पुण्‍यतिथि विशेष: पं. विद्यानिवास मिश्र की चेतावनी का काल, और बढ़ेगा पत्रकारिता का घटियापन

यह कहना कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि हिंदी पत्रकारिता के सामने अस्तित्‍व का सबसे बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है. न केवल छपने का संकट बल्कि पढ़े जाने का भी संकट. बात अब प्रकाशित अखबार और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की आपसी प्रतिस्‍पर्धा से आगे छपे शब्‍दों और दिखाई जा रही खबरों के प्रति विश्‍वास और ईमानदारी के सवाल तक आ कर टिक गई है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 14, 2021, 9:05 AM IST
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पुण्‍यतिथि विशेष: पं. विद्यानिवास मिश्र की चेतावनी का काल, और बढ़ेगा पत्रकारिता का घटियापन
कोरोना संकट से उबरने में लगा है ऐसे समय में भारतीय मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया गहरे संकट में है. (प्रतीकात्मक)

कोरोना संकट से उबरने में लगा है ऐसे समय में भारतीय मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया गहरे संकट में है. यह कहना कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि हिंदी पत्रकारिता के सामने अस्तित्‍व का सबसे बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है. न केवल छपने का संकट बल्कि पढ़े जाने का भी संकट. बात अब प्रकाशित अखबार और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की आपसी प्रतिस्‍पर्धा से आगे छपे शब्‍दों और दिखाई जा रही खबरों के प्रति विश्‍वास और ईमानदारी के सवाल तक आ कर टिक गई है. घर सजाने का तसव्‍वुर बाद में, पहले यह सोचा जाना जरूरी है कि घर बचाएं कैसे? अस्तिव पर छाए घटाटोप अंधेरे के इस समय में पथप्रदर्शक उजली किरण अतीत से ही निकलती है. साहित्‍य और पत्रकारिता के मनीषियों के विचारों में भविष्‍य की पगडंडी उभरती है.


देश-विदेश में भारतीय संस्कृति तथा साहित्य की अलख जगाने वाले शिक्षक, साहित्यकार, कुशल संपादक, राज्यसभा सांसद, प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य पद्मश्री व पद्म भूषण सम्मान से अलंकृत पं. विद्यानिवास मिश्र के विचारों में भी आगत की राह जरूर दिखलाई देती है. सभी जानते हैं कि वेदों से लेकर आधुनिक कविता तक और पाणिनी के व्याकरण से लेकर पश्चिमी भाषा विज्ञान तक में सिद्ध पंडित मिश्र का पहला परिचय उनके ललित निबंध हैं. लोक और साहित्‍य की शुचिता के चिंतक पं. मिश्र ने 1990 के दशक में नवभारत टाइम्स के संपादक का दायित्‍व संभाला था. यह वही समय था जब उदारीकरण और वैश्‍वीकरण ने निरंतर आकार बना कर देशज मूल्‍यों और कर्मों को लीलना शुरू किया था. वसुधैव कुटुंबकम् के बदले विश्‍व ग्राम की पहचान नई परिधि बन कर उभर चुकी थी. हिंदी पत्रकारिता के सामने भी संकट खड़े हो गए थे. ऐसे में पं. मिश्र ने पत्रकारिता की भाषा और संस्‍कार की चिंता की थी. उन्‍होंने ही नवभारत टाइम्स में भाषा की शुद्धता को बचाए रखने का संघर्ष खड़ा किया था. अपने समूचे पत्रकारीय जीवन में मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे. वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था. यही कारण था कि मतभेद के क्षणों में उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी छोड़ दी. और फिर बाजार के दबाव में नभाटा (नवभारत टाइम्‍स) एनबीटी हो गया.


अपने निधन से कुछ पहले उत्‍तर प्रदेश में एक समाचार पत्र द्वारा आयोजित समारोह में पंडित मिश्र ने कहा था कि पत्रकारिता तनी हुई रस्सी पर नट की तरह चलने का काम है. बिना पढ़ाई-लिखाई कैसी पत्रकारिता? कहने वाले पंडित मिश्र ने साहित्‍य की पत्रकारिता और पत्रकारिता में साहित्‍य को शीर्ष स्‍थान तक पहुंचाया था. वर्ष 2007 में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘साहित्य के सरोकार’ में हिंदी साहित्‍य में पत्रकारिता के योगदान पर लिखे अपने लेख में पंडित मिश्र कहते हैं- ‘हिंदी जिन सामाजिक-आर्थिक दबावों में आज का नया रूप पा सकी, उन दबावों से अधिक प्रभावशाली दबाव भीतर का था. भीतर का दबाव सांस्कृतिक आवश्यकता से उद्भूत हुआ था. पश्चिमी औधोगिक संस्कृति से टकराव के बाद अपने को पहचानने की दुर्निवारता आयी. उसने दो बातें अनुभव करायीं. एक तो देश की एक भाषा हो और वह भाषा देश के जन की भाषा हो, दूसरे यह कि पश्चिम की बौद्धिकता को नकारे बिना अपने मौलिक प्रवाह को पुनः सक्रिय करने की आवश्यकता है. यह सांस्कृतिक चेतना सबसे पहले हिंदी पत्रकारिता में आयी और पत्रकारिता के विकास के साथ-साथ भाषा और आधुनिक सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ, परंतु दु:ख है कि एक शिखर पर पहुँचकर यह चेतना ढलान की ओर अस्तोन्मुख होती गयी. इस चेतना के पुनः आह्वान के लिए आवश्यक है कि हम अपनी नयी सांस्कृतिक प्रक्रिया के इतिहास का पर्यावलोकन करें.’


अखबरों में साहित्‍य की मौजूदगी पर पंडित मिश्र ने लिखा है- ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास, इसमें लेश मात्र संदेह नहीं कि हिंदी के प्रतिष्ठित मासिक पत्रों के कारण हुआ है. क्योंकि इन पत्रों के संपादकों के कठिन परिश्रम और साहित्य के दिग्बोध ने ही साहित्य को गति और विस्तार दिया है. हमें उनका ऋणी होना चाहिए और पर्यालोचन करना चाहिए कि हमने अपनी तेजस्विता रास्ते में कब और कहाँ खोई; हम कब से इतने विशिष्ट होने लगे कि साहित्यकार हैं तो पत्रकार को हीन समझते हैं, पत्रकार हैं तो साहित्य रचना को व्यर्थ का ख्याली पुलाव समझते हैं, हम कब से अपने बनाए घरौंदों को भ्रमवश सबका घर मानने लगे और कब से हमने अपने घर आँगन और घर के सामने के चबूतरे पर दीए जलाना बंद कर दिया किस पावस की छड़ी में भौरे ही उठकर ताप बढ़ाने वाली कोयल चुप हो गयी. इस पर्यालोचन में हिंदी पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास सहायक होगा, वह स्मरण दिलाएगा “उदन्त मार्तण्ड’ की बात कि, जड़ता अभी भी तोड़नी है, अभी भी ताप की आवश्यकता है. बिना ताप के, बिना तेजस्विता के बिना आग बने पिघलने की संभावना उदित नहीं होती. रस भी ताप से ही बनता है. हमारे आज के सृजनात्मक संसार में कहीं जीवन का रस सूखता नजर आता है तो सोचना चाहिए कि तप का ताप कहीं बुझने लगा है. साहित्य प्रकाश मात्र नहीं है न अंधकार को उजागर करने का व्यापार, वह पिपलने और पिपलाने वाला विधने और वींधने वाला व्यापार भी है. हिंदी पत्रकारिता ने हमारे साहित्य को यही काम सौंपा है, वह हम न भूले.


पत्रकारिता पर नए दबाव की बात करते हुए इसी शीर्षक से लिखे निबंध में पंडित मिश्र कहते हैं – ‘इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों का पत्रकारिता पर दबाव बुरी तरह पड़ रहा है. इलेक्ट्रानिक मीडिया विशेष रूप से दूरदर्शन और उसकी नयी-नयी उपजातियाँ पढ़ने की प्रवृत्ति कम कर रही है. उनके कारण अनपढ़पन की विचित्र सी लत खासकर बच्चों में पड़ती जा रही है. उस दबाव में छापाखाने वाले माध्यम दृश्यता से आक्रांत हो रहे हैं, साथ-ही-साथ वे त्वरिततर गति से सूचना के संप्रेषण के दबाव में आ गए हैं. वे दबाव ऊपर से देखने पर बड़े भयंकर लगते हैं और हैं भी कुछ हद तक. इन दबावों के कारण सोचने की शक्ति कुछ-न-कुछ सुन होती जाती है, अखबार भी सोचता हूँ कि भुलाने वाली या उत्तेजना वाली गोली देते रहे, विवेकपूर्ण ढंग से सोचने का अवकाश न दें. इंद्रियों भी धीरे-धीरे बेकाम होती जाती हैं और अवास्तविक ही अवास्तविक देखते-देखते मनुष्य अवास्तविक के संसार में ही भयनीली जिंदगी जीने लगता है. तब तर्क भी ताक पर रख दिए जाते हैं, भाव भी बिसरा दिया जाता है.


बकौल पंडित विद्यानिवास मिश्र इलेक्ट्रानिक माध्यम का दूसरा अभिशाप यह है कि यह माध्यम विविधताओं को समाप्त करता है, सब चौरस बनाता चला जाता है, इससे तरह-तरह की रंगतें कुछ गिने-चुने रंग-पाशों में बंध जाती हैं, असंख्य स्वरों के संभार अपनी मीड़े खो देते हैं. इससे जीवन की गुणवत्ता का निश्चय ही हास होता है, इसकी छूत लगती है तो अखबार भी रंगीनी में और अधिक सपाट होने लगते हैं और इने-गिने शब्दों के कुचक्र में फंस जाती है सारी सूचना और संवेदना. परंतु इस दबाव का सकारात्मक पक्ष भी है. इलेक्ट्रानिक माध्यम जिस प्रकार की परिस्थिति पैदा करते हैं, उसमें घर के भीतर के संवाद चुकने लगते हैं और स्विच आफ होते ही भयंकर रिक्तता भारी पड़ने लगती है, तब कुछ सूझता ही नहीं, इसका जब एक अपरिहार्य रूप से अतिरेक होगा तो संवाद की उत्कंठा और बलवती होगी. कुछ-कुछ होने भी लगी है, अपनी आँखों से प्रकृति को मनुष्य को निहारने की ललक जगेगी. उस समय पत्रकारिता की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण होगी. छापाखाना भी यंत्र है, पर यांत्रिकता का दबाव मनुष्य की सहज बुद्धि के दबाव की अपेक्षा वहाँ कमहै. अखबार में तब परिवर्तन होंगे. घिसे-पिटे फार्मूलों की रपटी, कहानियाँ और एक-सी धिरावदार प्रस्तुतियों का स्थान लेंगी सहज बातचीत, नयी-नयी संवेदनाओं की पुलक से भरी कहानियां और जीवन से भरपूर प्रस्तुतियां, खुरदुरी पर भाव भंगिमा में एकदम नयी. एक दूसरा शुभ फल होगा, नए दबाव के कारण छापे के माध्यम में कुछ अधिक चुस्ती और कुछ अधिक संयम दोनों आएँगे. एक कि मानवीयता का उत्तर दृढ़ और सकारात्मक मानवीयता से ही दिया जा सकेगा. यही नहीं उससे ये भयावह दिखने दाले माध्यम भी अनिवार्यतः प्रभावित होंगे, क्योंकि अंतत: ये माध्यम भी मनुष्य के मस्तिष्क की ही संतान है. पर यह, सब शीघ्र घटित होने वाला नहीं, अभी काफी कशमकश रहेगी, काफी घटियापन बढ़ेगा. बाजारूपन ईमान पर कुछ बरस तक हावी रहेगा. तब जाकर परिवर्तन शुरू होगा. मैं इसी से आशावादी हूँ और मुझे तात्कालिक दबाव की परेशानी खास परेशानी नहीं लगती.’


पं. मिश्र ने यह बात आज से डेढ़ दशक पहले कही थी. 14 फरवरी 2005 को एक सड़क दुर्घटना में उनका देहांत हो गया. मगर उनकी लेखनी का उजास पत्रकारिता और साहित्य कोहरे में प्रकाश स्‍तंभ की तरह राह बूझ जमगमगा रहा है. पत्रकारिता की बेहतरी का मार्ग उनके इस कथन से हो कर गुजरता है – ‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है.’


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: February 14, 2021, 9:01 AM IST
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