जयंती विशेष : महादेवी वर्मा की निगाह से देखें, दुनिया और हसीं नजर आएगी

पद्म भूषण से सम्‍मानित महादेवी वर्मा की कविताएं वेदना का स्वर हैं तो गद्य में भाव, शब्‍द लय और चित्रात्‍मकता का अभूतपूर्व संयोग है. उन्हें चित्रकला का भी शौक था और उन्होंने अपनी कई रचनाओं के लिए चित्र बनाए.

Source: News18Hindi Last updated on: March 26, 2021, 10:43 AM IST
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जयंती विशेष : महादेवी वर्मा की निगाह से देखें, दुनिया और हसीं नजर आएगी
महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की 'मीरा' भी कहा जाता है.
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है,
क्यूं देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम।

साहिर लुधियानवी का यह शेर जिंदगी को अपनी तरह से देखने व जीने की बात करता है मगर ऐसा हर बार सही हो यह जरूरी नहीं है. कम से कम महादेवी वर्मा के मामले में तो यह शेर लागू नहीं होता है. यदि महादेवी वर्मा की दृष्टि से देखी जाए तो हमें दुनिया और भी खूबसूरत, और भी रसयुक्‍त और अधिक साफ दिखाई देगी. महादेवी की आंखों से देखने पर जीवन अधिक विहंगम ही नहीं होगा बल्कि हम उसे अधिक सूक्ष्‍मता से भी देख सकते हैं. उनकी रचनाओं, खासकर गद्य, में प्रकृति, मानव स्‍वभाव, समाज व इंसानी कार्य व्‍यापार, अपने समय के श्रेष्‍ठ व्‍यक्तित्‍व अपनी संपूर्णता साथ मिलते हैं. उनका लिखा इतना विविधवर्णी है कि महादेवी वर्मा के शब्‍द चित्रों और जीवन अनुभवों को पढ़ें बगैर उन विषयों और व्‍यक्तित्‍वों के बारे में जानकारी पूर्ण नहीं हो सकती है. चाहे किस स्रोत से जुटा लीजिए वह जानकारी अधूरी ही रहेगी.
हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख कवियों सुमित्रानन्दन पंत, जय शंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की साथी महादेवी वर्मा की 26 मार्च को जयंती है. उनका जन्‍म उत्‍तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद में होली के दिन वर्ष 1907 में हुआ था. उन्‍होंने 1933 में प्रयाग विश्वविद्यालय से एमए की उपाधि प्राप्त की और फिर इलाहाबाद प्रयाग महिला विद्यापीठ में वे पहली महिला प्रिंसिपल नियुक्त हुईं. कविताएं उनकी लेखनी की प्रमुख विधा थी लेकिन उनका साहित्‍य केवल कविताओं तक सीमित नहीं है. पद्म भूषण से सम्‍मानित महादेवी वर्मा की कविताएं वेदना का स्वर हैं तो गद्य में भाव, शब्‍द लय और चित्रात्‍मकता का अभूतपूर्व संयोग है. उन्हें चित्रकला का भी शौक था और उन्होंने अपनी कई रचनाओं के लिए चित्र बनाए.
जब महादेवी वर्मा संस्‍मरण ‘पथ के साथी’ में महात्‍मा गांधी, गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, प्रथम राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद या प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, अपनी बाल सखा सुभद्रा कुमारी चौहान के बारे में लिखती हैं तो ये केवल उनके व्‍यक्तिगत अनुभव नहीं रह जाते हैं. हम उनके अनुभव में इन सभी व्‍यक्तित्‍यों के जीवन के अनेक उजले पहुलओं से रूबरू होते हैं. ऐसे पहलू जो अन्‍य किसी माध्‍यम से जानना संभव नहीं है. जैसे महादेवी वर्मा के साहित्य कर्म के आरंभ को ही देख लीजिए. ‘सुभद्रा’ शीर्षक से लिखे संस्‍मरण में महादेवी वर्मा ने अपनी प्रिय सखी कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के बारे में बेहद संवेदनशीलता और तटस्‍थता से लिखा है. इलाहाबाद में स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही महादेवी वर्मा ने कॉपियों में कविताएं लिखना शुरू कर दिया था. सभी इस बात से अनजान थे मगर उनकी सहपाठी सुभद्रा कुमारी चौहान से यह छिप न सका. सुभद्रा कुमारी चौहान के लिए महादेवी वर्मा ने इस संस्‍मरण में लिखा है –‘हम दोनों जब साथ रहते थे तब बात में एक मिनिट और हंसी में पांच मिनट का अनुपात रहता था. इसी से प्राय: किसी सभा-समिति में जाने के पहले न हंसने का निश्चय करना पड़ता था. एक दूसरे की ओर बिना देखे गंभीर भाव से बैठे रहने की प्रतिज्ञा करके भी वहां पहुंचते ही एक-न-एक वस्तु या दृश्य सुभद्रा के कुतूहली मन को आकर्षित कर लेता और मुझे दिखाने के लिए वे चिकोटी तक काटने से नहीं चूकतीं. अनेक कवि-सम्मेलनों में हमने साथ भाग लिया था, पर जिस दिन मैंने अपने न जाने का निश्चय और उसका औचित्य उन्हें बता दिया उस दिन से अंत तक कभी उन्होंने मेरे निश्चय के विरुद्ध कोई आग्रह नहीं किया. आर्थिक स्थितियां उन्हें ऐसे निमंत्रण स्वीकार करने के लिए विवश कर देती थीं, परंतु मेरा प्रश्न उठते ही वे कह देती थीं, मैं तो विवशता से जाती हूं, पर महादेवी नहीं जाएगी, नहीं जाएगी.'

हम में से अधिकांश का महादेवी के गद्य से परिचय पाठ्य पुस्‍तक में शामिल संस्‍मरण ‘सोना हिरणी’ के माध्‍यम से हुआ है। इस संस्‍मरण के अलावा, गिल्‍लू, रामा, भाभी, बिन्‍दा, घीसा, अभागी स्त्रियां जैसे तमाम संस्‍मरण केवल साहित्‍य नहीं अपुति उस काल के लोक जीवन, समाज और मानवीय स्‍वभाव को समझने के सूत्र हैं.


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे फक्‍कड़ मनीषी महादेवी के भाई थे. -‘निराला भाई/ जो रेखाएं न कह सकेंगी’ शीर्षक से संस्‍मरण में वे लिखती हैं – ‘उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निराला जी से पूछ बैठी थी, "आप के किसी ने राखी नहीं बाँधी?" अवश्य ही उस समय मेरे सामने उनकी बंधन-शून्य कलाई और पीले, कच्चे सूत की ढेरों राखियाँ लेकर घूमने वाले यजमान-खोजियों का चित्र था. पर अपने प्रश्न के उत्तर में मिले प्रश्न ने मुझे क्षण भर के लिए चौंका दिया.'कौन बहन हम जैसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी?' में, उत्तर देने वाले के एकाकी जीवन की व्यथा थी या चुनौती यह कहना कठिन है. पर जान पड़ता है किसी अव्यक्त चुनौती के आभास ने ही मुझे उस हाथ के अभिषेक की प्रेरणा दी जिसने दिव्य वर्ण-गंध-मधु वाले गीत-सुमनों से भारती की अर्चना भी की है और बर्तन मांजने, पानी भरने जैसी कठिन श्रम-साधना से उत्पन्न स्वेद-बिंदुओं से मिट्टी का श्रृंगार भी किया है.मेरा प्रयास किसी जीवंत बवंडर को कच्चे सूत में बांधने जैसा था या किसी उच्छल महानद को मोम के तटों में सीमित करने के समान, यह सोचने विचारने का तब अवकाश नहीं था. पर आने वाले वर्ष निराला जी के संघर्ष के ही नहीं, मेरी परीक्षा के भी रहे हैं. मैं किस सीमा तक सफल हो सकी हूं, यह मुझे ज्ञात नहीं, पर लौकिक दृष्टि से नि:स्व निराला हृदय की निधियों में सब से समृद्ध भाई हैं, यह स्वीकार करने में मुझे द्विविधा नहीं. उन्होंने अपने सहज विश्वास से मेरे कच्चे सूत के बंधन को जो दृढ़ता और दीप्ति दी है वह अन्यत्र दुर्लभ रहेगी. ’ निराला के साथ का एक किस्‍सा और अनूठा है. वे लिखती हैं, वह संध्या भी मेरी स्मृति में विशेष महत्व रखती है जब श्रद्धेय मैथिलीशरण जी निराला जी का आतिथ्य ग्रहण करने गए. बगल में गुप्त जी के बिछौने का बंडल दबाए, दियासलाई के क्षण प्रकाश क्षण अंधकार में तंग सीढ़ियों का मार्ग दिखाते हुए निराला जी हमें उस कक्ष में ले गए जो उनकी कठोर साहित्य-साधना का मूक साक्षी रहा है. आले पर कपड़े की आधी जली बत्ती से भरा, पल तेल से खाली मिट्टी का दिया मानो अपने नाम की सार्थकता के लिए ही जल उठने का प्रयास कर रहा था. यदि उसके प्रयास को स्वर मिल सकता तो वह निश्चय ही हमें, मिट्टी के तेल की दुकान पर लगी भीड़ में सब से पीछे खड़े पर सब से बालिश्त भर ऊंचे गृहस्वामी की दीर्घ, पर निष्फल प्रतीज्ञा की कहानी सुना सकता. रसोईघर में दो-तीन अधजली लकड़ियां, औंधी पड़ी बटलोई और खूंटी से लटकती हुई आटे की छोटी-सी गठरी आदि मानो उपवास-चिकित्सा के लाभों की व्याख्या कर रहे थे.

वह आलोकरहित, सुख-सुविधा-शून्य घर, गृहस्वामी के विशाल आकार और उससे भी विशालतर आत्मीयता से भरा हुआ था. अपने संबंध में बेसुध निराला जी अपने अतिथि की सुविधा के लिए सतर्क प्रहरी हैं. वैष्णव अतिथि की सुविधा का विचार कर वे नया घड़ा ख़रीद कर गंगाजल ले आए और धोती-चादर जो कुछ घर में मिल सका सब तख़्त पर बिछा कर उन्हें प्रतिष्ठित किया. तारों की छाया में उन दोनों मर्यादावादी और विद्रोही महाकवियों ने क्या कहा-सुना यह मुझे ज्ञात नहीं, पर सबेरे गुप्त जी को ट्रेन में बैठा कर वे मुझे उनके सुख-शयन का समाचार देना न भूले.’ एक चित्र में कथा सम्राट प्रेमचंद के पैरों में फटे जूते देख अग्रणी व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई ने अपने निबंध में प्रेमचंद के व्यक्तित्व की सादगी के साथ दिखावे की प्रवृत्ति एवं अवसरवादिता पर व्यंग्य किया है. प्रेमचंद के सहज व्‍यक्तित्‍व की विराटता महादेवी वर्मा के संस्‍मरण में भी रेखांकित होती हैं. ‘स्‍मरण प्रेमचंद’ में वे लिखती हैं –‘एक दोपहर को जब प्रेमचंदजी उपस्थित हुए तो मेरी भक्तिन ने उनकी वेशभूषा से उन्हें भी अपने ही समान ग्रामीण या ग्राम-निवासी समझा और सगर्व उन्हें सूचना दी- गुरुजी काम कर रही हैं. प्रेमचंदजी ने अपने अट्टहास के साथ उत्तर दिया--तुम तो खाली हो. घडी-दो घड़ी बैठकर बात करो. और तब जब कुछ समय के उपरान्त मैं किसी कार्यवश बाहर आई तो देखा नीम के नीचे एक चौपाल बन गई है. विद्यापीठ के चपरासी, चौकीदार, भक्तिन के नेतृत्व में उनके चारों ओर बैठे हैं और लोक-चर्चा आरम्भ है.’

महादेवी वर्मा के शब्‍दों में प्रेमचंदजी के व्यक्तित्व में एक सहज संवेदना और ऐसी आत्मीयता थी, जो प्रत्येक साहित्यकार का उत्तराधिकार होने पर भी उसे प्राप्त नहीं होती. अपनी गम्भीर मर्मस्थर्शनी दृष्टि से - उन्होंने जीवन के गंभीर सत्यों, मूल्यों का अनुसंधान किया और ‘अपनी सहज-सरलता से, आत्मीयता' से उसे सब ओर दूर-दूर तक पहुंचाया. उन्होंने साधारण कथा, मनुष्य की साधारण घर-घर की कथा, हल-बैल की कथा, खेत-खलि-हान की कथा , निर्झर, वन, पर्वतों की कथा सब तक इस प्रकार पहुंचाई कि वह आत्मीय तो थी ही, नवीन भी हो गई. प्रेमचंद के लिए कही गई महादेवी वर्मा की बात दरअसल स्‍वयं उनके लिए भी लागू होती है. महादेवी वर्मा के व्‍यक्तित्‍व की सहजता, संवेदनशीलता, भावनात्‍मकता और सूक्ष्‍म दृष्टि ने जीवन को इस तरह लिखा कि उनके अनुभव हमारे अनुभवों में प्रतिबिंबित हो गए हैं. उनके संस्‍मरणों में पाठकों ने अपना जीवन जी लिया हैं. उनके रेखा चित्रों में अपना होना पा लिया. महादेवी के गद्य में वह समय धड़कता है जिसे हम बहुत पीछे छोड़ आए हैं. कभी महादेवी वर्मा के संस्‍मरणों की किताब के पन्‍नों को खोलिए, आपके आसपास संवेदना की सोना, गिल्‍लू, नीलू, गौरा जैसे प्रा‍णी कुलांचे भरने लगे. हमारे इतिहास पुरूषों के व्‍यक्तित्‍व की आभा को जान कर आप चमत्‍कृत हो उठेंगे और महादेवी वर्मा के लेखन के प्रति सम्‍मान व अचरज से भर जाएंगे.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: March 26, 2021, 10:43 AM IST
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