कदमों का उठते, उठते रूक जाना, कितने दिन और चलेगा?

ओम प्रभाकर के गीत अपनी संक्षिप्तता किन्तु समान प्रभावान्विति में अद्वितीय हैं. उनके किसी भी गीत को लेकर आईए रिचर्डस् के व्यावहारिक आलोचना सिद्धान्त की सार्थकता पर विश्वास किया जा सकता है. छोटे से छोटे गीत में भी कथ्य को उसकी सम्पूर्णता में व्यक्त करना ओम प्रभाकर की अपनी विशेषता है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 24, 2021, 3:52 PM IST
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कदमों का उठते, उठते रूक जाना, कितने दिन और चलेगा?
अपने समकालीन समाज को जागृत करने वाले उनके नवगीत अपने समय का चेहरा ही नहीं दिखलाते हैं.
हाथों का उठना/ कंपना/ गिर जाना

कितने दिन चलेगा?

कितने दिन और सहेंगे/ वे कब चीत्‍कार करेंगे

कब तक होंगे वे तैयार/ कब तक हुंकार भरेंगे?




कदमों का उठते-/ उठते रूक जाना

कितने दिन और चलेगा?

दरवाज़ों को खुलना है/ गिरना है दीवारों कोलेकिन/ कितने दिन तक और

चलना है अतिचारों को?

आंखों का उठना/ झुकना/ मुंद जाना

कितने दिन और चलेगा?

इन पंक्तियों के लेखक 80 वर्षीय कवि-गीतकार ओम प्रभाकर का 23 फरवरी 2021 की शाम मध्‍य प्रदेश के देवास में निधन हो गया है. ओम प्रभाकर अपने व्‍यक्तित्‍व, कृतित्‍व और गीत परंपरा में योगदान के लिए सदैव याद किए जाएंगे.


5 अगस्त 1941 को मध्य प्रदेश के भिंड में जन्‍मे ओम नारायण अवस्थी को साहित्‍य जगत में ओम प्रभाकर के नाम से जाना गया. कविता और नवगीत के लिए चर्चित ओम प्रभाकर ‘कविता — 64’ के संपादन के लिए पहचाने गए. अज्ञेय का कथा साहित्य, पुष्प चरित, कंकाल राग, काले अक्षर भारतीय, तिनके में अशियाना आदि उनकी प्रतिनिधि पुस्तकें हैं. भिंड के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं शोध केंद्र के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे ओम प्रभाकर सेवानिवृत्ति के बाद देवास में बस गए थे.


अपने पचास वर्षों से अधिक समय के सृजनकाल में ओम प्रभाकर ने हिन्दी ही नहीं बल्कि उर्दू में भी समान रूप से लिखा और समान सम्‍मान पाया. ओम प्रभाकर की ग़ज़ल-गीतों में प्रेम के बहाने जीवन के विविध आयामों, सुख-दुःख की अभिव्यक्ति दिखाई देती है. गीतों का मुख्‍य स्‍वर भले ही प्रेम कहा गया है मगर ओम प्रभाकर की रचनाएं अपने समय का आईना हैं और उसमें व्‍यवस्‍था का विरोध मुखर होता रहा है. समूची व्‍यवस्‍था के प्रति मुख़ालिफ़त, विरोध का स्‍वर उनकी रचनाओं में अकसर दिखाई देता है. इस विरोध के स्‍वर से सत्‍ता सदैव सहमी है और उसे ऐस स्‍वर रास नहीं आते. सत्‍ता इन स्‍वरों को फैलने नहीं देना चाहती. अकुंश के जाने कितने क्षण एक रचनाकार के जीवन में आते हैं और ओम प्रभाकर भी इस अनुभव से अछूते नहीं रहे. ऐसे ही एक अनुभव का उल्‍लेख स्‍वयं ओम प्रभाकर ने लेखक सत्यनारायण पटेल के उपन्यास ‘ गांव भीतर गांव’ पर टिप्‍पणी करते हुए किया है.


वे लिखते हैं –


बरसों पहले ग्वालियर रेड़ियो के निदेशक ने मुझसे पूछा था, ‘ ओम जी आपकी ये कविता क्या शासन के ख़िलाफ़ है?


मैंने कहा था, ‘ जी, नहीं! ये कविता आज की सारी व्यवस्था के ख़िलाफ़ है.


‘ठीक है. आप रिकार्डिंग करवा दीजिए.


अपने समकालीन समाज को जागृत करने वाले उनके नवगीत अपने समय का चेहरा ही नहीं दिखलाते हैं बल्कि प्रेरणा उनका अंतर्निहित तत्‍व है. जैसे उनकी यह कविता –


हम जहां हैं


वहीं से आगे बढ़ेंगे.


देश के बंजर समय के


बांझपन में


याकि अपनी लालसाओं के


अंधेरे सघन वन में


या अगर हैं


परिस्थितियों की तलहटी में


तो वहीं से बादलों के रूप में


ऊपर उठेंगे.


हम जहां हैं


वहीं से आगे बढ़ेंगे.


यह हमारी नियति है


चलना पड़ेगा


रात में दीपक


दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा.


जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी


हम लड़ेंगे


हम जहां हैं


वहीं से आगे बढ़ेंगे.


नवगीत और ओम प्रभाकर के योगदान का उल्‍लेख गीतकार प्रेमप्रेमशंकर रघुवंशी ने अपनी पुस्‍तक ‘नवगीत – स्‍वरूप विश्‍लेषण’ में किया है. वे लिखते हैं कि नवगीतों की सबसे प्रमुख महत्ता यही है कि इन्होंने स्खलन और अप्रसिद्धि की ओर बढ़ती हुई गीतचेतना को फिर से साहित्यिक संस्कार और प्रतिष्ठा दी है. इसका कारण यह है कि इन गीतों में लोकानुभूति की वह सतही भूमिका नहीं है जो कि पिछले खेवे के कवि-सम्मेलनी कवियों में दिखाई पड़ रही थी. इनके पास न तो घिसी-पिटी भाषा है और न बाजारू मुहावरे. इसके साथ इनमें अनावश्यक खींचातान भी नहीं की गई है. कवि- सम्मेलन गीतकार जहां एक प्रमुख पंक्ति को उठाकर अनेक भाव-भूमियों की परिक्रमा करता था और अपने श्रोताओं पर तात्कालिक प्रभाव छोड़ जाता था, वहीं इन गीतों का शिल्प अधिक सुगठित और गम्भीर है.


ओम प्रभाकर और नरेश सक्सैना के गीत यहां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. ओम प्रभाकर के गीत अपनी संक्षिप्तता किन्तु समान प्रभावान्विति में अद्वितीय हैं. उनके किसी भी गीत को लेकर आईए रिचर्डस् के व्यावहारिक आलोचना सिद्धान्त की सार्थकता पर विश्वास किया जा सकता है. छोटे से छोटे गीत में भी कथ्य को उसकी सम्पूर्णता में व्यक्त करना ओम प्रभाकर की अपनी विशेषता है.


करीब तीन दर्जन महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक गीत संकलनों के रचियता ओम प्रभाकर ने हिंदी कविता और नवगीत पर कई महत्वपूर्ण आलेख भी लिखे हैं. उनके कृतित्‍व को रेखांकित करते हुए गीत संकलन ‘पांच जोड़ बांसुरी’ के संपादक गीतकार चंद्रदेव सिंह लिखते हैं कि निराला के बाद डॉ. हरिवंश राय बच्‍चन, ठाकुर प्रसाद सिंह, केदारनाथ सिंह, ओम प्रभाकर ऐसे गीतकार हैं जिन्‍होंने अपनी सम सामयिक पीढ़ी को प्रेरित ही नहीं किया बल्कि इनमें उसका प्रतिनिधित्‍व करने की भी क्षमता रही है. गीत संकलन ‘पांच जोड़ बांसुरी’ का प्रकाशन 1947 से 1967 के बीच प्रकाशित गीतों को रेखांकित करने के लिए किया गया था.


ओम प्रभाकर के नवगीतों की भाषा और शैली पर टिप्‍पणी करते हुए गीतकार चंद्रदेव सिंह लिखते हैं कि यदि रघुवीर सहाय शहरों में रहने वाले अत्यंत सामान्य लोगों की भाषा के सहारे हिन्दी कविता की नयी भाषा बनाना चाहते हैं तो उन्हें उसकी उतनी ही छूट है जितनी ओम प्रभाकर को ग्वालियर की जन-प्रकृति से शब्द और चित्र लेकर एक नयी चित्र-सृष्टि करने की. लेकिन यदि रघुवीर सहाय और ओम प्रभाकर एक-दूसरे को विरोधी मानने लगते हैं तब चिन्ता उत्पन्न हो सकती है. उन्हें बराबर यही समझना होगा कि वे दोनों दो नये क्षेत्रों में काम कर रहे हैं लेकिन वे दोनों मिलकर हिन्दी कविता तथा प्रकारान्तर से हिन्दी भाषा की शक्ति में वृद्धि कर रहे हैं और उसे ऐसे अछूते शब्द-बिम्बों से अलंकृत कर रहे हैं जिसके बिना कल तक हिंदी प्राणहीन होने लगती थी. इतना मान लेने के बाद आलोचकों द्वारा की गई हिंदी गीत-कविता की उपेक्षा पर दु:ख होता है. आलोचकों की अपनी नासमझी के कारण हिंदी कविता का बहुत नुकसान हुआ है.


गीतकार प्रेमशंकर रघुवंशी के अनुसार कुछ कवि ऐसे भी हैं जो आधुनिक जीवन की समस्याओं का चित्रण अपनी कल्पनाओं के माध्यम से करते हैं -ओम प्रभाकर, शलभ श्रीराम सिंह, देवेन्द्र कुमार, नरेश सक्सेना, रमेश रंजक आदि सामायिक जीवन अनुभवों को व्यजित करने में अत्यन्त दक्ष हैं यही कारण है कि इनकी कविताओं में ताजापन अधिक है. रोजमर्रा का जीवन कल्पनाओं के माध्यम से इस प्रकार चित्रित हो गया है कि कविता और सामयिक जीवन एकाकार हुए लगते हैं.


जाने क्या हुआ कि दिन


काला-सा पड़ गया.


चीजों के कोने टूटे


बातों के स्वर डूब गये


हम कुछ इतना अधिक मिले


मिलते-मिलते ऊब गये


आंखों के आगे


सहसा जाला-सा पड़ गया.


ताउम्र सृजनरत रहे गीतकार ओम प्रभाकर का जाना वास्‍तव में एक पीढ़ी का अवसान है. ऐसी पीढ़ी का अस्‍त होना जिसने अपनी बात कहने के लिए हिंदी और उर्दू की दूरियों को पाट दिया था और जिनके लिए भाषा विवाद की जड़ नहीं अपनी अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम रही.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: February 24, 2021, 3:49 PM IST
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