जयशंकर प्रसाद: कामायनी और पुरुषत्‍व-मोह में बिसरा दी गई सत्ता नारी की

जयशंकर प्रसाद का नाम लिया जाता है तो ‘कामायनी’ का उल्‍लेख स्‍वत: हो जाता है. वर्ष 1936 में प्रकाशित ‘कामायनी’ इतिहास और कल्पना का अद्भुत समन्वय है जिसका आधार वेद और पुराण हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 30, 2021, 8:19 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
जयशंकर प्रसाद: कामायनी और पुरुषत्‍व-मोह में बिसरा दी गई सत्ता नारी की
जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के चार स्‍तंभों में से थे.

30 जनवरी को जब पूरा देश शहीद दिवस मनाता है उसी दिन साहित्‍य के पुरोधा जयशंकर प्रसाद को भी याद करने का अवसर होता है. छायावाद के चार स्‍तंभों में से एक कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और निबंधकार जयशंकर प्रसाद का जन्‍म 30 जनवरी 1889 में वाराणसी में हुआ था. मात्र 48 वर्ष की आयु में 15 नवंबर 1937 को उनका निधन हुआ. इस अल्‍प अवधि में रचा गया उनका साहित्‍य प्रसाद युग के नाम से जाना जाता है. उनकी अंतिम रचना ‘कामायनी’ छायावाद का अकेला महाकाव्‍य हैं. छायावाद का प्रतीक काव्‍य ‘कामायनी’ अपनी कई विशेषताओं के कारण स्‍तुत्‍य है.


जयशंकर प्रसाद का जन्‍म वाराणसी के प्रसिद्ध वैश्‍य परिवार में हुआ था. तम्‍बाकू का व्‍यापार करने के कारण उनका परिवार ‘सुँघनी साहू’ के नाम से प्रसिद्ध था. प्रसाद का बाल्‍यकाल सुख के साथ व्‍यतीत हुआ. मगर चार वर्ष के अंतराल में पहले पिता और फिर माता की मृत्‍यु के बाद बालक जयशंकर प्रसाद की मुश्किलें बढ़ गईं. जयशंकर प्रसाद के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा का दायित्‍व बड़े भाई शम्‍भूरत्‍न पर आ गया. स्‍कूल की पढ़ाई में मन नहीं लगने के कारण जयशंकर प्रसाद की शिक्षा घर पर ही हुई. जहां एक ओर प्रसाद का जीवन संघर्ष की पथरीली राहों से गुजरा वहीं उनका रचना संसार हिन्‍दी साहित्‍य के वैभव का जगमग सूर्य है. उनके इस रचना संसार में आंसू, कामायनी, चित्राधर, लहर, झरना जैसी काव्‍य कृतियां, आंधी, इन्‍द्रजाल, छाया, प्रतिध्‍वनि जैसी कहानियां, तितली, कंकाल इरावती उपन्‍यास और स्कन्‍दगुप्‍त, अजातशुत्र, प्रायश्चित्त, जनमेजय का नाग यज्ञ, विशाख, ध्रुवस्‍वामिनी जैसे नाटक शामिल हैं.


मगर जब भी जयशंकर प्रसाद का नाम लिया जाता है तो ‘कामायनी’ का उल्‍लेख स्‍वत: हो जाता है. वर्ष 1936 में प्रकाशित ‘कामायनी’ इतिहास और कल्पना का अद्भुत समन्वय है जिसका आधार वेद और पुराण हैं. मनु, श्रद्धा और इडा इस महाकाव्य के केंद्र हैं. मनु इच्छा, श्रद्धा क्रिया और इडा ज्ञान के प्रतिनिधि हैं. प्रलय के बाद सृष्टि रचना के साथ ही मनु और श्रद्धा के रूप में पुरुष और नारी के आपसी सहयोग और समन्‍वय को पौराणिक संदर्भ में रचा गया है. इस महाकाव्‍य में प्रसाद एक ऐसे युग की कल्‍पना करते हैं जहां भौतिकता और बौद्धिकता नहीं, श्रद्धा और संयम ही आनंद का आधार है. जहां ईर्ष्‍या नहीं शांति है. कामायनी में कुल पंद्रह सर्ग हैं. ये 15 सर्ग हैं – चिन्ता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इडा (तर्क, बुद्धि), स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद (त्याग), दर्शन, रहस्य और आनन्द.


‘कामायनी’ का आरंभ जलप्रलय से होता है. वह जलप्रलय जो देवताओं के विलास के परिणाम स्‍वरूप हुआ है. इस अंत के बाद भी मनु अकेले बचते हैं. घोर निराशा के बीव उन्‍हें लताओं, वनस्पतियों में धरती और जीवन का संकेत दिखाई देता है. उम्‍मीद और नाउम्‍मीदी के बीच श्रद्धा प्रकट होती है. श्रद्धा मनु के जीवन में आस लौटा लाती है. बुद्धि की प्रतीक इड़ा मनु को मर्यादा में देखना चाहती है. लेकिन मनु बुद्धि यानि इड़ा को भी अपनी अधीनता में रखना चाहते हैं. प्रजा से युद्ध में घायल मनु को श्रद्धा का साथ मिलता है. साथ निकलते हैं. काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, संघर्ष, रहस्‍य जैसे जीवन के विभिन्‍न पड़ावों से होते हुए जब प्रसाद कामायनी के अंतिम सर्ग तक आते हैं तो कहते हैं कि प्रकृति में सब कुछ समरस है.‘चिन्ता’ सर्ग आरंभ हो कर अपने अंतिम ‘आनन्द’ सर्ग तक पहुंचती ‘कामायनी’ वास्‍तव में भौतिकता के थोथे सुख से आतंरिक आनंद की यात्रा का महाकाव्‍य है. अचेतन आडंबर की तुलना में चेतन्‍यता के बोध की यात्रा.


यही कारण है कि कामायनी को जितनी बार पढ़ा जाए नए संदर्भों में इसके नए अर्थ खुलते हैं. जीवन के विविध आयामों के प्रति विचार दृष्टि साफ होती है. शायद इसीलिए ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ में मुक्तिबोध ने लिखा है कि प्रसाद मनु, इडा, श्रद्धा को अपनी दार्शनिक मनोवृत्तियों के अनुकूल चाहे जैसा प्रतीकत्व प्रदान करें, कामायनी की व्याख्या वर्णित मानव चरित्रों के आधार पर ही की जा सकती है.

भाषा, प्रतीक और बिम्ब के लिहाज से कामायनी जितनी वैभवशाली है, बोध की दृष्टि से उतनी ही महीन. कामायनी अपने तमाम साहित्यिक, कला, भाव और प्रतीक-बिम्‍ब पक्ष के अलावा एक और खास तथ्‍य के कारण अहम् स्‍थान रखती है. वह तथ्‍य है, सृष्टि में स्‍त्री की भूमिका. यूं तो पुरूष और स्‍त्री मानवीय विशेषताओं और कमजोरियों के कारण समान है मगर सृष्टि निर्माण में समान या कुछ अधिक भूमिका के बावजूद स्‍त्री को कमतर स्‍थान दिया गया है. इन स्थिति में समूचा प्रसाद साहित्‍य स्‍त्री की विशिष्‍ट को गाढ़े रूप में रेखांकित करता प्रतीत होता है. खासकर कर कामायनी में वे स्‍त्री के इस योगदान को प्रस्‍तुत करते हैं. कामायनी के कुछ बरस पहले 1933 में मैथिलीशरण गुप्त ने ‘यशोधरा’ महाकाव्‍य लिखा था. गौतम बुद्धके गृह त्याग की कहानी को केन्द्र में रखकर लिखे गए इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की विरहजन्य पीड़ा को उकेरा गया गया हे. इसी काव्‍य की पंक्ति ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ नारी के संघर्ष को दिखाने वाली सार्वकालिक और सार्वभौमिक प्रतीक हैं. इसी समय में कामायनी के लज्‍जा सर्ग में प्रसाद कहते हैं-

‘नारी! तुम केवल श्रद्धा हो/ विश्वास-रजत-नग पगतल में.

पीयूष-स्रोत-सी बहा करो/ जीवन के सुंदर समतल में.


कामायनी में श्रद्धा मनु की प्रेरणा है. वह मनु को जीवन के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाती है. मनु जितना कमजोर, श्रद्धा उतनी की सशक्‍त. मनु में जितना विचलन, श्रद्धा में उतना ही स्‍थायित्‍व. वह श्रद्धा ही है जो मनु के मन की चंचलता के आगे अडिग खड़ी रहती है. नारी के प्रति प्रसाद का दृष्टिकोण कामायनी की श्रद्धा में ही दिखाई देता है. उन्होंने श्रद्धा का चरित्र चित्रण ऐसी नारी के रूप में किया है जो पुरूष की अनुगामिनी नहीं, सहगामिनी बल्कि सहगामिनी से बढ़ कर नर की जीवन यात्रा की सारथी है.


‘कामायनी’ के इडा सर्ग में प्रसाद ने लिखा है- ‘मनु तुम श्रद्धा को गये भूल/ उस पूर्ण आत्म-विश्वासमयी को/ उड़ा दिया था समझ तूल/ तुमने तो समझा असत् विश्व/ जीवन धागे में रहा झूल/ जो क्षण बीते सुख-साधन में/ उनको ही वास्तव लिया मान/ वासना-तृप्ति ही स्वर्ग बनी, यह उलटी मति का व्यर्थ-ज्ञान/ तुम भूल गये पुरुषत्‍व-मोह में/ कुछ सत्ता है नारी की/ समरसता है संबंध बनी/ अधिकार और अधिकारी की.” (यह लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: January 30, 2021, 7:50 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर