पीड़ा और भेद की अभिव्‍यक्ति ही नहीं उत्‍तर भी हैं अनामिका की कविताएं

अनामिका अपने समूचे रचना संसार में विद्रोह को नहीं समरसता की पक्षधर रही हैं. वे स्त्री के जीवन को, उसके कार्य क्षेत्र को नकारती नहीं हैं बल्कि उसके लिए उसकी अपनी जगह की मांग करती है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 13, 2021, 2:59 PM IST
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पीड़ा और भेद की अभिव्‍यक्ति ही नहीं उत्‍तर भी हैं अनामिका की कविताएं
अनामिका की कविताएं
विख्यात कवयित्री, अनुवादक और आलोचक अनामिका को उनके हिंदी कविता संग्रह "टोकरी में दिगन्त: थेरीगाथा 2014" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया है. हिन्दी में पहली बार किसी कवयित्री के कविता संग्रह को यह पुरस्कार मिला है. अनामिका को यह पुरस्‍कार मिलना वस्‍तुत: आधी आबादी के स्‍वर को चिह्नित करने वाली हिंदी कविता का सम्‍मान है. मगर, अनामिका की इन कविताओं को केवल स्‍त्री चेतना का पर्याय कहना अन्‍याय होगा. वे लैंगिक परिचय के दायरे से कहीं आगे एक समर्थ लेखिका हैं. उनकी कविताएं स्‍त्री मनोभाव की जमीन पर भले ही उगी हैं मगर इनकी शाखाएं हर बार हमारे समय के अंधेरे की मुखर पड़ताल करती हैं. ये कविताएं स्‍त्री आखों में उभरे आंसूओं की छवियां ही नहीं हैं बल्कि संघर्ष के लिए तनी मुट्ठी का प्रतीक भी है.

17 अगस्त 1961 को बिहार के मुजफ्फरपुर में जन्‍मी अनामिका और उनकी कविताएं किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. उन्हें हिंदी कविता में अपने विशिष्ट योगदान के कारण राजभाषा परिषद् पुरस्कार, साहित्य सम्मान, भारतभूषण अग्रवाल एवं केदार सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. गलत पते की चिट्ठी, बीजाक्षर, अनुष्टुप, समय के शहर में, खुरदुरी हथेलियाँ, दूब धान, टोकरी में दिगन्त: थेरीगाथा 2014 और पानी को सब याद था अनामिका के प्रमुख काव्‍य संग्रह हैं. प्रतिनायक कहानी संग्रह है और अवांतर कथा, पर कौन सुनेगा, दस द्वारे का पिंजरा, तिनका तिनके पास उपन्‍यास हैं.

अपनी रचनाओं से भारतीय समाज एवं जीवन आम परिचित भाषा और शैली से रेखांकित करने वाली अनामिका के बगैर आधुनिक हिन्दी साहित्‍य का परिचय अधूरा है. वे अपनी रचनाओं में दृश्‍य बुनती चलती हैं और एक तीखा व्‍यंग्‍य पाठक के अवचेतन पर दर्ज होता जाता है. उनकी कविताएं स्‍त्री पक्ष में कही गई सबसे सशक्‍त आवाज हैं तो इसलिए कि वे अतीत से होते आए भेदभाव और पक्षपात से लेकर वर्तमान आधुनिक काल के रिश्‍तों के पेंच में उलझी स्‍त्री के मनोभावों को सहजता से रख रही हैं. आधी आबादी के बुनियादी अधिकारों और अस्तित्व के प्रश्‍न उनकी कविता की धूरी हैं. जैसे, ‘स्त्रियां’ कविता में वे लिखती हैं :-

पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज

बच्चों की फटी कॉपियों का

चना जोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!अनामिका की कविता में स्‍त्री और पुरूष के बीच हमेशा मौजूद रही खाई का उल्‍लेख है तो इस उपेक्षा के खिलाफ उठ खड़े होने की घोषणा भी है. ‘स्त्रियां’ कविता में वे कहती हैं :-

एक दिन हमने कहा–

हम भी इंसान हैं

हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर

जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद

नौकरी का पहला विज्ञापन.

देखो तो ऐसे

जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है

बहुत दूर जलती हुई आग.

सुनो, हमें अनहद की तरह

और समझो जैसे समझी जाती है

नई-नई सीखी हुई भाषा.

उन्‍हें जिस संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त, थेरी गाथा: 2014’ के लिए साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला है वह बौद्ध-धर्म की परंपराओं और स्मृतियों की वाहक थेरी गाथाओं के बहाने स्‍त्री जीवन के स्‍याह पक्ष को उजागर किया है. बुद्ध की समकालीन मानी जानेवाली भिक्षुणियों का जीवन और विचार इस काव्‍य संग्रह का आधार है. गौरतलब है कि 70 से ज्यादा बौद्ध भिक्षुणियों के विचार उसकी विभिन्न गाथाओं में शामिल हैं. अनामिका ने इन गाथाओं के माध्‍यम से स्त्री देह और मन के प्रश्‍नों को अपनी कविताओं में बुना है. जैसे, ‘कमरधनियां’ कविता में वे कहती हैं :-

अब करधनियाँ नहीं हैं

कमर अब कसी है इरादों से

और औरतों ने आवाज़ उठा ली है

दादियों की बात मानते हुए

कि ऐसा भी धीरे क्या बोलना

आप बोलें कमरधनी सुने!

बोलें, मुहँ खोलें जरा डटकर

इतनी बड़ी तो नहीं है न दुनिया की कोई भी जेल

कि आदमी की आबादी समा जाए

और जो समा भी गई तो

वहीं जेल के भीतर झन-झन-झन

बोलेंगी हथकड़ियाँ

ऐसे जैसे बोलती थीं कमरधनियाँ

मिल-जुलकर मूसल चलाते हुए.

उनका पिछला कविता संग्रह 'पानी को सब याद था' एक कदम आगे जाते हुए भारतीय स्त्री जीवन के कष्‍टों की धरा और उम्‍मीद के आकाश का संयोजन है. अनामिका की कविताओं में गाँव की देशज स्‍त्री से लेकर शहरों की उत्‍तर आधुनिक स्त्रियों के जीवन संघर्ष का प्रतिबिम्‍ब है.

खास बात यह है कि अनामिका अपने समूचे रचना संसार में विद्रोह को नहीं समरसता की पक्षधर रही हैं. वे स्त्री के जीवन को, उसके कार्य क्षेत्र को नकारती नहीं हैं बल्कि उसके लिए उसकी अपनी जगह की मांग करती है. हमारे समाज में स्त्रियों को उनकी जगह बताने के इरादे से पुरूषों ने अनेक कहावतें, पैमाने गढ़ रख हैं. इसी को आईना दिखाते हुए वे ‘बेजगह’ कविता में कहती हैं :-

“अपनी जगह से गिर कर

कहीं के नहीं रहते

केश, औरतें और नाख़ून” -

अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे

हमारे संस्कृत टीचर.

और मारे डर के जम जाती थीं

हम लड़कियाँ अपनी जगह पर.

जगह? जगह क्या होती है?

यह वैसे जान लिया था हमने

अपनी पहली कक्षा में ही.

याद था हमें एक-एक क्षण

आरंभिक पाठों का–

राम, पाठशाला जा !

राधा, खाना पका !

राम, आ बताशा खा !

राधा, झाड़ू लगा !

भैया अब सोएगा

जाकर बिस्तर बिछा !

अहा, नया घर है !

राम, देख यह तेरा कमरा है !

‘और मेरा ?’

‘ओ पगली,

लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं

उनका कोई घर नहीं होता."

जिनका कोई घर नहीं होता–

उनकी होती है भला कौन-सी जगह ?

कौन-सी जगह होती है ऐसी

जो छूट जाने पर औरत हो जाती है.

अनामिका की कविताएं केवल पीड़ा, भेदभाव, संघर्ष ही उजागर नहीं करती हैं, वे समाधान की बात भी करती हैं. वहां केवल प्रश्‍न और तंज ही नहीं हैं, उत्‍तर भी हैं. कोरोना काल में सोशल मीडिया पर संवाद की शृंखला ‘मुक्तिपथ’ में अनामिका ने 'हमारा समय हमारी कविता' विषय पर बात की थी. अपने वक्तव्य में उन्‍होंने कहा था कि क‍विता में मजिस्‍ट्रेट नहीं बनना है. चीख पुकार नहीं मचाना है. कविता संवाद मुखी भाषा में हो. अगर आप मीठे न होंगे, कुमति का निराकरण कुमति से, क्रोध का निराकरण क्रोध से करने जाएंगे तो कोई आपको सुनने नहीं आएगा. यह वक्‍तव्‍य उनकी रचनाओं में मुखरता से उच्‍चारित होता है. जैसे, समरसता के साथ समाज में स्‍ट्रक्‍चरल परिवर्तन की हिमायती अनामिका की एक कविता कहती है :-

जो बातें मुझको चुभ जाती हैं

मैं उनकी सुई बना लेती हूँ

चुभी हुई बातों की ही सुई से मैंने

टाँकें हैं फूल सभी धरती पर.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: March 13, 2021, 2:58 PM IST
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