शानी न होते तो अल्‍पसंख्यकों का असुरक्षित होना कौन बताता?

भारतीय मुसलमानों की जिंदगी का सच जितनी शिद्दत से पहली बार किसी मुस्लिम लेखक ने उजागर किया था तो वे थे गुलशेर खां शानी. उनका उपन्‍यास ‘काला जल’ भारत के मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम जीवन यथार्थ चित्रण के लिए जाना जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 16, 2021, 11:40 AM IST
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शानी न होते तो अल्‍पसंख्यकों का असुरक्षित होना कौन बताता?
शानी का पूरा नाम गुलशेर खां शानी है, उनका जन्म 16 मई 1933 को हुआ.
साहित्‍य के गलियारों में अकसर यह बहस होती है कि दलित साहित्‍य, महिला साहित्‍य, मुस्लिम साहित्‍य की प्रतिनिधि रचना क्‍या इसी वर्ग के लोग कर सकते हैं या कोई ‘बाहरी’ भी अपनी अनुभूति के स्‍तर से इन वर्गों के हालात को समझकर लिख सकता है? इस बहस से इतर मूल मुद्दा यह है कि दलित, मुस्लिमों और महिलाओं की समाज में दुर्गति और उत्‍पीड़न उजागर होने के बाद कितने ही बरस गुजरे तो क्‍या उनकी स्थिति में बदलाव आया है? इस सवाल का मोटा सा जवाब होगा- नहीं. हमारा समाज इन वर्गों के उत्‍पीड़न से मुंह फेरे रहता है और जब कोई गुलशेर खॉं शानी भारतीय मुस्लिमों की असली स्थिति से पर्दा हटाता है तो समाज को यह सच स्‍वीकार करने में दिक्‍क्‍त होती है. इसी अनदेखी का नतीजा है कि शानी कदम कदम पर स्‍वयं को वंचित महसूस करते हैं. यही कारण है कि भारतीय मुसलमानों की असमानता का ‘काला जल’ आज भी उतना ही गंदला है.

भारतीय मुसलमानों की जिंदगी का सच जितनी शिद्दत से पहली बार किसी मुस्लिम लेखक ने उजागर किया था तो वे थे गुलशेर खां शानी. उनका उपन्‍यास ‘काला जल’ भारत के मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम जीवन यथार्थ चित्रण के लिए जाना जाता है. शानी ने मुसलमानों के अपने ही देश में पिछड़ जाने का दर्द बयां किया है. उन्‍हीं शानी की 16 मई को जयंती है. वे 16 मई 1933 को अविभाजित मध्‍य प्रदेश के आदिवासी जिले बस्तर में जन्‍मे थे. शानी ने कुल मिलाकर छह उपन्यास लिखे-‘कस्तूरी’, ‘पत्थरों में बंद आवाज’, ‘काला जल’, ‘नदी और सीपीयां’, ‘सांप और सीढ़िया’, ‘एक लड़की की डायरी’. इनमें ‘काला जल’ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है. इसे भारतीय मुस्लिम समाज और संस्कृति को समझने का सबसे श्रेष्‍ठ माध्‍यम कहा जाता है. 1972 में वह मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सचिव नियुक्त हुए. साक्षात्कार' पत्रिका के संस्थापक-संपादक बने. 1978 में परिषद से सेवा मुक्त होने के बाद वे दिल्ली पहुंचे. उन्‍होंने कुछ समय नवभारत टाइम्स के रवि वार्ता का संपादन किया. 1980 में साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के संस्थापक-संपादक बने. अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘कहानी’ का भी उन्होंने संपादन किया. मध्यप्रदेश सरकार ने उनके साहित्यिक अवदान का मूल्यांकन करते हुए, अपने सर्वोच्च सम्मान ‘शिखर सम्मान’ से नवाजा. शानी की कई कहानियां विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं. 9 फरवरी, 1995 को शानी इस जहान से रुखसत हुए.

शानी का रचना संसार व्‍यापक है. उन्‍होंने ‘युद्ध’, ‘बिरादरी’, ‘एक नाव के यात्री’ और ‘इमारत गिराने वाले’ जैसी कहानियां भी लिखी हैं. मगर सबसे अधिक चर्चित हुआ तो ‘काला जल’. मप्र में कला-संस्‍कृति को आकाश देने वाले अशोक वाजपेयी के अनुसार शानी अपनी और आस-पास के जीवन से लगातार बेचैन रहने वाले व्यक्ति थे. उन्हें अपनी अल्पसंख्यकता का गहरा-तीखा अहसास था. वे बस्तर जैसे आदिवासी अंचल से भोपाल और फिर भोपाल से दिल्ली आए थे. इस अहसास से उन्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकी कि वे अन्ततः हर जगह से हकाले गये-उन्हें हर बार जबरन कुछ छोड़ना पड़ा.

शानी का साहित्य कुल मिलाकर हाशिए से देखी पायी सच्चाई के बेलाग और संत्रास्त बखान का साहित्य है. शानी को अपने हाशिए की स्थिति मंजूर नहीं थी और वे ऐसा होने के विरुद्ध अपनों से और दूसरों से एक अनथक लड़ाई में जिंदगी भर मुब्तिला रहे. पर उनमें अपने हाशिए पर होने की बात को पहचानने की हिम्मत थी. हाशिए पर होने भर से उनकी हिस्सेदारी कम नहीं हो जाती थी.
‘काला जल’ 1961 में लिख लिया गया था मगर अनेक हां, ना के बाद 1965 में कथाकार राजेंद्र माथुर के प्रकाशन से यह छप कर आया. बकौल राजेंद्र माथुर अगर शानी न होता तो हम आत्ममुग्धों, संस्कृति-धर्म की स्व-घोषित इकहरी महानताओं के शंखों-घोंघों में कैद जगद्गुरुओं को झकझोर कर कौन दिखाता कि बहुसंख्यकों के बीच अकेले और असुरक्षित होना क्या होता है? क्या होता है पाकिस्तान, बंगलादेश और कुवैत में हिन्दू होकर रहना? शानी कुछ ज्यादा ही ‘लाउड’ हो, मगर वह ‘फेक’ तो नहीं ही था. लिटरेटवर्ल्ड के ‘संस्मरण’ में शानी की बेटी सूफ़िया ने याद किया था कि आज जब मैं उनसे की गयी बातचीत के क्षण याद करती हूं या उनकी किताबें पढ़ती हूं तो लगता है कि पापा का बस्तर से दिल्ली का सफर न सिर्फ लम्बा था बल्कि वो गर्म रेत पर नंगे पांव चलने के समान ही था. उन्हें हज़ारों बार ये एहसास कराया गया कि तुम मुसलमान हो. तुम हिंदी में लिखते हो. तुम हिंदी के मुसलमान साहित्यकार हो. ऐसा क्यों कहा जाता था उन्हें. बार–बार अलग क्यों कर दिया जाता था. सूफ़िया कहती हैं ‘उनकी कहानियों को पढ़िए तो आपको स्पष्ट कारण मिलेगा कि शानी जी को गुस्सा क्यों आता था. ’

एक दिन ऐसे ही अच्छे मूड को देखते हुए सूफ़िया ने पूछा था–‘पापा, आपको बात-बात पर गुस्सा क्यों आता है.’ तब उन्होंने एक लम्बी सांस लेते हुए जवाब दिया था – ‘बेटे हम ऐसे होते नहीं, लोग हमें बना देते हैं.’ शानी कई बार चिढ़ भी जाते थे कि ‘मुझे अल्लाह ने क्यों जगदलपुर बस्तर में ही पैदा किया. क्यों गुलमेर ख़ां के यहां पैदा किया. मुझे दिल्ली या आगरा में ही क्यों नहीं पैदा किया राजेंद्र यादव की तरह.’ सूफ़िया कहती हैं ‘प्रतिरोध का जो सफर उन्होंने तय किया था नंगे पांव, उसकी तपिश, उसकी तकलीफ़ तो जबान पे आएगी न.

शानी ने बेबाकी से मुस्लिम समाज के साथ हो रहे भेद का ही वर्णन नहीं किया बल्कि मुस्लिम समाज में आ रहे आडंबरी बदलाव को भी व्‍यक्‍त किया है. मुहर्रम पर मातम मनाने आये लोगों का सच जाहिर करते हुए वे लिखते हैं; “इंद्रा के किनारे हम सब लोग पिकनिक करने आये थे.” शानी ने यह बात 1961 में लिखी थी मगर अब यह कथन हर शहर का सच हो गया है. मुहर्रम के दिन भोपाल के करबला के रोड पर सज आई गुब्‍बारों, चना जोर गरम और अन्‍य दुकानों के दृश्‍य मातमी दिन के पिकनिक में बदल जाने के गवाह हैं.
हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही’ कहते हैं कि शानी का काला जल सिर्फ लेखक की अपनी कहानी न होकर, पूरे मध्यवर्गीय मुस्लिम समुदाय, और उससे भी ज्यादा, सभ्य कहलाए जाने वाले समूचे भारतीय समाज से किसी हद तक कटे और पीछे छूटे हुए मुस्लिम समाज का रूपक बनकर उभरता है.


यह बात खास तौर पर रेखांकित करने योग्य है कि इस उपन्यास से पहले शायद ही कभी मुस्लिम समुदाय का इतना प्रामाणिक चित्रण किसी दूसरी किताब में हुआ हो. दरअसल अभिशाप की काली छाया हमारे चारों तरफ है… समूचे भारतीय समाज में, जिससे कोई भी संवेदनशील भारतीय बच नहीं सकता. इसलिए सवाल सिर्फ मुस्लिम समाज का नहीं है. आधुनिक भारतीय मध्यम वर्ग को मुस्लिम, हिन्दू या दूसरे मजहबी समुदायों में बांटकर देखा और समझा भी नहीं जा सकता. ‘काला जल’ उपन्यास में दो नायक हैं : एक ख़ुद शानी और दूसरा बब्बन. आज जब देश में हम अन्‍य वर्गों की तुलना में मुस्लिमों की स्थिति का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि आज भी किसी शानी या किसी बब्‍बन के लिए समाज वैसा ही है जैसा ‘काला जल’ के दौरान था. शानी का ‘काला जल’ हर ओर दिखलाई देता है. यह जल साफ होने के बदले अधिक गंदला महसूस होता है. अफसोस यह है कि इस कलुषता को कम करने के प्रयास भी समय के साथ बढ़ने की जगह घटते महसूस होते हैं. शानी आज होते तो वंचित होने का उनका दर्द और अधिक होता. लेखक के रूप में वंचित, अल्‍पसंख्‍यक समाज के रूप में वंचित.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: May 16, 2021, 11:39 AM IST
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