जयंती विशेष : बाबा साहेब ने अपनी पत्‍नी रमाबाई को आखिर क्‍यों कहा था पूजनीय

डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन में कदम कदम पर संघर्ष था और खुद बाबा साहेब के शब्‍दों में उनके साथ कष्ट भोगने में तत्पर यदि कोई था तो वह थी रमाबाई अंबेडकर. उनकी पत्‍नी जिन्‍हें डॉ. अंबेडकर प्यार से रामू बुलाते थे और अनुयायी समाज मातोश्री. 7 फरवरी उन मातोश्री की जयंती है और उनके संघर्ष को याद करने का अवसर भी.

Source: News18Hindi Last updated on: February 7, 2021, 11:51 AM IST
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जयंती विशेष : बाबा साहेब ने अपनी पत्‍नी रमाबाई को आखिर क्‍यों कहा था पूजनीय
रमाबाई अंबेडकर की जयंती पर विशेष

एक बहुत प्रचलित और पुरानी कहावत है कि ‘हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है.’ इस तथ्‍य को कई बार स्‍वीकारा जाता है मगर अकसर ही ख्‍यात और सफल व्‍यक्तियों के जीवन के कई बार सफलता का आधार बनी महिलाओं खास कर उनकी जीवन संगीनी के योगदान को कमोबेश बिसरा दिया जाता है. मगर हमारे समाज के आधार स्‍तंभ कहे जाने वाले मनीषियों ने खुल कर महिलाओं को अपनी सफलता का श्रेय दिया है. ऐसा ही एक उदाहरण हैं संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और उनकी पत्‍नी रमाबाई दम्‍पत्ति का.


डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन में कदम कदम पर संघर्ष था और खुद बाबा साहेब के शब्‍दों में उनके साथ कष्ट भोगने में तत्पर यदि कोई था तो वह थी रमाबाई अंबेडकर. उनकी पत्‍नी जिन्‍हें डॉ. अंबेडकर प्यार से रामू बुलाते थे और अनुयायी समाज मातोश्री. 7 फरवरी उन मातोश्री की जयंती है और उनके संघर्ष को याद करने का अवसर भी.

7 फ़रवरी 1898 को जन्मी रमाबाई की 9 वर्ष की उम्र में वर्ष 1906 में 14 वर्षीय भीमराव अंबेडकर से हुई थी. 9 वर्ष की उम्र से आरंभ हुआ संघर्ष में साझेदारी का यह सिलसिला रमाबाई की अंतिम सांस 9 मई 1935 तक जारी रहा. बाबा साहेब ने भी अपने जीवन में रमाबाई के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण माना है. अंबेडकर दम्‍पत्ति के जीवन की राह कभी आसान नहीं रही और रमाबाई ने हर संघर्ष में अपने पति डॉ. अंबेडकर का पूरा साथ दिया है. वे घर-घर जाकर गोबर के उपले बेच कर परिवार के पेट भरने का जतन करती तो दूसरों के घरों में काम कर बाबासाहेब की शिक्षा का खर्च जुटाने में मदद करती थीं. इस साथ के बारे में डॉ. अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत भारत’ के एक संपादकीय में बताया है. उन्होंने लिखा है कि जिंदगी के एक बड़े हिस्सें में (जब भीमराव अंबेडकर विदेशों में पढ़ाई कर रहे थे) गृहस्थी का सारा बोझ रमाबाई ने उठाया. विदेश से वापसी के बाद भी जब डॉ. अंबेडकर सामाजिक उत्‍थान के कार्य में जुटे हुए थे तब उनके पास परिवार के लिए समय ही नहीं होता था तब रमाबाई ने ही पूरे परिवार का ख्‍याल रखा. जीवन के संघर्ष में उनके और बाबासाहेब के पांच बच्चों में से केवल एक यशवंत अंबेडकर ही जीवित रहे. ऐसी विकट परिस्थितियों में भी रमाबाई बाबा साहेब का संबल बन हमेशा खड़ी रहीं. असमानता, भेदभाव, छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के साथ उन्‍हें आर्थिक अभावों से भी दो-दो हाथ करने थे. बाबा साहेब जग सुधार में जुटे थे तो रमा बाई ने परिवार का मोर्चा संभाले रखा.


25 नवंबर 1921 को लंदन से भेजे पत्र में डॉ. अंबेडकर ने पत्‍नी रामू को लिखा- ‘गंगाधर (अंबेडकर दम्‍पत्ति का पहला पुत्र) बीमार है, यह जाकर दु:ख हुआ. स्वयं पर विश्वास रखो, चिंता करने से कुछ नहीं होगा. तुम्हारी पढ़ाई चल रही है, यह जानकर प्रसन्नता हुई. पैसों की व्यवस्था कर रहा हूं. मैं भी यहां अन्न का मोहताज हूं. तुम्हें भेजने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी कुछ न कुछ प्रबंध कर रहा हूं. अगर कुछ समय लग जाए, या तुम्हारे पास के पैसे खत्म हो जाएं तो अपने जेवर बेचकर घर-गृहस्थी चला लेना.’

यही कारण था कि रमाबाई को लंबे समय तक भूखे या आधा पेट खाना खाकर जीना पड़ा था. फिर चार बच्चों की मृत्‍यु ने उन्हें तोड़ दिया था. 1923 में भारत लौटने के बाद अंबेडकर दम्‍पत्ति के जीवन में कुछ सुख की छांह आई लेकिन तब बाबा साहेब की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई. उनके पास परिवार के लिए समय नहीं था मगर आर्थिक संघर्ष कुछ कम हो गया था. मगर, कठोर जीवन संषर्घ के कारण रमाबाई का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था. उपचार काम नहीं आ रहा था. मृत्यु से पहले करीब छह महीने तक वे बिस्तर पर रहीं.


रमाबाई की मृत्‍यु पर बाबा साहेब फुट फुट कर रोए थे. अंबेडकर की जीवनी के लेखक धनंजय कीर के अनुसार बीमारी से पूरी तरह टूट चुकी अंत में साहेब की रामू उन्हें सदा-सदा के लिए छोड़कर 27 मई 1935 को चली गईं. रमाबाई की मृत्यु एक रात पहले ही अंबेडकर लौटे थे. उनकी मृत्यु के समय उनकी शैय्या के पास बैठे थे. भारी दिल से, गंभीर मुद्रा, विचार और दुख से व्याकुल मन: स्थिति के साथ वे शवयात्रा के साथ धीमे-धीमे चल रहे थे. श्मशान यात्रा से लौटने पर वह दुख से व्याकुल होकर कमरे में अकेले पड़े रहे. एक सप्ताह तक छोटे बच्चे की भांति वे फूट-फूटकर रोते रहे. (धनंजय कीर, 2018 पृ.239).


पत्‍नी रमाबाई के समर्पण और साथ को याद करते हुए डॉ. अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत भारत’ के संपादकीय में उन्‍हें पूजनीय कहा है. डॉ. अंबेडकर के शब्दों में – ‘कौड़ी का फायदा न होते हुए जिसने एक वर्ष तक बहिष्कृत भारत के 24-24 कॉलम लिखकर जनजागृति का काम किया तथा उसे करते समय जिसने (अंबेडकर) अपने स्वास्थ्य, सुख, चैन व आराम की चिंता न करते हुए अपने आंखों की बाती बनाया, इतना ही नहीं, इस लेखक (अंबेडकर) के विदेश में रहते समय जिसने (रमाबाई) रात-दिन अपनी गृहस्थी का भार संभाला तथा आज भी वह संभाल रही है. लेखक (अंबेडकर) के परदेस से वापस आने पर अपनी (रमाबाई) विपन्नावस्था में अपने सिर पर गोबर के टोकरे ढोने के लिए जिसने आगे-पीछे नहीं देखा, ऐसी अत्यन्त ममतामयी, सुशील तथा पूज्य पत्नी के संपर्क में जिसे चौबीस घंटे में आधा घंटा भी साथ बिताने को नहीं मिला.’ ( प्रभाकर गजभिये, 2017 पृ.152)


डॉ. अंबेडकर ने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को अपनी पत्‍नी रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा, कि उन्हें मामूली भीमा से डॉ. अंबेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को जाता है. पत्‍नी को अपनी सफलता का इस तरह श्रेय देने के उदाहरण कम मिलते हैं. बाबा साहेब के कृतित्‍व को याद करते समय ही उनकी जीवन संगीनी रमाबाई के योगदान को रेखांकित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इस किरदार को लाइट हाउस मानते हुए जीवन संघर्ष के हर मोड़ पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना चाहिए.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: February 7, 2021, 11:51 AM IST
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