साल गुजरे मगर सावित्री बाई फुले का महिला शिक्षा का सपना अधूरा

सावित्री बाई फुले का जिक्र इसलिए कि 3 जनवरी को उनकी जयंती है और यह दिन उनके कार्यों, संघर्षों को याद करने के साथ ही उनके अधूरे कामों को पूरा करने का संकल्प लेने का सुअवसर है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 3, 2021, 10:28 AM IST
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साल गुजरे मगर सावित्री बाई फुले का महिला शिक्षा का सपना अधूरा
सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था.
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो/ क ख ग घ को पहचानो/ अलिफ़ को पढ़ना सीखो/ अ आ इ ई को हथियार/ बनाकर लड़ना सीखो.

साक्षरता के लिए सफदर हाशमी का यह गीत खूब चर्चित हुआ है. इस गीत से करीब सवा सौ साल पहले महाराष्ट्र की समाज सुधारिका सावित्री बाई फुले ने लिखा था, शूद्रों की चेतना जगाने के लिए/ है सर्वोत्तम शिक्षा का मार्ग/ शिक्षा से मिले ज्ञान, ज्ञान से प्राप्त होवे इंसानियत/ और पशुता होती है समाप्त. (सावित्रीबाई फुले, शूद्रों का दर्द : पीड़ा, शेखर पवार द्वारा अनुदित)

समाज के पिछड़े वर्ग और उनमें भी महिलाओं की शिक्षा के प्रति चिंता की इन दो अभिव्यक्तियों और इस अंतराल में हुए तमाम प्रयासों के बाद भी देश में स्त्री शिक्षा की स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है. वर्ष 2011 की जनगणना बताती है कि देश में महिला साक्षरता दर मात्र 64.46 फीसदी है, जबकि पुरुष साक्षरता दर 82.14 फीसदी है. साक्षरता के मामले में स्त्रियां अपने देश में पुरूषों से नहीं पिछड़ी है बल्कि वह तो दुनिया की अन्य स्त्रियों से भी पिछड़ी दिखाई देती हैं. उल्लेखनीय है कि वैश्विक महिला साक्षरता दर 79.7 प्रतिशत है. आज सर्वसाधन सुलभ होने के बाद यह स्थिति है तब समझा जा सकता है कि सावित्री बाई ज्योतिराव फुले के जीवनकाल में यानी 19 वीं सदी में क्या हाल रहे होंगे.

सावित्री बाई फुले का जिक्र इसलिए कि 3 जनवरी को उनकी जयंती हैं और यह दिन उनके कार्यों, संघर्षों को याद करने के साथ ही उनके अधूरे कामों को पूरा करने का संकल्प लेने का सुअवसर है. हममें से कई के मन में यह सवाल होगा कि सावित्री बाई फुले कौन है? सावित्री बाई फुले इस देश की पहली महिला शिक्षिका होने के साथ साथ पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं. उन्होंने अपना पूरा जीवन वंचित तबके खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में लगाया.
सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था. 9 वर्ष की उम्र में यानि 1840 में सावित्री बाई का विवाह ज्योतिराव गोविंदराव फुले यानि ज्योति बा फुले से हुआ था. विवाह के समय सावित्री बाई अनपढ़ थीं जबकि ज्योति बा फुले भी तीसरी कक्षा तक ही पढ़े थे. जिस दौर में शिक्षा पर केवल उच्च वर्ग के पुरूषों का ही अधिकार था उस समय में सावित्री बाई फुले पढ़ने का सपना देख रही थीं. दलित और महिलाओं के लिए शिक्षा ग्रहण को पाप कहने वाले दौर में ज्योति बा के सहयोग से सावित्री बाई न केवल पढ़ी बल्कि लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की शुरुआत की.

जात-पात और छुआछूत के उस युग में दलित बालिकाओं की शिक्षा की बात करना इतना सरल नहीं था. महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़े वाड़ा में नौ लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की. एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए. फुले दंपति के बालिका शिक्षा के इस कदम का ब्राह्मणों ने जमकर विरोध किया. महज 17 साल की उम्र में सावित्री अपने लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं. तब विरोधी रास्ते में उन्हें परेशान करने की भरसक कोशिश करते थे. सामाजिक दबाव बनाने के साथ मानसिक रूप से तोड़न के लिए उनके घर गुंडे भेजे गए. उनके बारे में यह तथ्य सर्वज्ञात है कि सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका करते थे. सावित्री बाई अपने थैले में एक साड़ी लेकर जाती थी और स्कूल पहुँच कर साड़ी बदल कर बालिकाओं को पढ़ाती थीं.

सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा ने 24 सितंबर, 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना की. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा भी शुरू की. उन्‍होंने पहला विधवा पुनर्विवाह 25 दिसम्बर 1873 को करवाया.
सावित्री बाई फुले का समय वह दौर था जब महज 12-13 वर्ष की उम्र में बालिकाओं की उम्रदराज पुरुषों से शादी कर दी जाती थी. कई कन्याएं किशोरावस्था में ही विधवा हो जाती थीं. सामाजिक मान्याता के अनुसार उनका केशवपन कर उन्हें कुरूप बनाया जाता था ताकि उनकी तरफ कोई पुरुष आकर्षित न हो सके. फिर भी ये विधवा बालिकाएं पुरुषों से बच नहीं पाती थीं और गर्भवती होने पर समाज का बहिष्कार झेलती थीं. सामाजिक बहिष्कांर और क्रूरता के चलते गर्भवती महिला आत्म हत्या या भ्रूण व शिशु की हत्या का मार्ग चुन लेती थी. इस अमानवीय बर्ताव से महिलाओं को बचाने के लिए ज्योति बा और सावित्रीमाई ने गर्भवतियों के लिए प्रसूतिग्रह शुरू किया.

फुले दम्पत्ति ने 28 जनवरी 1853 में अपने पड़ोसी मित्र और आंदोलन के साथी उस्मान शेख के घर में बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की. इसकी पूरी जिम्मेदारी सावित्रीबाई ने संभाली. 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' समाज की रूढि़यों से पीडि़त गर्भवती महिलाओं के लिए आश्रय स्थल था. उस समय यह समस्या कितनी व्यावपक थी इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि बाल हत्या प्रतिबंधक गृह में 4 सालों जैसे कम समय में ही 100 से अधिक विधवा महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया. विधवा केशवपन का विरोध करते हुए सावित्री बाई ने नाइयों की हड़ताल करवाई और उन्हें विधवा केशवपन ना करने के लिए प्रेरित किया.

28 नवंबर 1890 को बीमारी के चलते ज्योतिबा की मृत्यु हो गई थी. ज्योति बा के निधन के बाद सावित्री बाई ने ही उनका अंतिम संस्कार किया. इतना बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाने वाली वे देश की पहली महिला हैं. ज्योति बा के निधन के बाद सत्यशोधक समाज की जिम्मेदारी सावित्री बाई फुले ने निभाई. सावित्री बाई की एक पहचान उनका मराठी काव्य भी है. उन्होंने “काव्य फुले” और “बावन कशी सुबोध रत्नाकर” नामक ग्रंथ तैयार किए. अपनी कविताओं और लेखों में उन्होंनने सामाजिक चेतना का विचार मुखर किया है.

1897 में पुणे में फैले प्लेग के दौरान सावित्री बाई दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी थी. प्लेग से पीड़ित गरीब बच्चों के लगाए गए शिविर में पीड़ित बच्चे पांडुरंग गायकवाड़ की देखभाल के दौरान उन्हें भी प्लेग ने जकड़ लिया. इस संक्रमण के कारण 10 मार्च 1897 को सावित्री बाई का देहांत हो गया.


सावित्री बाई फुले से परिचित करवाने के लिए कही कई ये पंक्तियां कितनी ही ज्यारदा और सटीक क्योंत न हों, वे सावित्री बाई फुले के संघर्ष और कृतित्व को बताने में हमेशा कमतर ही होंगी. इन बातों को हम कई सालों से कहते, सुनते, पढ़ते लिखते आए हैं. मगर हकीकत कुछ और ही है. महिला शिक्षा हर पायदान पर पिछड़ी है. एक तो अभी भी बहुत कम परिवार हैं जो लड़कियों का स्कूल भेजना पसंद करते हैं. वे स्कूील भेजते भी हैं तो प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के बाद उनकी पढ़ाई बंद करवा देते हैं. आम समझ में राजस्थान को पुरातनवादी तथा बिहार को ज्ञान के लिए अधिक व्यग्र माना जाता है. मगर जनगणना के ही आँकड़े बताते हैं कि राजस्थान (52.12 प्रतिशत) और बिहार (51.50 प्रतिशत) में भी स्त्रीम शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की 2018 में जारी रिपोर्ट में बताया गया था कि 15-18 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 39.4 प्रतिशत लड़कियों का स्कूली शिक्षा हेतु किसी भी संस्थान में दाखिला नहीं हैं. ये लड़कियां पढ़ने नहीं जाती हैं बल्कि या तो घरेलू काम करती हैं या भीख मांगने, कमाई के अन्ये कार्यों से जुड़ी होती हैं. दूसरी, पढ़ लिख कर कॅरियर बनाने की चाह रखने वाली महिलाओं की दशा और संघर्ष की गाथा तो बहुत विस्तृरत है.

अकसर जब देश में महिला अधिकारों की बात होती है तब महिला जीवन स्थिति की तुलना में स्त्री शिक्षा का मुद्दा स्वत: ही दूसरे नंबर पर आ जाता है. हमारी पहली चिंता होती है कि कन्या भ्रूण हत्या कैसे रोंके, कन्या जन्म हुआ है तो उसे कैसे बचाएं, कैसे उसे पूर्ण टीकाकरण और पर्याप्त पोषण मिले ताकि वह बीमारी, कुपोषण या एनीमिया के कारण अपना जीवन ही न खो दे. यानि, घर संवारने की चिंता तो बाद में पहले यह सोचें कि इमारत बचाएं कैसे?


तमाम अध्ययनों में कहा गया है कि स्त्री समानता या स्त्री सशक्तिकरण का अभियान तब पूरा नहीं हो सकता है जब तक स्त्री आर्थिक रूप से आत्म निर्भर नहीं हो जाती है या उसके निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी नहीं मिल जाती है. यह तभी होगा जब स्त्री शिक्षित होगी. केवल साक्षरता से काम चलने वाला नहीं है. स्त्री समानता के नारों और अभियानों ने दबाव समूह का काम किया है और इस दबाव में स्त्रियों की मौजदूगी दिखलाई देने लगी है मगर यह उपस्थिति भी सतही है. कई मंचों पर खासकर निर्णायक जगहों पर महिला प्रति‍निधि मूक सहमति के तौर पर ही दिखाई देती है. वे कोरम पूरा करती हैं. आमतौर पर उनकी असहमति और विचार के लिए कोई जगह नहीं होती है. ऐसे में सावित्री बाई फुले को जयंती पर याद करने का उद्देश्यन रस्म अदायगी नहीं बल्कि महिला शिक्षा के उनके सपनों और लक्ष्यों को याद दिलाना भी है.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: January 3, 2021, 10:22 AM IST
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