कबीर जयंती पर विशेष: जिन्हें बचपन में रटते गए, फिर धीरे-धीरे भूलते गए

अपनी पुस्तक 'भारत एक सनातन यात्रा' से आचार्य रजनीश ओशो कहते हैं- ‘भाषा तो कबीर की टूटी-फूटी है. बिना पढ़े-लिखे थे. लेकिन भाव अनूठे हैं कि उपनिषद फीके पड़ें, कि गीता, कुरान और बाइबिल भी साथ खड़े, होने की हिम्मत न जुटा पाएं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 24, 2021, 11:18 AM IST
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कबीर जयंती पर विशेष: जिन्हें बचपन में रटते गए, फिर धीरे-धीरे भूलते गए
कबीर आज भी पुकार रहे हैं. उनके साथ जाने के लिए वास्‍तव का घर फूंकने की आवश्‍यकता नहीं है. ईगो, अभिमान, घमंड, ताकत व श्रेष्‍ठता के घर को फूंकने की जरूरत है.
कबीर से हमारा पहला परिचय पाठ्य पुस्‍तकों में उनकी रचनाओं को पढ़ने के दौरान होता है. संदर्भ, प्रसंग सहित व्‍याख्‍या करने और जीवनी लिखने के दौरान कबीर दास के बारे में उतना ही लिखा जाता है जितना बाल बुद्धि से समझा गया है. भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा के कवि कबीर को कभी संत कह कर संबोधित किया जाता है, तो कभी महात्‍मा.

पाखंड, कर्मकांड, धार्मिक अंधभक्ति का जमकर खंडन करने वाले कबीर प्रगतिशील कवि हैं जिनकी रचनाओं में ईश भक्ति, प्रेम, ज्ञान, सत्‍संग का अधिक मानव हितैषी पक्ष उजागर होता है. विडंबना यह है कि संत कबीर और उनके विचार पाठ्य पुस्‍तकों तक ही सीमित रहते हैं. परीक्षा खत्‍म उनकी सीख भी खत्‍म. बाद के जीवन में उन्‍हें गुरु प्रतिमा या संप्रदाय प्रमुख के रूप में याद रखा जाता है, उनकी शिक्षाओं को आचरण में उतारने के प्रयत्‍न न्‍यून ही होते हैं.

हम अब तक जान ही नहीं पाए हैं कि कबीर को पढ़ने से ज्‍यादा समझने की आवश्‍यकता है. उन्‍हें परम पुरूष बना कर ऊंचे आसान पर बैठा दिया जाता है. ऐसे आसान पर जहां विराजित व्‍यक्ति की पूजा की जाती है, उसके विचारों का पालन करने की श्रद्धा नहीं होती. अंधभक्ति का यह आवरण हटा कर देखेंगे तो कबीर के विचार पथ पर चल पाएंगे.

कबीर और उनके विचारों की बात इसलिए कि ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा को संत कबीर की जयंती मनाई जाती है और इस बार पूर्णिमा 24 जून को है. कबीर का जन्‍म (लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी) काशी में हुआ था. उनके जन्‍म के संबंध में अनेक किंव‍दंतियां प्रचलित हैं. उनका लालन पालन जुलाहा परिवार में हुआ था.
जन्‍म को लेकर जो भी मान्‍यताएं हों, मूल बात यह है कि कबीर ने अपने लेखन में समय के समाज के आडंबर, धर्म भीरूता, पाखंड पर करारी चोट की हैं. वे धर्म और ईश आस्‍था को उसके वास्‍तविक अर्थ के साथ प्रस्‍तुत करने वाले सिद्ध संत थे. उनके दोहों, साखियों में वह राह दिखती है जो जीवन प्रबंधन के लिए आवश्‍यक है.

अपनी स्‍कूली शिक्षा के दौरान किताबों में पढ़े इन दोहों को जरा याद कीजिए :

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब.पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब..

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय.
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय..

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय.
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये.
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए..

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर.
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर..

निंदक नियेरे राखिये, आंगन कुटी छावायें.
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए..

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय.
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय..

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय.
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय..

क्‍या ये दोहे पढ़ाई की दुनिया के बाहर हमारे लिए सबसे बड़े जीवन सूत्र नहीं हैं? सफलता के फंडों की तलाश में खोये युवाओं, अध्‍यात्‍म गुरु की खोज में कथा वाचकों के पीछे भाग रही दुनिया, अंध भक्ति में धर्म भीरू और कट्टर हो रहे समाज के लिए वास्‍तविक गुरु मंत्र नहीं हैं ये दोहे?

मगर यह बात हमें समझ कहां आती है? अपनी पुस्तक 'भारत एक सनातन यात्रा' से आचार्य रजनीश ओशो कहते हैं- ‘भाषा तो कबीर की टूटी-फूटी है. बिना पढ़े-लिखे थे. लेकिन भाव अनूठे हैं कि उपनिषद फीके पड़ें, कि गीता, कुरान और बाइबिल भी साथ खड़े, होने की हिम्मत न जुटा पाएं. भाव पर जाओगे तो.... भाषा पर अटकोगे तो कबीर साधारण मालूम होंगे.

कबीर ने कहा भी- लिखा-लिखी की है नहीं, देखा-देखी बात. नहीं, पढ़कर नहीं कह रहे हैं. देखा है आंखों से. जो नहीं देखा जा सकता, उसे देखा है, और जो नहीं कहा जा सकता, उसे कहने की कोशिश की है. बहुत श्रद्धा से ही कबीर समझे जा सकते हैं. ऐसा न हो, तो समझना कि कबीर के शब्द पकड़े, शब्दों की व्याख्या की, शब्दों के अर्थ जाने; पर वह सब ऊपर-ऊपर का काम है. जैसे कोई जमीन को इंच-दो इंच खोदे और सोचे कि कुआं हो गया. गहरा खोदना होगा. कंकड़-पत्थर आएंगे, कूड़ा-कचरा आएगा. मिट्टी हटानी होगी. धीरे-धीरे जलस्रोत के निकट पहुंचोगे.

कितनी अर्थपूर्ण बात कही है ओशो ने. कबीर को याद करने वाले उनकी बातों के मर्म तक कितना पहुंच पाए हैं? बाल्‍यावस्‍था में संत कबीर की वाणी को बार-बार रटने वालों को जीवन के मध्‍यकाल में कबीर की वाणी कितनी याद रहती है?’ उन्‍हें भगवान बनाने वालों को कितना याद रहता है कि मोक्ष की लालसा में काशी में प्राण त्‍यागने वालों की आंखें खोलने के लिए कबीर ने काशी छोड़कर उस मगहर में प्राण त्यागने का निर्णय किया, जिसे लोग नर्क का द्वार कहते थे.

यह विडंबना ही है कि हर महापुरूष की तरह कबीर को भी अपनुयायियों ने भगवान बना कर पूजा मगर धार्मिक रूढ़ियों और कर्मकांडों को तोड़ने में अधिकांश विफल रहे. कबीर के काल में भी धार्मिक पाखंड और भेदभाव शीर्ष पर था. आज भी है. इतने सालों में पहनावा बदला है मगर सोच तो वही है. बल्कि अधिक संकीर्ण हुई है.

कबीर होते तो आज भी वे यही कह रहे होते :

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना

आज भी हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुस्लिमों को रहमान प्यारा है. दोनों राम-रहीम के चक्कर में आपस में लड़ मिट रहे हैं लेकिन कोई मर्म को जान ही नहीं जान पाया.

कबीर ही थे जो उस वक्‍त भी कह गए और आज भी कहते :

मोको कहां ढूंढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में,

ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में,

ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग वैराग में,

खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पलभर की तलास में,

कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वासों की स्वास में.

कहां हैं वह समाज जो स्‍वासों की श्‍वांस में बसे प्रभु को पहचान सके? वे तो दशकों पहले कह गए हैं:

कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ,
जो घर फूंके आपनौ, चले हमारे साथ.

कबीर आज भी पुकार रहे हैं. उनके साथ जाने के लिए वास्‍तव का घर फूंकने की आवश्‍यकता नहीं है. ईगो, अभिमान, घमंड, ताकत व श्रेष्‍ठता के घर को फूंकने की जरूरत है. कबीर के कहे की हमारे समय में नए संदर्भ, प्रसंग सहित व्‍याख्‍या कर आचरण में उतारने की आवश्‍यकता है. अन्‍यथा तो हर बार की तरह यह जयंती भी एक दिन का उत्‍सव बन कर गुजर जानी है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: June 24, 2021, 11:18 AM IST
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