स्‍मृति शेष सुंदरलाल बहुगुणा : पेड़ों की कटाई से आहत मन ने ठुकरा दिया था पद्म श्री

आज जब हमने पेड़ों के लिए जीवन भर समर्पित रहे सुंदरलाल बहुगुणा को खो दिया है तब इस समय में पर्यावरण की‍ चिंताएं अधिक गहरी हुई हैं. देश भर में जारी तमाम विकास प्रोजेक्‍ट में पेड़ों की बलि ली जा रही है. मध्‍य प्रदेश के छतरपुर जिले में सबसे बड़ा हीरा भंडार मिला और हीरे पाने के लिए बकस्वाहा में 382.131 हेक्टेयर का जंगल खत्म करने की तैयारी कर ली गई है. वन विभाग के अनुसार जंगल में 2 लाख 15 हजार 875 पेड़ हैं जिन्‍हें काटा जाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: May 21, 2021, 4:45 PM IST
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स्‍मृति शेष सुंदरलाल बहुगुणा : पेड़ों की कटाई से आहत मन ने ठुकरा दिया था पद्म श्री
चिपको आन्दोलन के कारण सुंदरलाल बहुगुणा दुनिया भर में 'वृक्षमित्र' के नाम से प्रसिद्ध हुए. (फोटो साभारः ANI )
जीवन नश्‍वर हैं. ऐसे बोध वाक्‍य तब अप्रभावी महसूस होते हैं जब हम जीवन को मायने देने वाले मनीषियों को खो देते हैं. ऐसा ही एक शख्‍स आज हमारे बीच से चला गया. यह शख्‍स केवल एक इंसान या एक आंदोलन का पर्याय नहीं था बल्कि एक ऐसी प्रेरणा है जो युगों-युगों तक समाज में पर्यावरण चेतना की लौ प्रदी‍प्‍त रखेगी. हम बात कर रहे हैं चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा के अवसान की. 94 वर्षीय बहुगुणा कोरोना संक्रमित थे और उपचार के दौरान उन्‍हें बचाया नहीं जा सका.

सुंदरलाल बहुगुणा कौन थे यह बताने की आवश्‍कता नहीं हैं. जहां भी कहीं कोई पेड़ कटता है तो उसे बचाने की कोशिशों के दौरान चिपको आंदोलन और सुंदरलाल बहुगुणा का जिक्र हो ही जाता है. चिपको आन्दोलन के कारण सुंदरलाल बहुगुणा दुनिया भर में 'वृक्षमित्र' के नाम से प्रसिद्ध हुए. पेड़ों को बचाने के लिए चर्चित 'चिपको आन्दोलन' का प्रतीक वाक्य था- 'क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार/ मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार.' पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने बहुगुणा को 'पर्यावरण गांधी' कह कर संबोधित किया गया है. 1981 में भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिया लेकिन उन्होंने यह कह कर इसे अस्वीकार कर दिया कि जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूं.

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी, 1927 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के सिलयारा (मरोड़ा) नामक स्थान में हुआ. प्राथमिक शिक्षा के उपरांत वे लाहौर चले गए और वहीं सनातन धर्म कॉलेज से उन्होंने बीए किया. लाहौर से लौटने के उपरांत काशी विद्यापीठ में एमए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए. पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से इन्होंने सिलयारा में पर्वतीय नवजीवन मंडल' की स्थापना की. 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के संपर्क में आने के बाद वे दलित विद्यार्थियों के उत्थान के लिए कार्य करने लगे, टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की.

1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए उन्होंने सोलह दिनों तक अनशन किया. चंडी प्रसाद भट्ट द्वारा शुरू किए गए चिपको आंदोलन में पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा भी जुड़ गए, आंदोलन को विस्तार दिया और इसे जल, जंगल तथा जमीन को जीवन की सुरक्षा से जोड़ दिया. इस आंदोलन के तहत 26 मार्च 1974 में गौरा देवी के नेतृत्व समाज पेड़ों से चिपक कर पेड़ों की कटाई पर रोक लगवाने में सफल हुआ.
सुंदरलाल बहुगुणा ने चिपको आंदोलन से गांव-गांव में जागरूकता लाने के लिए 1981 से 1983 तक लगभग 5,000 कि.मी. लंबी ट्रांस-हिमालय पदयात्रा की. उस समय इस आंदोलन का इतना असर जरूर हुआ कि जंगलों की कटाई के खिलाफ लोगों में जागरुकता आई और पेड़ों की कटाई में काफी कमी आनी शुरू हो गई. चिपको आंदोलन का ही परिणाम था कि 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा. प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण एक सतत प्रक्रिया हैं और इस प्रक्रिया के हिस्सेदार हम सभी को होना चाहिए. कश्मीर और कोहिमा की यात्रा के बाद वे टिहरी बांध विरोध में कूद गए.

तब से लेकर आज तक इस बहस ने जोर पकड़ा है कि विकास जरूरी या पर्यावरण. जितने पेड़ों को काटा भी गया है, उतनी ही गंभीर यह बहस भी हुई है. हालांकि, बार-बार के आंदोलनों के बाद सरकारों और विकास एजेंसियों ने काटे जाने वाले पेड़ों के बदले पौधरोपण किए मगर इन पौधों में से अधिकांश पेड़ बन ही नहीं पाए. इस तरह हमारा धरती अपनी हरियाली खोती जा रही है. विशेषज्ञ कहते हैं कि दोबारा पेड़ लगाने के नाम पर जो काम होता है वो पेड़ कटाई की भरपाई नहीं कर पाता है विकास एजेंसियां की रूचि कटाई की भरपाई की खानापूर्ति में होती है. जंगल को पुराने स्‍वरूप में लौटाने की इच्छा अक्‍सर उनकी योजनाओं और कामों में दिखाई नहीं देती. एक जैसे पौध रोप देने से जंगल की जैव विविधता नष्‍ट हो जाती है.

दिसंबर 2019 में भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा जारी इंडियन स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, आईएसएफआर 2019 के मुताबिक सरकारी रिकॉर्ड में वन क्षेत्र के 7,67,419 वर्ग किलोमीटर में से 2,26,542 वर्ग किलोमीटर में फॉरेस्ट कवर नहीं है. रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 30 प्रतिशत जंगलविहीन इलाके पर सड़क निर्माण, खनन और खेती की जा रही है. मतलब यह कि जहां फाइल में जंगल बताया गया है वहां वास्‍तव में हरियाली है ही नहीं. हालांकि, भारतीय वन सर्वेक्षण कहता है कि देश का फॉरेस्ट कवर पिछले 17 वर्षों में पांच प्रतिशत बढ़ा है लेकिन फॉरेस्ट एरिया घटा है.
आज जब हमने पेड़ों के लिए जीवन भर समर्पित रहे सुंदरलाल बहुगुणा को खो दिया है तब इस समय में पर्यावरण की‍ चिंताएं अधिक गहरी हुई हैं. देश भर में जारी तमाम विकास प्रोजेक्‍ट में पेड़ों की बलि ली जा रही है.
मध्‍य प्रदेश के छतरपुर जिले में सबसे बड़ा हीरा भंडार मिला और हीरे पाने के लिए बकस्वाहा में 382.131 हेक्टेयर का जंगल खत्म करने की तैयारी कर ली गई है. वन विभाग के अनुसार जंगल में 2 लाख 15 हजार 875 पेड़ हैं जिन्‍हें काटा जाएगा.

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के बाद मिलने वाले विकास का स्‍याह सच यह है कि पर्यावरण के नुकसान का खतरा अन्‍य देशों की तुलना में भारत में अधिक है क्‍योंकि भारत में किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक लोग प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं. हमारे यहां की बड़ी आबादी आजविका के लिए जंगलों, झीलों, समुद्रों, नदियों, घास के मैदानों, पहाड़ियों पर निर्भर हैं. हमारा पारिस्थितिक तंत्र गंभीर दबाव में हैं. इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि विकास के नाम पर जंगल, पानी, हवा पर ही सबसे अधिक खतरा मंडराया हुआ है.

जब यह तथ्‍य बता रहा हूं तब याद आ रहा है कि भारत वहीं देश हैं जहां आजादी के पहले पर्यावरण संकट कोई समस्‍या नहीं था और आजादी के बाद यह धीरे धीरे ऐसी समस्‍या बना कि गुजरे सात दशक में जल, जंगल और ज़मीन के संरक्षण के लिए चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, आपिको आंदोलन और मौन घाटी आंदोलन जैसे 300 से अधिक आंदोलन हुए हैं. इन चिंताओं के बीच सुंदरलाल बहुगुणा अवसान असल में उस पूरे आंदोलन और उन सभी की व्‍यक्तिगत क्षति है जो पर्यावरण बचाने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं. हालांकि, उनके विचार और उनका जीवन प्रेरणा के रूप में हमारे भीतर पेड़ कटाई सहित पर्यावरण विरोधी कार्यों के विरूद्ध संघर्ष की लौ जलाए रखेंगे.

(डिस्क्लेमरः ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: May 21, 2021, 4:45 PM IST
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