जयंती विशेष : हिंदी साहित्य का आंगन बुहारने वाले 'नामवर' आलोचक

साहित्य की परंपरा और स्थापित प्रतिमानों को ढहाने और नए कीर्ति स्तम्भ खड़े करने वाले आलोचक नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को नई धार और नई पैठ दी है. वाद, विवाद और संवाद वाली अपनी शैली के कारण वे सबसे ज्यादा पढ़े गए, सुने गए, विवादों में घिरे रहे आलोचक हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 29, 2021, 1:34 PM IST
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जयंती विशेष : हिंदी साहित्य का आंगन बुहारने वाले 'नामवर' आलोचक

ट्ठाइस जुलाई को हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर सिंह की जयंती है. 19 फरवरी 2019 दुनिया छोड़ गए नामवर सिंह सशरीर न होने के बाद भी चर्चा में रहते हैं, तो इसका कारण उनका कृतित्व और व्यक्तित्व ही है. साहित्य की परंपरा और स्थापित प्रतिमानों को ढहाने और नए कीर्ति स्तम्भ खड़े करने वाले आलोचक नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को नई धार और नई पैठ दी है. वाद, विवाद और संवाद वाली अपनी शैली के कारण वे सबसे ज्यादा पढ़े गए, सुने गए, विवादों में घिरे रहे आलोचक हैं.


बनारस के जीयनपुर गांव में 1926 में जन्म लेने वाले नामवर सिंह ने उन्नीस सौ इकतालीस में कविता लिखना शुरू किया. वे बीएचयू वाराणसी से सागर विश्वविद्यालय पहुंचे. जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर और फिर महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रहे. इस बीच, लोकसभा का चुनाव भी लड़े और हारे. उन्होंने चार दशक से ज्यादा समय तक आलोचना पत्रिका का सम्पादन किया. पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया.


मगर, नामवर सिंह के कृतित्व के इस वितान का सबसे मजबूत पहलू आलोचना है. नामवर सिंह ने कविता लिखना छोड़कर आलोचना की राह पकड़ी थी. इसकी वजह पूछने पर उन्होंने एक साक्षात्कार में पंडित किशोरी दास वाजपेयी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा था – ‘सोचा मैंने उषाकाल में मां के भजर सजाऊं, अभिनव अर्थ उपार्जित करके अपनी भेंट चढाऊं, किन्तु भक्त पद प्रक्षेपों से धूल यहां भर आई, रहा बुहार उसी को तबसे यों सब उम्र गंवाई.’


आलोचना कर्म से बुहारते रहे हिंदी साहित्य का आंगन

वे अपने आलोचना कर्म से सदैव हिंदी साहित्य का आंगन बुहारते रहे. इस दिशा में उनका सबसे बड़ा कर्म पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ को माना गया है. ‘कविता के नए प्रतिमान’ का प्रकाशन (1968) में हुआ था, जिसने समकालीन हिंदी कविता की आलोचना की नई जमीन तैयार की है. इस पुस्तक के माध्यम से आधुनिक कविता को प्रगतिशील विचार की दृष्टि से पढ़ा और समझा जाने लगा. इस आलोचना पुस्तक में नामवर सिंह ने अज्ञेय के समक्ष रघुवीर सहाय और गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं को केंद्र में रखा.


यह नामवर के ही सामर्थ्य की बात थी कि जिन अज्ञेय के विचार पर सवाल उठाए कालांतर उनके समग्र अवदान को भी रेखांकित किया. ऐसा ही प्रतिमान स्थापित करने का एक कार्य पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ ने किया. 1982 में प्रकाशित इस पुस्तक को स्वयं नामवर सिंह अपना वास्तविक काम मानते थे. इसमें उन्होंने तुलसीदास की बजाय सूरदास और कबीर की प्रासंगिकता को महत्व दिया.

नामवर सिंह का आलोचना कार्य जितना अहम है, उतने ही अधिक वे विवादों में भी रहे. वे हिंदी के ऐसे  आलोचक हैं, जिनके विचार पर खूब लिखा गया. वे दशकों तक हिंदी आलोचना के केंद्र रहे. एक दौर था जब हर कवि अपनी रचनाओं पर नामवर सिंह की टिप्पणी पाने के लिए लालायित रहते थे. मानो पारस पत्थर ने छू दिया हो. यह दौर के साल तक रहा. इस वजह से उन पर ‘गिराने’ और ‘उठाने’ के आरोप भी खूब लगे.


क्‍या चर्चा में बने रहने का माध्यम बना विवाद?

अस्सी के दशक में संत तुलसीदास के आगे कबीरदास की महत्ता स्थापित करने वाले नामवर सिंह का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा हुआ था. कहा जाने लगा था कि नामवर बिना विवादों के रह ही नहीं सकते हैं. विवाद उनके चर्चा में बने रहने का माध्यम माना गया. उन पर विचार बदलने के आरोप भी लगे थे. उन पर साहित्य की आलोचना नहीं, बल्कि राजनीति खासकर सत्ता के पक्ष का विमर्श करने का भी आरोप लगाए गए.


अपना 75वां जन्मदिन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की उपस्थिति में मनाने, 90 वें जन्मदिन पर वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हाथों सम्मानित होने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचक होने के बावजूद उनके साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह को संबोधित करने पर इस दिग्गज आलोचक की आलोचना हुई. वे प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के काम पर टिप्पणी करने से भी बचते रहे, तो कभी तीखी टिप्पणियों से माहौल गरमाते रहे.

यही कारण है कि उम्र के अंतिम पड़ाव में उनके लिखे पर नहीं, बल्कि कहे पर ज्यादा चर्चा और आलोचना हुई.


मृत्यु उपरांत भी विवादों से जुड़े रहे नामवर सिंह

जीवित रहते ही नहीं मृत्यु उपरांत भी विवाद नामवर सिंह के साथ जुड़े ही हुए हैं. ताजा मामला उनकी जीवनी में शामिल तथ्यों से जुड़ा है. हिंदी के युवा आलोचक अंकित नरवाल ने नामवर की जीवनी ‘अनल पाखी’ लिखी है. नामवर सिंह के निधन के दो वर्ष बाद जब यह जीवनी सामने आई, तो नामवर सिंह के व्यक्तित्व के विरोधाभासी तथ्यों पर हंगामा हो गया.  इस जीवनी में नामवर सिंह के पुत्र द्वारा संपादित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘आमने सामने’ में डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर सिंह के बीच हुई बातचीत का जिक्र किया गया.


कहा गया कि नामवर सिंह कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और महात्मा गांधी की जब हत्या हुई ,थी तो संघ परिवार के लोगों की धरपकड़ में नामवर भी गिरफ्तार कर लिए गए थे. उन्हें 3 महीने पुणे तथा लखनऊ जेल में काटने पड़े थे. जब वे जेल से छूटे तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके सम्मान में जेल के द्वार पर स्वागत भी किया था, लेकिन महापंडित राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक ने उनके जीवन को बदल दिया और वे संघी से मार्क्सवादी बन गए. समर्थकों ने विरोध जताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी कि तथ्य इस जीवनी से एकदम उलट है.

नामवर सिंह के कभी संघ में होने को लेकर सोशल मीडिया में जब विवाद हुआ, तब डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस बात का खंडन किया और कहा कि नामवर जी के बारे में गलत छपने से यह भ्रम पैदा हुआ. दरअसल, वे  त्रिपाठी संघ में थे और जेल गए थे. विवाद भडक़ा तो प्रकाशक ने न सिर्फ पुस्तक वापस ले ली है, बल्कि राजकमल प्रकाशन ने भी अपनी पहले छपी पुस्तक भी वापस ले ली है, जिसके आधार पर इसमें कुछ गलत तथ्य छपे थे.


इन तमाम विवादों से ऊपर नामवर सिंह अपने बेबाक विचारों और आलोचना के अपने विराट कर्म के लिए जाने जाएंगे. वे साहित्य ही नहीं विचार के आंगन में भी जीवन भर ‘कूड़ा’ बुहारते रहे. आलोचना के लिए सीमित अवसरों वाले इस समय में असहमतियों के बीच अपनी दृष्टि के आलोचना कर्म की राह बनाने वाले नामवर सिंह को सबसे अधिक याद करने की आवश्यकता अनुभव होती है.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: July 28, 2021, 7:00 AM IST
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