है. संस्‍थान बनाने के लिए भाभा ने एक भी पेड़ को काटा नहीं सभी बड़े पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया. पहले पेड़ लगाए गए और फिर बिल्डिंग बनाई गई.

1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहते हुए भाभा कभी भी अपना ब्रीफ़केस चपरासी को उठाने नहीं देते थे. वे हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूँ और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष. किस्‍सा है कि किसी सेमिनार में जूनियर वैज्ञानिक के मुश्किल सवाल पर भाभा ने सहजता से कहा कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है. वे कुछ दिनों में सोच कर इसका जवाब देंगे.


ये वे गुण हैं जो एक महान वैज्ञानिक को संवेदनशील इंसान बनाते हैं. ऐसा सरल इंसान जैसा होना आज मुश्किल कार्य लगता है. देश की तरक्‍की के लिए कहा गया उनका एक कथन आज भी सौ फीसदी उपयुक्‍त है. उन्‍होंने कहा था कि हम भारत में यह मानते हैं कि एक सरकारी आदेश से अच्छे वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की जा सकती है.

एक वैज्ञानिक संस्थान, चाहे वह प्रयोगशाला हो या अकादमी, उसकी परवरिश पेड़ की तरह बड़ी सावधानी से करना चाहिए. यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें बड़ी संख्या में औसत दर्जे के कर्मचारी कुछ विशेष नहीं कर सकते हैं. इस क्षेत्र में विशिष्‍ट करने के लिए कम से कम 10-15 साल लगते हैं. क्‍या शॉर्ट कट से सफलता पाने के लालची हो गए हमारे समाज में शीर्ष वैज्ञानिक होमी भाभा को अपने इन संदेशों के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए? (ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: January 24, 2021, 7:31 AM IST
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