पुण्यतिथि : घने अंधेरे को परास्त करने के लिए प्रार्थना को शब्द देने वाले गीतकार भरत व्यास

वी. शांताराम के कहने पर भरत व्यास ने एक ऐसा गीत तैयार किया, जो सभी मजहब के लोगों को अपना लगे. अगले दिन भरत व्यास ने गीत का मुखड़ा सुना दिया. इसे सुन वी. शांताराम चहक उठे. उन्होंने.प्रसन्नता से कहा था -"आपका यह गीत अमर होने वाला है.'

Source: News18Hindi Last updated on: July 4, 2021, 11:45 AM IST
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पुण्यतिथि : घने अंधेरे को परास्त करने के लिए प्रार्थना को शब्द देने वाले गीतकार भरत व्यास
4 जून को गीतकार भरत व्यास की पुण्यतिथि है.


ध्यप्रदेश के औद्योगिक शहर इंदौर में वरिष्ठ नागरिकों की संस्था आनन्दम अपने हर कार्यक्रम के बाद सभी के मंगल की प्रार्थना करते हैं-

ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चलें, और बदी से टलें
ताकि हंसते हुये निकले दम... 

सर्वधर्म प्रार्थना बन गए इस गीत को पं. भरत व्यास ने लिखा है. प्रख्यात फिल्म निर्देशक वी. शांताराम की फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' के इस गीत का लिखा जाना भी ऐतिहासिक है. इस गीत के बारे में वी. शांताराम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उन्होंने भरत व्यास को अपनी इच्छा बताई थी कि वे ऐसा प्रार्थना गीत चाहते हैं, जो सभी मजहब के लोगों को अपना लगे.अगले दिन भरत व्यास ने गीत का मुखड़ा सुना दिया. इसे सुन वी. शांताराम चहक उठे. उन्होंने.प्रसन्नता से कहा था -"आपका यह गीत अमर होने वाला है.' बताते हैं कि भरत व्यास ने वी. शांताराम से मुलाकात के बाद कोल्हापुर से मुंबई लौटते समय कार में ही पूरा गीत लिख दिया था.

सिर्फ यही गीत क्यों, वी. शांताराम की ही फिल्म "तूफान और दीया' का गीत 'निर्बल से लड़ाई बलवान की, यह कहानी है दीये और तूफान की' हो या फिल्म 'रानी रूपमती' का गीत 'आ लौट के आजा मेरे मीत' या फिल्म 'नवरंग' के गीत हों या फिल्म 'बूंद जो बन गयी मोती' का गीत 'कौन चित्रकार है...' हो या फिल्म 'संत ज्ञानेश्वर' का गीत 'ज्योत से ज्योत जलाते चलो' हो, पीढ़ियों से पसन्द किए जा रहे ये गीत भरत व्यास की कालजयी रचनाएं हैं.

भरत व्‍यास को पहले गीत के मेहनताना के तौर पर मिले थे 10 रुपए
4 जून को इन्हीं भरत व्यास की पुण्यतिथि है. 6 जनवरी 1918 को अपने ननिहाल बीकानेर में जन्मे भरत व्यास चुरू से मैट्रिक करने के बाद कोलकाता चले गए. शुरुआत में कोलकाता में किए गए नाटकों "रंगीला मारवाड़', "रामू चनणा', "ढोला मारवाड़', "मोरध्वज' आदि से प्रसिद्धी पाई. 1942 में वे मुंबई आ गए. उन्होंने पहला गीत फिल्म "दुहाई' के लिए लिखा जिसके पारिश्रमिक के रूप में उन्हें 10 रुपये मिले. उनका लिखा पहला गीत था, ‘आओ वीरो हिल मिल गायें वंदे मातरम’.

भरत व्यास ने ‘गुलामी’, ‘पृथ्वीराज संयोगिता’ और ‘आगे बढ़ो’ फ़िल्मों में अभिनय किया. ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’, ‘ढोला मरवड़’, ‘रामू चनड़ा’ फिल्मों की कथा, पटकथा और संवाद भी लिखे. ‘रंगीला राजस्थान’, ‘ढोला मरवड़’ का निर्देशन किया और ‘स्कूल मास्टर’ में संगीत दिया, मगर पहचान उनको गानों से ही मिली.


मंच के कवि के तौर पर भी उन्हें देश भर में विशिष्ट पहचान मिली. समय मिलने पर वे कवि सम्मलनों में शिरकत करते थे. ‘केसरिया पगड़ी’, ‘दो महल’, ‘बंगाल का दुष्काल’, ‘राणा प्रताप के पुत्रों से’, ‘अहमदनगर का दुर्ग’, ‘मारवाड़ का ऊंट सुजान’ उनकी चर्चित कविताएं हैं. ‘ऊंट सुजान’, ‘मरुधरा’, ‘राष्ट्रकथा’, ‘रिमझिम’, ‘आत्म पुकार’ और ‘धूप चांदनी’ उनके प्रमुख काव्य संग्रह. ‘तेरे सुर मेरे गीत’ और ‘गीत भरा संसार’ उनके गीत संग्रह और ‘रंगीला मारवाड़’, ढोला मारू’ एवं ‘तीन्यू एकै ढाल’ नाटक हैं.

उर्दू के बोलबाले के बीच पहराया हिंदी का परचम
भरत व्यास ने जब गीत लिखने शुरू किए, तब हिंदी फिल्मों के गीतों में उर्दू का भरपूर दखल था. साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलजार जैसे गीतकार अपने गीतों में खुले दिल से उर्दू शब्दों का उपयोग किया है. शैलेंद्र, नीरज, आनंद बक्शी का झुकाव भी उर्दू की ओर था. ऐसे में कवि प्रदीप, पं. नरेंद्र शर्मा, भरत व्यास जैसे गीतकार हिंदी का परचम लहराने के लिए जाने जाते हैं.

एक श्रेष्ठ फिल्म गीतकार की विशेषता यह होती है कि वह कहानी की मांग के अनुरूप गीत लिख पाता है. वी. शांताराम जैसे दिग्गज निर्देशक के पसंदीदा गीतकार भरत व्यास ने मांग के अनुरूप ही गीत नहीं लिखे, बल्कि गीतों में शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया. इसी कौशल के कारण वी. शांताराम का निर्माण- निर्देशन और पंडित भरत व्यास के गीत एक दूसरे के पर्याय बन गए थे.


जरा याद कीजिए फिल्म 'नवरंग' का गीत 'अरे जा रे हट नटखट'. होली के प्रतीक गीत बन चुके इस गीत के बोल जितने अनूठे हैं, उतना ही सम्मोहक फिल्मांकन. गीत को सुने या पढ़ें, स्मृति में होली के रंग छा जाते हैं :-

धरती है लाल आज, अम्बर है लाल
उड़ने दे गोरी गालों का गुलाल
मत लाज का आज घूँघट निकाल
दे दिल की धड़कन पे, धिनक धिनक ताल
झाँझ बजे चंग बजे, संग में मृदंग बजे
अंग में उमंग खुशियाली रे
आज मीठी लगे है तेरी गाली रे
अरे जा रे हट नटखट...


वी. शांताराम की ही अविस्मरणीय फ़िल्म 'दो आंखें बारह हाथ' का गीत 'उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा' वर्षा का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक गीत है. भरत व्यास अपने गीतों में शुद्ध हिंदी का प्रयोग कर इस धारणा को तोड़ते रहे कि भाव और  सम्प्रेषण का प्रवाह साधने के लिए उर्दू दरकार है. ‘श्यामल श्यामल बरन कोमल चरण’ (नवरंग), ‘बादलों बरसो नयन की कोर से’ (संपूर्ण रामायण), ‘जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है’ (सम्राट पृथ्वीराज चौहान), ‘आया ऋतुराज बसंत है’ (स्त्री) और ‘डर लागे गरजे बदरिया’ (राम राज्य) जैसे गीत हिंदी में भावाभिव्यक्ति के उदाहरण हैं.

भाषाई शुद्धता और क्लिष्ट शब्दों के उपयोग पर बहस
गीतों में भाषाई शुद्धता और क्लिष्ट शब्दों के उपयोग पर बहस होती रही है. क्या ही अद्भुत संयोग है कि इस सवाल पर दो अलग छोर के रचनाकारों की राय समान है. साहिर लुधियानवी ने भी कहा था कि गीत की पहली पंक्ति अगर समझ आ जाती है तो दूसरी पंक्तियों में उपयोग किए गए क्लिष्ट शब्दों का अर्थ श्रोता अपने अनुसार लगा ही लेते हैं.

दूसरी तरफ, भरत व्यास ने ख्यात रेडियो उद्धघोषक अमीन सायानी से चर्चा में कहा था- "मेरा विश्वास है कि हिंदी में हर तरह के भाव या रस को प्रकट करने का पूरा सामर्थ्य है. जहां तक क्लिष्ट भाषा की बात है, यदि ये गीत जनता की समझ में नहीं आते तो फिर भला इतना लोकप्रिय कैसे हो गए?'


सच ही कहा है इन दिग्गज गीतकारों ने. 'हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन' गीत की इन पंक्तियों को देखिए भरत व्यास की बात कितनी उपयुक्त प्रतीत होती है:

तपस्वीयों सी हैं अटल ये पर्वतों की चोटियांं
ये सर्प सी घूमेरदार, घेरदार घाटियां
ध्वजा से ये खड़े हुये हैं वृक्ष देवदार के
गलीचे ये गुलाब के, बगीचे ये बहार के
ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है
ये कौन चित्रकार हैं...

आज भी भरत व्‍यास के गीतों पर झूमता है श्रोताओं का दिल
भरत व्यास भाषाई शुचिता निभाते हुए रजत पटल के लिए साहित्य रच रहे थे. इस रचना तप का ही परिणाम है कि उनके गीतों आज भी पल भर में श्रोताओं के दिल को छूते हैं. विरह गीत सुन कर अश्रु बरस जाते हैं तो प्रेम गीत भावभीना कर देते हैं. कितने ऊंचे गीतकार हुए हैं भरत व्यास कि उनके गीत को कई लोग रचनाकार का नाम जाने बगैर ही गुनगुनाते हैं. न केवल गुनगुनाते हैं बल्कि प्रेरणा भी पाते हैं :

ये अंधेरा घना छा रहा
तेरा इनसान घबरा रहा
हो रहा बेखबर
कुछ न आता नज़र
सुख का सूरज छिपा जा रहा
है तेरी रोशनी में वो दम
जो अमावस को कर दे पूनम ...
जब ज़ुलमों का हो सामना
तब तू ही हमें थामना
वो बुराई करें
हम भलाई भरें
नहीं बदले की हो कामना
बढ़ उठे प्यार का हर कदम
और मिटे बैर का ये भरम
नेकी पर चले
और बदी से टलें
ताकि हंसते हुये निकले दम.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: July 4, 2021, 11:45 AM IST
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