विश्‍व जल दिवस: बे-पानी होते समाज में पानीदार होने की दरकार

एनजीटी में वर्ष 2018 में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि देश में 2009 में जहां 2700 अरब घन मीटर भूमिगत जल था, वहीं दस साल बाद 2019 में 411 अरब घन मीटर भू जल ही बचा है. यह गिरावट की बेहद ही भयावह तस्वीर है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 22, 2021, 12:54 PM IST
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विश्‍व जल दिवस: बे-पानी होते समाज में पानीदार होने की दरकार
2019 में 411 अरब घन मीटर भू जल ही बचा है.
दृश्‍य 1 : साल 2019 की गर्मियों में भारत के छठे सबसे बड़े शहर चेन्नई के लोगों ने पहली बार एक ट्रेन को अपने लिए पानी लाते हुए देखा. नीति आयोग के मुताबिक चेन्नई भारत के उन 21 शहरों में से एक है जहां साल दर साल जल संकट गहरा रहा है. भारत ही क्‍यों, मिस्र की राजधानी काहिरा भी भयानक जल संकट देख रहा है, जबकि प्रकृति ने उसे नील नदी का वरदान दिया है. मगर यहां पेयजल जुटाना सबसे बड़ी समस्‍या है.
दृश्‍य 2 : जमीन पर पानी सूखता है तो उम्‍मीद आसमान की ओर ताकती है. हर साल मौसम विभाग मानसून के सामान्य रहने का अनुमान लगात है मगर सामान्‍य बारिश औसत आंकड़ों में ही होती है. मौसम विज्ञानियों का मानना है कि कुछ सालों से बारिश का ट्रेंड बदल रहा है. दुनिया में नहीं बल्कि भारत में भी पिछले तीन सालों में मानसून का पैटर्न बदला है. यही कारण है कि कहीं तेज बारिश बाढ़ लाती है, कुछ घंटों में सर्वाधिक वर्षा के रिकार्ड तोड़ती है तो कहीं हर साल बढ़ने वाला सूखा हलक सूखाता है.
दृश्‍य 3 : हर साल गर्मियों में मध्‍य प्रदेश के कई हिस्सों में कुंए और नलकूप सूखने पर लड़ाई झगड़े, पानी की राशनिंग और सिर पर पानी ढ़ो कर लाने की स्थितियां बनती हैं. 2019 में जहां कहीं थोड़ा बहुत पानी था वहां लंबी कतारें तनाव की आशंका बढ़ा रही थी. जनता को पानी देने के लिए जलस्रोतों की पुलिस से पहरेदारी करवाने की नौबत आ गई थी. 2020 में भी कोरोना से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को पानी जुटाने के लिए जमकर तोड़ा गया था.

आकाश, धरती और पाताल में गुम होते पानी की चिंताएं क्‍या कम थी कि इंसान की आंखों और संवेदनाओं का पानी भी सूखने लगा है. एक वो दौर था जब सिख गुरु गोविंद सिंह जी के दरबार में सेवादार भाई घनैया युद्ध के दौरान अपने सैनिक ही नहीं दुश्‍मनों सेना के सिपाहियों को भी पानी पिलाने की सेवा करते थे. वे सेवा करते समय कभी यह नहीं सोचते थे कि जिसे पानी पिला रहे है, वो दोस्त है या दुश्मन.
95वें साल पहले बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस बुनियादी अधिकार पानी के लिए गरिमा की लड़ाई लड़ी थी. बाम्‍बे स्‍टेट के महाड़ में नियम था कि दलित सार्वजनिक तालाब या कुएं से पानी नहीं पी सकते थे. विधानसभा दलितों को सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी पीने का अधिकार दे चुकी थी पर अगड़ी जाति के लोग दलितों को यह अधिकार देना नहीं चाहते थे. फिर क्‍या था, 20 मार्च 1927 को बाबा साहब अपने समर्थकों के साथ महाड़ के चवदार तालाब पहुंचे और पानी पी कर रूढ़ी को तोड़ दिया. मगर ऊंची जाति के लोगों ने ‘गोबर और गौमूत्र’ डालकर तालाब के पानी को शुद्ध किया. अब 95 साल बाद उप्र में मंदिर में पानी पी लेने पर पीट दिया जाता है.

इस तरह हमारे भीतर लगातार सूख रहे संवेदना के पानी, धरती पर जल की कमी, उसके अपव्‍यय और जल संरक्षण को लेकर जो चिंताएं कुछ बरस पहले तक 'कागजी' मानी जा रही थीं, वे अब हकीकत में सामने आ रही हैं. क्‍या विडंबना है कि एक तरफ अत्‍यधिक पानी से जान जा रही है तो दूसरी तरफ पानी का न होना जानलेवा साबित हो रहा है!

एनजीटी में वर्ष 2018 में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि देश में 2009 में जहां 2700 अरब घन मीटर भूमिगत जल था, वहीं दस साल बाद 2019 में 411 अरब घन मीटर भू जल ही बचा है. यह गिरावट की बेहद ही भयावह तस्वीर है.
हमारे आसपास साफ पेयजल जुटाने के लिए रोज की जा रही जद्दोजहद को देख कर पानी के संकट की भयावहता का अंदाजा लगाना आसान है मगर फिर भी आंकड़ों को भी देख लेना चाहिए. नीति आयोग हमें चेता चुका है कि 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जाएगी. रिपोर्ट में जल संसाधनों और उनके उपयोग की समझ को गहरा बनाने पर जोर दिया गया है. अनुभव यह है कि जल संकट भोगने वाले लोग पानी मिलते हैं अपनी परेशानी भूल उसे बहाने में संकोच नहीं करते हैं. सरकार के तमाम अभियानों के बाद भी यह चिंता गहराती जा रही है कि अन्‍य संसाधनों की ही तरह पानी भी कुछ लोगों के कब्‍जे में जा रहा है. पानी भी केवल सक्षम और धनी समुदाय के अधिकार में जा रहा है. पहले उच्‍च वर्ग का जल स्रोतों पर एकाधिकार था अब पानी धनाढ्यों के बूते की चीज होता जा रहा है. सभी को पानी उपलब्‍ध करवाने के नाम पर जल वितरण व्‍यवस्‍था और जल स्रोतों को निजी हाथों में देने की प्रक्रियाएं जारी हैं. अगर ऐसा हुआ तो साफ पेयजल के दाम बाजार के हिसाब से तय होंगे और आम जनता की पानी तक पहुंच ही नहीं होगी. जिसके पास पैसा होगा पानी उसका होगा.

मध्‍य प्रदेश में पेयजल के निजीकरण का ऐसा ही पहला प्रयास खण्डवा में किया गया था जो बुरी तरह विफल हुआ है. इसलिए, पानी का तंत्र स्थानीय निकाय, जल संसाधन विभाग, जन स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग आदि के ही हाथ में होना चाहिए. सरकारों को जलस्रोतों की सुरक्षा तथा उसमें संचित पानी के उपयोग को परिभाषित करना होगा. यह तो सरकार का पक्ष है. इस सिक्‍के का दूसरा पहलू जनता है. जब से समाज ने जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ सरकार पर जिम्‍मा छोड़ा है तब से जल संकट गहराता जा रहा है. समाज को पानी बचाने और पानी के सही उपयोग में अपनी भूमिका फिर पहचाननी होगी. गर्मियों में जल संकट के बीच सिर पर बर्तन रख कई किलो मीटर दूर से पानी लाते बच्‍चों और महिलाओं की तस्‍वीरों को देख आप चिंतित होते हैं और फिर बिना सोचे समझे व्‍यर्थ पानी बहाते हैं तो आपसे कुछ नहीं कहा जाना चाहिए.... सिस्‍टम का बहाना न बनाइये. उसे कोसिये भी मत. सिस्टम में सुधार की दरकार है.

मगर हम व्‍य‍क्तिगत स्‍तर पर तो सजग हो ही सकते है न? कम से कम पानी बचाने, पेड़ न काटने, पॉलीथिन का उपयोग सीमित या बन्द करने, एसी पर निर्भरता घटाने जैसे मामलों में तो हम पहल कर ही सकते हैं.


आज विश्‍व जल दिवस है और आज यह पहल शुरू करने का दिन है. गौरतलब है कि पूरे विश्व में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है. वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा ने इस दिन को वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय लिया गया. 26 सालों बाद अब वर्ष 2021 के विश्व जल दिवस की थीम है "पानी को महत्व देना” यानि पानी के महत्‍व को समझाना. ऊपर कही गई बातों में से अधिकांश अलग अलग रूपों में दर्जनों बार दोहराई जा चुकी है मगर हम पर असर होता ही नहीं है. वरना तो आती जाती रस्‍सी पत्‍थर पर भी निशान कर ही देती है. पत्‍थर होते इंसान में क्‍या अब पानी के प्रति समझदार होने की किसी तरह की उम्‍मीद की जा सकती है?

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
पंकज शुक्‍ला

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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First published: March 22, 2021, 12:43 PM IST
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