अज्ञेय: हिंदी पत्रकारिता का 'दिनमान', पत्रकारों की नैतिकता से ही बचेगा समाज

जयंती विशेष: आज जब पत्रकारिता पर गोदी मीडिया होने का आरोप लग रहा है, ऐसे समय में जब सोशल मीडिया समूचे पत्रकारिता के चेहरे और चरित्र को बदल रहा है, ऐसे युग में जब पत्रकारिता के जनपक्ष में होने पर सवाल उठ रहे हों तब अज्ञेय की दृष्टि पत्रकारिता को राह दिखलाती है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 6, 2021, 10:00 AM IST
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अज्ञेय: हिंदी पत्रकारिता का 'दिनमान', पत्रकारों की नैतिकता से ही बचेगा समाज
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जन्‍म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ था.
हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित साहित्यकारों में गिने जाने वाले अज्ञेय का 7 मार्च को जन्मदिन है. हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, शैलीकार, कथाकार, ललित-निबंधकार अज्ञेय का एक परिचय पत्रकारिता और संपादन भी है. वे हिंदी की सर्वाधिक चर्चित पत्रिका 'दिनमान' के संस्‍थापक संपादक रहे हैं. शहीद भगत सिंह के साथी और आजादी के पहले करीब छह वर्ष तक जेल में बिताने वाले अज्ञेय ने समय पूर्व पत्रकारिता के क्षरण को भांप लिया था. वे दशकों पहले कह कर गए हैं कि 'हिंदी आज का एक भी पत्रकार या संपादक वह सम्मान नहीं पाता जो कि पचास-पचहत्तर वर्ष पहले के अधिकतर पत्रकारों को प्राप्त था. इस अप्रतिष्ठा का प्रमुख कारण उनके पास मानदंड और नैतिकता का नहीं होना है.' क्‍या हिंदी पत्रकारिता अपने इस पुरोधा संपादक के कहे में अपनी पुनर्प्रतिष्‍ठा के सूत्र तलाश सकती है?

यदि स्‍थूल परिचय देना हो तो हम कहेंगे कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जन्‍म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ था. अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े. भगत सिंह के साथी बने अज्ञेय 1930 में गिरफ़्तार हो गए. छह वर्ष जेल और नज़रबंदी भोगने के बाद जब आजाद हुए तो 1936 में कुछ दिनों तक आगरा के समाचार पत्र 'सैनिक' के संपादन मंडल में रहे. 1943 से 1946 तक ब्रिटिश सेना में रहे; इसके बाद इलाहाबाद से प्रतीक नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की. देश-विदेश की यात्राएं कीं. उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का काम किया. 1980 में उन्होंने वत्सलनिधि नामक एक न्यास की स्थापना की जिसका उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करना था. दिल्ली में ही 4 अप्रैल 1987 को उनकी मृत्यु हुई. 1964 में आँगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1978 में कितनी नावों में कितनी बार पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया.

सचिदानंद हीरानंद वात्‍सायन के 'अज्ञेय' के होने के पीछे भी कहानी भी दिलचस्‍प है और उनके साहित्यिक अवदान के दर्जनों पहलू हैं जिन पर विस्‍तार से बात की जा सकती है. मगर, फिलहाल तो चर्चा को उनके पत्रकार रूप तक केन्द्रित रखते हैं. जब भी हम अतीत की किसी घटना की तुलना वर्तमान से करते हैं और कोई परिणाम जांचने की कोशिश करते हैं तो अधिक काल्‍पनिक हो जाने का खतरा होता है. मगर पत्रकारिता में अज्ञेय की भूमिका पर काल्‍पनिक होने का खतरा कम है. हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि यदि आज अज्ञेय होते तो पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं क्‍या होती.

'कवि कहानीकार अज्ञेय संवेदना और दृष्टि' पुस्‍तक में शोधकर्ता डॉ. भरत सिंह लिखते हैं कि अज्ञेय और मुक्तिबोध ने जब लेखन का सूत्रपात किया था, उस समय देश में वामपंथी आंदोलन का प्रसार हो रहा था कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी. कांग्रेस के वामपंथी और कम्युनिस्ट एकजुट होकर साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को पुनः सक्रिय करने लगे थे. किसान-मजदूरों के संघर्षों की चिनगारियाँ राजनीतिक वातावरण में फैलने लगी थीं. इसी समय दोनों आजीविका के लिए संघर्ष के मैदान में उतरे. 1936 के पूरे वर्ष, अज्ञेय ने, 'सैनिक समाचार-पत्र, आगरा में संपादक के पद पर काम किया. फिर संपादन को छोड़कर मेरठ के किसान आंदोलन में कूद पड़े. मेरठ के बागपत कस्बे में किसान सम्मेलन का आयोजन हुआ था अज्ञेय ने लगातार कई दिनों और रात गाँवों में घूम-घूमकर किसान मार्च का आयोजन करने की तैयारियों में अपने को लगा दिया था. वे लगातार भाषण देते और किसान एकजुटता के लिए कई दिनों तक पैदल चलते रहे.
अज्ञेय के सहयोगी रहे बुजुर्ग पत्रकार त्रिलोक दीप ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया था कि संपादक अज्ञेय के दिमाग में हर समय कुछ नया करने का विचार घुमड़ता रहता था. अपनी ही खींचीं गई लकीर से बड़ी लकीर खींचने की ज़िद्द उनका स्‍वभाव बन गई थी. ऐसी धुन जिसके लिए उन्‍होंने हर संभव कार्य किया. दिनमान के संपादक के रूप में बिहार के सूखाग्रस्त इलाकों की यात्राएं की. जब गोवा के आज़ाद होने पर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने गोवा में महा सम्मेलन किया तो इसके कवरेज के लिए वे खुद गए. जबकि संपादक के नाते वे किसी भी रिपोर्टर को भेज सकते थे. इस सम्मेलन पर अज्ञेय की रपट पढ़ कर साहित्‍यकार फणीश्वर नाथ रेणु भी अचरज में पढ़ गए थे. अपनी प्रतिक्रिया में रेणु ने कहा था कि आप बड़े साहित्यकार हो, चित्रकार हो, फ़ोटोग्राफ़र हो, कवि हो, विचारक हो यह तो जानता था परंतु इतने ग़ज़ब के रिपोर्टर भी हो, यह अब जान पाया हूं.

सन 1965 में आरंभ हुई 'दिनमान' अज्ञेय के संपादन में निकली हिंदी की ऐसी पत्रिका बनी जिसने पत्रकारिता को साहित्‍य सी संवेदनशीलता और सरोकार से जुड़ाव का प्राण तत्व दे दिया. 'दिनमान' ने हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा और शैली दी. नवाचार और नए प्रयोगों के कारण 'दिनमान' हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का स्वर्णिम पृष्‍ठ बन गई. अज्ञेय ने अपने समय के सारे बड़े लेखकों को 'दिनमान' से जोड़ा. कवि रघुवीर सहाय तो उनके बाद दिनमान के संपादक हुए. दिनमान के बाद ने अज्ञेय नवभारत टाइम्‍स का संपादन किया. एक तरफ जहां उनके मार्गदर्शन में निकली दिनमान के रूप में हिंदी पत्रकारिता ने अपने शीर्ष को जिया तो अज्ञेय के समक्ष ही संपादक जैसी संस्‍था का क्षरण आरंभ हो गया था. शायद यही कारण था कि पत्रकारों एवं संपादकों की जिम्‍मेदारियों को लेकर चिंतित अज्ञेय ने कम होती प्रतिष्ठा के लिए संपादकों को ही जिम्मेदार ठहराया था. 'आत्मपरक' में अज्ञेय ने कहा है कि 'हिन्दी पत्रकारिता के आरंभ के युग में हमारे पत्रकारों की जो प्रतिष्ठा थी, वह आज नहीं है. साधारण रूप से तो यह बात कही जा सकती है, अपवाद खोजने चलें तो भी यही पावेंगे कि आज का एक भी पत्रकार या संपादक वह सम्मान नहीं पाता जो कि पचास-पचहत्तर वर्ष पहले के अधिकतर पत्रकारों को प्राप्त था. आज के संपादक पत्रकार अगर इस अंतर पर विचार करें तो स्वीकार करने को बाध्य होंगे कि वे न केवल कम सम्मान पाते हैं, बल्कि कम सम्मान के पात्र हैं- या कदाचित सम्मान के पात्र बिल्कुल नहीं हैं, जो पाते हैं पात्रता से नहीं इतर कारणों से. इस अप्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह है कि उनके पास मानदंड नहीं है. वहीं हरिशचन्द्रकालीन संपादक-पत्रकार या उतनी दूर ना भी जावें तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का समकालीन भी हमसे अच्छा था. उसके पास मानदंड थे, नैतिक आधार थे और स्पष्ट नैतिक उद्देश्य भी. उनमें से कोई ऐसे भी थे जिनके विचारों को हम दकियानूसी कहते, तो भी उनका सम्मान करने को हम बाध्य होते थे. क्योंकि स्पष्ट नैतिक आधार पाकर वे उन पर अमल भी करते थे- वे चरित्रवान थे.'

आज जब पत्रकारिता पर गोदी मीडिया होने का आरोप लग रहा है, ऐसे समय में जब सोशल मीडिया समूचे पत्रकारिता के चेहरे और चरित्र को बदल रहा है, ऐसे युग में जब पत्रकारिता के जनपक्ष में होने पर सवाल उठ रहे हों तब अज्ञेय की दृष्टि पत्रकारिता को राह दिखलाती है. अज्ञेय का यह कहना बेहद महत्‍वपूर्ण है कि पत्रकार अथवा संपादक को केवल विचार क्षेत्र में ही बल्कि कर्म के नैतिक आधार के मामले में भी अग्रणी रहना चाहिए. भारत में वे ही लोग पूजे गए जिन्होंने जैसा कहा वैसा ही किया. उनका यह कहना पत्रकारिता के लिए ही नहीं बल्कि समूचे समाज के लिए अहम् है कि मेरा सहज विवेक मुझे आश्वस्त करता है कि पत्रकारिता के मूल्‍य पूरे समाज के जीवन को अधिक गहरा, समर्थ और अर्थवान बना सकते हैं. अज्ञेय ने दिनमान के माध्‍यम से पत्रकारिता के जो प्रतिमान स्थापित किए थे वे इतने सालों बाद भी पाठकों की स्मृति में ताजा हैं. क्‍या 'वन मिनट रीड' में तब्‍दील हो रही हिंदी पत्रकारिता के उन सरोकारों और मूल्‍यों को नहीं बचाया जा सकता है, जिनकी चर्चा अज्ञेय ता-उम्र करते रहे हैं?(यहां व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: March 6, 2021, 9:10 AM IST
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